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लाॅकडाउन

घर पर रहोगे, तो रहोगे

जिस घर के सपने देखे थे, आओ कुछ दिन उस घर में सपने देखें

यह एकांतवास नहीं, तपस्या है

कवि सम्मेलनों को कोरोना से नुक़सान हुआ है, कविता को नहीं

आपदा की इस घड़ी में “ख़ुद को भी छूने से बचें”

कर्फ्यू खुलते ही सबको आधार कार्ड का फोटो बदलवाने के लिए लाइन में लगना पड़ेगा क्योंकि 21 दिन में तो असली चेहरे निकल ही आएंगे!

✍️ चिराग़ जैन

नृत्य : हर्ष का उत्कर्ष

सृष्टि के समस्त नाद की अनूदित कृति है नृत्य। सुर के अनुरूप गति, ताल के अनुरूप थाप, अर्थ के अनुरूप मुद्रा और भाव के अनुरूप भंगिमा; इन सबको एक साथ साधने का कौशल है नृत्य। नर्तक नटराज की प्रतिकृति है। शब्द से भंगिमा तक की यात्रा का सारथी नर्तक है।
देह के एक-एक अंग को अलग-अलग करके एक ही लय ताल में थिरकाना नर्तक का कौशल है। भृकुटि, नेत्र और दृष्टि… तीनों अलग-अलग होकर एक साथ नाचने लगती हैं। अधर, कपोल, ग्रीवा, कंधे, वक्ष, भुजाएँ, कलाई, हथेली, अंगुलियाँ, कटि, नितम्ब, चरण… सब नाचते हैं… विलग किन्तु एकाकार। मन बावरा होकर नाचता है। धरती एड़ी से टकराकर नूपुर में स्वर भरने लगती है।
शेष साज दूर खड़े नर्तक के स्पर्श को तरसते रहते हैं और नूपुर कलाकार के पैर पकड़कर नृत्य का अंग बन जाता है। नूपुर यह संदेश देता है कि आनन्द से एकाकार होना है, तो पैर ही पकड़ने होंगे। यदि पैर न पकड़े जाएँ तो आनन्द के दर्शन सम्भव हैं, स्पर्श नहीं। कृष्ण की बाँसुरी आनन्द उत्पन्न कर सकती है किंतु कृष्ण के नृत्य का अंग नहीं बन सकती। किन्तु मीरा के घुंघरू मीरा के साथ-साथ नाच सकते हैं। क्योंकि बाँसुरी ने अधर चुने और घुंघरुओं ने पग।
नृत्य स्वयं में एक दर्शन है। देह के विदेह होने की झाँकी है। वातावरण में घुल जाने का अनुभव है। मन के भीतर जुट आए उत्स का मूर्त रूप है। झिझक और संकोच से विरक्ति है नृत्य। सहजता का महापर्व है नृत्य। निश्छल हो जाने का उद्घोष है नृत्य। निस्पृह हो जाने की सूचना है नृत्य। आत्मा के अलंकृत और मन के झंकृत हो उठने का पल है नृत्य। हर्ष के उत्कर्ष का अनुवाद है नृत्य। यही कारण है कि जिसने उसे पा लिया, वह नाचने लगा। नाचने के लिए कुछ पा लेने की ख़ुशी; न्यूनतम अर्हता है। मीरा ने पा लिया तो वह नाचने लगी। राधा ने पा लिया तो वह नाचने लगी। सूर, कबीर, रैदास, तुलसी… सब नाचते हुए लोग हैं। यहाँ तक कि लंगड़ा मनसुखा भी नाच उठता है। नाचने के लिए देह चाहिए ही नहीं। नृत्य तो मन में घटित होता है, देह तक तो केवल कम्पन पहुँचता है। जैसे धरती के गर्भ में हुई हलचल का कम्पन भर भूकम्प बन जाता है, किन्तु भूकम्प हलचल का कारण नहीं है। कारण तो अदृश्य है। बहुत गहरे, मन की भीतरी परतों में।
यही कारण है कि जब कोई प्रेम में होता है तो मन की इस हलचल का असर चेहरे पर दिखाई देने लगता है। फिर स्वयं प्रेमी भी किसी तरह इस असर को रोक नहीं सकता। हलचल हुई है तो भूकम्प का आना तय है। मन नाच उठा है तो देह का थिरकना अवश्यम्भावी है। इसे रोकने का कोई उपाय नहीं है।
बरसात होती है तो वृक्ष नाचने लगते हैं। बादल घिरते हैं तो पवन की थिरकन दिखाई देती है। समुद्र लहर-लहर नाचता है, झीलें, नदियाँ… सब नृत्यमय हैं। मरुस्थल भी नाचता है। पर्वत जड़ होकर भी वादियों में नृत्य करता प्रतीत होता है। झरने गाते हुए नाचते हैं। इन सबका नाचना ही प्रकृति के स्वास्थ्य का द्योतक है। रुग्ण व्यक्ति नाच नहीं सकता।
नाचने के लिए स्वस्थ होना ही पड़ेगा और स्वस्थ बने रहने के लिए नाचना ही होगा।

