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आकांक्षा

मैं तुम्हारी आँख में कुछ स्वप्न अपने आँज आया
तुम मेरे सपनों को अपने आँसुओं में मत बहाना

जब तुम्हें आभास हो, गंतव्य दुर्गम हो रहा है
या सफलता के प्रयासों के जकड़ ले पाँव कोई
राह का मौसम गुलाबी हो करे कर्तव्य विस्मृत
या तुम्हें आकृष्ट कर बैठे, मनोहर गाँव कोई
तब घड़ी भर देखना दर्पण में अपनी पुतलियों को
तब घड़ी भर इस अनोखे स्वप्न से आँखें मिलाना

एक दिन तुमको समूची साधना मिथ्या लगेगी
एक दिन उलझाएगी तुमको इसी पथ की पहेली
एक दिन थककर तुम्हारे पाँव भी दुखने लगेंगे
एक दिन तुम भी चलोगी साधना-पथ पर अकेली
बस उसी दिन जान लेना, है बहुत नज़दीक मंज़िल
बस उसी दिन और भी जीवट जुटाकर पग बढ़ाना

मन्त्र हैं निष्प्राण उनमें साधना के प्राण भर दो
शब्द को अनुभूतियों का स्पर्श दो, वह जी उठेगा
जिस समंदर ने तुम्हारे वक़्त की नैया डुबोई
चंद्रमा की ओर बढ़ता ज्वार उससे ही उठेगा
जब नई आभा छलक आए सफलता के नयन में
तब नयन की कोर पर उसको सजाकर मुस्कुराना

✍️ चिराग़ जैन

परलोक की अवधारणा

सत्य तो लगती नहीं, परलोक की अवधारणा पर
आपसे मिलने की हर इक आस इस ही पर टिकी है
हाथ की रेखाओं का कोई नहीं हो अर्थ फिर भी
आपसे आजन्म दूरी की कथा इनमें लिखी है

कुछ नहीं होता है करवा चौथ के निर्जल व्रतों से
किन्तु अपनी आस्था को घोल देना अर्घ्य जल में
पत्थरों के कान सुन पाते नहीं हैं प्रार्थनाएँ
किन्तु संशय आप मत रखना तपश्चर्या के बल में
आस्था होगी विजय, तो मान्यता यह ध्वस्त होगी
है वही सच, जो मेरी आँखों के आगे भौतिकी है

इस जनम में चूक हो जाए किसी सम्बन्ध की तो
कोई भव उसकी सटीकी के लिए होता तो होगा
जिस कृषक ने शुष्क भू पर धान रोपी मूढ़ता से
वह कभी बिल्कुल सही फसलें कहीं बोता तो होगा
कर्मकाण्डों की निठुरता से सदा ही क्षुब्ध हूँ मैं
किन्तु व्यवहारिक जगत् में भावना सस्ती बिकी है

✍️ चिराग़ जैन

पागलपन का सुख

अब नहीं आना हमको सारी दुनिया के समझाने में
ये क्या जानें कितना सुख मिलता पागल हो जाने में

दुनिया की सारी दौलत ठुकरा बैठी दीवानी थी
उसको अपने नटवर नागर के सँग प्रीत निभानी थी
मिश्री सा मीठापन पाया उसने विष पी जाने में
ये क्या जानें कितना सुख मिलता पागल हो जाने में

थाम लुकाठी हाथ कबीरा साखी गाया करता था
ढोंगी को झीनी चादर से ख़ूब छकाया करता था
अपना ही घर फूंक लिया दुनिया के दीप जलाने में
ये क्या जानें कितना सुख मिलता पागल हो जाने में

बिगड़े मस्त दिमाग़ों में ही ख़ुशियों वाले लच्छे हैं
हमको पागल ही रहने दो हम पागल ही अच्छे हैं
रंग बसंती गहराएगा फाँसी पर चढ़ जाने में
ये क्या जानें कितना सुख मिलता पागल हो जाने में

जब आँखों की एक झलक से सारी दुनिया हल्की हो
जब कोई हिचकी पलकों से आंसू बनकर ढलकी हो
उसके बिन जीने से अच्छा है उस पर मर जाने में
ये क्या जानें कितना सुख मिलता पागल हो जाने में

