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भारतीय सेना की कार्रवाई

एक शरारती लड़का पूरे मोहल्ले के लोगों को तंग करता रहता था। वो रात में चैन से सोते लोगों के घर की घंटी बजाकर भाग जाता था। कई बार उसे समझाया गया। पंचायत में भी उसे टोका गया। लेकिन वो समझने को तैयार नहीं था। रोज़ की तरह एक दिन वह किसी की घंटी बजाने की सेंध लगाए बैठा था। उसी मौके का लाभ उठाकर एक दबंग पड़ोसी ने उस शरारती लड़के के घर पर खुजली का पाउडर बिखेर दिया। सूना है कि वो लड़का गाँव के जोहड़ में खुजा-खुजा कर खूनमखून बरामद हुआ है।

✍️ चिराग़ जैन

दिगम्बरत्व

प्रश्न उठा है जैन धर्म के संत नग्न क्यों रहते हैं
प्रश्न उठा है जग में रहकर आत्ममग्न क्यों रहते हैं
प्रश्न उठा है जैन धर्म में बिल्कुल ढील नहीं है क्या
सभ्य जगत् में नग्न विचरना; ये अश्लील नहीं है क्या
सच समझे बिन बकबक करना, थोथा मान तुम्हारा है
त्याग वेश पर नाक चढ़ाना ये अज्ञान तुम्हारा है
काम अगर सर चढ़ जाए तो जीव व्यथित हो जाता है
मन भीतर से निश्छल हो तो त्याग घटित हो जाता है
वस्त्र त्यागना क्या कोई करतब फ़िल्मी हीरो का है
काम विजित कर नग्न विचरना; ये टेवा वीरों का है
शुद्ध आचरण की बातें, अभिमानी नहीं सुनी तुमने
संतों का बस बाना देखा, बानी नहीं सुनी तुमने
चखने वाले ने जूठे बेरों में मीठा प्रेम चखा
जिसके मन में जो मूरत थी उसने वैसा रूप लखा
सच बतलाओ, बचपन में जब नंगे डोला करते थे
तब भी क्या तुम ऐसी ओछी भाषा बोला करते थे
बचपन में हर नारी तुमको क्या केवल तन लगती थी
माँ का दूध पिया तब भी क्या कामवासना जगती थी
कह सकते हो तब तुमको इन बातों का आभास न था
कह सकते हो तब अन्तस् में कोई कामविलास न था
मन का पाप उजागर ना हो इस हित साधन जोड़ लिए
जब मन में कालिख आई तो उजले कपडे ओढ़ लिए
तुमको भय है काम भावना पर तुम पार न पाओगे
मन में पाप उठेगा तो तुम उसे मार ना पाओगे
लेकिन नग्न विचरने वाले संतों को ये फ़िक्र नहीं
धर्मध्यान से सिक्त ह्रदय में, काम-पाप का ज़िक्र नहीं
आत्मसाधना में बाधक अभिशाप भस्म हो जाएगा
तप की ज्वाला में जलकर हर पाप भस्म हो जाएगा
तुम क्या जानो जैन धर्म का क्या इतिहास सुनहरा है
तुम क्या समझो पंचेद्रियों पर धर्मध्यान का पहरा है
केशलोच पर वो बोले जो खुद को नोच नहीं सकते
कितनी कठिन तपश्चर्या है, तुम ये सोच नहीं सकते
हम वो नहीं जिन्होंने केवल धन वैभव ही जोड़ा है
हम उनके वंशज हैं जिनने जीत-जीत कर छोड़ा है
तोरण पर पशुकष्ट देखकर हममें करुणा जागी है
हमने चक्रवर्ती की सब संपत्ति जीत कर त्यागी है
जैन धर्म का साधक केवल क्षमा सुधा ही पीता है
हमने कमठ सरीखा दानव आचरणों से जीता है
हमको अपने मुनिराजों से क्षमाधर्म का ज्ञान मिला
हमें कठिन उपसर्ग समय में संयम का वरदान मिला
हम हिंसक हो जाते तो तुम इतना बोल नहीं पाते
हम बदला लेने लगते तो मुंह तक खोल नहीं पाते
हम भी तुमको गाली दें तो तुम जैसे हो जाएंगे
हम तुम जैसे होकर अपने कुल को नहीं लजायेंगे
तुम इक बार विचारो फिर से अहंकार ही चूका है
उसका चेहरा घृणित हो गया, जिसने नभ पर थूका है
हाथी निकला, श्वान बौराये; कहो लफंगा कौन हुआ
दर्पण में जाकर तो देखो सचमुच नंगा कौन हुआ

✍️ चिराग़ जैन

मैं दुर्गा हूँ कमज़ोर नहीं

मैं दुर्गा हूँ कमज़ोर नहीं
मुझ पर रस्मों का ज़ोर नहीं
मेरे सपनों को बांध सके
ऐसी दुनिया में डोर नहीं

कोमल हूँ कन्यापूजन में
चण्डी हूँ दुष्टों से रण में
जब ठान लिया तो मिला दिया
धरती को अम्बर से क्षण में
मुश्किल की कोई भी आंधी
मुझको सकती झकझोर नहीं

मेरे सपनों का देश अलग
मेरा ख़ुद का परिवेश अलग
सारी दुनिया की बात अलग
मेरे मन का संदेश अलग
कुछ भी सुनकर चुप रह जाऊँ
ऐसा अब होगा और नहीं

अर्पण की घड़ी अगर आई
अपना सर्वस्व लुटा दूंगी
धोखे से छलना चाहोगे
भारी विध्वंस मचा दूंगी
हर पल कोमल भी नहीं मगर
हर पल को बहुत कठोर नहीं

आँखों में सपना पलता है
दिल हिरण चैकड़ी भरता है
क़दमों में बिजली सी तेज़ी
मन में बेहद चंचलता है
मैं दौड़ जिसे छू नहीं सकूं
ऐसा तो कोई छोर नहीं

✍️ चिराग़ जैन

प्यार का सम्प्रेषण

चीखने से
शोर बढ़ता है
सम्बन्ध नहीं।

सुकून की खटिया
बुनी जाती है
सहजता की बाण से;
इसमें प्रयास की गाँठें हों
तो मुक्त नहीं हो सकती नींद
चुभन से!

जताना
और बताना
व्यापार में होना चाहिए
व्यवहार में नहीं।

और प्यार में…
…वहाँ तो
आँखें मिलते ही
फिफ्थ गीयर लग जाता है
धड़कनों में!
ओंठ व्यस्त रहते हैं
कँपकँपाने और मुस्कुराने में।

शब्द और आवाज़
केवल शोर हैं
प्यार के सम्प्रेषण में।

✍️ चिराग़ जैन

संतोष

बूंद भर जल नहीं दो भले तुम मुझे
दीखते ही रहो बस घड़ों की तरह

क्या हुआ गर कभी प्यास बाकी रही
ज़िन्दगी चुक गई आस बाकी रही
जिन ज़मीनों की अरदास बाकी रही
खोखली हो गई बीहड़ों की तरह

मंडियों में सजाया हुआ नेह हूँ
मैं शपथ में बसा एक संदेह हूँ
वक़्त के हाथ जर्जर हुई देह हूँ
बस लिपटते रहो चीथड़ों की तरह

वैभवों का बिखरता हुआ कक्ष हूँ
इक वृहन्नल के आगे खड़ा लक्ष हूँ
आँधियों का सताया हुआ वृक्ष हूँ
तुम बरसते रहो कंकड़ों की तरह

✍️ चिराग़ जैन

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