✍️ चिराग़ जैन

शंकर

जो जीवन को तीर्थ बना ले तीर्थंकर हो जाता है
क्रोध चढ़े सिर पर तो मानव प्रलयंकर हो जाता है
जग की पीर पचाकर जग का हित कर पाना मुश्किल है
जो विष पीकर भी जीवित हो, वो शंकर हो जाता है

✍️ चिराग़ जैन

मतदान क्यों ज़रूरी है

राजनीति किसी भी दल की हो, उसकी बदतमीज़ी जनता की निष्क्रियता के बल पर ढिठाई बनने लगती है। भारतीय लोकतंत्र के वर्तमान स्वरूप में ‘मतदान’ ही एकमात्र अस्त्र है जो जनता के पास है। शेष तंत्र से हताश होकर इस अस्त्र को भी नष्ट कर देना, भ्रष्टाचारियों को बढ़ावा देने जैसा है।
जिस क्षेत्र की जनता पूर्ण मतदान कर देगी, उसकी अभिरुचियों और आकांक्षाओं को अनदेखा करना किसी भी दल के लिए असंभव होगा। मध्यमवर्ग की ज़रूरतें किसी भी राजनैतिक दल की वरीयता सूची में इसी कारण नहीं शामिल हो पातीं क्योंकि मध्यमवर्गीय नागरिक मतदान प्रक्रिया से सर्वाधिक उदासीन हैं। राजनीति हमें लोकतंत्र से बाहर करना चाहती है, ताकि अपने कैडर और कार्यकर्ताओं के वोट से ही विधानसभाओं और संसद की सूरत तैयार हो सके। आम मतदाता यदि वोटिंग की प्रक्रिया से न जुड़ा तो उसकी ओर किसी का ध्यान न जाएगा।
इस देश में, आयकर देनेवालों से किसी सरकार को कोई फ़र्क नहीं पड़ता, इसीलिए बजट बनाते समय आयकर देनेवालों को ही घोड़े से खच्चर बनाया जाता है। इस देश में नियमों का पालन करनेवाले भी सरकार के किसी काम के नहीं हैं, इसीलिए पूरी न्याय व्यवस्था अपराधियों के बचाव में जुट जाती है और पीड़ित को सिद्ध करना पड़ता है कि उसके साथ अपराध हुआ है।
लेकिन इस देश में वोट देनेवाले से हर सरकार को फ़र्क़ पड़ता है, इसीलिए झुग्गियों की पीड़ा हर पार्टी सुन पाती है और हाउस टैक्स भरनेवाला बेचारा दफ़्तरों के चक्कर लगा-लगाकर टूट लेता है; इसीलिए अनधिकृत कॉलोनियों को नियमित किया जाता है और बिल्डरों को पूरी क़ीमत चुकानेवाला नागरिक किराये के मकान में रहकर, अदालतों के चक्कर काट रहा है। वोट को अनावश्यक समझोगे तो राजनीति के लिए अनावश्यक हो जाओगे। इस देश के लिए न सही, लोकतंत्र के लिए न सही; अपने अस्तित्व के लिए ही सही, वोट ज़रूर डालें।
इससे पहले कि लोकतंत्र फीका हो जाए, अपनी उंगली पर नीला निशान लगवा आओ।

✍️ चिराग़ जैन

वक़्त

दिल बच्चा है; सपनों के संग पिकनिक करता रहता है
बूढ़ा एक दिमाग़ हमेशा चिकचिक करता रहता है
वक़्त; जिसे तुम पूरी दुनिया का सरताज समझते हो
मेरी इक दीवार घड़ी में टिकटिक करता रहता है

✍️ चिराग़ जैन

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