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नोट बंद हो गये

जिनके इशारों पर नाचता था भ्रष्टतंत्र
कैश के बिना सभी रिमोट बंद हो गये
वोट फोर नोट की जो करते थे राजनीति
उन मायाधारियों के वोट बंद हो गये
डाकुओं का कैश से हुआ है ऐसा मोहभंग
सरे-आम लूट व खसोट बंद हो गये
पर्दे के पीछे काफ़ी कुछ अभी भी है बंद
जनता को लगता है नोट बंद हो गये

✍️ चिराग़ जैन

नोटबंदी Day by Day

8 NOV

एक सप्ताह से काला धुआँ आँखों में जल रहा था, अब नारंगी और हरे नोट आँखों में चुभ रहे हैं।

जितने का पेट्रोल भरवा सकते हो भरवा लो, बाकी में पैट्रोल डाल कर आग लगा दो।
आदेशानुसार : मोदी उर्फ़ धो दी।

प्रधानमंत्री जी करुणानिधान हैं, वे जानते थे कि दिल के दौरे वाले मरीज़ 100 रूपये के नोट नहीं जुटा पाएंगे इसलिए अस्पतालों में काले नोट स्वीकार्य हैं।

मोदी जी की इमेज उस बच्चे की तरह हो गई है जो अपनी हर अगली शरारत से पिछले काण्ड को छोटा सिद्ध कर देता है।

इस बीच विजय माल्या ने स्टेट बैंक के जीएम से बोला है कि अपना 1700 करोड़ रुपैया लेना हो तो कल कूड़ेदानों में से बीन लेना। फिर मुझे मत बोलना कि पैसा नहीं दिया।

उधर पाकिस्तान में इस बात की खलबली है कि जो आदमी एक झटके में अपने 1000-500 के नोट की वैल्यू दो कौड़ी की कर सकता है वो हमारे दो कौड़ी के देश का क्या करेगा!

9 NOV

बॉर्डर फ़िल्म का डायलॉग याद आ गया-
सुबह नाश्ता करते हुए पोलीपैक दूध बैन कर दूंगा।
दोपहर के लंच में इंजन वाले वाहनों पर रोक लगा दूंगा। और रात के खाने मेंमिल में बना कपड़ा बंद कर पूरे देश को पेड़ के पत्ते लिपटवा दूँगा।

जसोदाबेन ने मोदी जी को फोन करके पूछा है – 1000 और 500 के नोटों ने भी तुमसे शादी कर ली थी क्या?

कुछ ख़ास बात नहीं है। करेंसी नोट का रंग रूप अमरीका जैसा बनाने के चक्कर में मोदी जी ने कच्चे के व्यापारियों की शक्ल सोमालिया जैसी बना दी।

अब तो लोग दो दिन की सब्ज़ी भी इकट्ठी नहीं ख़रीद रहे, पता नहीं मोदी जी कब लौकी को ग़ैर कानूनी घोषित कर दें।

मन की बात कोई सुन नहीं रिया था तो मेरे भाई ने मनी की बात कर दी।

लब्बो-लुआब : हज़ार और पाँच सौ के नोट एक साथ बंद कर दिए जाएं तो दो हज़ार का नोट पैदा हो जाता है।

स्मॉग हटते ही मोदी जी ने दिन में तारे दिखा दिए।

हज़ारीप्रसाद द्विवेदी जी ने काफी माखनलाल चतुर्वेदी जी लगाए लेकिन बनारसी दासने अमीर ख़ुसरो जी को भिखारी ठाकुर बनाने का फैसला वापस नहीं लिया। अब पूराभारतेंदु हरिश्चंद्र इस फ़िराक़ गोरखपुरी में है कि अपने मैथिली शरण गुप्त धनको उजागर करके मन को निर्मल वर्मा कर लें।

बिगड़ी हुई औलाद को सुधारने के लिए जेबख़र्च बंद करने का उपाय हमेशा कारगर होता है।

10 NOV

8 नवंबर को मोदी जी ने जनता बोला – 1000-500 के नोट काग़ज़ के टुकड़े रह जाएंगे।
9 नवम्बर को न्यायालय ने सरकार से पूछा – pollution कण्ट्रोल का मास्टर प्लान बताओ?
मतलब, सब जानते हैं कि नोट जलेंगे से धुआँ होगा ही होगा।

वो कौन सा दार्शनिक था जो कह कर गया था कि पैसा तो सड़कों पर बिखरा पड़ा है, समेटने के लिए हिम्मत चाहिए। निंद्य है।

