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राम ने खोया बहुत श्रीराम बनने के लिए

त्याग दी हर कामना निष्काम बनने के लिए
तीन पहरों तक तपा दिन, शाम बनने के लिए
घर, नगर, परिवार, ममता, प्रेम, अपनापन, दुलार
राम ने खोया बहुत श्रीराम बनने के लिए
✍️ चिराग़ जैन

कोई बिछड़कर मिला है

जहाँ तुमको बस एक पत्थर मिला है
वहाँ हमको जन्नत का मंज़र मिला है

उसे भी ग़ज़ब का मुक़द्दर मिला है
मुक़द्दर में जिसको तिरा दर मिला है

कहाँ कोई ऐसा क़लन्दर मिला है
जिसे मन मुताबिक़ मुक़द्दर मिला है

हुआ एक अरसे के बाद आज तनहा
लगा, जैसे कोई बिछड़कर मिला है

भले चोट की जिस्म पर दोस्तों ने
मगर ज़ख़्म उसका ज़ेह्न पर मिला है

कोई तेरी रहमत को माने न माने
तिरा नाम सबकी ज़ुबां पर मिला है

ज़माना भले उसको समझे न समझे
मगर इक इशारा बराबर मिला है

जिसे जो मिला है वो उसका मुक़द्दर
मुझे जो मिला है वो बेहतर मिला है

कोई उनसे पूछे मुक़द्दर के मानी
जिन्हें तिश्नगी में समन्दर मिला है

✍️ चिराग़ जैन

ख़ुशियों की तस्वीर

मन के आंगन में मुस्कानों की जागीर बनानी है
अपने ही हाथों से ख़ुद अपनी तक़दीर बनानी है
हम कुछ रंग चुरा लाए हैं ख़ुशियों के गुलदस्ते से
इन रंगों से हमको जीवन की तस्वीर बनानी है
✍️ चिराग़ जैन

नज़र

पलक गिरते ही पल में खेल सारे देख लेता हूँ
मैं इनसे आँख को ढँक कर सितारे देख लेता हूँ
मेरी ये बन्द पलकें दूरबीनों से कहाँ कम हैं
मैं इनमें ज़िन्दगी भर के नज़ारे देख लेता हूँ

✍️ चिराग़ जैन

पाप

सिर्फ़ मतलब के लिए हर चाल चलना पाप है
हर दफ़ा दर देखकर मजहब बदलना पाप है

शाइरी, दीवानगी, नेकी, इबादत, मयक़शी
और राहे-इश्क़ में गिर कर संभलना पाप है

काश बच्चों की तरह हालात भी ये जान लें
ख़्वाहिशों की तितलियों के पर मसलना पाप है

दौर इक ऐसा भी था, जब झूठ कहना मौत था
और अब ये हाल, सच की राह चलना पाप है

किस डरौने दौर में हम जी रहे हैं या ख़ुदा
घर में रहना ऐब है, घर से निकलना पाप है

पाप का दिल से निकल हरक़त में आना ज़ुर्म है
ज़ुर्म का भीतर ही भीतर दिल में पलना पाप है

✍️ चिराग़ जैन

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