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बलात्कार की जड़ें

बलात्कारी कहीं आसमान से नहीं आते। हम जैसे ही सामान्य दिखनेवाले लोग होते हैं, ये वीभत्स अपराधी। स्त्री सुरक्षा को लेकर जो कुछ बातें बनाई जाती हैं, उनकी निस्सारता हर बार उघड़कर सामने आती है। हमारे यहाँ रात-बेरात लड़कियों को अकेली जाने पर मनाही थी। लेकिन निर्भया काण्ड से पता चला कि किसी का साथ होना भी काम नहीं आता। बुलन्दशहर कांड में तो पिता के सामने माँ-बेटी को एक साथ रौंदा गया।
अब रात और दिन का भी कोई अर्थ नहीं रहा। हवस ने अब घड़ी देखना बन्द कर दिया है। बलात्कारी भी शेष समाज की तरह अमीर-ग़रीब, शिक्षित-अशिक्षित, अगड़े-पिछड़े, हिन्दू-मुस्लिम कई प्रकार के होते हैं। अमीर बलात्कारी यकायक किसी को खेत में जाकर दबोचने से परहेज करता है। वह बाक़ायदा आर्थिक, सामाजिक अथवा अन्य किसी प्रकार का दबाव बनाकर लड़की के साथ इत्मीनान से सालों तक बलात्कार कर सकता है। जबकि ग़रीब बलात्कारी के पास न तो ऐसा कोई लोभ होता है, न धैर्य। इसलिए वह मौक़ा देखते ही वीभत्स होने में यक़ीन करता है।
कुछ विशेष किस्म के बलात्कारी घर से यह सोचकर नहीं निकलते कि उन्हें बलात्कार करना है। वे तो बस हाथ आये अवसर का लाभ उठाते हुए कभी लड़की की छातियाँ मसलते दिखते हैं तो कभी दंगों या बलवों का लाभ उठाकर लूटपाट के साथ बलात्कार भी कर देते हैं। यह सब इतना अचानक घटित होता है कि न तो बलात्कारी को पुलिस की वर्दी बदलने का वक़्त मिलता है, न ही किसी धर्म विशेष का पटका गले में से उतारने की सुधि रहती है। शायद बलवों में विरोधी धर्म की बहन-बेटियों की आबरू लूटना वीरता माना जाता हो। अन्यथा किसी धर्म की रक्षार्थ निकले जत्थों में एक न एक व्यक्ति तो इस कर्म का विरोध करने के लिए आगे ज़रूर आता।
हर दुर्दांत कांड के बाद हम सरकार से कड़े कानूनों की मांग कर बैठते हैं। सरकारें भी अपनी राजनीति बचाने के लिए क़ानून बना देती हैं, लेकिन जब भी कोई लड़की अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए अथवा किसी से अन्य बदला लेने के लिए इन कानूनों का दुरुपयोग कर रही होती है, तब वह किसी नए बलात्कार की नींव रख रही होती है। जब-जब इन कानूनों का दुरुपयोग होता है तब-तब समाज ऐसी घटनाओं के प्रति संवेदनहीन होता जाता है।
हैदराबाद, बुलंदशहर, कानपुर, हाथरस, अलवर, दिल्ली, गुवाहाटी… ये सब शहर ऐसी घटनाओं पर शर्मिंदा होकर अपनी बेटियों के आगे लज्जित हो चुके हैं। कॉलेज परिसर से लेकर खेत-खलिहानों तक और न्याय के मंदिर से लेकर धर्म के मंदिरों तक इस अपराध ने पैर पसारे हैं। यौन-कुंठित नपुंसकता जब पौरुष का भरम पाल लेती है, तब बलात्कार होता है। अत्याधुनिक बनने की होड़ जब ‘ओपन माइंडेड कल्चर’ की आड़ में असभ्य शब्दावली को सामान्य मानने लगती है, तब बलात्कार होता है।
स्कूल से निकलती बच्चियों से लेकर कचरा बीनती अधेड़ तक; तीन महीने नई नवजात से लेकर 80 वर्ष की वृद्धा तक, असुरक्षा के इस अभिशाप को झेलती हैं। मतलब साफ़ है, बलात्कार किसी शारीरिक सुख की प्राप्ति का ज़रिया नहीं, बल्कि पाशविक प्रवृत्ति के मुखर हो जाने का परिणाम है। और इस प्रवृत्ति को खाद-पानी देने में समाज का प्रत्येक वर्ग समान अपराधी है।
हम सबको अपने समाज में पनप रही इस पशुता को अपने-अपने स्तर पर नष्ट करना होगा, क्योंकि तंत्र से अपेक्षा रखकर हम अब तक कई बेटियों की ज़िंदगी बर्बाद कर चुके हैं।

