Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
गहराई में जाकर बिल्कुल चुप हो जाती हैं
और किनारे आकर लहरें शोर मचाती हैं
लहरें पल भर में जीवन का सार बताती हैं
जिसमें से उठती हैं उस में ही मिल जाती हैं
जब उस अनुपम प्रथम मिलन की यादें आती हैं
नम होते हैं अधर और पलकें मुस्काती हैं
साहिल केवल कचरा ही देता है सागर को
फिर भी लहरें साहिल को मोती दे जाती हैं
मैं तो भावों और शब्दों में उलझा रहता हूँ
पर उनसे जुड़कर ग़ज़लें पावन हो जाती हैं
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
ख़ुद अन्धेरे में रहकर ही
प्रकाशित करता है औरों को
…कैमरा।
लेकिन जैसे ही कोई किरण
रौशन करने आती है
कैमरे को…
…तो इसे
अंधियारी लगने लगती है
सारी दुनिया।
बिल्कुल इंसान की तरह है
कैमरा भी
…ओछा कहीं का!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
आस का दामन छूट गया
लगा मुक़द्दर फूट गया
फिर से पलकें भीग गईं
लो फिर से दिल टूट गया
पहले भी कई बार हुआ
मन में ग़ज़ब ख़ुमार हुआ
नैनों में सपने उभरे
और ये दिल लाचार हुआ
अब फिर वही कहानी है
हालत वही पुरानी है
अमृत पीना चाहा तो
भीतर कड़वा घूंट गया
प्यार हुआ तो पीर मिली
सबको ये तक़दीर मिली
कब लैला को क़ैस मिला
कब रांझे को हीर मिली
सबका ये अफ़साना है
क़िस्सा वही पुराना है
कहीं ज़माने की ज़िद थी
किसी से दिलबर रूठ गया
जीवन एक कहानी है
दुनिया आनी-जानी है
फिर भी गर दिल रोए तो
ये इसकी नादानी है
नादानी क्यों करता है
क्यों सपनों पर मरता है
जीवन भर का सच बाक़ी
पल दो पल का झूठ गया
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
कोई महज ईमान का जज्बा लिए जिया
कोई फ़रेब-ओ-झूठ का मलबा लिए जिया
टूटन, घुटन, ग़ुबार, अदावत, सफ़ाइयाँ
इक शख्स सच के नाम पे क्या-क्या लिए जिया
जब तक मुझे ग़ुनाह का मौक़ा न था नसीब
तब तक मैं बेग़ुनाही का दावा लिए जिया
था बेलिबास अपनी नज़र में हर एक शख्स
दुनिया के दिखावे को लबादा लिए जिया
रोशन रहे चराग़ उसी की मज़ार पर
ताज़िन्दगी जो दिल में उजाला लिए जिया
इक वो है जिसे दौलते-शोहरत मिली सदा
इक मैं हूँ ज़मीरी का असासा लिए जिया
तुम पास थे या दूर थे, इसका मलाल क्या
मैं तो लबों पे नाम तुम्हारा लिए जिया
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
सत्य का पथ हमें क्यों जटिल सा लगा
उम्र को झूठ में ढाल कर चल दिए
सादगी की सुहानी डगर छोड़ कर
ज़िन्दगानी फटेहाल कर चल दिए
जो रवैया हमें पीर देता रहा
क्यों उसी के लिए हम पुरस्कृत हुए
ज़िन्दगी पर चढ़े पाप के आवरण
पाठ जितने पढ़े सब तिरस्कृत हुए
प्रश्न तो आत्मा ने उठाए मगर
हम उन्हें बिन सुने टालकर चल दिए
हर घड़ी भावनाएँ खरोंची गईं
हर क़दम दंभ की जीत होती रही
राजसी स्वप्न पलकें सजाए रहे
सत्व की रौशनी मौन सोती रही
लोभ की राह पर पीर रोती मिली
हम उसे और बदहाल कर चल दिए
हम ख़ुशी ही कमाने चले थे मगर
हम ख़ुशी ही गँवाते रहे उम्र भर
कौन जाने कि किस चैन के वास्ते
चैन अपना गँवाते रहे उम्र भर
उम्र भर आँकड़े ही जुटाते रहे
प्यार की जेब कंगाल कर चल दिए
भागते-दौड़ते रास्तों पर अगर
दर्द लाचार तनहा तड़पता मिला
पूस की रात में कोई बेघर दिखा
जेठ में प्यास से कोई मरता मिला
एक पल के लिए मन द्रवित तो हुआ
भावना पर क़फ़न डालकर चल दिए
✍️ चिराग़ जैन