Article, Chirag Jain Writings, Nazariya, Prose
“वीरे दी वेडिंग” चार लड़कियों की कहानी हैं जिन्हें बारहवीं कक्षा की परीक्षा सम्पन्न होने की ख़ुशी में घरवाले घर में शराब पार्टी अरेंज करके देते हैं। पहली लड़की विवाह से पूर्व अपने बॉस से सेक्स सम्बन्ध बनाती है। यह लड़की अपनी सहेलियों के कहने पर अपने मंगेतर को भरी महफ़िल में किस करने की कोशिश करती है और जब मंगेतर इस पर ऐतराज करता है तो सरे-आम उसको माँ की गाली देती है। यही लड़की अपनी सहेली की शादी के बीच से निकल कर एक ऐसे लड़के के साथ जाकर सो जाती है जिसका वह नाम भी नहीं जानती। .
दूसरी लड़की का पति उसे हस्त-मैथुन करते हुए पकड़ लेता है। वह लड़की अपने पति को छोड़कर अपने पिता के घर लौट आती है। यह लड़की अपनी सहेली को इस बात पर ताना देती है कि वह किसी से सेक्स किये बिना शादी कैसे कर सकती है। यह लड़की अपने पिता को बताती है कि उसके पति ने उसे क्यों छोड़ दिया तो उसका पिता उसे कहता है “मुझे पहले बताना था, तेरे पति को तो मैं लटका दूँगा।”
तीसरी लड़की अपनी सहेली को बताती है कि टेस्ट ड्राइव किये बिना तो मैं गाड़ी भी न लूँ फिर तू पति कैसे ले सकती है। चौथी लड़की अपने प्रेमी से इस बात पर आश्चर्य जताती है कि जब हम दो साल से साथ रह रहे हैं तो फिर तू शादी क्यों करना चाहता है! ये चारों लड़कियां बेहद सभ्य परिवारों से आती हैं इसलिए “फ़िल्म की स्क्रिप्ट की तथाकथित डिमांड पर” हिंदी भाषा के कुछ अश्लील शब्द जिन्हें हम गाली कहते हैं उनको बीप कर दिया गया है। लेकिन इन्हीं लड़कियों ने फ़िल्म में कुछ अंग्रेजी की शब्दावली का प्रयोग भी किया है।
अंग्रेजी वह पतित पावनी है जिसमें नहाकर अश्लीलता भी स्टेटस सिंबल बन जाती है। इसीलिए पूरी फिल्म में बार बार FUCK, ASS, SHIT जैसे पवित्र शब्दों को सेंसर ने स्वीकार कर लिया। “मेरी लेले”; “तेरी लेने के लिए डिग्री भी चाहिए”; “उसे अपनी तीसहजारी दिखा दे”; “चढ़ जा”; “तूने बॉस को ठोक दिया”; “अपना हाथ जगन्नाथ”; ओ हेलो, हमारा भी ले लो” और “मेरी फटी पड़ी है” जैसे संवाद इन चारों लड़कियों के मुँह से उचर कर फ़िल्म की और स्त्री अस्मिता की शोभा बढ़ा रहे हैं।
जब-जब इन भौंडे संवादों और अश्लील इशारों पर सिनेमा हॉल में सीटियां गूंजी तब-तब मुझे नारी सशक्तिकरण के अभियान अपने मुँह पर कालिख पोते खड़े दिखाई दिए। जब जब फ़िल्म में सोनम कपूर पर उसकी सहेलियों ने अश्लील कमेंट किये तब तब लड़की को घूरने पर भी उसे प्रताड़ना मानने वाला कानून और अधिक अंधा प्रतीत हुआ। जब स्वरा भास्कर के हस्तमैथुन दृश्य पर सिनेमा हॉल का अंधेरा सिसकारियों से भर गया तब तब मुझे “नारी-सम्मान” के नारे लूले नज़र आने लगे।
कानून कहता है कि किसी स्त्री को अश्लील इशारे करना या उसे अश्लील सामग्री दिखाना अपराध है। लेकिन फ़िल्म की चारों अबला नारियाँ फुकेट में नंगे नाच देखने जाएँ तो यह बोल्डनेस है। इस फ़िल्म में प्रदर्शित लड़कियां समाज के जिस चेहरे का चित्र उतार रही हैं उसे देखकर कानून, मर्यादा, समाज और संस्कृति के परदों के पीछे जारी सभ्यता के इस भौंडे नाटक का यवनिका पतन हो जाएगा।
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
जब दिवाकर की तपिश के दाह से भयभीत होंगे
तब अंधेरे तिलमिलाकर रश्मियों से वैर लेंगे
जो भरी बरसात में भीगे हुए ठिठुरे फिरेंगे
