Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
बंगाल चुनाव की हलचल के बीच ‘लपेटे में नेताजी’ की शूटिंग के लिये कोलकाता जाना तय हो गया। कार्यक्रम के प्रोड्यूसर आशीष पाण्डे ने पिछली बार हुगली नदी में स्टीमर पर शो शूट करने का प्रयोग किया था, जिसकी काफी प्रशंसा हुई। उसी से प्रभावित होकर इस बार भी उसी प्रारूप में शो शूट होना था। 1 अप्रेल को कार्यक्रम की रूपरेखा बनी कि 4 अप्रेल को दो एपिसोड सुबह- सुबह शूट किये जाएंगे और एक एपिसोड शाम को। 3 अप्रेल की दोपहर को दिल्ली से फ्लाइट थी, सो हमारे पास तीन एपिसोड्स की तैयारी करने के लिये कुल 48 घण्टे का समय था।
ऐसी स्थिति पहले भी कई बार हुई है, लेकिन इस बार कठिनाई यह रही कि कोलकाता चुनाव पर ही पहले चार एपिसोड शूट किये जा चुके थे इसलिए चुनावी माहौल की काफी सामग्री हम पिछले शूटिंग शेड्यूल में प्रयोग कर चुके थे। उसी विषय और उसी पात्रों के साथ लगभग वैसे ही घटनाक्रम पर तीन एपिसोड्स तैयार करने थे वो भी केवल 48 घण्टे में।
चारों आमंत्रित कवि अपने अनुभव, निष्ठा तथा क्षमता के बल पर इस चुनौती से जूझ ही लेंगे यह प्रोडक्शन को विश्वास था, और अंततः यह विश्वास बना रह सका। लेकिन यह यात्रा बेहद रोमांचक रही। दिल्ली हवाई अड्डे पर पहुँचा तो सुदीप भोला जबलपुर से आकर सुबह से प्रतीक्षारत थे। उन्होंने बताया कि कोरोना की नयी लहर के चलते दिल्ली हवाई अड्डे पर उतरते ही उनका कोविड टेस्ट किया गया है। हवाई अड्डे पर भी लोगों के चेहरे पर कोरोना का भय और व्यवहार में सावधानी देखकर लगा कि जनता इस वायरस के दूसरे आघात से जूझने के लिये तैयार है।
शाम 6 बजकर 30 मिनिट पर कोलकाता में लैंडिंग हुई। हवाई अड्डे की एक दर्जन कन्वेयर बेल्ट्स में से जिस पर हमारा लगेज आना था, वह अचानक चलते-चलते बन्द हो गयी। लगभग 40-45 मिनिट का समय इस अनचाही परिस्थिति ने नष्ट किया, वह भी उस समय जब हम चारों में से कुछ कवियों को होटल पहुँच कर सुबह 5 बजे शूट होनेवाले 2 एपिसोड्स के लिये कविताएँ पूरी करनी थीं। येन-केन प्रकारेण होटल पहुँचे और जल्दी-जल्दी भोजन की औपचारिकता निभाकर सभी सुबह की तैयारी में जुट गये। लिखना भी ज़रूरी था और स्क्रीन पर फ्रेश दिखने के लिये सोना भी ज़रूरी था। मैं लगभग पूरी तैयारी करके ही घर से निकला था, इसलिए तुरन्त सो गया।
रात में अचानक किसी की उबकाइयो की आवाज़ से नींद खुली। तंद्रा की अवस्था से बाहर आया तो ज्ञात हुआ कि सुदीप भोला कई बार उल्टी कर चुके हैं और बुखार जैसा महसूस कर रहे हैं। स्वाभाविक रूप से पहला संदेह कोविड का ही हुआ। सुबह तक सुदीप परेशान रहे और सुबह तक स्थिति यह हो गयी कि उनका चेहरा शिथिल हो गया।
पाँच बजे शूटिंग के लिये जाना था, लेकिन मैं और कार्यक्रम के संपादक अमृत आनंद जी मुँह अंधेरे ही सुदीप को निकटतम नर्सिंग होम में ले गये। आवश्यक जाँच तथा आवश्यक उपचार देकर एक डेढ़ घण्टे में हम सुदीप को वापिस होटल ले आये। कार्यक्रम सुदीप के बिना करने का निर्णय लिया जा चुका था, लेकिन जब तक मैं नहा-धोकर लौटा तब तक सुदीप शूटिंग पर चलने का मन बना चुके थे।