जिन आँखों में रंग ख़ुशी का भरना अच्छा लगता है
उसकी हर इक चाहत पूरा करना अच्छा लगता है
अपने सारे काम भुला कर उसका हाथ बँटाने में
ये क्या जानें कितना सुख मिलता पागल हो जाने में

मन करता है हाथ उठाकर मुक्त गगन में बह जाएँ
समझ मना करती है जिनको, वो सब बातें कह जाएँ
कितनी इच्छाएँ कैदी हैं मन के पागलखाने में
ये क्या जानें कितना सुख मिलता पागल हो जाने में

जब कोई बेचारा केवल आँख सेकता रह जाए
बंदर बोटी ले भागे और शेर देखता रह जाए
किसी और की पटी प्रेमिका को लेकर भग जाने में
ये क्या जानें कितना सुख मिलता पागल हो जाने में

✍️ चिराग़ जैन

परोक्ष

यूँ समझ लो हम किसी पर्वत शिखर पर आ गए हैं
जब कई झोंके हवा के आएंगे तो भय लगेगा
उस घड़ी तुम हारना मत
सिर्फ ये आभास करना
इस महापर्वत के अपराजित शिखर पर
श्वास लेते आदमी को देखने का
इन हवाओं को अभी अभ्यास कम है
ये समीरों का समर सामान्य ही है
ध्यान से देखो इन्हें तुम
है स्वयं की हार पर अचरज इन्हें ज़्यादा
तुम्हारी जीत पर विश्वास कम है

यूँ समझ लो
हम किसी बादल के ऊपर उड़ रहे हैं
जब कभी नीचे धरातल दिख पड़ेगा
भय लगेगा
उस घड़ी तुम काँपना मत
सिर्फ ये उल्लास करना
बादलों की पालकी पर तैरने के
स्वप्न को साकार होते देखने पर
विश्व को विश्वास कम है
ये धरा का मोहबल सामान्य ही है
ध्यान से देखो इसे तुम
क्षोभ है इसको स्वयं के स्वप्न पर ज़्यादा
पर तुम्हारी कामना की पूर्ति का संत्रास कम है

✍️ चिराग़ जैन

शब्द शक्ति

मंच पर दो शब्द कहने की विवशता
भौंथरा करती रही है
सैंकड़ों शब्दों की पैनी धार को,
मार डाला है
बनावट से सुसज्जित ग्रीटिंगों ने
मौन अधरों पर थिरकते प्यार को।

बात दिल से झूमकर निकले
तो फिर
बस ‘भाइयो-बहनो’ का सम्बोधन
भरी महफ़िल को दीवाना बना दे,
धमनियों से बह के आए शब्द हों तो
एक ही विन्यास
बर्बर डाकुओं की क्रूरता को
आदमीयत का
(सभी को मान्य)
पैमाना बना दे।

किन्तु अब इस दौर में
भाषाओं के व्यापारियों से
मंच के भाषण लिखाए जा रहे हैं।
स्वार्थ की डाली पे बैठे
काग को कोयल बताकर
अब सियारी गीत गाए जा रहे हैं।

चापलूसी
ज्ञान का मांगा हुआ लहंगा पहनकर
मंच पर मुजरा करे तो
अब उसे मुजरा नहीं कहते।

शब्द के लच्छे बनाकर
वक़्त के महंगे लम्हे
बर्बाद करने की कला
श्रोताओं को पूर्णार्थ की ख़्वाहिश से
कोसों दूर रखती है।

प्रेम, मानवता, दया, करुणा
हमारी संस्कृति
माँ-बाप, हिन्दुस्तान
जनता, लोकसत्ता
न्याय और संघर्ष
अपनी सभ्यता
संवेदना, अध्यात्म
और ऐसे ही ढेरों शब्द
अपने अर्थ का बल क्षीण करके
अधमरे से हो गए हैं।

अब इन्हें सुनकर किसी के
रोंगटे उठते नहीं हैं।

हमने अपने मानसिक रनिवास में बैठी
प्रशंसा की सुरक्षा के लिए
जिन शब्दों का पहरा बिठाया है
उन्हें ख़ुद ही नपुंसक कर दिया है,
शांति के सब वाक्य
इतने खोखले शब्दों के मिलने से बने हैं
समझ लो
हमने अपने हाथ से
माहौल हिंसक कर दिया है।

शब्द ऐसे जी के बोले जाएँ
मदिरा बोल देने मात्र से
पूरी सभा मदहोश हो जाए।

✍️ चिराग़ जैन

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