Protected: रावण-शूर्पणखा सम्वाद
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परिपक्वता एक सिद्धि है जो थोड़े नैष्ठुर्य, थोड़ी कायरता और थोड़ी निर्लज्जता की साधना से प्राप्त होती है।
✍️ चिराग़ जैन
कई बार ऐसा महसूस होता है कि धरती पर हमारा जन्म ही केवल काग़ज़ सम्भालने के लिए हुआ है। आपके पास काग़ज़ हैं, तो सब कुछ है। आपके पास घर है, लेकिन घर के काग़ज़ नहीं हैं तो भले ही आप महल में रह रहे हो, सरकार के लिए आप बेघर हो। लेकिन सड़क पर रहनेवाले बेघर के नाम की, किसी मकान की रजिस्ट्री अगर सरकारी बाबू को मिल गई तो फिर वो लाख सिर पटक ले, उसे बेघर नहीं माना जाएगा।
कोई पैदा हुआ तब माना जाता है, जब उसके पैदा हो जाने का काग़ज़ बरामद हो जाए। ऐसे ही कोई मरा हुआ भी तब माना जाता है जब नगर निगम उसके मरण का दस्तावेजीकरण कर देता है। और ये मरने का काग़ज़ हासिल करने के लिए भी बहुत काग़ज़ लगाने पड़ते हैं। भले ही नगर निगम का पूरा महकमा किसी की शवयात्रा में सशरीर शामिल हुआ हो, भले ही स्वयं यमराज किसी के मरने की गवाही देने उपस्थित हो जाएं, लेकिन काग़ज़ लगाए बिना मरण प्रमाण-पत्र नहीं मिलेगा। उल्टे कोर्ट, यमराज को अपने यमराज होने के कागज़ प्रस्तुत करने का आदेश भी दे सकता है। आखिर हर चीज़ का कोई सिस्टम होता है।
मनुष्य जाति ज्यों-ज्यों विकसित हुई, त्यों-त्यों इन काग़ज़ों को सम्भालनेवाले लोग, पेशे और विभाग भी विकसित हुए। चार्टर्ड अकाउंटेंट, वकील, अभिलेखागार जैसी संज्ञाएं काग़ज़ के महत्व का प्रमाण हैं।
आम आदमी के लिए आवश्यक है कि वह काम से ज्यादा काग़ज़ पर ध्यान दे। आम आदमी हमेशा काग़ज़ों से घबराया रहता है। लेकिन सिस्टम कभी काग़ज़ से नहीं घबराता। उसे अच्छी तरह पता है कि कब कौन सा काग़ज़ मिलना चाहिए और कब कौन सा काग़ज़ नहीं मिलना चाहिए।
आपको बैंक में खाता खोलने के लिए पैन कार्ड, आधार कार्ड, बायोमैट्रिक और गवाही जैसे पर्याप्त काग़ज़ देने पड़ते हैं। फिर भी आप काग़ज़ का महत्व भूल न जाओ, इसलिए बैंक समय-समय पर आपका केवाईसी करता है। इस प्रक्रिया में आप उन्हीं कागज़ों की एक और कॉपी नत्थी करते हैं। बैंक नयी कॉपी को पुराने काग़ज़ से मिलाकर सन्तुष्ट होता है कि उसके कस्टमर का काग़ज़ी चरित्र बिल्कुल नहीं बदला है। इस प्रक्रिया के पूर्ण हुए बिना आप अपने खाते से अपना ही पैसा नहीं निकाल सकते हैं। किन्तु जब आपके साथ कोई डिजिटल फ्रॉड हो जाए तो अपराधी ने आपके खाते से पैसा किस खाते में ट्रांसफर किया। किस जगह से उसे निकाला गया। किस ब्रांच में उसका केवाईसी हुआ, कहाँ उसने साक्षात आकर बायोमैट्रिक किया और किसने उसके अस्तित्व की गवाही दी- पुलिस को ये काग़ज़ नहीं मिलते। अर्थात् आपके खाते में से आपको पैसा निकालना है, तो केवाईसी ज़रूरी है, लेकिन कोई प्रतिभाशाली जेबकतरा आपके बैंक खाते से पैसा बिना केवाईसी के निकाल सकता है।
बीमा एजेंट जब बीमा करने आता है तब वह बीमित व्यक्ति का परिचित होता है। तब उसे किसी काग़ज़ की ज़रूरत नहीं होती। ‘अरे भाईसाहब, मैं बैठा हूँ ना’ और ‘आप फ़िकर मत करो’ जैसे मंत्रोच्चार से वह नागरिक के माथे पर बीमातिलक लगा देता है। लेकिन जैसे ही उस नागरिक को इंश्योरेंस के क्लेम की ज़रूरत पड़ती है, तब अचानक वह परिचित एजेंट ‘सिस्टम’ बन जाता है। और सिस्टम के लिए तो काग़ज़ लगाने ही पड़ते हैं।
किसी नागरिक की छवि आयकर इंस्पेक्टर की आँखों में उतर जाए, तो उसके परदादा ने बचपन में उसे जो चवन्नी दी होती है, उसको भी गैरकानूनी नकद लेनदेन साबित कर दिया जाता है। लेकिन ईमानदारी से टैक्स देने के बाद बचे हुए पैसे हड़पकर, जब कोई बिल्डर घर नहीं देता तो वकीलों को बिल्डर की बेईमानी सिद्ध करने में दस-दस साल लग जाते हैं।
काग़ज़ जब चाहे प्रकट हो जाता है, जब चाहे विलीन हो जाता है। यह काग़ज़ की लीला है। इसलिए आपका पेट भरे या न भरे, काग़ज़ का पेट भरते रहो। क्योंकि रहीम ने कहा है- “रहिमन काग़ज़ राखिए…”
