Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
आईआईटी रुड़की का कवि सम्मेलन था। सभागार में तिल रखने को जगह नहीं थी। मंच पर डॉ गोविंद व्यास, श्री मनोहर मनोज, श्री अरुण जैमिनी, श्री अंसार कम्बरी और मैं आमंत्रित कवियों के रूप में विराजमान थे। तीन कवि रुड़की स्थानीय कवियों के रूप में मंचासीन थे और दो युवक विद्यार्थी कवियों के रूप में।
संचालन प्रारंभ किया तो संस्थान में भूगोल विषय पर शोध कर रहे दिव्यांशु दीक्षित से शुरुआत कराई। पहले ही मुक्तक में दिव्यांशु ने मंत्रमुग्ध कर दिया-
मौन भी स्वर हो गए अब लौट आओ
प्रश्न उत्तर हो गए अब लौट आओ
फूल जल तुमने चढ़ाया पत्थरों पर
प्राण पत्थर हो गए अब लौट आओ
कथ्य और भाषा, दोनों उम्मीद से बेहतर थी। फिर भीतर के क्षुद्र अहंकार ने स्वप्न देखा कि शायद गीत कमज़ोर होगा। लेकिन गीत ने भी मेरे भीतर के अहंकार को चूर-चूर किया… अहा, क्या बिंबविधान था…
प्रेम में उतरा, तभी कठिनाइयाँ स्वीकार कर लीं
ज़िन्दगी की भँवर क्या, जब नयन झीलें पार कर लीं
उफ्फ… भूगोल का शोधार्थी, मन की इतनी गहरी परतों को खोलकर छू सकेगा.. यह मेरी कल्पना से परे था। जियो दिव्यांशु, तुम सबकी नज़रों में आओ, किन्तु तुम्हारी दिव्यता को किसी की नज़र न लगे। दिव्यांशु के काव्यपाठ का सम्मोहन अभी टूटा भी न था, कि संस्थान के पर्यवेक्षक श्री महावीर ने दार्शनिक मुक्तकों से मंच और श्रोतादीर्घा को चमत्कृत किया। अद्भुत मनोदशा थी, जितना सुनता जाता था, उतनी ही प्यास बढ़ती जाती थी। जब हेमन्त मोहन ने ग़ज़लें पढ़नी शुरू कीं तो ऐसा लगा, ज्यों प्रतिभा अपने विश्वरूप के दर्शन करा रही हो। आँखें अपलक हो चली थीं और तन अकम्पित! और फिर एक शेर ने तो श्रेष्ठता के चरम को छू लिया-
क़ैदख़ानों को बड़ा करते रहें
लोग समझेंगे कि वो आज़ाद हैं
अहा.. रोम-रोम खिल उठा। कितने पुण्यों से ये दो मिसरे हेमन्त मोहन को मिले होंगे। ईश्वर इस लाजवाब शायर को ख़ूब आशीष दे! इसके बाद भी मंच काव्य से लबरेज ही रहा, विश्वकर्मा के प्रांगण में सरस्वती के इन लाडलों की उपस्थिति ऐसी ही थी मानो लंका नगरी की किसी कुटिया में रामभक्त मिल गया हो।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
बैंकाक में काव्यपाठ के उपरांत पटाया भ्रमण का निर्णय हुआ। थाईलैंड की खाड़ी पर बसा यह रंगीन शहर अपनी विलासिता के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है। मुम्बई जैसी ऊमस भरे मौसम में भी लोगों की ऊर्जा में कोई कमी नहीं है। प्रदूषण और गंदगी से पूरी तरह मुक्त यह शहर सैलानियों की पसंदीदा जगह है। नारियल की मिठास यहाँ सामान्य से अधिक है। आम का मौसम है इसलिए आम और लीची बेचने वाले हर सौ कदम पर मिल जाते हैं। थाई महिलाएँ बेहद परिश्रमी होती हैं। समुद्र किनारे रेस्तरां चलाने से लेकर मसाज पार्लर्स में काम करने तक हर जगह उनकी ऊर्जा यथावत है। थाई पुरुष टैक्सी या मोटरबाइक पर सैलानियों की दूरियाँ कम करते हैं। गौतम बुद्ध के प्रति आस्था पूरे देश में अनवरत प्रसारित है। महाराज जनक के समान थाईलैंड