✍️ चिराग़ जैन

भाषा : सिनेमा से समाज तक

हिन्दी सिनेमा की भाषा भारतीय समाज में हिंदी की यात्रा का सम्पूर्ण चित्र प्रस्तुत करने के लिये पर्याप्त है। ज्यों-ज्यों समाज की भाषा बदली त्यों-त्यों सिनेमा की भाषा भी बदलती गयी।
प्रारंभिक हिंदी फिल्मों में एक ओर उर्दू शब्दावली की भरमार थी तो दूसरी ओर संस्कृतनिष्ठ हिंदी भी सहज स्वीकार्य होती थी। ‘ग़म दिये मुस्तक़िल’ जैसे गीत उन दिनों लोकप्रियता के प्रतिमान बन जाते थे। मजरूह का ही ‘हम हैं मताए-कूचा-ए-बाज़ार की तरह’ जैसी ख़ालिस उर्दू की ग़ज़ल भी न केवल स्वीकार्य थी बल्कि जनता के मुँह पर चढ़कर बोलती थी। उर्दूनिष्ठ हिंदी के ये उदाहरण बाद में शकील बदायूनी, साहिर लुधियानवी, हसरत जयपुरी, क़ैफ़ी आज़मी, जांनिसार अख़्तर और शहरयार से होते हुए गुलज़ार और जावेद अख़्तर के ज़माने तक ख़ूब दिखाई देते हैं। हाल ही में ‘मेरे रश्के-क़मर तूने पहली नज़र इस तरह से मिलाई मज़ा आ गया’ गीत की लोकप्रियता ने उर्दू की स्वीकार्यता पर पुनः मुहर लगाई। यह भी सत्य है कि उर्दू की गाढ़ी शब्दावली के प्रयोग में अब, पहले की अपेक्षा, क़ाफ़ी कमी आ गई है। हाँ, आम बोलचाल की उर्दू पहले भी ख़ूब प्रचलित थी और आज भी उसकी स्थिति में कोई ख़ास बदलाव देखने को नहीं मिलता।
उधर संस्कृतनिष्ठ हिंदी के उदाहरण स्वरूप भरत व्यास के गीतों ने बड़ी लक़ीर खींची। ‘हरी-भरी वसुंधरा पे नीला-नीला ये गगन’; ‘प्रणय, विरह और मिलन की कथा सुनो साथी’; ‘कल्पना के घन बरसते’ और ‘ओ पवनवेग से उड़ने वाले घोड़े’ सरीखे गीत हिंदी सिनेमा के उस दौर की पहचान बने। इंदीवर ने ‘चन्दन सा बदन, चंचल चितवन’ जैसी शब्दावली से पण्डित जी की इस परंपरा को पुष्ट किया। गोपालदास नीरज जी ने ‘मदिर’; ‘पाती’ और ‘जल’ जैसे शब्दों को गीत में पिरोकर प्रचलित कर दिया। क्लिष्ट शब्दावली के प्रयोग के और भी तमाम उदाहरण हिंदी फिल्मी गीतों में आसानी से ढूंढे जा सकते हैं। बालकवि बैरागी जी द्वारा लिखे गये गीत ‘तू चंदा मैं चांदनी’ में ‘तरुवर’ और ‘पाख’ जैसे शब्द बड़ी आसानी से प्रयुक्त हुए हैं। इससे इंगित मिलता है कि उस समय तक हमारे जन की भाषा में प्रचलन से बाहर हुए शब्दों को पुनर्जीवित करने की क्षमता थी।