✍️ चिराग़ जैन
वाटिका में विचरण करते हुए अमरीका की दृष्टि, चुहल करती हुई इज़रायल पर पड़ी। अमरीका, इज़रायल के अप्रतिम सौंदर्य पर मुग्ध हो गया। इज़रायल भी अमरीका के वैभव और साज-सज्जा से प्रभावित हुए बिना न रह सकी। आंखों ही आंखों में उपजा प्रेम, अधरों से अभिव्यक्त न हो सका और दोनों मन की बात मन में दबाए अपने-अपने महल में लौट आए। वाटिका की उस मौन मुलाकात ने दोनों की नींद में धतूरा बो दिया था।
अमरीका के कानों में किशोर कुमार की आवाज़ गूंजती थी ‘करवटें बदलते रहे सारी रात हम। और इज़रायल के चेहरे पर मीना कुमारी के अंदाज़ में ठुमरी चल रही थी ‘यूं ही कोई मिल गया था’।
आख़िर एक दिन इज़रायल ने बहाने से अमरीका को फोन मिला ही लिया। आपस का तो कोई ख़ास विषय था नहीं, लेकिन बात करने का बहाना चाहिए था तो मुग्धा नायिका ने शिकायत की सिम्पैथी हासिल करने के लिए अमरीका से कहा, ‘देखो ना, ये ईरान आते-जाते मुझे छेड़ता है। पूरे शरीर पर क्रूड ऑयल मलकर मेरे पीछे पड़ा रहता है।’
प्रेम में डूबे अमरीका की आंखों में ईरान की छवि ऐसे छप गई, जैसे किसी घायल नागिन की आंखों में दुश्मन की तस्वीर प्रिंट हो गई हो। उसने प्रेमी के रिरियाते से स्वर में गर्जना की ‘तुम चिंता मत करो प्रिये, मैं इस ईरान केे बच्चे को ऐसा सबक सिखाउंगा कि इसकी सारी हेकड़ी निकल जाएगी। मेरे होते कोई और तुम्हें छेड़ जाए, ऐसा आज के बाद नहीं होगा।’
अमरीका को काम पर लगाकर इज़रायल फिर से वाटिका में टहलने निकल गई। उधर अमरीका ने अपने सारे श्रेष्ठ योद्धा, अपना पूरा राजदरबार और अपनी पूरी ताकत ईरान पर झोंक दी। मंत्रियों ने पूछा, ‘महाराज, अचानक से ईरान से अपनी क्या दुश्मनी हो गई?’
महाराज ने आशिकी पर विश्व-कल्याण की चादर डालकर कहा, ‘मुझे रात को सपने में जॉर्ज वाशिंगटन दिखाई दिए थे, उन्होंने बताया है कि ये ईरान दुनिया की सभी ख़ूबसूरत राजकुमारियों का अपहरण करनेवाला है। और अगर एक बार इसने अपहरण प्रारंभ कर दिया तो इसे रोकना असंभव हो जाएगा।’
चूंकि सपनों का कोई प्रमाण नहीं होता, इसलिए बेचारे अमरीकी लड़ाके प्राण देने निकल पड़े। खूब घमासान हुआ। इधर से मिसाइल, उधर से बमबारी। इधर तबाही, उधर तबाही। जब लड़ाई महाभारत के युद्ध से भी लंबी खिंच गई, तो मंत्रियों ने महाराज से फिर पूछा, ‘महाराज, दोनों तरफ के इतने सैनिक मारे जा चुके हैं। मासूम बच्चों तक की जान जा चुकी है। आख़िर हम ये लड़ाई लड़ क्यों रहे हैं, और कब तक लड़ेंगे?’
मंत्रियों के दबाव पर महाराज ने रात को चुपचाप इज़रायल को फोन मिलाकर पूछा, ‘डार्लिंग, हमने ईरान से लड़ाई शुरू तो कर ली, अब बताओ, इसे खत्म करने के लिए क्या शर्त रखनी है।’
इज़रायल ने मतलब निकलने के बाद वाले अंदाज़ में कहा, ‘मैं तो ख़ुद परेशान हूं कि तुमने इतना हंगामा क्यों मचाया हुआ है? मिस्टर अमरीका, आई एम नॉट योर प्रोपर्टी। यू आर नॉट सपोज़ टू क्रिएट डिस्टरबेंस बिटवीन ऑवर नेबरहूड।’
इज़रायल के इस बदले हुए रूप से अमरीका का दिल टूट गया। उसने अल्ताफ़ राजा का गाना गुनगुनाना शुरू किया ‘जा बेवफ़ा जा, तुझे प्यार नहीं करना।’ बेवफ़ाई का बदला लेने के लिए अमरीका ने पाकिस्तान को फोन करके कहा, ‘भाई, किसी के बहकावे में आकर मैंने ईरान के साथ बिना मतलब का रायता फैला दिया है। अब तुम हमारा मामला सलटवा दो।’
पाकिस्तान ठहरा पुराना बदमाश। तहबाज़ारी और मांडवाली में उसे हमेशा मज़ा आता है। बस अब तक लोग उसकी मांडवाली करवाते थे, अब वो लोगों की मांडवाली करवाने निकला है।
इस्लामाबाद में अदालत लगी। जिस जज को शांति करानी थी, उसको तो आदत कलेश की थी। सो वही हुआ, जिसे शांतिदूत समझा था, वो तो शिशुपाल निकला। इस्लामाबाद टॉक्स फेल हो गई। ईरान अपने अपमान के लिए मरने की सीमा तक लड़ने पर उतारू है और अमरीका ‘नेतु-नेतु’ का मंत्र रटते हुए निष्काम भाव से युद्ध करने का ढोंग कर रहा है।
✍️ चिराग़ जैन