वे अधम भोली बया की बस्तियों से वैर लेंगे
मंत्र-जप की साधना का सत्व जब संभव न होगा
तब करेंगे ढोंग इक पाखण्ड का चोगा पहन कर
जो जला बैठे स्वयं के हाथ समिधा चोरने में
प्रश्न लेकर वे खड़े हैं भक्ति के पावन हवन पर
मृत्यु के प्रख्यात सच को जब नहीं झुठला सकेंगे
तब अघोरी बेसहारा अरथियों से वैर लेंगे
कृष्ण जब षड्यंत्र के आमंत्रणों को भाँप लेंगे
तब विदुर के साग में कमियाँ निकालेगा सुयोधन
जब समर में जीतने की शक्ति पर संदेह होगा
रात में सोते हुओं को फूँक डालेगा सुयोधन
जो सुदर्शन से पराजित हो गए हर एक रण में
वे मधुर सरगम सुनाती वंशियों से वैर लेंगे
वृक्ष के तन पर नहीं चल पाएगा वश कोई जिसका
वो हवा सूखे हुए पत्ते हिलाकर ख़ुश रहेगी
योग्यता जिसमें न हो अट्टालिकाओं के परस की
वो लपट कुछ फूस के छप्पर जलाकर ख़ुश रहेगी
जो झखोरे सामधेनी को नहीं धमका सकेंगे
वे किन्हीं जलदीपकों की बातियों से वैर लेंगे
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
उमंग, शौर्य, शक्ति का अनन्त नित्यकोष है
ये संस्कृति का घोष है, ये भारती का घोष है
त्रिभुज, स्वरद, पणव सुसज्ज झल्लरी की गूंज है
सुरों की दिव्य देह ताल वल्लरी की मूँज है
महोत्सवों में बाँसुरी की तान का विधान है
समर समय में शंख के स्वरों का शौर्यगान है
समर्पणों को तूर्य की ध्वनि का पारितोष है
ये संस्कृति का घोष है, ये भारती का घोष है
नागांग, घोषदण्ड और आनकों का लास्य है
मृदङ्ग का वितान और गोमुखों का भाष्य है
हृदय धरा पे भूप, सोनभद्र का प्रवाह है
तिलंग-उदय-अजेय से शिथिल क्षणों का दाह है
अमर, अकंप, अप्रतिम, अथक, अजर, अदोष है
ये संस्कृति का घोष है, ये भारती का घोष है
ये श्रीनिवास सुब्बु के करों का घोषदण्ड है
ये दाते, बापुराव का प्रचण्ड शक्ति खण्ड है
किरण, तिलक-कामोद सम सृजन का दिव्य क्षेत्र है
ये केशवः की तर्जनी है शंकरः का नेत्र है
ये मेघ घोष, ब्रह्म घोष और सिंह घोष है
ये संस्कृति का घोष है, ये भारती का घोष है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
ग़ैब ख़ामोश था जब क़त्ल हुए थे जंगल
इसकी बरसात को क़ीमत चुकानी पड़ती है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Lapete Mein Netaji, Poetry
सूरज आग उगलता हो
सिर पर मेघ मचलता हो
भीषण कोहरा पड़ता हो
अम्बर दिन भर जलता हो
हर मुश्किल को झेल गए हम मेहनत की तलवार से
हमें कष्ट होता है केवल शासन के व्यवहार से
मिट्टी सख्त हुई तो हम भी कंधे पर हल धर लाए
नाखूनों से नहर काट कर खेतों तक कलकल लाए
ओले बरसे नहीं हटे
पारा उछला वहीं डटे
आंधी आई अड़े रहे
जमा हुए हम नहीं घटे
हम हरदम बढ़कर जूझे है हर इक पारावार से
हमें कष्ट होता है केवल शासन के व्यवहार से
सूखी रोटी खाकर भी हम रह लेते खुशहाली में
कई पीढियां बीत गई हैं ऐसी ही कंगाली में
भीतर कितने शूल गए
जीवन का सुख भूल गए
बिटिया बिन ब्याही बैठी
बापू फाँसी झूल गए
दर्द हमारा आकर देखो, मत पूछो अखबार से
हमें कष्ट होता है केवल शासन के व्यवहार से
यही एक उम्मीद रखी है संसद के रखवालों से
बाजारों को मुक्त करा दो, चोरों और दलालों से
शासन सुख से सोता है
लहसुन धीरज खोता है
गन्ना सूखे खड़े-खड़े
प्याज आँख भर रोता है
श्रम को उसका मोल मिलेय इतना मांगा सरकार से
हमें कष्ट होता है केवल शासन के व्यवहार से
✍️ चिराग़ जैन