इससे अलग एक धारा आमफ़हम शब्दों के दायरे से बाहर जाने से परहेज करती रही। शैलेन्द्र के गीतों में हिंदी का सर्वाधिक जनसुलभ स्वरूप प्रदर्शित होता है। वे दर्शन के गीत भी सबसे सादा शब्दावली के परकोटे से बाहर नहीं जाने देते थे। ‘आज फिर जीने की तमन्ना है, आज फिर मरने का इरादा है’; ‘वहाँ कौन है तेरा मुसाफ़िर जाएगा कहाँ’; ‘सजन रे झूठ मत बोलो, ख़ुदा के पास जाना है, न हाथी है न घोड़ा है वहाँ पैदल ही जाना है’ और ‘याद न जाए बीते दिनों की’ जैसे गीत उसी भाषा के उदाहरण हैं जो हम आज भी आम बातचीत में प्रयोग करते हैं। क़ैफ़ भोपाली, राजा मेहदी अली ख़ान, इंद्रजीत सिंह तुलसी, पण्डित नरेंद्र शर्मा, विट्ठलभाई पटेल और राजेंद्र कृष्ण जैसे रचनाकार भी लगभग इसी आम शब्दावली की परंपरा के गीतकार रहे। और यह शब्दावली ही फिल्मों में सर्वाधिक अपेक्षित भी रही, क्योंकि संस्कृतनिष्ठ हिंदी और उर्दूनिष्ठ हिंदी लिखनेवाले रचनाकारों के यहाँ भी इस शब्दावली के उदाहरण ख़ूब दिखाई देते हैं।
समय के साथ हमारी भाषा में पंजाबी के शब्दों की उपस्थिति बढ़ने लगी। ऐसे में आनन्द बख़्शी और संतोष आनन्द ने पंजाबी के शब्दों का सहजता से प्रयोग किया। ‘कुड़ी’; ‘मुंडा’ जैसे एकाध शब्द का प्रयोग बाद में इतना बढ़ा कि आनंद बख्शी ने ‘बिंदिया चमकेगी’ गीत की प्रत्येक तुकांत पंक्ति में बाक़ायदा पंजाबी का व्याकरण प्रयोग किया – ‘छत टुटदीये ते टुट जाये’।
लोकशैली के गीतों और कहीं-कहीं शुद्ध लोकगीतों को फिल्मों में प्रयोग किया गया तो अवधी, बृजभाषा, मराठी और भोजपुरी के हस्ताक्षर फिल्मी गीतों में चलने लगे। ‘चलत मुसाफ़िर मोह लिया रे’, ‘ठाड़े रहियो ओ बाँके यार रे’ और ‘कौन दिसा में ले के चला रे बटोहिया’ जैसे गीत इस धारा की गीतशैली के श्रेष्ठ उदाहरण हैं।
‘गॉड प्रॉमिस हम सच बोला है’ जैसे मुम्बइया हिंदी के भी कुछ गीत फिल्मों का हिस्सा बने। लेकिन यह प्रयोग बहुत अधिक प्रचलित न हो सका। इसी तरह दक्खिनी हिंदी का तड़का लगाकर ‘हमें काले हईं तो क्या हुआ दिलवाले हैं’ जैसे भी एकाध गीत लिखे गए; लेकिन वे भी चरित्र की मांग से अधिक अपनी स्वीकार्यता न बना सके। इसके पीछे एक कारण यह भी हो सकता है कि हिंदी फिल्मों का लक्ष्य दर्शक इस भाषा से बहुत परिचित नहीं रहा।
विशेष प्रयोग के रूप में दूसरी पीढ़ी की फिल्मों में भाषाओं के सम्मिश्रण के कुछ उदाहरण अवश्य मिलते हैं, लेकिन उनको भी परंपरा न बनाया जा सका। साहिर ने ‘न तो करवां की तलाश है’ में पंजाबी, ब्रजभाषा और उर्दू का अद्भुत समागम प्रस्तुत किया। नीरज जी ने भी ‘छुपे रुस्तम हैं ज़माने की ख़बर रखते हैं’ में अवधी का तड़का लगाकर क़व्वाली की खूबसूरती बढ़ाई। लेकिन इनकी सनद लेकर आगे के गीतकार ऐसे बहुत अधिक प्रयोग न कर सके।