बिजली की सी फुर्ती दिखाते हुए सुदीप दस मिनिट में नहा-धोकर सेट पर जाने के लिये तैयार थे। कोलकाता की उमस ने सेट पर पहुँचते ही ऊर्जा शोषित करना प्रारंभ कर दिया। पहला शूट प्रारम्भ होते-होते सात-सवा सात का समय हो गया था। उमस का प्रकोप हुगली में तैरते स्टीमर पर भी कम न हो सका। निस्पंद वातावरण में क्षण-क्षण और उग्र होते सूर्य के सम्मुख जैसे-तैसे पहला एपिसोड रिकॉर्ड हो गया। इस मौसम ने सुदीप की जुटाई गई ऊर्जा में सेंध लगा दी। मैंने पहली बार सुदीप के चेहरे पर पीड़ा देखी। अभी नीचे आकर साँस भी नहीं ले सके थे कि दूसरे एपिसोड की तैयारी हो गयी। सुदीप इस बार भी हमारे साथ रहे। सूरज और प्रचंड हो गया था। उमस और प्रबल हो गयी थी। लेकिन शो मस्ट गो ऑन का पालन करते हुए हम शूटिंग करते रहे। डेढ़ घंटे की इस शूटिंग ने हम सभी को ऊर्जाहीन कर दिया। स्थिति यह हुई कि होटल पहुँचते-पहुँचते मेरे शरीर ने हिम्मत छोड़ दी और मैं शिकंजी इत्यादि का सेवन करके बिस्तर पर लंबलोट हो गया। जब उठा तो पता चला कि सुदीप दोबारा अस्पताल गए थे, लेकिन डॉक्टर ने उन्हें आराम करने की सलाह देकर कुछ विटामिन इत्यादि की टेबलेट्स दे दीं। जब मैं उठा तब तक सुदीप सो चुके थे। दवाई उनके सिरहाने रखी थी, लेकिन उन्होंने खाई नहीं थी।
मन घबरा रहा था, सुदीप को कई बार उठाने का प्रयास किया, लेकिन वे हुंकारा भरकर ऐसे सो जाते, ज्यों कोई भयंकर नशे में सो रहा हो। उमस से थके हुए शरीर को वातानुकूलित कमरे में सुला दिया जाए तो उस पर ऐसा ही नशा चढ़ता है, इसका अनुभव मैं पहले भी कोलकाता शहर में कर चुका हूँ, इसलिए सुदीप की नींद से मैं चिंतित नहीं था, लेकिन उनके बिना खाये-पिये रहने से परेशान ज़रूर था।
बहरहाल, शाम के शूट का समय हो गया। इस बार सुदीप को शूट पर नहीं जाना था, यह सुनिश्चित कर दिया गया। सुदीप निद्रा से तंद्रा की अवस्था में आ गए थे लेकिन शो तीन ही कवियों के साथ होना था, सो सुदीप के लिये खिचड़ी ऑर्डर करके हम होटल से निकल गए। सेट पर पहुँचे तो सुबह जैसी उमस का स्थान शाम की मोहक हवा ने ले लिया था। पूरा जहाज रौशनी से जगमगा रहा था। टीएमसी, भाजपा और सीपीआई के नेतागण आ चुके थे, श्रोताओं की उपस्थिति हो चुकी थी और कवियों और एंकर ने मेकअप भी ले लिया था। उसी वक़्त अचानक मंद समीर ने झंझावात का रूप ले लिया। हुगली की लहरों में जैसे कोई भूकंप आया गया हो। आसमान को चीरती बिजली कड़कने लगी और हवा ने जहाज पर लगे सेट को तहस-नहस करना शुरू कर दिया। आनन-फानन में कैमरे और लाइट्स छत से उतारकर नीचे लाई गईं। यूनिट के लोगों ने भाग-भागकर कुर्सियाँ इत्यादि उड़ने से बचाई। सारा तामझाम यूनिट एक छोटे से कमरे में समा गए। ऑडिएंस और लीडर, नदी किनारे किसी सुरक्षित स्थान पर तूफान के रुकने की प्रतीक्षा कर रहे थे।
यकायक तेज़ बारिश शुरू हो गयी। स्पष्ट हो गया कि अब शो नहीं हो सकेगा। अब सब बारिश रुकने का इंतज़ार केवल इसलिए कर रहे थे कि अपने-अपने घर जा सकें। सारी मेहनत पर पानी फिर गया था लेकिन यूनिट और हमारे माहौल तनाव या क्षोभ के स्थान पर इस आकस्मिक स्थिति का हंसी-ठट्ठा चल रहा था। बारिश हल्की हो रही थी और मौसम खुशनुमा हो चला था। अचानक आशीष पांडे लाइट्स टेक्नीशियन से बोले- ‘दोबारा सेटअप लगाने में कितना समय लगेगा?’ आशीष जी के इस सवाल ने संकेत दे दिया कि शूटिंग रद्द नहीं होगी। जिस फुर्ती से सेट समेटा गया था, उससे दोगुनी ऊर्जा के साथ सेट दोबारा तैयार किया गया। एक-डेढ़ घंटे में दोबारा रौशनी नाचने लगी। जहाज फिर से जगमगा उठा। देर से ही सही, लेकिन शूटिंग शुरू हुई। शानदार एपिसोड शूट हुआ।
