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धैर्य

हे अर्जुन,
सूर्यास्त को देखकर
न धैर्य छोड़ो,
न धनुष;
हो सकता है
सूर्य गया हो
जयद्रथ को बुलाने!

✍️ चिराग़ जैन

काँच

मैंने काँच से सीखा है
कि
दुनिया को
सच दिखाने के लिए
छोड़ना ही पड़ता है
पारदर्शी स्वभाव

✍️ चिराग़ जैन

गए साल को सलाम

ऐ गये साल
तुझे मैं न भूल पाऊंगा

तू मेरे कितने ही ख़्वाबों को सच बना के गया
तू मेरी ज़िन्दगी में ख़ुशनसीबी ला के गया
मैं क्या गिनाऊँ, तेरे पहले क्या न था मुझमें
मैं क्या बताऊँ, तूने क्या सुक़ूं भरा मुझमें

जो तुझसे पहले मिला था, वो कुछ छिना भी है
मेरे वजूद मेें ‘कुछ’ ख़ैर के बिना भी है
जो साँस आयी, उसका जाना तय हुआ समझूँ
जो मिल रहा है उसी को फ़क़त दुआ समझूँ
ये खेल ज़िन्दगी का अपने हाथ है ही नहीं
है कौन, जिसके मुक़द्दर में रात है ही नहीं
हरेक रात के बाद आई सुब्ह, क्या कम है
बहुत ख़ुशी है ज़िन्दगी में, ज़रा-सा ग़म है
ये ग़म भी याद की लज़्ज़त बढ़ाये जाता है
ख़ुशी की ख़ुश्कियों को नम बनाये जाता है

जो लम्हा बीत रहा है, उसे सलाम करूँ
बस इस तरह मैं ज़िन्दगी का एहतराम करूँ
मैं नये साल में तुझसे न मुँह चुराऊंगा
ऐ गये साल
तुझे मैं न भूल पाऊंगा

✍️ चिराग़ जैन

नए घर में

नए फ्लैट की दीवारों पर
धीरे-धीरे उभर रहा है
हमारा घर

माॅड्यूलर किचन के खोपचों से
आँख बचाकर
एक कोने में पालथी मारकर बैठ गया है
सरसों के तेल का पीपा

सभी नए कंटेनरों के बीच
चुपके से जा छुपी है
युगों पुरानी हींग की डिब्बी!

बरसों से इकट्ठे हुए शो-पीस
चहक कर जा बैठे हैं
इस-उस टीवी पैनल पर

पापा के लिए बनी
स्पेशल अलमारी ने
सबको संजो लिया है थोड़ा-थोड़ा;
थोड़े-थोड़े हम सब
पसरने लगे हैं
माँ के कमरे तक

‘कोई फ़ालतू सामान नए घर में नहीं जाएगा’
के संकल्प ने
‘ये तो रख लो, ज़रूरत पड़ती रहती है’
के अनुरोध से
हार मान ली है

नपे-तुले घर में
सहेज लिए गए हैं कुछ एक्स्ट्रा बिस्तर
ताकि तीनों बहनों के
एक साथ आने पर भी
छोटा न लगे
हमारा नया घर

मेरे व्यवस्थित ऑफिस की एक दराज़ में
दर्ज हो गई हैं मेरी अव्यवस्थित पर्चियाँ;
मेरे बैडरूम की ड्रेसिंग का शीशा
सज गया है
एक छोटी लाल बिंदी से;
एकदम नए दरवाज़ों के पीछे
उभर आई हैं खूँटियाँ

चमचमाते हुए मंदिर में
विराज चुकी है
साठ-सत्तर साल पुरानी तस्वीरें

नए स्टाइल की डिजाइनर लाइब्रेरी में
कतार बांधकर खड़ी हो चुकी हैं
मेरी ‘सारी’ किताबें
जो बहुत देर तक छाँटने के बावजूद
एक भी कम नहीं हुई

हाइड्रोलिक डबल बैड के
स्टोरेज बॉक्स में बैठकर
लगाया जा रहा है सामान

ख़ूबसूरत बालकनी की जाली में
लटक गई है
काली पुती हुई हांडी

माँ की शादी में मिली
सिलाई मशीन
माँ के बिस्तर से दो हाथ दूर बैठी
सी रही है
नए घर में
पुरानी यादें

पैकिंग के सारे कार्टन
विदा कर दिए गए हैं
और उनके भीतर से निकलकर
हम सब
पूरी शिद्दत से
बसे जा रहे हैं
घर के रोम-रोम में!

✍️ चिराग़ जैन

इमारत और झोंपड़ी

झोंपड़ी को यह नहीं भूलना चाहिए
कि बड़ी इमारत का मलबा भी
झोंपड़ी से ऊँचा होता है।

और मलबे को भी
यह नहीं भूलना चाहिए
कि मलबा
कितना भी ऊँचा हो जाए,
उसे इमारत नहीं कहा जा सकता।

इमारत ध्यान रखे
कि चाटनेवाले दीमक कहलाते हैं
और
मरम्मत की आवाज़ें
शोर होती हैं, संगीत नहीं!

झोंपड़ी ध्यान रखे
कि इमारत पर कीचड़ फेंकेगी
तो ओछी कहलाएगी
और अपना आंगन लीपती रहेगी
तो मज़बूत भी बनी रहेगी
और सुन्दर भी!

✍️ चिराग़ जैन

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