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गुनाह

सज़ाओं में मैं रियायत का तलबदार नहीं क़ुसूरवार हूँ, कोई गुनाहगार नहीं मैं जानता हूँ कि मेरा क़ुसूर कितना है मुझे किसी के फ़ैसले का इन्तज़ार नहीं ✍️ चिराग़...

बनिये

बुझा दें प्यास औरों की वो मिट्टी के घड़े बनिये रहे अन्तस् में कोमलता भले बाहर कड़े बनिये हमारा क़द हमारी भावनाओं से निखरता है भले संख्या में कम हों हम मगर दिल के बड़े बनिये नहीं ऐसा नहीं हम लोग केवल दान करते हैं हक़ीक़त ये है हम प्रतिभाओं का सम्मान करते हैं हमें भगवान बनने...

अपना-अपना शऊर था

सरे-बज़्म मैं रुसवा हुआ, यही दौर का दस्तूर था मैं ये बाज़ियाँ न समझ सका, मिरी सादगी का क़ुसूर था तूने ग़म में ख़ुशियाँ तबाह कीं, मैंने हँस के दर्द भुला दिये ये तो अपना-अपना रिवाज़ था, ये तो अपना-अपना शऊर था तुझे जिस्म से ही गरज़ रही, मिरा जिस्म तेरी हदों में था मिरी रूह...

गुलशन

मैंने गुलशन को कई बार सँवरते देखा हर तरफ़ रंग का ख़ुश्बू का समा होता है पंछियों की चहक सरगम का मज़ा देती है चांदनी टूट के गुलशन में उतर आती है धूप पत्तों को उजालों से सजा देती है कोई अल्हड़, कोई मदमस्त हवा का झोंका शोख़ कलियों का बदन छू के निकल जाता है इस शरारत से भी...

मुझे तुम भूल सकते थे

फ़ज़ाई रक्स होता तो मुझे तुम भूल सकते थे तुम्हारा अक्स होता तो मुझे तुम भूल सकते थे तुम्हारी चाह हूँ, आदत, इबादत हूँ, मुहब्बत हूँ महज इक शख़्स होता तो मुझे तुम भूल सकते थे ✍️ चिराग़...
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