ऐसा लगा कि सुबह प्रकृति ने जो ऊर्जा सोख ली थी, वह दस गुनी करके हम पर बरसा दी। ऊर्जा से भरे हुए होटल लौटे तो देखा सुदीप के चेहरे पर भी कुछ रंगत लौटने लगी थी। रात के भोजन के नाम पर नाममात्र का कुछ खाकर सब सो गए। सुबह 7 बजे एयरपोर्ट के लिए निकलना था।
दिल्ली हवाई अड्डे पर सुदीप का जो कोविड टेस्ट हुआ था, उसकी रिपोर्ट अभी तक भी नहीं आई है। एयरपोर्ट ले जाने के लिए जो टैक्सी आई, उसका टायर पंक्चर हो गया। एयरपोर्ट पहुँचे तो ज्ञात हुआ कि जिस जहाज से जाना है, उसमें तकनीकी ख़राबी आ गयी। 10 बजे उड़नेवाली फ्लाइट ने 1 बजे उड़ान भरी और इस पंक्ति के लिखते-लिखते दिल्ली हवाई अड्डे पर टच-डाउन हो गया है। शानदार लेंडिंग हुई।
सुदीप कल सुबह की फ्लाइट से जबलपुर चले जाएंगे। और मैं अभी घर पहुँचते ही कुंडली बाँचूंगा कि किस मुहूर्त में घर से निकले थे।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
जुलाई 2014 की घटना है। कोटेश्वर से कवि-सम्मेलन करके प्रज्ञा विकास और मैं सुबह-सुबह ऋषिकेश के लिये रवाना हुए। सर्दियां ठीक से शुरू नहीं हुई थीं, लेकिन पहाड़ों की अपनी ताज़गी सुबह-सुबह हल्की ठण्ड का अहसास करा रही थी। पहाड़ की घुमावदार सड़क पर हरे पानी की धारा के साथ-साथ बढ़ते हुए हम देवप्रयाग पहुँचे। पतली-पतली गलियों से सीढ़ियाँ उतरते हुए हम घाट की ओर बढ़े। लगभग सत्तर-अस्सी डिग्री के कोण पर खड़ी सड़क थी जिसके दोनों ओर बाज़ार था। पहला पहाड़ पार किया तो हम एक ऐसे पुल पर पहुँच गए जिसके नीचे भागीरथी का अजस्र प्रवाह था। पुल पर से गुज़रते हुए हमने महसूस किया कि किसी के गुज़रने पर पुल हिलता था। पुल को पार करके हम फिर एक पतली सी पहाड़ी गली से गुज़रते हएु घाट तक आ पहुँचे।
जीवन में पहली बार संगम देखा था। मैं एक ऐसे छोर पर खड़ा था, जहाँ धरती समाप्त होती है और आगे जल ही जल दिखायी पड़ता है। यहाँ भागीरथी और अलकनन्दा का मिलन होता है। यहाँ से पानी की यह धारा ‘गंगा’ कहलाने लगती है।
अहा! एक ओर से भागीरथी दौड़ी चली आ रही थी। उसकी चाल किसी उत्साहित षोडशी जैसी उच्छृंखल थी। उसकी आवाज़ को कलकल नहीं, गर्जन ही कहा जा सकता है। सरकारी स्कूल की आधी छुट्टी में बच्चों का जो कलरव होता है वैसा शोर था भागीरथी की चाल में। यह होता तो शोर ही है, लेकिन मन को आनन्दित करता है।
उधर अलकनन्दा ऐसे चली आती थी मानो किसी ने पानी को संन्यास दे दिया हो। नदी में न कोई लहर, न शोर। पूरी नदी मोटे काँच की किसी प्लेट की तरह गहरे हरे रंग की पारदर्शिता लिए ठहरी-सी जान पड़ती थी। एक ओर बचपन की सी ऊर्जा और षोडशी की चुहल थी तो दूसरी ओर गहन संन्यास की सी शांति।
मेरे दाहिने कान में भागीरथी का रोर था और बाएँ कान में अलकनन्दा का मौन। मेरी आँखों में भागीरथी की उच्छृंखल धारा थी और मन में अलकनन्दा का गाम्भीर्य। दाईं ओर देखता था तो ऐसा लगता था, ज्यों किसी को वधस्थल की ओर ले जाया जा रहा हो और दाईं ओर देखता था तो लगता था कि कोई गहरी समाधि में उतरा हुआ ठहर गया हो। एक ओर जीवन का कलरव था और दूसरी ओर मरघट की शांति।
मैं इन दोनों विरोधाभासी धाराओं के मध्य निर्लिप्त-सा खड़ा था। घाट पर बजरंग बली का ग्रामीण सादगी के सौंदर्य से परिपूर्ण मंदिर था। मंदिर की सीढ़ियों पर बैठकर मैं देर तक दो विलग प्रवृत्तियों को एकाकार होकर ‘जाह्नवी’ बनते देखता रहा।