✍️ चिराग़ जैन

नोटबंदी

हमारी कल्पना शक्ति अद्भुत है। भारतीय रिजर्व बैंक ने 2000 रुपये के नोट जारी करने की बात कही और हमने कल्पनाएँ शुरू कर दी। बातें बनाने में हमें बहुत मज़ा आता है। ऐसी ही बातों के दम पर मोदी जी को चमत्कार पुरुष मानने की परम्परा चल निकली है।
आँखें बड़ी करके होंठों को गोल करके किस्से सुनाते-सुनाते हम अपने प्रधानमंत्री को पुरानी हिंदी फ़िल्म के उस नायक की तरह समझ बैठे हैं जो बेसिर-पैर की विलक्षण शक्तियों से युक्त होता था। ऐसा हम कई सामाजिक तथा राजनैतिक व्यक्तित्वों के साथ पहले भी कर चुके हैं लेकिन इस बार विशेष यह है कि स्वयं प्रधानमंत्री जी भी ख़ुद को किसी पुरानी हिंदी फ़िल्म का नायक मान चुके हैं।
सवा सौ करोड़ लोगों के देश को चलाने के लिए वे लगभग उन्हीं रास्तों का प्रयोग कर रहे हैं जैसे कोई घर-घर खेल रहा हो। स्मृति ईरानी को मानव संसाधन मंत्रालय देने से लेकर देश की मुद्रा को “गैरकानूनी” घोषित करने तक का उनका जो अंदाज़ है उससे एक बात स्पष्ट है कि रजनीकांत की फ़िल्में देखते हुए वे निश्चित ही तकिया गोदी में रखकर उसे भींच डालते होंगे।
काला धन बाहर निकलवाने का उनका विचार स्तुत्य है किन्तु इतने बड़े राष्ट्र को अचानक मुद्रा विहीन कर देना समझ से परे है। जिन मूल्यों के करेंसी नोट्स को बंद किया गया उसके बाद पूरा देश “एक दिन के लिये ही सही” अर्थहीन हो गया। इस एक दिन को “सिर्फ एक दिन” कहकर टालने से पूर्व हमें यह जान लेना चाहिए कि इस देश का एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो दिन भर मेहनत करके शाम को सिर्फ एक दिन के गुज़ारे भर का अर्थ जुटा पाता है; आज लिक्विड मनी की किल्लत के कारण उसके घर चूल्हा नहीं जल पाया होगा।
केमिस्ट 500 का नोट लेने को तैयार है लेकिन उसके पास बाकी बचे रुपये देने को सौ के नोट नहीं हैं। सब्ज़ी वाला, मदर डेयरी, चाय वाला, परचुनिया, पनवाड़ी, खोमचेवाला और यहाँ तक कि पुलिसवालों के समक्ष भी चालान काटने पर खुले पैसों की चुनौती है।
शादी-विवाह का मौसम है। जिसे आज बेटी विदा करनी है उसे कल रात 8 बजे अचानक प्रधानमंत्री जी ने बताया कि उधार लेकर, बैंक से आहरित कर या अन्य उपायों से उसने विवाह के हेतु जो धन जुटाया था वह सब गैरकानूनी है। यहाँ यह व्यवहारिक तथ्य भी ज्ञात हो, कि इस देश में बहन-बेटी को शगुन दिया जाता है जिसके लिए चेकबुक या NEFT/RTGS कराने की परंपरा नहीं है।
यद्यपि हमारे वित्त मंत्री जी बजट भाषण के दौरान यह स्पष्ट बोल चुके हैं कि “मिडिल क्लास” अपना ध्यान खुद रखे, तथापि इस सरकारसे यह प्रश्न करने का तो मन करता है कि मध्यमवर्गीय जनता के जीवन को सुगम नहीं बना सकते तो उसकी जीवनचर्या को जटिल करने का आपको क्या अधिकार है?
सवा सौ करोड़ लोगों के देश में तीन-चार प्रतिशत लोग ऐसे हैं जो करोड़ों के टर्न-ओवर की हैसियत रखते हैं। शेष जनता जीवन की मूलभूत चुनौतियों से जूझने में इतनी व्यस्त है कि लाखों-करोड़ों का हेर-फेर करने की फुरसत उसे मिल नहीं पाती। चार लोगों की खामियाँ टटोलने के लिए छियानवे लोगों को साँसत में ले आना यदि शासक को सफलता का पैमाना जान पड़ता है तो यह आश्चर्यजनक है।
स्विस बैंकों में जिन मोटी मछलियों ने डेरा डाल रखा है उनके नाम उजागर करके उस धन को जनसम्पत्ति घोषित करके देश की आर्थिक स्थिति सुधारने की बजाय देश को मुद्राविहीन कर देना क्या वास्तव में राजनैतिक पौरुष का परिचायक है?
मैं कड़े निर्णयों का विरोधी नहीं हूँ। न ही दो नंबर के पैसे का हितैषी हूँ। प्रधानमंत्री जी की नेकनीयती पर भी मुझे तनिक संदेह नहीं है लेकिन एक विचारशील नागरिक होने के नाते मैं यह अपेक्षा अवश्य करता हूँ कि माननीय नरेंद्र मोदी जी से जिन आँखों ने उम्मीदें जोड़ी हैं उनमें आख़िरी पायदान पर खड़ा वह व्यक्ति भी है जिसकी आवाज़ में विवशताओं की आह से अधिक ध्वन्योर्जा नहीं है।
डिस्क्लेमर : जल्दबाज़ी में ऊल-जलूल टिप्पणी करने वाले जान लें कि यह लेख मोदी जी के विरोध में नहीं अपितु लोकतंत्र के समर्थन में है। इसलिए तर्कहीन चलताऊ किस्म की श्रद्धापूरित बातें लिखकर अपने चश्मे के शीशे का रंग न बताएं।

