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अंतर्मुखी

ख़ुशी की लाश उठती है ख़ुशी की चाह के नीचे
बहुत से ज़ख्म होते हैं ज़रा-सी आह के नीचे
हमारे दिल की बातें दिल में ऐसे दब के रहती हैं
कि जैसे पीर सोता हो कोई दरगाह के नीचे

✍️ चिराग़ जैन

चांदनी से रात बतियाने सहेली आ गयी

चांदनी से रात बतियाने सहेली आ गयी
कुछ मुंडेरों के मुक़द्दर में चमेली आ गयी

पैर भी सुस्ता लिये, आँखों ने भी दम ले लिया
ज़िंदगी की राह में, दिल की हवेली आ गई

झाँकता है हर कोई ऐसे दिल-ए-नाशाद में
जैसे आंगन में कोई दुल्हन नवेली आ गई

बोझ कंधों का उतर कर गिर गया जाने कहाँ
जब मेरे सिर पे बुज़ुर्गों की हथेली आ गई

तीरगी का ख़ौफ़, सन्नाटे की दहशत थी मगर
इक किरण सूरज की धरती पर अकेली आ गयी

✍️ चिराग़ जैन

सच के नाम पे

दुनिया की बदसलूक़ी का तोहफ़ा लिये जिया
फिर भी मैं अपने सच का असासा लिये जिया

कोई महज ईमान का जज्बा लिये जिया
कोई फ़रेब-ओ-झूठ का मलबा लिये जिया

टूटन, घुटन, ग़ुबार, अदावत, सफ़ाइयाँ
इक शख़्स सच के नाम पे क्या-क्या लिये जिया

जब तक मुझे ग़ुनाह का मौक़ा न था नसीब
तब तक मैं बेग़ुनाही का दावा लिये जिया

हर एक शख़्स अपनी नज़र में था बेलिबास
दुनिया के दिखावे को लबादा लिये जिया

रोशन रहे चराग़ उसी की मज़ार पर
ताज़िन्दगी जो दिल में उजाला लिये जिया

इक वो है जिसे दौलतो-शोहरत मिली सदा
इक मैं हूँ ज़मीरी का असासा लिये जिया

तुम पास थे या दूर थे, इसका मलाल क्या
मैं तो लबों पे नाम तुम्हारा लिये जिया

✍️ चिराग़ जैन

सार्थकता

सच बोलने की भी जो हिम्मत जुटा न सके
ऐसी निरी खोखली जवानी किस काम की
शोषण को देख नहीं लहू में उबाल आए
बोलो ऐसी ख़ून की रवानी किस काम की
लाज, प्रेम, करुणा की नमी यदि सूख जाए
भला फिर आँख बिन पानी किस काम की
जिसके निधन पे न चार नैन नम हुए
ऐसे आदमी की ज़िन्दगानी किस काम की

✍️ चिराग़ जैन

ख़ुशी का रहा इंतज़ार

हमारा दिल था बहुत बेक़रार बरसों तक
किसी ख़ुशी का रहा इंतज़ार बरसों तक

जो एक पल तमाम दर्द को भुला देगा
उसी की आस पे थे ख़ुशगवार बरसों तक

वो मुझसे रू-ब-रू हैं, जिनका मुंतज़िर था मैं
ये पल करेगा मुझे अश्क़बार बरसों तक

तमाम मयक़दों का सारा नशा बेमानी
वो देख लें तो न उतरे ख़ुमार बरसों तक

ये क्या तिलिस्म किया तुमने इक दफ़ा छूकर
ख़याले-वस्ल रहा बरक़रार बरसों तक

✍️ चिराग़ जैन

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