फिल्मों की छठी-सातवीं पीढ़ी में अचानक अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग प्रारम्भ हुआ। यहाँ से शब्दों की तोड़-फोड़ प्रारम्भ हुई। भाषा खिचड़ी होने लगी। यह स्पष्ट रूप से कहना कठिन होगा कि यहाँ से जनता की भाषा फिल्मों ने बदली या फिल्मों की भाषा जनता ने! अंग्रेजी के मुहावरे और विशेष रूप से ‘आई लव यू’ वाक्यांश का प्रयोग गीतों में बहुतायत में होने लगा। वीनू महेंद्र ने ‘लवेरिया’ जैसा शब्द गढ़कर भी गीत लिखा, जो अपने समय मे मिसाल बन गया। आनन्द बख्शी ने भी अंग्रेजी के सहज शब्दों का प्रयोग करने के साथ-साथ कहानी की मांग पर अंग्रेजी के व्याकरण को निभाते हुए भी ‘माई नेम इज़ एंथोनी गोंसाल्विस’ जैसा गीत भी लिखा।
इसके बाद गीतों की भाषा कब हिंग्लिश हो गई, पता ही न चला। वे वर्जित शब्द जिन्हें असंसदीय या अश्लील समझा जाता था, वे भी गीतों में सम्मिलित होने लगे। हम गीत-ग़ज़ल से शुरू होकर गाली-गलौज तक को स्वीकारने लगे। यही स्थिति हमारी आम बोलचाल की भी रही। अंग्रेजी शब्दावली के बढ़ते चलन ने इस स्थिति को पुष्ट करने में महती भूमिका अदा की। एक ज़माने में ‘सेक्सी सेक्सी सेक्सी मुझे लोग बोलें’ गीत आया था तो सभ्य परिवारों में इस गीत को गुनगुनाने पर बच्चे पीट दिए जाते थे। बाद में यह सब आम हो गया। बॉलीवुड में ‘सत्यम-शिवम-सुंदरम’ और ‘राम तेरी गंगा मैली’ जैसे चित्रपट कलात्मक दृश्यों के कारण विवादित हो गए, लेकिन उनसे जन साधारण की सोच दूषित न हो सकी। लेकिन गीत और संवाद में अश्लीलता की घुसपैंठ ने आज यह स्थिति उत्पन्न कर दी है कि हमारे समाज की भाषा सभ्यता की मर्यादा लांघ चुकी है।
दृश्य सिनेमाघर के पर्दे पर छूट जाता है और भाषा लोगों की ज़ुबान पर चढ़कर समाज में छूत की तरह फैल जाती है। भाषा में वर्जित शब्दावली का सामान्य प्रयोग बढ़ने की प्रवृत्ति भाषा के लिए तो घातक है ही, समाज और संस्कृति के लिए भी विषबेल सरीखी है।
हिंदी फिल्मों की भाषा से यदि समाज की भाषा बनती है तो फिल्मों को अपनी भाषा के प्रति उत्तरदायित्व-बोध महसूस करना होगा और समाज की भाषा के आधार पर फिल्मों की भाषा तय होती है, तो हमें अपने परिवारों के भाषा-स्तर के प्रति बेहद गम्भीर होने की आवश्यकता है।
✍️ चिराग़ जैन

