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सीता की पाती

मुझको तो वन में रहने का काफ़ी है अभ्यास सुनो!
लेकिन तुमने दे डाला है ख़़ुद को कितना त्रास सुनो!

तुमने त्याग दिया है मुझको, पर मुझमें बाक़ी हो तुम
मैं तुमको संग ले आयी हूँ, कितने एकाकी हो तुम
मुझको बस वनवास दिया है, ख़़ुद को कारावास सुनो!
मुझको तो वन में रहने का काफ़ी है अभ्यास सुनो!

कैसे जनता सिंहासन की हर लाचारी समझेगी
दीवारें और छत भी कैसे बात तुम्हारी समझेंगी
थोड़ा दुःख ही साझा करती, रहती मैं यदि पास सुनो!
लेकिन तुमने दे डाला है ख़़ुद को कितना त्रास सुनो!

पहले उससे रण करना था, जिसने हमको कष्ट दिया
अब उसका पालन करना है, जिसने सब सुख ध्वस्त किया
तब वल्कल में शर साधा, अब महलों में संन्यास सुनो!
मुझको तो वन में रहने का काफ़ी है अभ्यास सुनो!

राजमुकुट ने कब-कब काटा, मैं समझूँ या तुम समझो
इस सौदे में कितना घाटा, मैं समझूँ या तुम समझो
आदर्शों की क्या क़ीमत है, मुझको है आभास सुनो!
मुझको तो वन में रहने का काफ़ी है अभ्यास सुनो!

छोड़ चलूँ इस राजमहल को, ख़़ुद से कहते तो होंगे
मुस्कानों के पीछे छिपकर, आँसू बहते तो होंगे
पर मर्यादा ही जीतेगी, है मुझको विश्वास सुनो
क्योंकि तुमने दे डाला है ख़़ुद को इतना त्रास सुनो!

मेरी पीड़ा ले जायेगी मुझको माँ के आँचल तक
तुम जलता मन ले जाओगे इक दिन सरयू के जल तक
साँसों के उस पार मिलेगी हमको सुख की साँस सुनो!
क्योंकि तुमने दे डाला है ख़़ुद को इतना त्रास सुनो!

✍️ चिराग़ जैन

दूसरा आयाम

जो प्रतीक्षा आँख में शबरी बसाए जी रही है
वह प्रतीक्षा राम के भी पाँव में निश्चित मिलेगी
धूप जैसी जिस विकलता को सुदामा ने जिया है
वह विकलता द्वारिका की छाँव में निश्चित मिलेगी

जो महल तक आ गयी होगी युगों का न्याय लेने
वह किसी वन में सिसकती इक शिला की आह होगी
जो युगों पहले घटे अन्याय के हित वन गयी है
वह किसी के मौन से पनपी कोई परवाह होगी
एक घटना जो नगर में कंकरी सी चुभ रही है
वह अहल्या के अछूते गाँव में निश्चित मिलेगी

द्रौपदी के चीर में बस द्रौपदी की लाज है क्या
उस अभागे वस्त्र के भीतर समूचा युग ढँका है
चीर लेकर जब स्वयं श्रीकृष्ण दौड़े हस्तिनापुर
तब मुरारी ने जगत् के ध्वंस पर अंकुश रखा है
जो घृणा सबको दिखाई दी सती के आँसुओं में
वह घृणा उस द्यूत के हर दाँव में निश्चित मिलेगी

हर कथानक में कथा का दूसरा आयाम भी है
सिर्फ़ राधा ही नहीं व्याकुल, विकल घनश्याम भी है
अपहृता होकर नहीं पीड़ित अकेली जानकी ही
प्रेम और दायित्व के घावों से पीड़ित राम भी है
धार का अस्तित्व जिस जल पर रहा निर्भर हमेशा
बस उसी जल पर पराश्रित नाव भी निश्चित मिलेगी
✍️ चिराग़ जैन

रावण

यदि अब राम की शरण में चला गया; तो
मुझे मेरे भीतर का पाप मार डालेगा
एकमात्र सधवा बचेगी मेरी पत्नी तो
शेष विधवाओं का विलाप मार डालेगा
जिनसे सुशोभित थी रावण की राजसभा
उन रिक्त आसनों का शाप मार डालेगा
मृत्यु जो करेगी वह जग को दिखायी देगा
जीवन तो मुझे चुपचाप मार डालेगा

जिस अपराध से न मुक्त हो सकूंगा कभी
उसको मैं बीच मँझधार कैसे छोड़ दूँ
अब मेरा पाप मेरे साथ जग से विदा हो
पाप पर जीवन उधार कैसे छोड़ दूँ
वीर हूँ तो जीतकर जीतत्याग कर दूंगा
अन्यथा मैं भाग्य लिखी हार कैसे छोड़ दूँ
विजयी हुआ तो सिया, राम को ही सौंप दूँगा
युद्ध करने का मैं विचार कैसे छोड़ दूँ’

हारने को कुछ भी बचा नहीं है शेष अब
प्राणप्रिय पुत्र मेघनाद भी चला गया
नयनों से अधरों तलक हुआ भावहीन
हर्ष भी चला गया, विषाद भी चला गया
जीत भी गया तो किसको दिखायेगा विजय
हारने का हर अवसाद भी चला गया
रण में मरण का वरण करना ही होगा
रावण ये जानने के बाद भी चला गया

तन अट्टहास करता था निज मूढ़ता पे
मन रो रहा था अपनों के तर्पण को
जिसपे गिरा था उसके कुटुम्ब का रुधिर
चूमने चला था उस भू के कण-कण को
अपनी ही हठ से प्रचण्ड क्रुद्ध हो गया था
राम से नहीं था कोई क्षोभ दशानन को
जिससे हुई थी बन्धु-बान्धवों की देह जीर्ण
भोगने गया था उस बाण की चुभन को

उचक-उचक नभ में कुटुम्ब ढूँढ़ता था
सबको लगा जो अभिमान से भरा हुआ
दस-दस शीश धरती में गड़े जा रहे थे
अपने ही मन से स्वयम् उतरा हुआ
अपने ही हाथों अपना ही यश नष्ट कर
अपने ही आप को बहुत अखरा हुआ
रामजी ने हार-जीत की प्रथा निभायी बस
रावण तो रण में गया ही था मरा हुआ

✍️ चिराग़ जैन

अयोध्या

शोभ रही नगरी सरयू-तट, खोज रहे उपमा तुलसी
नील सरोवर में दमके, जिस भाँति कली इक रातुल-सी
मानस-मानस राम बिराजत, आंगन-आंगन माँ तुलसी
या नगरी वरनैं न थके, क्या तो आदिकवि, अरु क्या तुलसी

✍️ चिराग़ जैन

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