भागीरथी और अलकनन्दा अपने-अपने स्वभाव की उत्कर्ष अवस्था में विद्यमान थीं। एक पत्थरों से टकराती हुई, भीषण शोर करते हुए, हिरन चौकड़ी भरती हुई दौड़ी चली आ रही थी। और एक इतनी शांत कि हवा भी उसके स्तब्ध-आभासी दर्पण को स्पर्श करने से संकोच कर रही थी। पटल पर एक भी सिलवट नहीं, लेकिन गतिमान थी। यूँ लगता था कि सर्वस्व प्राप्ति के बाद कोई योगिनी भंगिमा पर पूर्णता का सिंगार किये चली आ रही है।
उस दिन एहसास हुआ कि पूर्ण होने के लिए शून्य होना अनिवार्य है। जब चेहरे की समस्त भंगिमाएँ गौण हो जाती हैं तब मुखड़े पर पूर्णता की आभा दमकती है। इस आभा में कहीं कोई रंग नहीं होता, लेकिन फिर भी इसका सम्मोहन सबको आकृष्ट कर लेता है। आम्रपाली का समस्त सिंगार तथागत की इस एक झलक के सम्मुख मिथ्या सिद्ध हो जाता है।
नवम्बर की मीठी ठण्ड में मैं वसुधा, अलकनन्दा और भागीरथी के बीच खड़ा था। पाँव वसुधा पर थे, विचार भागीरथी से होड़ कर रहे थे और मन अलकनन्दा हुआ जाता था। श्वास में घुलकर यह दृश्य स्मृति पर अंकित हो रहा था।
कलकल करती नदी की पवित्र धारा को शहरों से गुज़रते हुए देखने का अनुभव स्मृति में कौंधा और फिर इसकी मीठी यात्रा के खारे समापन का विचार मन को बेचैन कर गया। यकायक मन नदी के साथ बहकर सागर तक की यात्रा कर आया। किसी सुन्दर जीवन के खारे अन्त की इस यात्रा ने वहीं एक गीत की देह धारण की। इस क्षण में एक पूरा जीवन जी लिया था मैंने। मैंने कलरव और शांति को एकाकार होते देख लिया था। मैंने देखा कि मौन जब शोर में समर्पित हो जाता है तो शोर का शोर कम हो जाता है। मैंने देखा कि स्वयं को खोकर भी अलकनन्दा में कोई सिलवट नहीं थी। मैंने देख लिया था कि सिलवटें विलीन होते ही यात्रा पूर्ण हो जाती है।
मैं भागीरथी की तरह किलकता हुआ देवप्रयाग पहुँचा था और अलकनन्दा की तरह गहरा मौन लिए लौट रहा था।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
भोपाल के पास एक छोटा-सा कस्बा है, आशापुरी। यहाँ उत्खनन में कुछ प्राचीन मंदिरों के अवशेष मिले हैं। सड़क किनारे एक अहाते में खुले चौक में लाल पत्थर की भव्य मूर्तियाँ रखी गई हैं। पूछने पर पता चला कि खुदाई में इन्हें बरामद करने के बाद यहाँ रखा गया है। सर्दी, गर्मी, बरसात में यह बहुमूल्य धरोहर बेकद्री की शिकार है।
इन मूर्तियों का पुरातात्विक महत्व तो है ही, लेकिन इनको देखकर जो आस्था उपजती है, वह तो मूल्यातीत है। केयरटेकर टाइप के एक लड़के से पूछा कि इनकी ख़ैर-ख़बर लेने कोई आता है क्या, तो वह बेपरवाह होते हुए बोला- ‘कोई कछु ना पूछै साहब!’ उसकी बात का प्रमाण खोजते हुए इन अवशेषों की पड़ताल की तो देखा गंधर्व, तोरण, देहरी, वेदी, गणेश, महावीर, कुबेर, शिव, विष्णु, नृसिंह, नवावतर, इंद्र और न जाने कितने ही शिल्प यहाँ खुले में पड़े अपने उद्धार की राह देख रहे हैं। इनमें से कुछ खंडित हैं और कुछ समय की मार से स्वयं को बचा लाए हैं।
घूरे में पड़ी इन मूर्तियों पर पीपल और जंगली घास ने दस्तक देनी शुरू कर दी है। एक तराशे हुए विशाल पत्थर पर हरियाली बेल ऐसे इठलाकर बढ़ी है जैसे शिल्पी द्वारा पत्थर पर तराशी हुई बेल से ईश्वर अपनी बेल की प्रतियोगिता कर रहा हो। इस विलक्षण सौंदर्य को निहार ही रहा था कि अचानक ऐसा लगा जैसे ये हरी बेल इन मूर्तियों को ताना मार रही हो कि, ‘धरती मैया की गोद में रहकर तो दम घुटता था, अब यहाँ घूरे में पड़कर चैन मिल गया!’
