Blank Verse, Chirag Jain Writings, Poetry, Unpublished
सूखी बावड़ी
बिलख कर रोई है आज;
सूखे कुओं की कागलें
क्षण भर छलछला कर
सूख गई हैं फिर से;
जर्जर तालाबों की मिट्टी
बैठ गई है थक कर!
पानी की पीर को
बानी देने वाली आवाज़
ख़ामोश हो गई है आज।
सूखे स्रोतों से बतिया कर
जो तर कर देता था उनका दामन
वो निःशब्द हो गया है।
एक पानीदार कहानी
अचानक
गुम हो गई है
किसी पुरानी अभागी नदी की तरह।
धाराओं की बीमारियाँ
तलाशती उँगलियाँ
टटोल नहीं पाईं
अपनी काया को जकड़ रहे
केकड़े का शिकंजा।
किसी मीठे तालाब की
आख़िरी बूंद सूखने जैसा है ये पल
किसी मीठी बावड़ी के
पाट दिए जाने जैसा है
ये समाचार
किसी लबालब कुँए के
रीत जाने जैसा है ये अवसाद
…अनुपम मिश्र को
जिन्होंने जाना है
उनकी आँखें छलकी नहीं हैं;
सूख गई हैं!
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
देखकर तुमको
पुलककर खोल दूंगा द्वार
इस भ्रम में नहीं रहना!
याद रखना, सर्द बर्फीली हवा से भागकर
तुम मधुर मनुहार के हर इक नियम को त्यागकर
छोड़ जाते हो कड़कती ठण्ड से बन स्वार्थी
बर्फ़ के वीरान जंगल में अकेला, बेसहारा
ये सभी कुछ भूलकर तुमसे मिलूंगा; मैं निरा ईश्वर नहीं हूँ।
फिर मिलेगा भक्ति का अधिकार
इस भ्रम में नहीं रहना!
जिन धमनियों और शिराओं की उफनती वीथियों में
तुम रवां करते रहे हो, रोज़ मंत्रोच्चार के संग
प्रेम के, अपनत्व के औ आस्था के दीप अनगिन
वे नसें जमने लगी हैं, बर्फ के नीचे सिमटकर
इस दफ़ा उनका पिघलना भी असंभव जान पड़ता है।
फिर उठेगा इन रगों में ज्वार
इस भ्रम में नहीं रहना!
सच कहो, यह प्रेम क्या बस स्वार्थ का दर्पण नहीं है
क्या तुम्हारा प्राथमिक उद्देश्य पर्यटन नहीं है
रोज़ इन दुर्गम पहाड़ों में
हवा जब इस घिनौने प्रेम का आकाश तक उपहास करती है
मैं अकेला सिर झुकाए, ढोंग के संबंध का बोझा उठाता हूँ
फिर छलोगे तुम मुझे इस बार
इस भ्रम में नहीं रहना!
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Poetry
दो घड़ी को
मैं किसी आकाश के रोमांच की
बांहें पकड़ कर;
उस धरा द्वारा मुझे सौगात में सौंपे गए
अविरल सुरक्षा भाव का
अपमान कर आया;
जो कि मुझको हर दफ़ा
अस्थिर उड़ानों से
पुनः नीचे उतर आने पे
बढ़कर थाम लेती है।
वे उड़ानें
(मैं जिन्हें उन्माद में
ऊँचाइयों पर ठहर जाने का
तरीका मान बैठा हूं)
महज ज़िद पर उतर आए
किसी बालक की ऐसी कूद भर है
जो थका कर मौन करती है मुझे
क्योंकि अभी
धरती के आकर्षण की सीमा
लांघ जाने का
अतुल साहस नहीं है
मेरी बचकाना उड़ानों में।
✍️ चिराग़ जैन
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कभी तो उम्मीद जी उठेगी
कहीं तो मंज़र हसीं रहेगा
कोई तो ऐसा भी वक़्त होगा
कि जिसको हम पे यकीं रहेगा
कुछेक लम्हों की बात सुनकर
दुआ का दामन न छोड़ देना
किसी चुभन की कसक से चिढ़कर
हसीन गुंचे न तोड़ देना
सुबह के माथे का ये पसीना
सबा को छूकर महक उठेगा
किसी तबस्सुम की बाँह थामे
मलाल यकदम चहक उठेगा
नसीब बदलेगा गर्दिशों का
यहीं हज़ारों कँवल खिलेंगे
इन्हीं उदासी भरे दिनों से
कभी मुहब्बत के पल मिलेंगे
सवाल बदलेंगे ज़िन्दगी के
जवाब अपने यही रहेंगे
हम आज भी सौ टका खरे हैं
हम उस घड़ी भी सही रहेंगे
ज़ेहन में जो भी उठे तमन्ना
उसे कहीं दिल में डाल लेना
नसीब जिस दिन गले लगा ले
हरेक हसरत निकाल लेना
✍️ चिराग़ जैन
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ईश्वर के एक इशारे पर
मानवता दहल गई सारी
लेकिन मानव की जिजीविषा
पल भर भी हिम्मत कब हारी
धरती डोली, हड़कंप मचा
ईश्वर ने यह भूकंप रचा
भय, शोक, करुण-चीखें, पुकार
मानव मन काँपा बार-बार
क्षण भर में भीषण वज्रपात
धन-जन हानि और प्राणघात
लेकिन अगले ही पल मानव
भरकर भीषण हुंकार उठा
जो चला गया उसको तजकर
कर जीवन का सत्कार उठा
दुनिया हर वर्गभेद भूली
मानवता की आशा फूली
हर दिशा सहायक हो आई
ज़ख़्मों का मरहम ले आई
मनुपुत्र मिलाकर ताल चले
अब कैसा भी भूचाल चले
हम फिर से गाँव बसा लेंगे
छप्पर से छाँव जुटा लेंगे
ईश्वर तेरे सुत दीन नहीं
भय से हारें वो हीन नहीं
कल फिर से सृजन करेंगे हम
फिर तेरा भजन करेंगे हम
✍️ चिराग़ जैन