जग में कुछ लोग कमाए
काऊ ने भोग लिए मन के सुख, काऊ ने देह के रोग कमाए
दौलत में सुख खोजने वालों ने केवल भौतिक भोग कमाए
काऊ ने प्रेम में जीते नारायण, काऊ ने मात्र वियोग कमाए
जीवन सिर्फ़ उन्होंने जिया, जिनने जग में कुछ लोग कमाए
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Muktak, Poetry
काऊ ने भोग लिए मन के सुख, काऊ ने देह के रोग कमाए
दौलत में सुख खोजने वालों ने केवल भौतिक भोग कमाए
काऊ ने प्रेम में जीते नारायण, काऊ ने मात्र वियोग कमाए
जीवन सिर्फ़ उन्होंने जिया, जिनने जग में कुछ लोग कमाए
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
संकट हो कोई समक्ष खड़ा
या फिर घिर आए युद्ध बड़ा
जीवन की हर कठिनाई से
मानव का पुत्र सदैव लड़ा
मानवता का इक दिव्य भाव, अंतस् में धारण कर लेंगे
आपदा अगर कोई आई, मिल-जुल के निवारण कर लेंगे
सागर ने लांघी मर्यादा
सूनामी यम का रूप बनी
भूकम्पों की मनमानी से
जब धरा मृत्यु का कूप बनी
मानवता एक हुई सारी
विपदा उसके आगे हारी
सब मतभेदों का तिरस्कार, जीवन के कारण कर लेंगे
आपदा अगर कोई आई, मिल-जुल के निवारण कर लेंगे
जब जीवनदायी मेघ फटें
अम्बर से मौत बरसती हो
नदियाँ सुरसा का रूप धरें
धरती किसान को ग्रसती हो
पर्वत से गिरे शिला भारी
शहरों को डसे महामारी
मानवता की रक्षा हित हम, हर स्वार्थ समर्पण कर लेंगे
आपदा अगर कोई आई, मिल-जुल के निवारण कर लेंगे
जगती का कष्ट मिटाने को
शिव हालाहल पी जाते हैं
कान्हा गोकुल की रक्षा में
पर्वत का बोझ उठाते हैं
अस्थियाँ दान जहाँ ऋषि करें
और जनक खेत में कृषि करें
यदि समय त्याग का आया तो, हम याद कोई क्षण कर लेंगे
आपदा अगर कोई आई मिल-जुल के निवारण कर लेंगे
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
बस तुम्हीं तो हो मेरी हर बेगुनाही के गवाह
तुम भी गर इल्ज़ाम दोगे, बेज़ुबां हो जाऊँगा
शायद उसने इसलिए मुझको अता की है शिक़स्त
हर दफ़ा जीता तो इक दिन बदगुमां हो जाऊँगा
जी रहा हूँ बांध पर ठहरी नदी की धार-सा
कोई दरवाज़ा खुलेगा तो रवां हो जाऊंगा
जो हवा जलती है मुझमें साँस बनकर रात-दिन
वो हवा झोंका बनेगी तो धुआँ हो जाऊंगा
मैं वो क़िस्सा हूँ जिसे है चंद लफ़्ज़ों की तलाश
वक़्त आएगा तो मैं पूरा बयां हो जाऊंगा
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
हमारे मन में आशाएँ अलग हैं
मगर हाथों में रेखाएँ अलग हैं
हमारी अपनी सीमाएँ अलग हैं
तुम्हारी भी विवशताएँ अलग हैं
हमारी ख़ुद से तुलना मत करो तुम
हमारी प्राथमिकताएँ अलग हैं
करी है हमने सी.ए. की पढ़ाई
मगर अम्मा की गणनाएँ अलग हैं
असीमित स्वप्न बोए कल्पना ने
मगर अब वास्तविकताएँ अलग हैं
विषय-सूची में लिक्खा भाईचारा
मगर भीतर की शिक्षाएँ अलग हैं
जवानी का नशा ये याद रक्खे
बुढ़ापे की समस्याएँ अलग हैं
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
ज़िन्दगी जब भी आज़माती है
इक नया रास्ता दिखाती है
न तो पिंजरे में चहचहाती है
न ही अब पंख फड़फड़ाती है
जब कभी माँ की याद आती है
ये हवा लोरियाँ सुनाती है
वो मरासिम को यूँ निभाती है
मिरा हर काम भूल जाती है
मेरे ख़्वाबों में यूँ वो आती है
जैसे पाजेब छनछनाती है
लफ़्ज़ मिल पाए तो सुनाऊंगा
इक ग़ज़ल मुझमें छटपटाती है
जब भी जाता है चांद महफ़िल से
रात की जान सूख जाती है
दिल को मिलती है जब ख़ुशी कोई
अक़्ल कुछ दर्द भूल जाती है
✍️ चिराग़ जैन