+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

निर्बल से प्रतिशोध

जब दिवाकर की तपिश के दाह से भयभीत होंगे
तब अंधेरे तिलमिलाकर रश्मियों से वैर लेंगे
जो भरी बरसात में भीगे हुए ठिठुरे फिरेंगे
वे अधम भोली बया की बस्तियों से वैर लेंगे

मंत्र-जप की साधना का सत्व जब संभव न होगा
तब करेंगे ढोंग इक पाखण्ड का चोगा पहन कर
जो जला बैठे स्वयं के हाथ समिधा चोरने में
प्रश्न लेकर वे खड़े हैं भक्ति के पावन हवन पर
मृत्यु के प्रख्यात सच को जब नहीं झुठला सकेंगे
तब अघोरी बेसहारा अरथियों से वैर लेंगे

कृष्ण जब षड्यंत्र के आमंत्रणों को भाँप लेंगे
तब विदुर के साग में कमियाँ निकालेगा सुयोधन
जब समर में जीतने की शक्ति पर संदेह होगा
रात में सोते हुओं को फूँक डालेगा सुयोधन
जो सुदर्शन से पराजित हो गए हर एक रण में
वे मधुर सरगम सुनाती वंशियों से वैर लेंगे

वृक्ष के तन पर नहीं चल पाएगा वश कोई जिसका
वो हवा सूखे हुए पत्ते हिलाकर ख़ुश रहेगी
योग्यता जिसमें न हो अट्टालिकाओं के परस की
वो लपट कुछ फूस के छप्पर जलाकर ख़ुश रहेगी
जो झखोरे सामधेनी को नहीं धमका सकेंगे
वे किन्हीं जलदीपकों की बातियों से वैर लेंगे

✍️ चिराग़ जैन

जो आहत हो जाए वह कमज़ोर होता है

साहित्य समाज का दर्पण है और धर्म समाज का परकोटा है। साहित्य और धर्म में गहरा संबंध है। समाज में विचार की प्रतिष्ठापना अथवा परिस्थितियों के सम्यक चित्रण के लिए पौराणिक पात्रों तथा धार्मिक रीतियों के उदाहरण प्रस्तुत करना साहित्य का शगल रहा है।
कृष्ण के बालस्वरूप का वर्णन कर, भक्ति के प्रतीक को वात्सल्य का बिम्ब बनाकर हर गृहिणी का कन्हैया बना देना सूरदास का ऐसा ही एक सफल प्रयास था। रामायण के राम को मानस के राम तक कि यात्रा कराते समय तुलसी को भी भाषादम्भ का त्रास झेलना पड़ा किन्तु अवधी बोली की मीठी चौपाइयों ने समाज को राम दिए और राम को समाज।
पौराणिक कथाओं के प्रतीकों को आधार बनाकर या किसी एक पात्र को केंद्र में रखकर लिखे गए खंडकाव्य समाज लिए सदैव उपयोगी सिद्ध हुए हैं। ऐसा भी देखा गया है कि कुछ स्थानों पर इन खंडकाव्यों के प्रमुख पात्र की पीड़ा के सम्मुख अन्य सभी पात्र कठघरे में खड़े दिखाई देने लगे। यशोधरा महाकाव्य में बुद्ध कठघरे में खड़े हैं तो रश्मिरथी में पूरा कुरुकुल सवालों के घेरे में है। ऐसे ही द्रौपदी और साकेत जैसे ग्रंथ महाभारत तथा रामायण के अनेक महान चरित्रों से प्रश्न पूछते दिखाई देते हैं।
गद्य साहित्य में ‘वयं रक्षामः’ जैसे उपन्यासों ने रामचरितमानस के खलनायक का पक्ष प्रस्तुत करने की हिम्मत की है।
विश्व की सभी भाषाओं में पौराणिक संदर्भों से प्रतीक उठाने और पूज्यनीय चरित्रों से प्रश्न पूछने की परंपरा रही है। ग्रीक साहित्य का तो अधिकांश हिस्सा पौराणिक संदर्भों से ही निर्मित है। अंग्रेजी साहित्य ने भी पादरियों और चर्च पर जमकर कटाक्ष किये हैं। हिंदी साहित्य में भी जातीय व्यवस्था, ब्राह्मणवाद और राम-कृष्ण जैसे आस्था केंद्रों को आधार बनाकर बात करने का अभ्यास है।
उर्दू ग़ज़ल भी इस रिवाज़ से अछूती नहीं है। अपेक्षाकृत अधिक कट्टर होने के बावजूद इस्लाम से सवाल करते हुए या इस्लामिक परंपराओं पर कटाक्ष करते हुए उर्दू ग़ज़ल ने कोई कठिनाई महसूस नहीं की। कहीं-कहीं तो मुल्ला-शेख़ आदि की बाक़ायदा खिल्ली ही उड़ाई गई है।
इस्लाम में शराब हराम है लेकिन शराब का पक्ष लेते हुए कितने ही अशआर कहे गए, जिनमें इस्लाम की इस परंपरा को सीधे निशाना बनाया गया है। कुछ उदाहरण देखें-