आस्था और इतिहास पर गर्व करनेवाली संस्कृति में यह दृश्य मन को भीतर तक कचोट गया। इधर क्षोभ बढ़ रहा था, उधर कौतूहल। इसी कस्बे में आगे एक पहाड़ी जैसे इलाके की चोटी पर वह स्थान देखने को मिला जहाँ से ये मूर्तियाँ निकाली गई हैं। देखकर, समझा जा सकता है कि यहाँ कभी कितना भव्य देवालय रहा होगा! पत्थर का एक भी टुकड़ा ऐसा न मिला जिस पर किसी कलाकार ने नक्काशी से कोई आस्था न उकेरी हो।
क गर्भगृह अभी भी लगभग गर्भगृह जैसा ही लग रहा है। उसमें शिवलिंग का स्थान अभी तक यथावत है। किन्तु उसमें से शिवलिंग निकालकर एक पुजारी ने पास के ही मंदिर में स्थापित कर लिया है। अब जब भी कोई ‘पर्यटक’ इन खंडहरों की दुर्दशा देखने आ जाता है तो पुजारी जी वह शिवलिंग दिखाने के बहाने उसे अपने नवनिर्मित मंदिर में ले आते हैं और वहीं माथा टिकवाकर उससे दक्षिणा की डिमांड करते हैं। इस दृश्य पर अपने स्थान से अलग हुआ शिवलिंग ठठाकर हँस पड़ता है कि चलो इतने बड़े मंदिर का कोई हिस्सा तो किसी का रोज़गार बन सका।
यह मुझे नहीं पता चला कि यह अमूल्य धरोहर किसी धर्मांध आततायी की कट्टरता का शिकार हुई है या फिर धरती की किसी करवट ने ईश्वर के इस भव्य मंदिर को तहस-नहस कर डाला है। लेकिन इतना मुझे ज़रूर समझ आया कि अब, जब यह अमूल्य धरोहर स्वतः ही अपनी गर्द झाड़ कर चमकना चाह रही है तब सरकारी ढर्रे की लापरवाही इन खण्डहरों को दिन-प्रतिदिन जर्जर किये जा रही है।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
6 मार्च। आज एवरेस्ट को क़रीब से देखा। बादलों के बीच घिरा श्वेत हिमालय, उस पर सोने सी पिघलती सूरज की रौशनी, नीले चोगे में लिपटे आकाश पर सफेद बादलों की बूंदी का प्रिंट। साथ में अपने भौगौलिक ज्ञान से परिपूर्ण महेंद्र अजनबी जी, जीवन के प्रति बेहद दार्शनिक सकारात्मक दृष्टिकोण से युक्त आशकरण अटल जी और प्रकृति के प्रत्येक बिम्ब में गीत की मूल पीड़ा तलाश लेने वाली डॉ सीता सागर। छोटे से देश नेपाल में जीवन की सबसे अनुभवसिक्त यात्रा भोग रहा हूँ। कवि-सम्मेलनों का धन्यवाद!
9 मार्च। नेपाल के तीन शहरों में हिंदी कविता का महोत्सव हुआ। एकल विद्यालय के संपर्क अभियान के उपलक्ष्य में आयोजित इन कवि-सम्मेलनों के आयोजन में जिन लोगों को कार्यकर्ता बनकर व्यवस्था करते देखा उनमें एस्सल समूह के उपाध्यक्ष श्री लक्ष्मीनारायण गोयल, जिंदल इंडस्ट्रीज़ के चेयरमेन श्री सुरेन्द्र कुमार जिंदल, श्री बिट्ठल माहेश्वरी, श्री महावीर घिराइया, श्री अशोक बैद, श्री गणेश खेतान, श्री अशोक सर्राफ, श्री विनोद पोद्दार, श्री शिव गोयल और श्री ओमप्रकाश लोहिया जैसे लक्ष्मीपुत्र सम्मिलित थे। जो लोग गलीचों से नीचे क़दम नहीं रखते उन्हें बीरगंज के जीतपुर गाँव की कीचड़ भरी गलियों में नंगे पाँव चलते देखा। जिनसे मिलने के लिए लोगों को अपॉइंटमेंट लेना पड़ता है उन्हें गाँव की कच्ची मढ़ैया में बैठकर लोगों से बिनती करते देखा कि वे अपने बच्चों को पढ़ने दें। जिनके पास करोड़ों के बिज़निस प्रोपोज़ल लिए लोगों की लाइन लगी रहती है उनको भरे सभागार में हैंड्स माइक लेकर लोगों से डोनेशन मांगते देखा।
‘जो विद्यालय नहीं जा सकते, उनके पास विद्यालय को ले जाना होगा’ -इस पुनीत उद्देश्य से कार्यरत एकल विद्यालय के इन कार्यक्रमों में पहली बार देखा कि भामाशाह स्वयं महाराणा प्रताप की तलाश में दर-दर भटक रहा है।
क्रमशः काठमांडू, बिराटनगर और बीरगंज में हज़ारों लोग इन कार्यक्रमों में सम्मिलित हुए। कविता के रस भी छलके, ठहाकों का महोत्सव भी हुआ और एकल विद्यालय के पुनीत कार्य के लिए हजारों लोगों को एकसूत्र में बंधते भी देखा।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
