Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Poetry
जब-जब आयुध पर अहंकार की परत चढ़ी इतिहासों में
तब चंद्रहास को रावण-ग्रीवा भेंट मिली है ग्रासों में
जब शास्त्रनीति की अनदेखी कर, तीर चलाए जाते हैं
तब अर्द्धरात्रि में सोते बच्चे मार गिराए जाते हैं
अविवेक शक्त हो जाए तो, हर रेख लांघता रण तय है
नि:शस्त्रो की हिंसा तय है, गर्भस्थों का तर्पण तय है
जब धर्म विफल हो जाता है, आवेशों को समझाने में
तब द्रोणपुत्र को देर नहीं लगती पिशाच बन जाने में
ऋषिकुल से जब भी ग्रहण किये दुर्द्धर्ष शस्त्र रघुबीरों ने
मंत्रों से मन को शुद्ध किया ऋषियों ने और फकीरों ने
यह शस्त्रशुद्धि का उपक्रम केवल ढोंग नहीं, आवश्यक है
यह शक्ति-शौर्य को इंगित है कि दुरुपयोग निजघातक है
रण में जब क्रोध चढ़े सिर पर, रणचण्डी तांडव करती हो
जब काल खड़ा गुर्राता हो, जब भू पर मौत विचरती हो
जब युद्ध चरम पर आ पहुँचे, जब तप्त शिराएँ दहती हों
जब शव पर चलना पड़ता हो, जब रक्त तटीना बहती हो
जब भले बुरे का भान न हो, जब नेत्र बड़े हो जाते हों
जब जबड़े भिंचने लगते हों, जब रोम खड़े हो जाते हों
जब अपने घावों की पीड़ा का ध्यान न हो, आभास न हो
जब महासमर में ध्वंस मचाने में कोई संत्रास न हो
जब हृदय शून्य हो जाता हो, मस्तिष्क गौण हो जाता हो
जब देह शेष रह जाती हो, कारुण्य मौन हो जाता हो
जब क्रोध धधकता हो भीषण, सारा विवेक खो जाता हो
वैरी का लोहू पी-पीकर, जब नर, पिशाच हो जाता हो
ऐसे आवेगुद्वेगों में संयत रहने का ध्यान रहे
विध्वंस मचाने से पहले मानवता का कुछ भान रहे
शर का संधान करे उस क्षण, दो नयन निमीलित हो जाएँ
आक्रोश, क्रोध, आवेश, ध्वंस इक क्षण को कीलित हो जाएँ
गाण्डीव उठाए जब अर्जुन, उस पल उसको यह भास रहे
छूटा शर लौट न पाएगा, बस इतना भर अहसास रहे
दिव्यास्त्र साधने से पहले, योधा पल भर यह ध्यान धरे
क्या यह क्षण टल भी सकता है, इसका उत्तर अनुमान करे
झंझा के तेज झखोरे में, अंतर दीपक को आड़ मिले
हिंसा से घिरते चेतन को, सत्पथ का एक किवाड़ मिले
इस हेतु दहकते शोलों पर, थोड़ी बौछार ज़रूरी है
इस हेतु शस्त्र संधान समय में मंत्रोच्चार ज़रूरी है
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
हिंदी की साहित्यिक गोष्ठियों में यह प्रश्न अक्सर चर्चा का विषय बनता है कि कवि-सम्मेलनों का स्तर गिर रहा है। मंच पर फूहड़ता बढ़ रही है। चुटकुलेबाज़ ख़ुद को कवि कहने लगे हैं। लफ़्फ़ाज़ी और बकवास करके श्रोताओं का समय नष्ट किया जाता है। वही पुरानी कविताएँ सुनाकर मोटे लिफाफे लेने का चलन बढ़ गया है। कविता के धंधेबाज़ों ने मंच को बर्बाद कर दिया है, इत्यादि।