ज़ाहिद शराब पीने से काफ़िर हुआ मैं क्यूँ
क्या डेढ़ चुल्लू पानी में ईमान बह गया
-शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

‘ज़ौक़’ जो मदरसे के बिगड़े हुए हैं मुल्ला
उन को मयख़ाने में ले आओ सँवर जाएंगे
-शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

लुत्फ़-ए-मय तुझ से क्या कहूँ ज़ाहिद
हाए कमबख़्त तू ने पी ही नहीं
-दाग़ देहलवी

झूम के जब रिन्दों ने पिला दी
शैख़ ने चुपके-चुपके दुआ दी
-कैफ़ भोपाली

ज़ाहिद शराब पीने दे मस्जिद में बैठकर
या वो जगह बता दे जहाँ पर ख़ुदा न हो
-नामालूम

भक्ति और भगवान के मध्य कोई तीसरा नहीं हो सकता। ईश्वर को भक्त से मिलने के लिए किसी संदेशवाहक की ज़रूरत नहीं होती -इस बात को कहने के लिए उर्दू शायरी में ऐसा भी शेर मिलता है, जिसमें मूसा को आड़े हाथों लेते हुए भी शायर को हिचकिचाहट नहीं हुई-

हमें भी जलवागाह-ए-नाज़ तक लेकर चलो मूसा
तुम्हें ग़श आ गया तो हुस्ने-जानां कौन देखेगा
-नामालूम

मुफ़लिसी में धार्मिक अपव्यय पर तंज करते हुए निदा फ़ाज़ली का एक दोहा ख़ूब मक़बूल हुआ-

बच्चा बोला देखकर मस्जिद आलीशान
अल्लाह तेरे एक को इतना बड़ा मकान

इश्क़ को कर्मकाण्ड से बड़ा बताते हुए दाग़ देहलवी कहते हैं-
आशिक़ी से मिलेगा ऐ ज़ाहिद
बन्दगी से ख़ुदा नहीं मिलता

और इन सबके इतर भक्त को भगवान से बड़ा बताते हुए असद अंसारी ने ऐसा शेर कहा जिसमें यह स्पष्ट कर दिया कि ख़ुदा ने ही बन्दे को नहीं बनाया बल्कि बन्दा भी ख़ुदा बना सकता है-

बन्दापरवर मैं वो बन्दा हूँ कि बहरे-बन्दगी
जिसके आगे सिर झुका दूंगा ख़ुदा हो जाएगा

अल्लामा इक़बाल ने भी आत्मविश्वास के आगे ईश्वर के झुक जाने की बात बहुत प्रभावी ढंग से कही-

ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले
ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे -बता तेरी रज़ा क्या है

ग़ज़ब ये है कि कविता के इस तेवर से कभी ऐसा नहीं हुआ कि आस्थाएँ खंडित हो गई हों, भावनाएँ आहत हो गई हों। सूफ़ी सहित्य तो अदब की ज़ुबान के दायरे से बाहर आकर ख़ुदा से तू-तड़ाक के लहजे में बात करता रहा लेकिन कभी कहीं कोई हंगामा नहीं बरपा।
इधर नाज़ ख्यालवी की एक नज़्म, जिसे नुसरत फ़तेह अली ख़ान ने गाया है, उसमें जिस लहजे में ख़ुदा पर सवाल उठाए गए हैं वह तो और भी अनोखा है। नज़्म का उन्वान ही ईश्वर को गोरखधंधा कहते हुए सामने आता है। उस नज़्म के कुछ अंश इस प्रकार हैं-

जब बजुज़ तेरे कोई दूसरा मौजूद नहीं
फिर समझ में नहीं आता तेरा पर्दा करना
तुम एक गोरखधंधा हो