तंज़ानिया की राजधानी दार-एस-सलाम में शानदार कवि-सम्मेलन सम्पन्न हो चुका था। वहाँ बसे भारतीयों का अपनत्व हमें सहज कर चुका था। यद्यपि इस यात्रा में पाठक जी हमारे मुख्य आयोजक थे लेकिन वहाँ बसे शेष भारतीयों ने भी हमें अकेलापन महसूस नहीं होने दिया।
एक सप्ताह में बेहद खूबसूरत पल जीने को मिले। आयोजकों का अपनत्व, हिंदी के प्रति डी एन पाठक जी का समर्पण, जितेंद्र भारद्वाज का कवि प्रेम, अजय गोयल और शिवि पाठक की काव्य प्रतिभा, पारुल जी की आवाज़, तंज़ानिया में भारत के राजदूत श्री संजीव कोहली जी की सहजता और स्वामी विवेकानन्द सांस्कृतिक केंद्र के निदेशक संतोष जी की सरलता।
तंज़ानिया स्थित स्वामी विवेकानन्द सांस्कृतिक केंद्र में सविता मौर्या नामक एक महिला तंज़ानिया के स्थानीय बच्चों को हिंदी सिखाती हैं। सविता जी को यदि तंज़ानिया में हिंदी की मदर टेरेसा कहा जाए तो अतिशयोक्ति न होगी। वे अन्य प्रवासी भारतीयों की तरह अपनी आजीविका और घर-गृहस्थी में व्यस्त हैं, किन्तु इस सब व्यस्तता से बचे सप्ताहांत को वे हिंदी की खेती में उपयोग करती हैं। अनेक वर्ष से यह कार्य अनवरत जारी है। इसके परिणामस्वरूप वहाँ हिंदी बोलने, समझने, लिखने और पढ़ने वाले तंज़ानियन बच्चों का एक समूह तैयार हो गया है। इस महती कार्य को करने वाली सविता जी यह सब अवैतनिक रूप से करती हैं। हाँ, बच्चों के आने-जाने के लिए बस के किराये की व्यवस्था वहाँ के प्रवासियों की श्स्वर्णगंगाश् नामक संस्था करती है और कक्षाओं के लिए स्थान की व्यवस्था स्वामी विवेकानन्द सांस्कृतिक केंद्र में निःशुल्क की गई है।
हमने जब इन बच्चों को हिंदी बोलते सुना, हिंदी के गीतों पर भावपूर्ण नृत्य करते देखा, हिंदी सिनेमा के गाने गाते देखा और हिंदी में इनसे बात की तो लगा जैसे कोई स्वप्न साकार हो गया।
कितना कुछ यादों में क़ैद हो गया है। कवि सम्मेलन से पूर्व जब तंज़ानियन बच्चों ने किशोर कुमार के फिल्मी गाने गाए तो मन झंकृत हो गया। कवि सम्मेलन में सैंकड़ों लोगों ने लगभग दो घण्टे तक मुझे और अरुण जैमिनी जी को सुना और सराहा। हम दोनों को विश्व हिंदी दिवस के अवसर पर सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम के अगले दिन पाठक जी हम दोनों कवियों को लेकर कुंबु-कुंबु सेल्यूस नामक स्थान के लिए रवाना होनेवाले थे। सेल्यूस तंज़ानिया के उस घने जंगल का नाम है जहाँ सैलानी न केवल जंगल सफ़ारी के लिए जाते हैं बल्कि शिकार के शौकीनों के लिए इस क्षेत्र को स्वर्ग कहा जाता है। यह स्थान दार-ए-सलाम से 220 किलोमीटर दूर था।
रवानगी से ही अरुण जैमिनी जी और मैं रोमांचित थे। शिकार की बात सुनकर मन कुछ खिन्न अवश्य हुआ किन्तु इस बात की प्रसन्नता थी कि जिन वन्यजीवों को भारत में देखना सम्भव नहीं था, उन्हें उन्हीं की भूमि पर स्वच्छंद विचरते देख सकेंगे।
रास्ता लम्बा, ख़ूबसूरत, ऊबड़-खाबड़ तथा कहीं-कहीं भयानक भी था। कई घण्टे राजमार्ग पर चलने के बाद गाड़ी एक कच्ची-सी सड़क पर उतर गयी। शहर पीछे छूट रहा था और हम गहरे जंगल में समाए जा रहे थे। कच्ची सड़क के दोनों ओर घने पेड़ों के झुरमुठ थे। दिन का समय था लेकिन गाड़ी से उतरने की मनाही थी। मोबाइल का नेटवर्क साथ छोड़ चुका था। जंगल इतना घना था कि रिज़ॉर्ट का मालिक, जिसका नाम ‘अतीत’ था, वह पानी से लेकर बर्फ़ तक हर ज़रूरत की चीज़ गाड़ी में स्टोर करके चला था। वह स्वयं गाड़ी ड्राइव कर रहा था। उसने हमें बताया कि इस ख़राब सड़क पर दो या तीन टूर करने के बाद गाड़ी के काफ़ी सारे पुर्ज़े बदलवाने पड़ते हैं। उसकी बात सुनकर मैंने अरुण जी से आँखों ही आँखों में कहा कि हमें तो इसी टूर के बाद अपने पुर्ज़ों की जाँच करवानी पड़ेगी।