पत्रकारिता का अंधा युग

जिस पत्रकारिता ने आदर्श, सिद्धांत, जनहित, सच और क्रांति जैसे शब्दों को अर्थ प्रदान किये, वही आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। सुनते हैं कि देश में जब कभी विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका के स्तम्भ जर्जर हुए हैं, तब-तब अकेले इस एक स्तम्भ ने लोकतंत्र के ढाँचे को बचाए रखा है। ‘जब तोप मुक़ाबिल हो तो अख़बार निकालो’ जैसे जुमलों से सुसज्जित पत्रकारिता आज ‘दलाली’ की गाली झेलने पर विवश है। गणेश शंकर विद्यार्थी और माखनलाल चतुर्वेदी जैसे कलमकारों के वंशज आज जनता से पिट रहे हैं और गालियाँ खा रहे हैं।
ग़ुलामी के दिनों में अंग्रेज सरकार की नाक में दम करनेवाली पत्रकारिता; आपातकाल में इंदिरा सरकार के खि़लाफ़ काले पन्ने पोतने वाली पत्रकारिता आज इतनी लाचार और जर्जर हो गई है कि नैतिकता और आदर्श तो दूर, अपने पेशे के मूलभूत नियमों का निर्वाह करने में भी असमर्थ सिद्ध हो रही है।
कभी पत्रकारों को इस बात का अभिमान होता था कि उनकी स्टोरी पर आज संसद में सवाल पूछा गया। कभी संपादक इस बात पर इतराते थे कि उनका अख़बार आज संसद में लहराया गया। कभी राजनीति को इससे फ़र्क़ पड़ता था कि अख़बार उनके विषय में क्या लिख रहे हैं। लेकिन आज राजनीति ने लोकतंत्र के वाचडॉग को स्ट्रीट डॉग जितना महत्व देना भी बंद कर दिया है। जो जनता पत्रकारों को अपनी आखि़री उम्मीद मानती थी, वह आज पत्रकारों को मारने पर उतारू है।
टीआरपी की अंधी दौड़ ने सुंदरियों को एंकर बनाने की जो मुहिम शुरू की थी वह आज चैनल वॉर तक आ पहुँची है। कभी अख़बार पढ़कर राजनीति की दिशा तय की जाती थी, लेकिन आज राजनीति का मूड देखकर ख़बरें बनाई जा रही हैं। चैनल के एंकर किसी आततायी आक्रमणकारी की तरह अराजकता की हद्द को लांघकर ख़बरें पढ़ रहे हैं। सड़क पर खड़ा पत्रकार हाँफ-हाँफ कर पीटूसी कर रहा है। बहस में माँ-बहन की गालियाँ ऑन एयर जाने लगी हैं।
क्या यही वह न्यूज़ एंकरिंग है जिसकी बुनियाद सुरेन्द्र प्रताप सिंह सरीखे संवेदनशील मनुष्य ने रखी थी। अख़बारों ने बाज़ार का लेप इतना ज़्यादा लगा लिया है कि अख़बार की आत्मा कहा जाने वाला सम्पादकीय पृष्ठ हाशिये पर चला गया है। इलैक्ट्रॉनिक मीडिया में नम्बर वन की ऐसी होड़ है कि बलात्कार और अपराध की ख़बरों को चटपटा बनाने के लिए मनुष्यता को चूल्हे की आँच में झोंकना आम हो गया है।
कभी जनमत की देवी कही जाने वाली पत्रकारिता आज उद्योगपतियों की रखैल और हुक्मरानों की दासी हो चली है। हिंदी फिल्मों में भी जिस पत्रकारिता की बेईमानी के सीन दिखाने में हिचकिचाहट बनी रही है, वह आज बिना सेंसर की ‘सी क्लास’ फिल्मों से भी ज़्यादा नीचे उतर आई है।
ख़बरों से खेलने और स्क्रीन भरने के कौशल से टीआरपी के आँकड़े जुटाते पत्रकार अगर इस वक़्त में ठहरकर अपने अस्तित्व की चिंता न कर सके तो यह स्थिति और भी भयावह हो जाएगी। कुर्सी से उछल-उछलकर टीआरपी बटोरते एंकर यह विचार करें कि जिनका काम जनता को बौद्धिक ख़ुराक़ देना था, वे आज घृणा मिश्रित उपहास के पात्र बनते जा रहे हैं।
धन अर्जित करना कोई अपराध नहीं है, लेकिन धन की इस भूख में जनहित को भेंट चढ़ा देना न तो नैतिकता है, न ही समझदारी। आज राजनैतिक दलों की और अपने अन्नदाता उद्योगपतियों के हस्तक्षेप के कारण यह स्थिति तो आ ही चुकी है कि सत्ताधारी दल की मर्ज़ी के बिना स्टोरी तो क्या टिपर चलाने की भी हैसियत किसी चैनल की नहीं है। इस स्थिति का प्रतिकार न किया गया तो सत्ता के स्वार्थ और जनता की घृणा के मध्य पत्रकारों की हालत यह होगी कि फ़ख़्र से गाड़ी पर ‘प्रेस’ का स्टिकर चिपकानेवाले व्हाइट कॉलर जर्नलिस्ट्स को यह बताते हुए शर्म आएगी कि वे मीडिया से हैं।