नहीं है तू तो फिर इंकार कैसा
नफी भी तेरे होने का पता है
नहीं आया ख़्यालों में अगर तू
तो फिर मैं कैसे समझा तू ख़ुदा है!
तुम एक गोरखधंधा हो

हैरान हूँ इस बात पर तुम कौन हो, क्या हो
हाथ आओ तो बुत, हाथ ना आओ तो ख़ुदा हो
तुम एक गोरखधंधा हो

अक्ल में जो घिर गया, लाइन्तहा क्योंकर हुआ
जो समझ में आ गया फिर वो खुदा क्योंकर हुआ
तुम एक गोरखधंधा हो

जब के तुझ बिन कोई नहीं मौजूद
फिर ये हंगामा ऐ खुदा क्या है
तुम एक गोरखधंधा हो

छुपते नहीं हो, सामने आते नहीं हो तुम
जलवा दिखा के जलवा दिखाते नहीं हो तुम
दैरो-हरम के झगड़े मिटाते नहीं हो तुम
जो अस्ल बात है वो बताते नहीं हो तुम
ये माबदो-हरम ये कलीसा-ओ-दैर क्यूं?
हरजाई हो जभी तो बताते नहीं हो तुम
तुम एक गोरखधंधा हो

दिल पर हैरत ने अजब रंग जमा रखा है
एक उलझी हुई तस्वीर बना रखा है
कुछ समझ में नहीं आता कि ये चक्कर क्या है
खेल क्या तुमने अज़ल से ये रचा रखा है
रुह को जिस्म के पिंजरे का बनाकर क़ैदी
उस पर फिर मौत का पहरा भी बिठा रखा है
देके तदबीर के पंछी को उड़ानें तूने
दामे-तकबीर भी हर-सम्त बिछा रखा है
करके आराइशी कोनैन की बरसों तुमने
ख़त्म करने का भी मंसूबा बना रखा है
लामकानी का बहरहाल है दावा भी तुम्हें
नाह्लो-अकरब का भी पैग़ाम सुना रखा है
ये बुराई, वो भलाई, ये जहन्नुम, वो बहिश्त
इस उलटफेर में फ़रमाओ तो क्या रखा है
जुर्म आदम ने किया और सज़ा बेटों को
अद्लो-इंसाफ का मियार भी क्या रखा है
देके इंसान को दुनिया में ख़लाफत अपनी
इक तमाशा-सा ज़माने में बना रखा है
अपनी पहचान की ख़ातिर है बनाया सबको
सबकी नज़रो से मगर खुदको छुपा रखा है
तुम एक गोरखधंधा हो

जो कहता हूँ, माना तुम्हें लगता है बुरा-सा
फिर है मुझे तुमसे बहरहाल गिला-सा
चुपचाप रहे देखते तुम अर्शे-बरी पर
तपते हुए कर्बल में मोहम्मद का नवासा
किस तरह पिलाता था लहू अपना वफ़ा को
खुद तीन दिनों से वो अगरचे था प्यासा
दुश्मन तो बहरहाल थे दुश्मन, मगर अफ़सोस
तुमने भी फ़राहम ना किया पानी ज़रा-सा

इन सब उदाहरणों की आवश्यकता इसलिए पड़ी की पिछले कुछ वर्षों से हमने कट्टरता का एक बाना ओढ़ लिया है। कवि कुछ भी लिखता है तो किसी न किसी की आस्थाएँ आहत हो जाती हैं। कविता के निहितार्थ तक पहुँचने की बजाय धर्म का चश्मा लगाकर हम प्रतीकों में अटककर रह जाते हैं।
हिन्दू धर्म, जिसकी सहिष्णुता विश्व भर के लिए अनुकरणीय रही है, जहाँ ईश्वर से परिहास करने की परंपरा रही है, जहाँ ईश्वर को घर-आंगन के किलोल करते बालक का स्वरूप दिया गया है, वहाँ कुछ भी कहते ही भावनाएँ आहत होने लगी हैं। हमारी आस्थाएँ इतनी कमज़ोर कैसे हो सकती हैं?
ध्यान से देखें तो सम्भवतः विश्व के किसी अन्य धर्म के पास हँसता हुआ ईश्वर नहीं है। पैग़म्बर, जीसस, बुद्ध, महावीर, हरकुलिस जैसे पौराणिक चरित्रों के चित्रण में हास्य और किलोल के प्रसंग नहीं मिलते। लेकिन कृष्ण के चरित्र में यह सब कुछ है। कृष्ण माँ से डाँट खाते हैं, कृष्ण माँ को तंग करते हैं, कृष्ण माखन चुराते हैं, कृष्ण गोपियों से छेड़छाड़ करते हैं, कृष्ण प्रेम करते हैं, कृष्ण क्रोधित होते हैं और कृष्ण दुःखी भी होते हैं। कृष्ण के पास सब कुछ करने की क्षमता है। राम पैंजनिया बांधकर ठुमककर चल सकते हैं। यह कल्पना अन्य किसी ईश्वरीय चरित्र के साथ इतनी सरल नहीं है।
ऐसे में साहित्य में पुराणों के प्रयोग निषेध की तख़्ती चिपका देना समाज के उन्नयन में अवरोधक है। हम अपने ईष्ट में अपने जीवन की वर्तमान परिस्थितियों के उदाहरण तलाशकर उनसे समाधान मांगने के अभ्यासी हैं।
प्रश्न पूछने से कोई ईश्वर छोटा नहीं होता और जो प्रश्न पूछने से छोटा हो जाए वह ईश्वर नहीं होता।

