Chirag Jain Writings, Ghazal, Poetry, Unpublished
चंद सस्ती ख्वाहिशों पर सब लुटाकर मर गईं
नेकियाँ ख़ुदगर्ज़ियों के पास आकर मर गईं
जिनके दम पर ज़िन्दगी जीते रहे हम उम्र भर
अंत में वो ख्वाहिशें भी डबडबाकर मर गईं
बदनसीबी, साज़िशें, दुश्वारियाँ, मातो-शिक़स्त
जीत की चाहत के आगे कसमसाकर मर गईं
मीरो-ग़ालिब रो रहे थे रात उनकी लाश पर
चंद ग़ज़लें चुटकुलों के बीच आकर मर गईं
वो लम्हा जब झूठ की महफ़िल में सच दाखिल हुआ
साज़िशें उस एक पल में हड़बड़ा कर मर गईं
क्या इसी पल के लिए करता था गुलशन इंतज़ार
जब बहार आई तो कलियाँ खिलखिला कर मर गईं
जिन दीयों में तेल कम था, उन दीयों की रोशनी
तेज़ चमकी और पल में डगमगा कर मर गईं
दिल कहे है- प्रेम में उतरी तो मीरा जी उठीं
अक्ल बोले- बावरी थीं, दिल लगाकर मर गईं
ये ज़माने की हक़ीक़त है, बदल सकती नहीं
बिल्लियाँ शेरों को सारे गुर सिखाकर मर गईं
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghazal, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
जो जितना भी सच्चा निकला
वो उतना ही तनहा निकला
सुख के छोटे-से क़तरे में
ग़म का पूरा दरिया निकला
कुछ के वरक़ ज़रा महंगे थे
माल सभी का हल्का निकला
मैंने तुझको ख़ुद-सा समझा
लेकिन तू भी सब-सा निकला
कौन यहाँ कह पाया सब कुछ
कम ही निकला जितना निकला
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghazal, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
हमने देखे हैं कई साथ निभानेवाले
बरगला लेंगे तुझे भी ये ज़मानेवाले
बारिशों में ये नदी कैसा कहर ढाती है
ये बताएंगे तुझे इसके मुहानेवाले
धूप जिस पल मिरे आंगन में उतर आएगी
और जल जाएंगे दीवार उठानेवाले
मौत ने ईसा को शोहरत की बुलंदी बख्शी
ख़ाक़ में मिल गए सूली पे चढ़ानेवाले
रास्ते सच के बहुत तंग, बहुत मुश्क़िल हैं
सोच ले ये भी ज़रा जोश में आनेवाले
अपनी ऑंखों को भी सिखला ले हुनर धोखे का
झूठी बातों से हक़ीक़त को छिपानेवाले
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
बीज ने वृक्ष से कहा-
“तुम महान हो”
वृक्ष ने उत्तर दिया-
“वृक्ष होने से पहले
मैं भी तुम जैसा ही था
जैसे तुम अब हो
मैं भी पहले ऐसा ही था”
…सुनकर
बीज धरती में गड़ गया
मिट्टी का एक आवरण उस पर चढ़ गया
फिर एक दिन
उसकी सीमाओं का खोल टूटा
उसमें से एक कोमल अंकुर फूटा
धूप-पानी पाकर
धीरे-धीरे वो अंकुर बड़ा हो गया
और एक दिन
मुस्कुराते हुए
वृक्ष के समकक्ष खड़ा हो गया
मनुष्य ने ईश्वर से कहा-
“तुम महान हो”
ईश्वर ने उत्तर दिया-
“ईश्वर होने से पहले
मैं भी तुम जैसा ही था
जैसे तुम अब हो
मैं भी पहले ऐसा ही था”
…सुनकर
मनुष्य इस सीधी-सादी बात के
गूढ़ अर्थ बूझने लगा
और जब कुछ नहीं सूझा
तो ईश्वर को पूजने लगा
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Muktak, Poetry, Unpublished
हूक सीने के आस-पास अभी बाक़ी है
उनके आने की कोई आस अभी बाक़ी है
शामो-शब सहरो-सुबह देख चुका हूँ लेकिन
और कुछ देखने की प्यास अभी बाक़ी है
✍️ चिराग़ जैन