सफ़र
आगे बढ़नेवाला हर पैर अपने ही दूसरे पैर को पीछे छोड़ता है। अगर पीछेवाला पैर स्वयं आगे आने की बजाय दूसरे पैर की निंदा में लग जाएगा तो सफ़र वहीं रुक जाएगा।
✍️ चिराग़ जैन
आगे बढ़नेवाला हर पैर अपने ही दूसरे पैर को पीछे छोड़ता है। अगर पीछेवाला पैर स्वयं आगे आने की बजाय दूसरे पैर की निंदा में लग जाएगा तो सफ़र वहीं रुक जाएगा।
✍️ चिराग़ जैन
पीर से कह दो
मुझे आँसू पचाना आ गया है
अब किसी आघात से घायल नहीं हो पाऊंगा मैं
प्यास को अपने पसीने से बुझाना आ गया है
दोपहर की धूप से बिल्कुल नहीं घबराऊंगा मैं
भाग्य के दरबार से संत्रास लेकर लौट आया
आस के आवास से उपहास लेकर लौट आया
मैं स्वयं में इक नया विश्वास लेकर लौट आया
अब किसी के सामने झोली नहीं फैलाऊंगा मैं
अब समस्या भी मुझे भयभीत कर सकती नहीं है
नियति अब कुछ भी मेरे विपरीत कर सकती नहीं है
हार ने जो कर दिया, वह जीत कर सकती नहीं है
युध्द के परिणाम पर हर हाल में मुस्काऊंगा मैं
आपदा में धीर का व्यवहार करना आ गया है
मुस्कुरा कर दर्द का उपचार करना आ गया है
अब मुझे हर वार को स्वीकार करना आ गया है
डूब कर भी धार के उस पार तो लग जाऊंगा मैं
✍️ चिराग़ जैन
राह कितनी भी कठिन हो, हौसला मत छोड़ देना
यह नियत है, हर डगर के अंत में मंज़िल मिलेगी
जो सफ़र पूरे हुए हैं, उन सभी का हाल पूछो
हर विजय की राह हर युग में बहुत बोझिल मिलेगी
राम होने के लिए वन-वन भटकना ही पड़ेगा
भाई की हत्या बिना सुग्रीव निष्कासित रहेगा
जो दशानन के सिंहासन पर सुशोभित हो गया है
वह विभीषण वंशहंता हो के अभिशापित रहेगा
वीर लक्ष्मण की कथाएँ जब खंगालेगा कोई तो
राजमहलों के सुखों में घुट रही उर्मिल मिलेगी
जंगलों को छाँट कर चाहे नगर निर्माण कर लें
रण बिना पूरा हुआ क्या, पांडवों की जीत का पथ
द्यूत, लाक्षागृह, कठिन वनवास और फिर दास जीवन
हर क़दम जर्जर हुआ है न्याय की उम्मीद का रथ
मौन रहकर भी समय को काटना चाहा कभी तो
कीचकों के रूप में निश्चित कोई मुश्किल मिलेगी
भोर की पहली किरण का मार्ग अंधियारा रहेगा
रात के अंतिम पहर को दीप की झिलमिल मिलेगी
प्रेम को सारे ज़माने की घृणा सहनी पड़ेगी
नफ़रतों को हर क़दम पर प्यार की महफ़िल मिलेगी
जिंदगानी के सफ़र में मौत का साया रहेगा
मौत को मंज़िल कहा तो, मौत भी तिल-तिल मिलेगी
✍️ चिराग़ जैन
ओ समय! जब तू मेरे विपरीत चलकर थक चुकेगा
तब तुझे कुछ देर मेरे साथ भी चलना पड़ेगा
जिस दीये के भाग्य में घी और बाती आ गई है
उस दीये को आज सारी रात भी जलना पड़ेगा
सत्य के तप की परीक्षा जब कभी प्रारब्ध लेगा
तब महाश्मशान तक प्रारब्ध ख़ुद भी जाएगा ही
सत्य तो हर इक चुनौती झेल ही लेगा नियति की
भाग्य लेकिन नित नया दुःख ढूंढ़कर तो लाएगा ही
जब किसी के वक्ष पर तू मूंग दलने जाएगा तो
ख़ुद तुझे ही मूंग अपने हाथ से दलना पड़ेगा
ओ समय! जब तू मेरे विपरीत चलकर थक चुकेगा
तब तुझे कुछ देर मेरे साथ भी चलना पड़ेगा
प्रश्नचिह्नों ने स्वयं ही वक्रता का दंश झेला
उत्तरों ने पूर्णता पाई सरल रेखा बनाकर
जिस किसी की कीर्ति को विषपात्र सौंपा था समय ने
ग्लानि धोता फिर रहा उनकी अमर गाथा सुनाकर
जानकी तो अग्निपथ को पार कर लेगी सहज ही
किन्तु युग को उस अगन के ताप में जलना पड़ेगा
ओ समय! जब तू मेरे विपरीत चलकर थक चुकेगा
तब तुझे कुछ देर मेरे साथ भी चलना पड़ेगा
राम का वनवास, सीता का विरह, उर्मिल के आँसू
तू अवध की देहरी पर और पीड़ा क्या रखेगा
सुत, पितामह, तात, अग्रज खो चुका कौन्तेय रण में
पाण्डवों के द्वार पर यम और क्रीड़ा क्या रचेगा
दूसरों को राह में काँटे बिछाने के लिए तो
ख़ुद तुझे भी कंटकों के रूप में ढलना पड़ेगा
ओ समय! जब तू मेरे विपरीत चलकर थक चुकेगा
तब तुझे कुछ देर मेरे साथ भी चलना पड़ेगा
✍️ चिराग़ जैन
उथल-पुथल सी मची हुई है
हल जीवन को रौंद रहा है
शायद ईश्वर की आँखों में
फिर से सावन कौंध रहा है
जितना ज़्यादा जोता जाए,
उतना सृजन निराला होगा
जब-जब खेत चुभन झेलेगा,
तब-तब ही हरियाला होगा
मिट्टी के कण-कण को निर्मम, दो बैलों के खुर कूटेंगे
फाल निरंतर चोट करेगी, परतों के तन-मन टूटेंगे
जिनमें फलने की इच्छा हो, उन बीजों को गड़ना होगा
तब इस धरती के दामन में आशा के अंकुर फूटेंगे
माटी का तन सीला होगा,
धरती का मुँह काला होगा
जब-जब खेत चुभन झेलेगा,
तब-तब ही हरियाला होगा
दिन भर अम्बर आग उगलता, तब आती है शाम सलोनी
फिर सूरज के छिप जाने को, हम कह देते हैं अनहोनी
लेकिन ऐसी हर अनहोनी केवल आँखों का धोखा है
दिन से किस दिन रात रुकी है, रातों ने कब दिन रोका है
कुछ पल रात बितानी होगी,
फिर भरपूर उजाला होगा
जब-जब खेत चुभन झेलेगा,
तब-तब ही हरियाला होगा
✍️ चिराग़ जैन