✍️ चिराग़ जैन

प्रश्न संस्कृति

अंधियारे में चलते रहने से जग का उत्थान न होगा
प्रश्नों से परहेज किया तो कोई अनुसंधान न होगा

भगवद्गीता उत्तर ही तो है अर्जुन की जिज्ञासा का
यम तक ने सम्मान किया है नचिकेता की अभिलाषा का
समवशरण में प्रश्न न हों तो आगम ज्ञान कहाँ से आता
प्रश्न गरुड़ यदि पूछ न पाते गरुड़ पुराण कहाँ से आता
ज्ञानपिपासा तृप्त हुई तो ईश्वर का अपमान न होगा
प्रश्नों से परहेज किया तो कोई अनुसंधान न होगा

यक्षों की अनदेखी करके प्यास बुझाना सम्भव है क्या
शंकाओं का उत्तर देना सचमुच एक पराभव है क्या
कनक, कसौटी से कतराए ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है
जिज्ञासा से आँख चुराए, वह मेरा आराध्य नहीं है
प्रश्न सुने तो आपा खो दे, वह मानुष विद्वान न होगा
प्रश्नों से परहेज किया तो कोई अनुसंधान न होगा

सावित्री की हठ ने चाहा उसके पति के प्राण न जाएँ
तब तक प्रश्न उठाते रहिए जब तक विधिना मान न जाएँ
प्रश्नों के ही ताड़पत्र पर हर इक ग्रंथ लिखा होता है
प्रश्नों की आधारशिला पर ही गणतंत्र टिका होता है
जो प्रश्नों को द्रोह कहे उस शासक का यशगान न होगा
प्रश्नों से परहेज किया तो कोई अनुसंधान न होगा

दम्भी राजा की मनमानी का प्रतिकार गुनाह नहीं है
अभिमानी की पूजा करना प्रह्लादों की चाह नहीं है
मृत्यु प्रकट होती खम्भे से अहम् अगर सिर चढ़ आता है
वरदानों का दंभ किया तो विधि का लेखा मिट जाता है
राम अमर होंगे युग-युग तक, रावण का अभिमान न होगा
प्रश्नों से परहेज किया तो कोई अनुसंधान न होगा

✍️ चिराग़ जैन

पुनर्समीक्षा

किस पर्वत से पत्थर आया, कैसे रूप धरा पत्थर ने
बस इतने भर से मूरत की, प्राण प्रतिष्ठा करनी होगी
पूछ लिया यदि उत्सुक होकर, शिल्पी की घायल उंगली से
तो फिर इस पूरे मंदिर की पुनः समीक्षा करनी होगी

रामकथा लिखना चाहो तो, केवट का किस्सा सुन लेना
कैसे त्याग गए पल भर में, शासन का हिस्सा सुन लेना
सागर से सुनना यश गाथा, जिसको क्रोध दिखा राघव का
शबरी और निषाद कहेंगे, जिनको शोध दिखा राघव का
वह पत्थर गाथा गाएगा परस जिसे इंसान किया था
उन ऋषियों के दल से पूछो जिन सबका कल्याण किया था
लिखना, कैसा युद्ध हुआ था राघव का दम्भी रावण से
पूछ नहीं लेना भूले से, परित्यक्ता सीता के मन से
अगर सिया ने मन खोला तो बहुत प्रतीक्षा करनी होगी
तो फिर इस पूरे मन्दिर की पुनः समीक्षा करनी होगी