वैष्णोदेवी में कभी एक पहाड़ी जंगल को लांघ कर तीन पिंडियों के दर्शन किये जाते थे। उस समय निष्ठावान पुजारी तमाम कष्ट सहकर पिंडियों की सेवा करने जाता था। फिर वहाँ दुर्गम मार्ग की जगह एक सड़क बन गई। उस सड़क पर चलकर खोमचे तीर्थ तक पहुंच गए। फिर लोग घूमने-फिरने के लिए वैष्णोदेवी जाने लगे। फिर लोग पिकनिक मनाने वैष्णोदेवी जाने लगे। फिर लोग हनीमून मनाने वैष्णोदेवी जाने लगे। लेकिन इस स्थिति में भी आस्थावान पुजारी ने कभी पिंडियों को गाली नहीं दी।
उस पुजारी की पीढियां चुक गई किन्तु पिंडियों की आराधना एक दिन भी नहीं रुकी। हिंदी काव्य मंचों पर बढ़ रही विकृतियों के नाम पर कुल कवि सम्मेलनों को फूहड़ कह देना ऐसा ही है ज्यों तीर्थक्षेत्र पर खोमचे की गंदगी देखकर ईश्वर की मूर्ति के प्रति निष्ठा समाप्त हो जाए।
हिंदी की लोकप्रियता में इज़ाफ़ा करने वाले कवि सम्मेलनों को उन आस्थावान पुजारियों की ज़रूरत है जो किसी भी स्थिति में अपने ईश्वर के प्रति अपना समर्पण कम न होने दें। तीर्थयात्रियों की हरक़तों से रुष्ट होकर मंदिर की इमारत पर कालिख़ पोतना कहाँ तक नैतिक है? जब मंदिर की ओर जाने वाले रास्ते पर पहला खोमचा जमा था उस समय पुजारी किस उपक्रम में व्यस्त थे? जब पवित्र तीर्थ की जड़ में हनीमून पैकेज वाला होटल खुला था तब पुजारी किस खोह में घुसकर तपस्या कर रहे थे?
खुसर-पुसर को “परिचर्चा” कहने वाले बुद्धिजीवियों को मंच की उठा-पटक से ऐतराज़ है लेकिन सम्मानों और पुरस्कारों पर होने वाले जुगाड़ उनकी दृष्टि में अपराध नहीं है। यदि किसी योग्य मेधावी ने परिवेश से परेशान होकर स्थान छोड़ा है तो ऐसा करके उसने किसी अयोग्य के लिए अवसर निर्माण करने का अपराध किया है।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
भीष्म ने प्रतिज्ञा ली थी कि जो सिंहासन पर बैठेगा उसमें अपने पिता की छवि देखूंगा। भीष्म लकी थे कि उस दौर में कांग्रेसी और भाजपाई लोग नहीं थे। वरना कोई भी चैनल अपने प्राइम टाइम में विरोधी पार्टी वाले किसी बड़बोले को बुलवाकर भीष्म की प्रतिज्ञा का ऐसा हश्र करता कि भीष्म उसका एक्सप्लेनेशन देने की बजाय इच्छामृत्यु का ऑप्शन सेलेक्ट करना ज़्यादा ईज़ी समझते।
भीष्म की इस प्रतिज्ञा को अवसरवाद का उदाहरण बताकर यह कहा जा सकता था कि यह तो सरासर ओछापन है। चापलूसी की हद है कि जो भी सिंहासन पर बैठेगा उसी को बाप बना लेगा। कोई पात्रा टाइप का प्रवक्ता कहता कि ये तो इनकी पुरानी परंपरा है। इनके पिता ने भी गधे को बाप बनाया था। इनकी दादी ने भी गधे को बाप बनाया था। इनके नाना तो गधे थे ही। …कैसा दोहरा मापदंड है। गधे को बाप बना सकते हो लेकिन गाय को माता नहीं मान सकते। वाह जी वाह… ये सब नहीं चलेगा।