✍️ चिराग़ जैन

भारत-पाकिस्तान संबंध

मोदी जी – “नवाज़ साहब, आप ये बार बार सीमा की शांति क्यों भंग करते हो?”
नवाज़ – “अरे मोदी जी, हमारे यहाँ 8 राज्य हैं, उनमें चुनाव होते हैं तो जनता का समर्थन जुटाने के लिए हमें भारत से छेड़ छाड़ करनी पड़ती है।”
मोदी जी – “ऐसा करके क्या सचमुच चुनाव जीता जा सकता है?”
नवाज़ – “100℅”
मोदी जी – “तो बेट्टा, अब तू देख। हमारे यहां 29 तो राज्य हैं, फिर 7 केंद्र शासित प्रदेश, फिर राज्यसभा के चुनाव, फिर नगर निगम …और हम तो यूनिवर्सिटी इलेक्शन तक को सीरियसली लेते हैं। तुम छेड़छाड़ की बात कर रहे हो हम तो छू छू कर ही मार डालेंगे।”

✍️ चिराग़ जैन

डाइवर्ट

जब हम बोलते थे कि देश में ग़रीबी बहुत है, तो वे बोलते थे कि बड़े लक्ष्य रखो! देखो देश को विश्व समुदाय में सम्मान मिल रहा है। सुनकर हम ग़रीबी पर मौन हो गए।
हमने कहा कि देश में भ्रष्टाचार बढ़ रहा है। वे बोले, दुनिया भारत को देख रही है। ऐसी बातें करके देश का सम्मान कम मत करो। हम भ्रष्टाचार भी पचा गए।
हमने कहा कि देश में महंगाई बर्दाश्त से बाहर हो रही है। वे बोले राष्ट्रप्रेम की बातें करते हो और ज़रा-सी महंगाई नहीं झिल रही। हम अपना-सा मुंह लेकर रह गए।
हमने पूछा कि अच्छे दिन का सपना सच क्यों नहीं हो रहा? वे बोले प्रधानमंत्री पर कटाक्ष करना अशोभनीय है।
…पठानकोट हमले के बाद हमने पूछा कि कब तक सहन करें? वे बोले कि वेदेशी मुआमलात जल्दबाज़ी में नहीं सुलझाए जाते। सब्र करो।
कश्मीर के मुख्यमंत्री ने पाकिस्तान के गुण गाए। हमने आहत होकर पूछा कि ये ग़द्दारी क्यों बर्दाश्त की गई? वे बोले कश्मीर की रणनीति का हिस्सा है। समय आने पर उत्तर दिया जाएगा। अब उरी में निहत्थे सपूत मौत के घाट उतार दिए गए। देश पूछ रहा है कि अत्याचारी को कब सबक सिखाया जाएगा? वे बोले सब्र करो। युद्ध अंतिम विकल्प है।
हमने पूछा कि चुनावी रैलियों में निवर्तमान सरकार को कायर कहकर जब हमसे वोट माँगा जा रहा था तब अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सम्मुख देश की विवशता को क्यों अनदेखा किया गया था?
वे उठे, फोन उठाया, कोई नंबर डायल किया और बोले- “स्वामी जी, देश का रक्तचाप बढ़ रहा है, कुछ ध्यान शिविर आयोजित करो, कुछ ध्यान डाइवर्ट करो।”
इससे पहले कि हम कुछ और बोलते, वे बोले शहीदों की आत्मा की शान्ति के लिए “मौन रखो।”

✍️ चिराग़ जैन

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