बस यह लिखना कैसे निर्धन ब्राह्मण से संबंध निभाया
बस यह लिखना किस कौशल से कालयवन का अंत कराया
बस यह लिखना उस नटवर का रणकौशल में यश कितना था
बस यह लिखना पूरे युग पर मधुसूदन का वश कितना था
गौवर्द्धन पर्वत बोलेगा जिसको उंगली पर रखा था
भीष्म-धनंजय की सुन लेना, जिनने रूप विराट लखा था
गीता के श्लोकों को पढ़कर, श्रद्धा का लेखा भर देना
राधा के बिरही यौवन को, बिल्कुल अनदेखा कर देना
राधा से उद्धव उलझे तो विस्मृत शिक्षा करनी होगी
फिर इस पूरे ही मंदिर की पुनः समीक्षा करनी होगी

बोधगया के वन बोलेंगे कितने थे विद्वान तथागत
नालंदा जगकर बोलेगा क्या थे दिव्य महान तथागत
ईश्वर का अवतार वही था, नगरवधू का मन बोलेगा
शांति-अहिंसा का गायक था, धरती का कण-कण बोलेगा
मुख पर कैसी दिव्य प्रभा थी, शिष्यों की टोली बोलेगी
इक दिन यह सारी मानवता उनकी ही बोली बोलेगी
तप की इक अनुपम शैली से युग के पन्ने मोड़ गए थे
राहुल से मत चर्चा करना, उसको सोता छोड़ गए थे
परित्यक्ता के अधर खुले तो खंडित निष्ठा करनी होगी
फिर इस पूरे ही मन्दिर की पुनः समीक्षा करनी होगी

जो तरु जग को फल देता है उसकी जड़ें उमस सहती है
जो घाटों की प्यास बुझा दे, वह नदिया प्यासी रहती है
अक्सर दीपक के भीतर ही गहन अंधेरा छुप जाता है
तेज दुपहरी की आभा में, मौन सवेरा छुप जाता है
जिस पर्वत में करुणा जागी उसके जल को बहना होगा
अमृत घट उपजाकर भी सागर को खारा रहना होगा
जग की भूख मिटानी है तो हल की चुभन सहन कर लेना
उजियारा फैलाना है तो निज को पूर्ण दहन कर लेना
हर पूजित को दायित्वों की कठिन परीक्षा करनी होगी
इतिहासों को हर मन्दिर की पुनः समीक्षा करनी होगी

✍️ चिराग़ जैन

पराजित विजेता

धर्मराज स्वीकार करोगे?
रण से जीते इस शासन में
कुछ अनबोले वृक्षों के शव भी शामिल हैं सिंहासन में
धर्मराज स्वीकार करोगे?

लाक्षागृह की कालनिशा में जिस भिलनी को दमित किया था
जिनके शव की भस्म बनाकर दुर्योधन को भ्रमित किया था
उन बच्चों की दग्ध अस्थियां चुभती होंगी सिंहासन में
धर्मराज स्वीकार करोगे?

अर्जुन के जीवन की रक्षा हेतु भतीजा भेंट चढ़ा था
बर्बरीक की छल-हत्या पर सारा मजमा मौन खड़ा था
क्या इनका बलिदान पढ़ोगे शपथ ग्रहण के अभिभाषण में
धर्मराज स्वीकार करोगे?

अर्जुन, भीम सदा आगे थे हर अवसर पर गौण रहे तुम
द्रोणप्रवर के विश्वासों की हत्या करके मौन रहे तुम
भ्रम को पोषित करना भी क्या पाप नहीं है अनुशासन में
धर्मराज स्वीकार करोगे?

मेघों से गठबंधन करके अर्जुन के प्रण पूर्ण कराए
एक नपुंसक के पीछे छिपकर पौरुष पर तीर चलाए
कोई भेद नहीं था उस क्षण तुम सबमें और दुःशासन में
धर्मराज स्वीकार करोगे?

भूल गए वह ब्राह्मण का घर; झूठ जहाँ कहकर ठहरे थे
द्रुपदसुता के बँटवारे पर तुम कितने गूंगे-बहरे थे
कैसे बाँट सके तुम पाँचो इक जीवित नारी राशन में
धर्मराज स्वीकार करोगे?

✍️ चिराग़ जैन

error: Content is protected !!