✍️ चिराग़ जैन

द शो मस्ट गो ऑन

शास्त्र कहते हैं कि हमें घटनाओं को दृष्टाभाव से देखना चाहिए। उनसे प्रभावित नहीं होना चाहिए। किंतु हम भारतीय, इतने संवेदनशील हैं कि हर घटना से विह्वल हो उठते हैं। यह स्वभाव संत-महंतों की वाणी की अवमानना है।
जब कई युगों में कई अवतार और महापुरुष मनुष्य को स्थितप्रज्ञ न बना सके तब ईश्वर ने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का सृजन किया। मीडिया ने हमारा मन पक्का करने के लिए हमें एक ही घटना से इतनी बार साक्षात्कार करवाया कि हमारा हृदय वज्र हो गया।
अमरीका में ट्विन टॉवर्स के गिरने की घटना कमज़ोर दिलवालों का दिल दहला न दे इसलिए विश्व भर के न्यूज़ चैनल्स ने उसे अलग-अलग एंगल से इतनी बार दिखाया कि सुख-दुःख के संसारी भाव में फँसे प्राणियों ने गिरनेवाली इमारतों की एक-एक मंज़िल इत्मीनान से गिन लीं।
इस प्रयोग के सफल रहने के बाद हमने संसद पर आतंकवादी हमले से लेकर मुंबई के ताज हमले तक सब कुछ साक्षी भाव से देखा। अपने अनुयायियों को इन ख़बरों से रोमांचित होते देख मीडिया ने हमें रोमांचित करने का नियमित कार्यक्रम तैयार कर लिया।
सूचना प्रेषण के टुच्चे लक्ष्य से प्रारम्भ हुई पत्रकारिता सनसनी, रोमांच और मनोरंजन जैसे विराट लक्ष्यों को साधने में सफल हुई। मीडिया ने प्रवचन नहीं किये, किन्तु अपने आचरण से हमें बताया कि कोई भी समस्या तभी तक बड़ी होती है जब तक अगली समस्या न आ जाए।
संत प्रवचन करते रह गए कि तूफ़ानों के सामने डटकर खड़े होना चाहिए। मीडिया ने यह काम करके दिखा दिया। जब भी कोई तूफ़ान भारत में प्रवेश करने लगा तो हमारे पत्रकार मुम्बई की चौपाटी पर कैमरा फिक्स करके डटकर खड़े हो गए। इस कठिन तपस्या से प्रसन्न हो बड़े से बड़े तूफ़ान ने अपना रास्ता बदल लिया।
इसे कहते हैं साधना। घटना घटे और ख़बर सुना दी जाए, यह तो कोई भी कर सकता है। इसमें काहे का बड़प्पन। घटना से ख़बर तो बनती ही आई है, लेकिन हमारे मीडिया ने ख़बर से घटना बनाकर यह प्रमाणित किया कि आदमी चाहे तो तक़दीर ही नहीं तरतीब भी बदल सकता है।
जिसके घर में कोई मौत हो गई हो, उस मातम में भी मृतक की पत्नी का बढ़िया से फ्रेम बनाकर उसको रोते हुए बाइट देने के लिए तैयार करने की क्षमता के लिए बेग़ैरती की जो तपस्या हमारे पत्रकारों को करनी पड़ती है, उसका अनुमान आम जनता को कभी नहीं हुआ।
मीडिया ने प्रण लिया है कि वह आपकी टीवी स्क्रीन को ख़ाली नहीं रहने देगा। इसलिए कोसी की बाढ़, कोयले के भंडार की समाप्ति, दुनिया नष्ट होने की भविष्यवाणी, कानपुर के पास सोना मिलने का सपना, सलमान का मुक़द्दमा, विकास का एनकाउंटर, राफेल की भारत यात्रा, पीएम का मोर प्रेम, कांग्रेस की कार्यसमिति की बैठक, सिंधिया का दलबदल, अमिताभ बच्चन की नानावटी यात्रा, पायलट का गुड़गांव भ्रमण और ऐसे ही तमाम मुद्दों को कई-कई दिन तक खींचने के बाद यकायक ग़ायब करके यह संदेश देता है कि यह संसार क्षणभंगुर है। इसको निर्लिप्त भाव से देखने वाला प्राणी ही सच्चे सुख को प्राप्त करता है।
सुशांत सिंह राजपूत मुआमले की जाँच को लेकर भी मीडिया ने यही समझाने का प्रयास किया कि जो तुम्हें दिख रहा है वह समस्या नहीं केवल भ्रम है। कल कोई नया झुनझुना मिलेगा तो यह मरीचिका यकायक ओझल हो जाएगी। किन्तु इसके ओझल होने का यह अर्थ कदापि नहीं है कि मीडिया जनता को रोमांचित करना बंद कर देगा। ‘द शो मस्ट गो ऑन’। इसके लिए किसी की चरित्र हत्या होती हो, तो हो जाए, इसके लिए किसी परिवार की संवेदनाएं खरोंची जाती हों तो खुरचने दो …बट द शो मस्त गो ऑन।
लॉकडाउन जैसे ख़बरहीन समय में भी मीडिया ने अपने धर्म से मुख नहीं मोड़ा। सुशांत सिंह राजपूत की मौत से हर रोज़ टीआरपी निचोड़ते रहे। फिर उसकी जाँच की प्रक्रिया की कड़ाही चढ़ गई। जिस अभिनेता की असमय मृत्यु से देश स्तब्ध हो गया था, अब उससे जुड़ी ख़बरों से ऊब होने लगी है। शोकमुक्ति का यह तरीक़ा कितना सफल रहा है।
हमें मीडिया के प्रति आभार व्यक्त करना चाहिए कि हमारे समाज को संवेदनहीन बनाकर निष्ठुर कर देने के लिए उसने कितनी गालियाँ खाई हैं।

