Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Muktak, Poetry
बुझा दें प्यास औरों की वो मिट्टी के घड़े बनिये
रहे अन्तस् में कोमलता भले बाहर कड़े बनिये
हमारा क़द हमारी भावनाओं से निखरता है
भले संख्या में कम हों हम मगर दिल के बड़े बनिये
नहीं ऐसा नहीं हम लोग केवल दान करते हैं
हक़ीक़त ये है हम प्रतिभाओं का सम्मान करते हैं
हमें भगवान बनने की कोई ख्वाहिश नहीं लेकिन
वो हर सत्कर्म करते हैं जो बस इन्सान करते हैं
जो दुनिया को फतह कर ले, वो बल-उत्साह हममें है
सभी के घर जले चूल्हा, ये इक परवाह हममें है
जो इक हारे हुए राणा को अपनी सम्पदा दे कर
पुनः लड़ने की हिम्मत दे, वो भामाशाह हममें है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
सरे-बज़्म मैं रुसवा हुआ, यही दौर का दस्तूर था
मैं ये बाज़ियाँ न समझ सका, मिरी सादगी का क़ुसूर था
तूने ग़म में ख़ुशियाँ तबाह कीं, मैंने हँस के दर्द भुला दिये
ये तो अपना-अपना रिवाज़ था, ये तो अपना-अपना शऊर था
तुझे जिस्म से ही गरज़ रही, मिरा जिस्म तेरी हदों में था
मिरी रूह मुझमें बची नहीं, तुझे कुर्बतों का फ़ितूर था
न सफ़र में मुझको मिला कोई, न डगर पे मुझको दिखा कोई
मुझे फिर भी इतना यक़ीन है, मेरे साथ कोई ज़रूर था
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chirag Jain Writings, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
मैंने गुलशन को कई बार सँवरते देखा
हर तरफ़ रंग का ख़ुश्बू का समा होता है
पंछियों की चहक सरगम का मज़ा देती है
चांदनी टूट के गुलशन में उतर आती है
धूप पत्तों को उजालों से सजा देती है
कोई अल्हड़, कोई मदमस्त हवा का झोंका
शोख़ कलियों का बदन छू के निकल जाता है
इस शरारत से भी कलियों को मज़ा आता है
सबसे नज़रें बचा के कलियाँ चटक जाती हैं
फूल खिलते हैं तो गुलशन में बहार आती है
पर ये रंगीन फ़ज़ा और ये गुलशन की बहार
वक़्त के साथ वीराने में बदल जाती है
धूप की तल्ख़ी उड़ाती है रंग फूलों का
आंधियाँ नूर की महफ़िल को फ़ना करती हैं
पत्तियाँ सूख के तिनकों की शक़्ल लेती हैं
तिनके गुलशन में बेतरतीब बिखर जाते हैं
चांदनी टूट के रोती है इस तबाही को
अब इसे देखने कोई यहाँ नहीं आता
कोई हलचल यहाँ दिखाई ही नहीं देती
अब ये गुलशन यूँ ही वीरान पड़ा रहता है
एक कोने में कहीं ज़र्द से पत्तों में छिपा
एक बिरवा किसी का इंतज़ार करता है
उसको मालूम है कल फिर से बहार आएगी
फिर से सूरत इसी गुलशन की सँवर जाएगी
यही गुलशन, यही पत्ते, यही गुंचे मिलकर
पूरे आलम को बहारों से फिर सजा देंगे
ज़र्द पत्तों में ये वीराना दुबक जाएगा
हर तरफ़ रंग का, ख़ुश्बू का नशा छाएगा
सूखे तिनके किसी का घोसला बन जाएंगे
फिर से सब लोग इस गुलशन में चले आएंगे
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Muktak, Poetry
फ़ज़ाई रक्स होता तो मुझे तुम भूल सकते थे
तुम्हारा अक्स होता तो मुझे तुम भूल सकते थे
तुम्हारी चाह हूँ, आदत, इबादत हूँ, मुहब्बत हूँ
महज इक शख़्स होता तो मुझे तुम भूल सकते थे
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Muktak, Poetry
मुझे गुलमोहरों के संग झरना आ गया होता
किसी छोटे से तिनके पर उबरना आ गया होता
तो मरते वक़्त मेरी आंख में आँसू नहीं होते
कि जीना आ गया होता तो मरना आ गया होता
✍️ चिराग़ जैन