Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Free Verse, Poetry
सुदामा जैसा मित्र मुझे नहीं चाहिए
जो बचपन में मित्र के हिस्से के चने खा गया
और जवानी में मित्रता का हिस्सा मांगने आ गया
कृष्ण जैसा मित्र भी मुझे नहीं चाहिए
जो बचपन में मित्र की चालाकी पर प्रतिकार किया
और जवानी में मित्र के गिड़गिड़ाने का इंतज़ार किया
मित्रता तो दुर्योधन की बड़ी थी
जिसने कर्ण को तब अंगराज बनाया
जब उसकी प्रतिभा रंगक्षेत्र में असहाय खड़ी थी
मित्रता तो कर्ण सी होनी चाहिए
जिसने दुर्योधन का साथ देते हुए यह विचारा ही नहीं
कि उसका मित्र ग़लत है या सही
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Naavik ke teer, Prose, Quotation
दोस्त वो नहीं जिसका आपके पास फ्रेंडशिप डे का सबसे पहला मेसेज आए। दोस्त वो जो फ्रेंडशिप डे के दिन आपसे फोन मिलाकर बोले – “साले तूने मुझे याद क्यों नहीं दिलाया कि आज फ्रेंडशिप डे है, कमीने तेरी भाभी को रात 12 बजे wish नहीं कर सका।”
और भी गहरा दोस्त वो है जो आपको बोले – “अबे मेरी एफबी से अपनी भाभी को कोई मस्त सा फ्रेंडशिप डे मेसेज भेज दे यार।”
और भी गहरा दोस्त वो है जो फ्रेंडशिप डे के दिन तुम्हें 20 बार फोन करे लेकिन उसे तुमको फ्रेंडशिप डे wish करना याद न रहे।
…दोस्त वो है, जो तुम्हारे साथ formal होने की बात सोच भी न सके; दुनियादारी तो दुनिया निभाती है।
✍️ चिराग़ जैन
Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Free Verse
स्कूटर के पीछे सधकर बैठी अधेड़ महिला
बचाती जा रही थी स्वयम् को
ट्रैफिक जाम में फँसे
अपने पति की बेफिक्री से।
रह-रहकर
आशंका और भय से भरी आँखें
मुस्कुरा कर
क्षमायाचना कर लेती थी
गाड़ी वालों से
ताकि उनकी झल्लाहट
पहुँचने न पाए
उसके पति तक।
आख़िरकार
मेरी गाड़ी के किनारे से
टकरा ही गया उसका पाँव।
…ज़ोर से लगी होगी उसे
लेकिन उसने एक पल भी नहीं देखा अपने पैरों की ओर
बल्कि झटाक से
दोनों हाथ जोड़कर मुझे देखा
फिर कसकर पकड़ ली स्कूटर की स्टॅपनी!
…और पति महाशय
ट्रैफिक जाम से गुस्साये
झल्लाते जा रहे हैं
उन्हें लगता था
वो कोई बोझा-सा ढो रहे हैं
अपने स्कूटर पर!
✍️ चिराग़ जैन
Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Free Verse, Poetry
सुनो!
सब कुछ तो बटोर लाया हूँ
अपने पुराने मकान से
नये मकान में;
फिर भी
काफ़ी कुछ छूट गया है वहीं
…जस का तस।
अलमारी के पीछे
जाला पूरती रहती थी एक मकड़ी
उसका घर तहस-नहस कर आया हूँ
अपना घर बदलते हुए।
दीवाली की सुबह
रसोई की चौखट पर
सरस की टहनियाँ टाँकते थे पिताजी;
उनकी सूखी हुई डंडियाँ
चुभती हुई सी छूट गई हैं
चौखट की झिरियों में।
राखी के सोन चिपकाने से
एक निशान बन जाता था दीवार पर
वो साथ न आ सका।
और छोटी बहन ने
पूजा वाले कमरे में
थापे लगाए थे
विदा होते हुए।
…जिन्हें देखने भर से
जीवंत हो जाती थी बहन की विदाई;
…उन्हें सहेजने का
कोई ज़रिया न हुआ।
पड़ोस वाले अंकल
यूं भी
कभी बतियाते तो नहीं थे,
लेकिन आज
जब ट्रक में चढ़ रहा था उनका पड़ोस,
तो वे अपनी बालकनी में
रोज़ से
कुछ ज़ियादा ख़ामोश नज़र आए।
नये घर की दीवारें
एकदम नयी हैं।
फ़र्श पर नहीं है
किसी दीये की चिकनाई के घेरे।
ट्यूब के पीछे
अभी नहीं बसा है
किसी छिपकली का घरौंदा।
यहाँ सामने वाले छज्जे से
लुंगी पहने कोई अधेड़
आते-जाते घूरता भी नहीं है।
एक बड़े से ट्रक में
लाद तो लाए हम
एक पूरा युग
लेकिन वक़्त लगेगा
उस युग को
इन दीवारों पर छाने में
अभी वक़्त लगेगा
इस मकान को
घर बनाने में।
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
क्या तुम सचमुच ख़ुश रह लोगी
संबंधों के तार तोड़ के
क्या तुम ख़ुद तक लौट सकोगी
अपनेपन की बाग़ छोड़ के
मेरे संदेशों की दस्तक
तुम सुनकर भी ध्यान नहीं दो
मेरे स्वर के आकर्षण को
अपने मन में मान नहीं दो
नदिया, नदिया ही रहती है
चाहे निकले धार मोड़ के
क्या तुम सचमुच ख़ुश रह लोगी
संबंधों के तार तोड़ के
तुम प्रतिबंध लगा सकती हो
सब तकनीकी संचारों पे
लेकिन कैसे रोक लगेगी
अंतर्मन वाली तारों पे
क्या हिचकी को रोक सकोगी
इक झूठी मुस्कान ओढ़ के
क्या तुम सचमुच ख़ुश रह लोगी
संबंधों के तार तोड़ के
संबंधों में खटपट होगी
मन बेचारा पीर सहेगा
किंतु कहीं संवाद रुका तो
हर अपनापन मौन रहेगा
दिल दुखने पर ऐसे चीखो
चुप्पी चल दे राह छोड़ के
क्या तुम सचमुच ख़ुश रह लोगी
संबंधों के तार तोड़ के
✍️ चिराग़ जैन