पूनावाला टाइप कोई प्रवक्ता कह सकता था कि बायलॉजिकली यह पॉसिबल तभी है जब डीएनए सेम हो। भीष्म ने इनडायरेक्टली यह कहा है कि जो सिंहासन पर बैठेगा उसकी शक्ल मेरे पापा से मिलती होगी। यह शुद्ध भाई-भतीजावाद है। बीजेपी हमेशा कांग्रेस को एक परिवार की पार्टी कहती रही है लेकिन बीजेपी में बेटे-बहुओं को आउट ऑफ टर्न आगे लाया जाता रहा है।
सिन्हा साहब संभाले हुए स्वर के साथ कहते महाभारत में ऐसी कोई प्रतिज्ञा का ज़िक्र ही नहीं मिलता। यह प्रतिज्ञा तो मुग़ल काल में बाबर ने ली थी कि वे रामलला के मंदिर में मस्जिद की छवि देखेंगे। इस तथ्य के ठोस प्रमाण मैगस्थनीज़ के यात्रा वृत्तांत में मिलते हैं कि जब वे बुलेट ट्रेन से दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन पर उतरे तो उन्हें प्लेटफॉर्म नंबर 7 से अयोध्या के भव्य राममंदिर का स्वर्ण शिखर दिखाई दिया।
उधर ओवैसी इस प्रतिज्ञा पर बोलते हुए बताते कि हिन्दू मैरिज एक्ट में अपनी फेयोंसी से अपने वालिद की शादी कराना ग़ैरक़ानूनी है। इसलिए जनाब भीष्म को और उनके वालिद साहब को इस जुर्म के लिए सज़ा होनी चाहिए। मुस्लिम पर्सनल लॉ में इस मुद्दे पर तफसील से साफ किया गया है लेकिन भीष्म क्योंकि हिन्दू हैं इसलिए उन पर मुस्लिम पर्सनल लॉ इम्पलीमेंट नहीं होता।
इन चारों के बयान के बाद बॉय कट हेयर स्टाइल को झटकते हुए एंकर अपना फैसला सुनाती – मतलब साफ है कि भीष्म को सिंहासन पर प्रतिज्ञा नहीं लेनी चाहिए थी। पिता की छवि सिंहासन से सुंदर है। मतलब भीष्म पिता हैं और पितामह भी। इस बुलेटिन में फिलहाल इतना ही देखते रहिये टाइम पास।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghanakshari, Poetry, Purushottam
रघुवीर अवध से वनवास को चले तो
रोते-रोते पैरों से लिपट गई धरती
शठ कोई झपट के ले गया जनकसुता
शव इतने गिरे कि पट गई धरती
हनुमान राम जी की भक्ति का सबूत लाओ!
फटे हुए सीने में सिमट गई धरती
सीता से चरित्र का प्रमाण मांगा राम ने तो
पीर इतनी बढ़ी कि फट गई धरती
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
गाँव के वटवृक्ष जिसकी झाड़ियाँ छूकर दुखी थे
अब नए बिरवे उसी कीकर को बाबा बोलते हैं
जिस मुहल्ले से निकलकर स्नान करना था ज़रूरी
आजकल अख़बार उन गलियों को क़ाबा बोलते हैं
ये नया अध्याय अब इस नस्ल को किसने पढ़ाया
कौन है जो पोखरों के नाम लिखता है रवानी
धूर्तता से ध्वस्त करके भीष्म का वैभव धनंजय
गुरुकुलों में बाँचता है आत्मश्लाघा की कहानी
कुछ पुराने लोग ये सच जानते भी हैं; मगर अब
हैं बहुत लाचार, अंगारे को लावा बोलते हैं
लिख रहे हैं आज जो इतिहास इक भीषण समर का
वे समर के वक्त डरकर छुप-छुपाते बच रहे थे
जब समय इनसे अपेक्षा कर रहा था वीरता की
ये कहीं बैठे हुए झूठी कहानी रच रहे थे
दो मवाली पीट आए थे कभी इक बेसहारा
पाठ्यक्रम इस बात को ‘दुश्मन पे धावा’ बोलते हैं
✍️ चिराग़ जैन