बेवफ़ा को इश्क़ हो जाए
कली चटके तो गुलशन से हवा को इश्क़ हो जाए
वफ़ा ऐसी ग़ज़ब हो, बेवफ़ा को इश्क़ हो जाए
इबादत वो कि रब बंदे का दीवाना बना भटके
मुहब्बत वो कि आशिक़ से ख़ुदा को इश्क़ हो जाए
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Muktak, Poetry, Unpublished
कली चटके तो गुलशन से हवा को इश्क़ हो जाए
वफ़ा ऐसी ग़ज़ब हो, बेवफ़ा को इश्क़ हो जाए
इबादत वो कि रब बंदे का दीवाना बना भटके
मुहब्बत वो कि आशिक़ से ख़ुदा को इश्क़ हो जाए
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished
आपकी प्रीत जबसे सुलभ हो गई
फिर किसी मीत की आरज़ू ना रही
प्यार में हार कर जो मिला है मुझे
अब किसी जीत की आरज़ू ना रही
साँवरे के लिए गीत गाती फिरी
एक मीरा दीवानी कहाती फिरी
क्षण समर्पण का जब तक न हासिल हुआ
तब तलक हर नदी गुनगुनाती रही
राधिका कुंजवन में मिली श्याम से
फिर उसे गीत की आरज़ू ना रही
शब्द आँखों में आकर ठहरने लगे
भाव चेहरे की लाली में ढलने लगे
कण्ठ में जम गए ज्ञान के व्याकरण
अर्थ अधरों पे आकर पिघलने लगे
श्वास का राग धड़कन से ऐसा मिला
मुझको संगीत की आरज़ू ना रही
अबकी सावन मिलेगा तो पूछूंगी मैं
मेघ पहले क्यों ऐसे न लाया कभी
बिजलियों ने न इतना प्रफुल्लित किया
कोयलों ने न यूँ मन लुभाया कभी
मन के चातक ने कैसा अमिय चख लिया
अब उसे छींट की आरज़ू ना रही
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
कैसा था वो अनुभव तुमने
सबसे पहले जब मेरे
संदेशों की अनदेखी की थी
जब सम्बन्ध प्रगाढ़ रहा था
सहज मिला करते थे हम-तुम
पहरों जाने कितनी बातें
रोज़ किया करते थे हम-तुम
तब भी मुझको डर लगता था
तब भी मैं सोचा करता था
आपस में दूरी आई तो
तुम उत्तर ना दे पाई तो
तब कैसे रातें काटेंगे
किससे अपना मन बाँटेंगे
तब भी तुमने बेफ़िक्री से
मेरे मन के ऐसे सब
अंदेशों की अनदेखी की थी
पहले सोचा व्यस्त हुई हो
दुनियादारी की बातों में
फिर जाना अभ्यस्त हुई हो
कोमलता पर आघातों में
जब संदेशा पहुँचा होगा
तुमने ये तो सोचा होगा
उत्तर बिना उदास रहेंगे
वो मुझसे नाराज़ रहेंगे
मैं उनको समझा ही लूँगी
कारण एक बना ही लूँगी
ख़ुद को लापरवाह बनाकर
तुमने उन अपनत्व भरे
आदेशों की अनदेखी की थी
जब मेरा सन्देश तुम्हारी
दिनचर्या में खो जाता हो
कुछ पल मेरी याद जगाकर
आख़िर धूमिल हो जाता हो
तब उत्तर की प्यास जगाए
हर आहट से आस लगाए
मन व्याकुल होता जाता था
सब धीरज खोता जाता था
खीझ, तड़प, चिंता, आकुलता
क्रोध, प्रलय, संशय, आतुरता
मत पूछो क्या क्या होता था
जब तुमने अधिकार भरे
परिवेशों की अनदेखी की थी
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
आगे के सफ़हों पर जो कुछ है वह भी है तो गोमुख निसृत गंगाजल ही, लेकिन इसका संचय जिस पात्र में किया गया है वह किंचित आधुनिक है। यह खण्ड फेसबुक पर हुई चर्चाओं का यथावत् संकलन है। इसमें मित्रों से हुई काव्यात्मक चैटिंग को जस का तस समायोजित किया गया है। इस खण्ड में केवल उन्हीं अंशों का सृजन-श्रेय मेरा है, जो मेरे नाम/चित्र के साथ प्रकाशित हैं। अन्य अंशों के सर्जकों को अपने नाम उजागर करने में संकोच था, सो फिलहाल उनको ‘अज्ञात’ जानकर ही आनंद लें।
✍️ चिराग़ जैन




Chirag Jain Writings, Free Verse, Poetry, Unpublished
वाह वाह!
नाम ही दशरथ था
काम तो
शतरथ वाला किया।
जुनून; लगन; मेहनत; सनक; दीवानगी
…इन सबसे आगे का शब्द खोज
बे शब्दकोश!
हुए होंगे कहीं पत्थर
जिनको तराशता था आदमी
मैंने तो आज
पत्थरों को
इक आदमी तराशते देखा।
सचमुच यार
सितार की झंकार
और बंसी की तान पर
थिरकती मुहब्बत से
ज़्यादा महँगी लगी
छैनी-हथौड़े की टंकार पर
उकरती मुहब्बत!
-✍️ चिराग़ जैन
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