का शरीर भी एक ही समय में आधा भोग में रत है और आधा साधना में। एक ओर स्वर्णाभ बुद्ध बिंब और थाई वास्तु से सुसज्जित पैगोडा मन को तृप्त करते हैं वहीं दूसरी ओर वाकिंग स्ट्रीट जैसे बाज़ार तन की थकान दूर करते हैं। भारत की तरह यहां भी अमलतास के कंगूरे खिल उठे हैं। दूर पश्चिम में सूर्यदेव अस्ताचलगामी हो गए हैं। उनकी कांति से स्वर्णदेही तथागत और भी भव्य हो उठे हैं। बाज़ारों में रंगीनियां बढ़ने लगी हैं। दिन भर की ऊमस को पदच्युत कर समुद्री हवाओं ने सत्ता सम्भाल ली है। हमने पटाया को स्वतदिखरप कहा और बैंकाक रवाना हो गए।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
सतपुड़ा के घने जंगलों में माचना नदी के किनारे; जहाँ मोबाइल नेटवर्क भी नहीं पहुँच पाया; वहाँ टिटहरी दल का कलरव और प्रकृति का अछूता स्वरूप देखा। जंगल के भीतर बेशक अनेक प्रकार के भय हों, किन्तु अकारण सताए जाने की आशंका कतई नहीं होती। नदी की धार भी जंगल के निष्पाप आदिवासियों की तरह बहुत सुकून के साथ बह रही है। वृक्ष, नदी, जंतु, पंछी, हवा, बादल और कहीं-कहीं गोंड आदिवासियों के गाँव; सब कुछ एक दूसरे के साथ ऐसे सुरम्य हो जाते हैं, मानो किसी कुशल संगीतज्ञ ने सात सुरों को करीने से गूँथकर किसी आनंदराग की सरगम लिख दी हो। नीला आसमान नदी में झाँककर खिलखिला रहा है और नदी अपने रास्ते में अड़नेवाले पत्थरों की शिक़ायत करने को आसमान की ओर उछल रही है।
मैंने नदी के पानी में पैर डाला तो वह नाराज़ नहीं हुई, उल्टे उसने मेरे पैरों को पखारकर मेरे रोम-रोम को आनंदित कर दिया। नदी से निकला तो मिट्टी स्नेह से भरकर मेरे पैरों से लिपट गई। मैंने नदी के बीच एक छोटी शिला पर बैठकर अपना एक गीत रिकॉर्ड करवाया। गीत की धुन के साथ नदी, हवा, टिटहरी और धूप ने ऐसे तारतम्य बैठा लिया कि गीत ने इनको अलंकार की तरह सजाकर इतराना शुरू कर दिया। रिकॉर्डिंग के समय मैंने महसूस किया कि जंगल के विशाल वृक्ष टकटकी लगाकर बड़े ध्यान से गीत का वैभव देख रहे थे।
दोपहर और सांझ के मिलन का समय था। जंगल में शाम होने लगे तो माहौल शांति का चोगा उतारकर सन्नाटा ओढ़ लेता है। नदी के पानी में पड़नेवाले प्रतिबिम्बों का रंग गहराने लगा था। सूर्य अपना लश्कर समेटकर पश्चिम की ओर बढ़ रहा था। एक कारी बदरिया उसके बिछोह की बात सोच-सोचकर और काली हुई जा रही थी। बदरिया, मनौती करती हुई बार-बार सूरज के आगे अड़ती थी और सूरज, हर बार की तरह इस बार भी उसकी मनुहार को अनदेखा कर पश्चिम में डूबता जाता था।
लाचार बदली हारकर भावनाशून्य चेहरे से अपने प्रीतम को डूबते देखती रह गई। पूरे आसमान में सिंदूर बिखर गया। ऐसा लगा मानो माचना के पानी में बदली का उम्मीद भरा दिल बह निकला हो। बिरहन बदरिया की आँखों से दो बूंदें छलक पड़ीं। मौके का फायदा उठाकर पवन ने उसके आँसू पोंछे और उसका हाथ पकड़कर उसे अपने साथ बहा ले गया।
रात ने पश्चिम में बिखरे सिंदूर पर काली रजाई डाल दी और दूर आसमान से तारे उचक-उचक कर बदरी और सूरज को ढूंढते रह गये।