ख़राब सड़क पर रोड़वेज की पुरानी बस में जो खड़खड़ का पार्श्व संगीत बजता रहता है, वही संगीत इस शानदार एक्सयूवी में हमारा सहगामी बना हुआ था। लेकिन हमारा पथ-प्रदर्शक एक गुजराती युवा था जो हमसे अधिक वाचाल, सभ्य तथा उत्सवधर्मी था इसलिए पूरे रास्ते उसने कभी किशोर कुमार के गीतों से तो कभी उस घने जंगल के किस्सों से मन बहलाए रखा।
पाठक जी थोड़े अंतर्मुखी हैं, वे कम बोलते हैं किंतु चिड़चिड़े अभिभावकों की तरह मनोरंजन में व्यवधान उत्पन्न नहीं करते। उल्टे हर गतिविधि में अपने मौन के साथ उपस्थित रहते हैं।
यूँ तो कुंबु-कुंबु रिज़ॉर्ट पहुँचते-पहुँचते दोपहर हो गयी थी लेकिन अतीत भाई के आतिथ्य ने रास्ते भर इतनी आवभगत की थी कि भूख लगभग नदारद थी। लेकिन रसोई में सामर्थ्य हो तो वह अफारे में भी भूख जगा दे। यही हमारे साथ उस दिन हुआ। उस घने जंगल में जहाँ ध्यान भटकाने के लिए मोबाइल नेटवर्क नहीं था, वहाँ ग्रामीण आभा से सुसज्जित उस प्रांगण में ज्यों ही हम खाट पर पसरे, हमारे सामने छाछ के गिलास अवतरित हो गए। सफ़र की थकान में जी भर-भर छाछ गटकने के बाद हम बहुत दिन बाद मोबाइलहीन होकर मनुष्यों से बात कर पा रहे थे।
जंगल की दोपहरी, रिजॉर्ट का खुला आंगन, घने वृक्षों की छाँव में बिछी हुई खाटें, दो पेड़ों के तनों से बंधा हुआ आराम झूला और इस माहौल को भोगते हुए हम। दस मिनिट में ही खाना लगा दिया गया। पेट भरा होने के बावजूद इस निर्जन में ऐसी व्यवस्था करने वाले का अनुरोध टाला न जा सका। अचार से लेकर तरकारी तक, सबमें से थोड़ा-थोड़ा थाली में सजाया तो छप्पन भोग जैसा महसूस होने लगा। ‘जंगल में मंगल’ की अवधारणा का कुछ-कुछ अर्थ हमें समझ आ रहा था।
थकान, माहौल और अन्न ग्रहण के उपरांत पलकों ने झपकने की तैयारी कर ली। लेकिन हमारे होस्ट ने शायद हमारे आलस्य की सुपारी ले रखी थी। ज्यों ही हमने सुस्ताने की बात कही, वह बोल उठा कि एक बार रूफिजी का पानी देख लो, फिर सो लेना।
रूफिजी एक भव्य नदी है, जिसके किनारे यह रिज़ॉर्ट बना हुआ है। यह नदी सेल्यूस के बीच से बहती है। इसमें घड़ियालों और मगरमच्छों के झुंड आसानी से दिखाई दे जाते हैं। हम खाट से उठकर सौ क़दम ही चले होंगे कि हमें इस विशालकाय नदी के दर्शन हुए। प्रकृति को उसका अपना माहौल मिल जाए तो वह कितनी विराट हो जाती है, इस बात का अनुमान हमें नदी के तट पर खड़े होकर हुआ।
कुछ देर इस नदी के सौंदर्य को निहारने के बाद हम अंततः रिज़ॉर्ट में बने कमरों में आकर पसर ही गए। एकाध घण्टे की नींद; जिसे बेहोशी कहना अधिक समीचीन है; उससे ऊर्जा एकत्रित करके हमने चाय का एक सत्र चलाया। चाय पीते-पीते हमें बताया गया कि अब हम इससे भी ज़्यादा ख़ूबसूरत अनुभव से गुज़रने वाले हैं। हम शहरी लोगों के लिए यही स्थान कुंजवन सरीखा आनन्द उपलब्ध करा रहा था, अब इससे अधिक क्या होगा… यह हमारी समझ से परे था।
शाम हो रही थी… हम चाय की चुस्कियाँ लेते हुए कल्पना कर रहे थे कि अब आगे क्या होगा। उधर रिज़ॉर्ट के कर्मचारियों ने काफ़ी सारा सामान नदी तट पर रखी नाव में जमाना शुरू कर दिया। चाय समाप्त होते ही हमें भी एक दूसरी नाव में सवार कर दिया गया। यह नाव एक जानदार मोटरबोट थी, एक नाव में ढेर सारा सामान एक निश्चित दिशा में चल रहा था और दूसरी नाव में हमारा होस्ट हमें रूफिजी की लहरों पर रोमांच करा रहा था।
घड़ियालों से भरी नदी में सूर्य अस्त होने जा रहा था। हल्के बादलोंवाले आकाश में प्रदूषण से मुक्त संध्या अनगिनत रंग बिखेरकर जो दृश्य उत्पन्न करती है उसी के लिए ‘वर्णनातीत’ शब्द की सर्जना हुई होगी। रूफिजी का पाट इतना चौड़ा है कि एकबारगी समुद्र का भ्रम होने लगता है। हमारी मोटरबोट पूरी गति से डूबते हुए सूर्य की दिशा में दौड़ रही थी। पीछे नदी की लहरें मोटरबोट के वेग से एक विशेष आकार बनाते हुए नृत्य कर रही थीं। मोटरबोट पूरे उत्साह में भरकर डूबते सूरज को छू लेने को तत्पर थी और नदी उस तुच्छ मशीन का हाथ पकड़कर उसे रोक लेने को आतुर थीं। हम लहरों पर सवार थे, आँखों में प्रकृति का अनुपम सौंदर्य चमक रहा था, आगे का कार्यक्रम पता नहीं था इसलिए कहीं पहुँचने की जल्दी भी नहीं थी। जब तक सूर्य अस्त न हो गया तब तक हम इसी आनन्द में मग्न रहे। हमारा मोबाइल केवल कैमरा हो गया था।
