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सार्थकता

सच बोलने की भी जो हिम्मत जुटा न सके ऐसी निरी खोखली जवानी किस काम की शोषण को देख नहीं लहू में उबाल आए बोलो ऐसी ख़ून की रवानी किस काम की लाज, प्रेम, करुणा की नमी यदि सूख जाए भला फिर आँख बिन पानी किस काम की जिसके निधन पे न चार नैन नम हुए ऐसे आदमी की ज़िन्दगानी किस काम की...

मूल से कटकर

एक दिन पीपल के पत्तों को हवा ने बरगलाया! फिर शरारत से भरे लहजे में उनका गात छूकर कान में यूँ फुसफुसाया- “तुमको अंदाज़ा नहीं क्या रूप है तुमको मिला इस नाकारा पेड़ की शोभा के तुम आधार तुम जो चाहो तो हवाएँ ले चलें तुमको दूर परियों के सुनहरे देस अम्बर पार! ये ख़नकती...

पत्थर को भी तरते देखा

हमने सूरज को यहाँ डूब के मरते देखा और जुगनू से अंधेरों को सँवरते देखा तूने जिस बात पे मुस्कान के पर्दे डाले हमने उसको तेरी आँखों में उतरते देखा एक लमहे में तेरे साथ कई रुत गुज़रीं तेरे जाने पे मगर वक़्त ठहरते देखा लोग कहते हैं बस इक शख़्स मरा है लेकिन क्या किसी ने वहाँ...

अर्थ बदल के देख

सूरज जैसा जल के देख सोच में मेरी ढल के देख मुझसे तेज़ निकल के देख अपनी सोच बदल के देख हाला तेरे अंतस् की यहाँ-वहाँ न छलके देख अगुआई क्या होती है मेरे आगे चल के देख फिर से तेरी बात चली फिर से आँसू ढलके देख राम लिखा और तैर गए पत्थर होकर हल्के देख पायल मौन चली आई होंठ...

प्रभु की वन्दना

नानक, कबीर, महावीर, पीर, गौतम को पंथ-देश-जातियों का नाम मत दीजिए जिनने समाज की तमाम बेड़ियाँ मिटाईं उन्हें किसी बेड़ी का ग़ुलाम मत कीजिए मन के फ़कीर अलमस्त महामानवों को रूढ़ियों से जोड़ बदनाम मत कीजिए प्राणियों के प्रति प्रेम ही प्रभु की वन्दना है भले किसी ईश को प्रणाम मत...
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