मैंने उस दिन माचना के किनारे जीवन के हज़ारों रंग, याद के एक ही फ्रेम में कैद कर लिए।
✍️ चिराग़ जैन
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आजकल दिल्ली का मौसम कुछ अजीब हो गया है। इस बार धूप गुलाबी होने से पहले ही चिलचिलाने लगी है। वसन्त की फुलवारी अभी ठीक से मुस्कुरा ही पाई थी कि आकाश में मंडराती चीलों की आवाज़ ने माहौल को एक मनहूस वीराने से ढाँप लिया। रंगों के नाम पर कुछ है तो बस पलाश, वो भी रह रहकर ऐसे टूट कर भूशायी होते हैं कि सौंदर्य की डोर पकड़ कर उभरता काम, क्षणभंगुरता के तथागत भाव से वनोन्मुखी हुआ जाता है। दिल्ली की सडकों पर निकलो तो पता चलता है कि पलाश के ही दो रंगों का सारा खेल चल रहा है। ज़्यादातर पेड़ों पर गहरा लाल रंग बड़बोला सा आसमान से बातें करता दिखाई देता है। कहीं-कहीं भगवा रंग भी है, लेकिन इस भगवा की ख़ूबसूरती लाल वाले दरख्तों की भीड़ में दब रही है। हाँ, हरे पत्ते दोनों ही से पूरी तरह नदारद हैं। कहीं किसी पेड़ पर दो-चार पत्ते बचे भी हैं, तो वे वृक्ष को फूलते देख उनके रंग पीले पड़ गए हैं। नीम, पीपल और जामुन के पुराने दरख़्त नए मौसम में उपेक्षित से खड़े हैं। बेपरवाह हवाओं ने उनके पास से गुज़रते हुए जो शरारत की है, उससे शर्मिंदा होकर वे ज़मीन में गड़े जा रहे हैं। ज़मीन अपने मूल से कटकर गिरे पत्तों की जर्जर देह से पट गई है। हवा का झोंका इन सूखे पत्तों को ज़रा सा छेड़ देता है तो ये एक दूसरे से टकराने लगते हैं। इससे एक खड़खड़ाहट की आवाज़ पैदा होती है। धरती ठहाका मार कर अपने जिस्म पर रेंगते इन कृतघ्नों पर हँसती है और हवाएँ मौसम की नमी सोखती हुईं दूर निकल जाती हैं।
✍️ चिराग़ जैन
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सुजानगढ़ से जयपुर के लिए निकला हूँ। रेगिस्तानी वीराने के बीच दूर तक पसरी हुई सड़कपर फर्राटे से दौड़ती गाड़ी में घूमर बज रहा है। घूमर की धुन पर मन भी झूमरहा है और वीराना भी। प्रकृति रात में जितनी खूबसूरत हो उठती है उतनी हीभयावह भी। अँधेरा बढ़ता जा रहा है और सड़क के दूसरे छोर पर व्याप्त शून्य औरसघन होता जा रहा है। यत्र-तत्र टिमटिमाते बल्ब “उम्मीद की किरण” के मुहावरेकी गवाही दे रहे हैं या “तिनके के सहारे” की… कहना कठिन है। सड़क केकिनारे खड़े खेझड़ी के पेड़ों पर जब गाड़ी की लाइट पड़तीहै तो ऐसा लगता है जैसे रेगिस्तान के बीच कोई नाडकटी देह लम्बे लम्बे हाथफैला कर आलिंगन का निमंत्रण दे रही हो। इस बीच सड़क पर किसी जीव की आँखेंचमक उट्ठी हैं… गाड़ी जब तक उसके समीप पहुंची तब तक वे आँखें दौड़ कर अपनीदेह के पास पहुँच कर गम हो चुकी थी।अज्ञातजन्य भय अपने पूरे सौष्ठव केसाथ व्याप्त है। हर मोड़ पर किसी कौतूहल से मन ठहरने लगता है। शून्य औरप्रकाश के समागम से निर्मित हर आकृति कल्पना की छैनी से नया अनुवाद पा रहीहै। गाड़ी दौड़े जा रही है, शून्य सड़क के उस पार तनाहुआ है, घूमर गूँज रहाहै, सौन्दर्य श्यामल होता जा रहा है, भय रुचिकर होता जा रहा है, जयपुरआकांक्षाओं के निकट है और देह से दूर…. आनंद आ रहा है।
✍️ चिराग़ जैन