✍️ चिराग़ जैन

मधुबन पर बस उसका हक़ है

फूलों का सौंदर्य निरखने
बगिया में दुनिया आती है
रंग लुभाते हैं आँखों को
गंध भ्रमर को ललचाती है
लेकिन हर ललचाने वाला
सुख की घड़ियों का ग्राहक है
जड़ में जिसका लगा पसीना
इस उपवन पर उसका हक़ है

शोभा बढ़ती है उपवन की
रूप निरखने वालों से भी
फूलों का मकरंद निखरता
उसको चखने वालों से भी
लेकिन मधुबन उसका होगा
जो ये फूल उगाने आया
तुम सब खिल जाने पर आए
पर वो इन्हें खिलाने आया
तुम उत्सव के अभिनेता हो
वो संघर्षों का नायक है
जिसने सींचे हैं सब पौधे
बस मधुबन पर उसका हक़ है

मंदिर-मंदिर द्वारे-द्वारे
तुमने केवल हाथ पसारे
ईश्वर के व्यापारी बोलें-
ईश्वर हैं क्या सिर्फ़ तुम्हारे?
पूजक बनकर तुमने केवल
इच्छाओं का भार दिया है
छैनी ने आकार दिया है
शब्दों ने विस्तार दिया है
देवालय में मूरत रखकर
शीश झुकाने वाले सुन लें
जिसने रूप गढ़ा मूरत का
बस भगवन पर उसका हक़ है

धरती उनकी है, जो आए
तिनका-तिनका नीड़ बनाने
उनका क्या जो निकल पड़े हैं
ध्वंस मचाती भीड़ बनाने
जो लालच से अभिप्रेरित है
उसका कुछ अधिकार नहीं है
विक्रेता, सर्जक से ऊँचा!
जीवन है, बाज़ार नहीं है
कंस, कालिया सबने केवल
गोकुल का दोहन करना था
जिसने वंशी के स्वर घोले
वृंदावन पर उसका हक़ है

✍️ चिराग़ जैन

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