इधर अंधेरा उजाले पर हावी होने लगा, और उधर हमारा केवट हमें रिज़ॉर्ट ले जाने की बजाय नदी के बीच उग आए एक रेतीले टापू पर ले आया। हम पहली बार इस तरह के टापू पर आए थे इसलिए टापू पर चढ़ने में हम दोनों को ख़ासी मशक्कत करनी पड़ी।
रात हो रही थी और हम निर्जन वन के बीच विशाल नदी पर बने एक टापू पर कुर्सी लगाकर बैठे थे। हमारे पैरों के नीचे हाल ही में बने किसी मगरमच्छ के पंजों के निशान थे। नदी में घड़ियालों की आँखें चमक रही थीं। पानी की गति का जो संगीत होता है, उसकी लय पर पूरा वातावरण अस्ताचल से निकलती धीमी रौशनी में नृत्य कर रहा था।
दूसरी नाव में लादकर टापू पर एक लाइव तंदूर (जिसे आजकल बारबिक्युनेशन बोलते हैं) लाया गया था। शाकाहारी स्नेक्स की दर्जनों वैरायटी के साथ सोमरस की भी व्यवस्था की गई थी। हमें बताया गया कि नॉनवेज खानेवालों के लिए नॉनवेज भी बनवाया जाता है। इसलिए हम दोनों के शाकाहारी होने की बात सुनकर हमारा होस्ट काफी निराश था।
बहरहाल, रात का सन्नाटा। और यह सन्नाटा आपकी कल्पना में उतरे किसी भी सन्नाटे से ज़्यादा रोमांचक था। छोटा सा रेत का द्वीप, उसके चारों ओर पूरे वेग से बहती नदी, नदी के चारों ओर अफ्रीका का घना जंगल, नदी के पानी में चमकतीं मगरमच्छ की आँखें, जंगल से आती शेर की आवाज़, चांदनी रात, तारों से भरा आकाश, सामने रखे तंदूरी आलू, हाथ में जाम और बराबर की कुर्सी ओर रखे सारेगामापा कारवां में किशोर दा का गीत- ये शाम मस्तानी…!
अगली सुबह खुली जीप में हम गेम रिज़र्व में दाखि़ल हुए। हमारा राइडर देव एक अफ्रीकी लड़का था, लेकिन उसका स्वभाव बेहद शालीन था। अंग्रेजी उसे समझ आती थी सो संवाद में कोई ख़ास समस्या नहीं हो रही थी। प्रवेश करते ही इम्पाला हिरणों का एक झुंड चौकड़ी भरते हुए हमारे सामने से गुज़रा। उसके बाद जिराफ़, ज़ेब्रा, जंगली सूअर, जंगली भैंसे, साँप, दरियाई घोड़े, सांभर, बंदर, लंगूर और मगरमच्छ देखते हुए तीन घण्टे का समय बीत गया। देव, मुख्य सड़क पर चल ही नहीं रहा था। ऊबड़-खाबड़ धरती पर उसकी लैंड-क्रूज़र शेर की तलाश में झाड़ियों को रौंदती हुई बढ़ रही थी। अचानक देव ने अपनी भाषा में कुछ कहा। उसके चेहरे की रंगत और आँखों की चमक बता रही थी कि हमारी तलाश ख़त्म होने को है। उसने एक छोटे से टीले के ऊपर गाड़ी चढ़ा दी। टीले के ऊपर एक पेड़ था, जिसकी छाया में पाँच शेरनियाँ आराम फरमा रही थीं। देव ने उनसे लगभग तीन फीट दूर गाड़ी रोक दी। अरुण जी और मैं इस खूबसूरत ख़तरे को निहारते रहे। हमने खूब फ़ोटो खींची। शेरनियों के साथ पोज़ बनाकर सेल्फियाँ भी लीं। ऐसा लगा मानो कोई संकल्प पूरा हो गया हो।
शेरनियाँ सुस्ती में सोती रहीं और हम आगे बढ़ गए। थोड़ी दूर पर हमें हाथियों का एक झुंड मिला। यह भी हमसे 10 फीट से ज़्यादा दूर नहीं था। गर्मी से मुक्ति पाने को हाथी अपने ऊपर पानी डालते रहे और हम आराम से उनकी वीडियो बनाते रहे। इसके बाद हमने एक ऐसी जगह पर खाना खाया जहाँ चारों ओर जिराफ़ ही जिराफ़ थे।
सुकून, रोमांच और आंनद जैसे शब्दों के सही मआनी क्या होते हैं; यह बताने में शायद मैं अभी पूरी तरह सफल न होऊँ, लेकिन जब कभी इन शब्दों के बारे में सोचता हूँ तो मेरी कल्पना रूफिजी के बीच बने उस रेतीले टापू पर पहुँचकर घने अंधेरे में गुम हो जाती है।
✍️ चिराग़ जैन