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संकोच

मुस्कानों ने सूर्य उगाया
संकोचों ने अस्त कर दिया
आशाओं का महल नवेला
आशंका ने ध्वस्त कर दिया

मर्यादा की डोरी थामे
स्वीकृति का इंगित तो आया
किन्तु झुकी पलकों का मतलब
आशंकित मन समझ न पाया
ख़ुद ही मैंने हिम्मत जोड़ी
ख़ुद ही उसको नष्ट कर दिया

हलकी सी मुस्काई भी थीं
तुम दाँतों में होंठ दबाकर
फिर मीठे गुस्से से तुमने
देखा था मुझको झुँझलाकर
बिन बोले ही तुमने मेरी
दुविधा को आश्वस्त कर दिया

साथसदा रहने की ज़िद में
संगत का सौभाग्य गँवाऊं
तुम मिल जाओ इस चाहत में
मिलने तक को तरस न जाऊँ
मैं तो पग-पग पर कतराया
तुमने मार्ग प्रशस्त कर दिया

✍️ चिराग़ जैन

बंद कपाटों पर तुम आए

इस जीवन में चूक हुई है, बंद कपाटों पर तुम आए
आँखों तक अँधियारा पैंठा, तब तुमने कुछ दीप जलाए
अब इन दीपों के ईंधन से, केवल ऊष्मा ग्रहण करूंगा
अगले जन्म अगर आया तो, उजियारों का वरण करूंगा

शास्त्र बनाते मोक्षपथिक पर, प्यास मुझे इक और जन्म की
बहुत जटिल लगती हैं मुझको, नीरस बातें ज्ञान-धर्म की
पुण्य बढ़े तो स्वर्ग-सुखों में, मुझको निश्चित ला पटकेंगे
मैं उस लोक रहूंगा व्याकुल, मन के भाव यहाँ भटकेंगे
तुमको छूकर बच सकता हूँ, तुमको निश-दिन स्मरण करूंगा
जिसको जगत् अनैतिक कहता, मैं वैसा आचरण करूंगा

बचपन में दादी कहती थी, पिछला अगला सब होता है
आँखें जस की तस रहती हैं, कुछ मिलता सा ढब होता है
आँखों की पहचान बनाना, आदत स्वयं गवाही देंगी
मुझको देखोगे तो तुमको, धड़कन ख़ूब सुनाई देंगी
तुम उस पल चैकन्नी रहना, यादों का अवतरण करूंगा
उस पल मैं धरती से नभ तक, अब का वातावरण भरूंगा

जब भी तुमको बिन कारण ही, कोई जगह बहुत भाती हो
अगर हवा की गंध तुम्हारा, हाथ पकड़ खींचे लाती हो
तुम उस जगह प्रतीक्षा करना, मैं इक रोज़ वहीं आऊंगा
देख तुम्हें निःशब्द रहूंगा, तुमको छूकर जम जाऊंगा
भाषा अधरों पर थिर होगी, पलकों पर व्याकरण धरूंगा
पूर्ण हुए संकल्पों का मैं, आँसू से आचमन करूंगा

✍️ चिराग़ जैन

अभय

मीत तुम चाहतों से डरा मत करो
चाह की जीत दिखलाउंगा एक दिन
मुक्त हो जाओगी तुम विवशताओं से
एक बंधन सजा जाउंगा एक दिन

तुम अगर कर सको तो यही बस करो
जब खुलें पंख तो रोकना मत उन्हें
जब कभी कामनाएँ तरल हो उठें
तो किसी लाज से सोखना मत उन्हें
रीत जाना नहीं, रीतियों की तरह
मैं नया रंग भर जाउंगा एक दिन

प्यार के नूर की बात करते सभी
प्यार का नूर सबको सुहाता नहीं
हम समझ ही नहीं पा रहे हैं अभी
प्यार क्यों बेहिचक बोल पाता नहीं
ये नियम, झूठ की पैरवी हैं प्रिये
सत्य का रूप दिखलाउंगा एक दिन

देह ने विष पिया, आत्मा ने नहीं
तुम मुझे देह अपनी नहीं सौंपना
जिन रिवाज़ों दूभर हुई ज़िन्दगी
सोच में तुम उन्हें बस नहीं रोपना
उम्र भर की छुअन भूल ही जाओगी
उंगलियों में समा जाउंगा एक दिन

✍️ चिराग़ जैन

तपस्या

जब मुझे विश्वास होगा, तुम मुझे हासिल न होगे
मैं पुनः संसार सागर में स्वयं को झोंक दूंगा
जो रसायन दग्ध करता है हृदय को, धमनियों को
व्यस्तताओं से उसी की हर क्रिया को रोक दूंगा

जिस घड़ी होगा सुनिश्चित, भाग्य रेखा में नहीं तुम
बस तभी इक वक्र रेखा, शुक्र पर्वत छोड़ देगी
जब मुझे आभास होगा, भावना बेमोल है अब
बुद्धि बढ़कर तब अचानक मोह बंधन तोड़ देगी
हाँ, कठिन होगा हृदय से रक्त शोधन मात्र करना
कामना की प्यास को मैं रीतियों की ओक दूंगा

क्या पता उस पल स्वयं पर भी नियंत्रण हो न मेरा
पर स्वयं को आँकड़ों में व्यस्त करना सीख लूंगा
जिन अनर्गल कर्मकाण्डों की प्रणय ने पीर झेली
मैं उन्हीं से प्रीत का घर ध्वस्त करना सीख लूंगा
मैं स्वयं को भी नहीं अच्छा लगूंगा उन दिनों जब
प्रेम में डूबे हुओं को शिष्ट बनकर टोक दूंगा

प्रेम के बिन रस नहीं बनता हृदय की वीथियों में
किन्तु फिर भी रक्त का संचार चलता ही रहेगा
तंत्रिकाओं का सिहरकर फिर उभरना उभरना बंद होगा
कोशिकाओं का मगर व्यापार चलता ही रहेगा
देखने भर के लिए संसार चलता ही रहेगा
किन्तु मैं मन को ख़ुद अपने हाथ से परलोक दूंगा

✍️ चिराग़ जैन

सख़्त पहरा है

आज कुछ अचरज नहीं है भाग्य के व्यवहार पर
पूर्णता आ ही नहीं सकती कभी इस द्वार पर
सख्त पहरा है
किसी पिछले जनम के पाप का
हूँ स्वयं कारक नियति में मिल रहे संताप का

भावना से शून्य कैसे प्रार्थना होगी कहो ना
है बहुत दूभर विवशता लाद कर संबंध ढोना
रेत के घर क्यों सदा ही लहर की ज़द में रहे हैं
प्रश्न गहरा है
अर्थ क्या है बस उंगलियों पर सरकते जाप का
हूँ स्वयं कारक नियति में मिल रहे संताप का

किसलिए सुख से सदा वंचित रही अच्छी कहानी
क्यों नयन की कोर पर है पीर का अनुवाद पानी
गीत की दारुण कथा सुन सृजन की पलकें सजल हैं
अश्रु ठहरा है
क्यों हुआ निःशब्द जीवन गीत के आलाप का
हूँ स्वयं कारक नियति में मिल रहे संताप का

जब हथेली की लकीरों से उलझना हो अकारण
कुण्डली में मिल न पाए गृहदशाओं का निवारण
जिस खगोली पिण्ड ने जीवन अंधेरा कर रखा है
वह सुनहरा है
रंग क्या देखूँ नियति से जुड़ चुके अभिशाप का
हूँ स्वयं कारक नियति में मिल रहे संताप का

✍️ चिराग़ जैन

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