देशभक्ति
कैसे इस पर न्यौछावर हो अपना ख़ून-पसीना सीखें
वक़्त पड़े तो फौलादी साबित हो हर इक सीना, सीखें
शीश कटे तो उसका, जिसने भारत-भू पर आँख उठाई
हम इस पर मरना क्यों चाहें, इसकी ख़ातिर जीना सीखें
✍️ चिराग़ जैन
कैसे इस पर न्यौछावर हो अपना ख़ून-पसीना सीखें
वक़्त पड़े तो फौलादी साबित हो हर इक सीना, सीखें
शीश कटे तो उसका, जिसने भारत-भू पर आँख उठाई
हम इस पर मरना क्यों चाहें, इसकी ख़ातिर जीना सीखें
✍️ चिराग़ जैन
अगर इंसान बनकर आए तो इंसान बोलेगा
ज़ुबां मिसरी सरीखी मीर का दीवान बोलेगा
अगर हैवानियत लेकर इधर आए तो फिर सुन लो
शिवाजी की ज़ुबां में सारा हिंदुस्तान बोलेगा
✍️ चिराग़ जैन
प्रतिशोध एक अंतहीन प्रक्रिया है। जाति, धर्म, सम्प्रदाय, खानदान, राजनीति, विचारधारा, देश, समाज… इन सबका सौंदर्य और सुख प्रतिशोध की इस महाज्वाला में भस्म हुआ जाता है। देवासुर संग्राम से लेकर रामायण, महाभारत और चाणक्य ही नहीं, वरन प्रत्येक संस्कृति और समाज के पास प्रतिशोध की इस विकराल चिता में ज़िन्दा जली हुई ज़िन्दगी की भयावह दास्तान है।
राम, गौतम, महावीर, नानक, ईसा… इन सबने इसी प्रतिशोध के चक्र को गतिहीन करके निष्क्रोध होने के अलग-अलग मार्ग सुझाए। उन्होंने हमें दिखाना चाहा कि मनुष्य की मुस्कुराती हुई आँखों में सुख देखने का अभ्यास कर लो तो रक्तपात और परपीड़ा में आनन्द तलाशनेवालों का क़द छोटा होता चला जाएगा। उन्होंने हमें सिखाया कि घृणा फैलाकर कोई समाज सुखी न रह सकेगा। उन्होंने हमें बताया कि क्षमा को इतना विराट बना लो कि विद्रूपता उसके आकार को लांघने का साहस न कर सके। उन्होंने हमें बताया कि अपनी मनुष्यता को इतना प्रबल बना लो कि कोई अमानुष उसके संकल्प को विचलित न कर सके। उन्होंने हमें सुझाया कि अपनी आस्था को इतना पुष्ट कर लो कि अनास्था का कोई झंझावात उसे आहत न कर पाए।
लेकिन हम तो उल्टे चलने लगे। हमने अपने धर्म का आनन्द भोगने की बजाय दूसरे के धर्म को नष्ट करने में सारी ऊर्जा झोंक दी। हम अपनी लकीर बड़ी करने की बजाय दूसरों की लकीरें मिटाने में जुट गए। हम क्षमा को ताक पर रखकर उद्दंडता के अखाड़े में दण्ड पेलने लगे।
हम घृणा को प्रेम से जीतने की बजाय, घृणा का उत्तर घृणा से देने पर उतारू हो गए। जिस क्षण हम अपने तरीके छोड़कर उसके तरीके से लड़ने लगे, बस उसी क्षण से हम पराजित हैं।
हमारी स्थिति उस विदुर की तरह है जो शकुनि के पासे बदलवाकर अब पछता रहा है। हम उन पांडवों की तरह हैं जो कौरव बनकर युद्ध जीत तो गए किन्तु उनके भीतर का पाण्डवत्व कुरुक्षेत्र में गिरनेवाला पहला शव बन गया।
हम कुरुक्षेत्र में प्रवेश करते समय केवल इतना भर संकल्प ले लें कि जब इस रण से बाहर निकलेंगे तो अपने भीतर के पाण्डवत्व को साथ लेकर लौटेंगे। हम अपनी क्षमा को बिसारकर उद्दंडता को सबक़ नहीं सिखाएंगे।
विश्वास कीजिये, यदि हम ऐसा कर पाए तो हमारे धर्मस्थलों में विद्यमान ग्रंथ जीवंत हो उठेंगे। फिर हमें हमारे महापुरुषों की वाणी का प्रचार करने के लिए लाउड स्पीकर नहीं लगाने पड़ेंगे। फिर हमारा आचरण ही हमारे धर्म का प्रतीक हो जाएगा।
✍️ चिराग़ जैन
जो प्रतीक्षा आँख में शबरी बसाए जी रही है
वह प्रतीक्षा राम के भी पाँव में निश्चित मिलेगी
धूप जैसी जिस विकलता को सुदामा ने जिया है
वह विकलता द्वारिका की छाँव में निश्चित मिलेगी
जो महल तक आ गयी होगी युगों का न्याय लेने
वह किसी वन में सिसकती इक शिला की आह होगी
जो युगों पहले घटे अन्याय के हित वन गयी है
वह किसी के मौन से पनपी कोई परवाह होगी
एक घटना जो नगर में कंकरी सी चुभ रही है
वह अहल्या के अछूते गाँव में निश्चित मिलेगी
द्रौपदी के चीर में बस द्रौपदी की लाज है क्या
उस अभागे वस्त्र के भीतर समूचा युग ढँका है
चीर लेकर जब स्वयं श्रीकृष्ण दौड़े हस्तिनापुर
तब मुरारी ने जगत् के ध्वंस पर अंकुश रखा है
जो घृणा सबको दिखाई दी सती के आँसुओं में
वह घृणा उस द्यूत के हर दाँव में निश्चित मिलेगी
हर कथानक में कथा का दूसरा आयाम भी है
सिर्फ़ राधा ही नहीं व्याकुल, विकल घनश्याम भी है
अपहृता होकर नहीं पीड़ित अकेली जानकी ही
प्रेम और दायित्व के घावों से पीड़ित राम भी है
धार का अस्तित्व जिस जल पर रहा निर्भर हमेशा
बस उसी जल पर पराश्रित नाव भी निश्चित मिलेगी
✍️ चिराग़ जैन