Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
ओ ईश्वर कहलानेवाले
सारा विश्व बनानेवाले
क़िस्मत के पर्दे में छुपकर
सारा खेल रचानेवाले
अपना नाटक ख़ुद ही खेले मानव को इतना अवसर दे!
कर पाए, तो इतना कर दे!
तेरी मर्ज़ी होती है तो हम इस धरती पर आते हैं
तेरी मर्ज़ी से जीते हैं, तू कहता है, मर जाते हैं
तेरे हाथों की कठपुतली
जैसे चाहा वैसे उछली
पल भर को ढीली भी कर दे
हर इक कठपुतली की सुतली
एक दफ़ा पुतलों की डोरी, पुतलों के हाथों में धर दे
कर पाए, तो इतना कर दे!
सुनते हैं तूने ही सारी दुनिया को वरदान दिए हैं
कहने को इक जीभ बनाई, सुनने को दो कान दिए हैं
आवाज़ें सुंदरतम भर दीं
साँसों तक में सरगम भर दी
हर ख़ामोशी के ज़ख़्मों में
तूने सुर की मरहम भर दी
जो मन में ताण्डव करते हैं, उन शब्दों को भी तो स्वर दे
कर पाए तो इतना कर दे!
हो सकता है ऐसा हो तो, हम जीवन को दुःख से भर लें
हो सकता है यह सब कुछ हम शायद तुझसे बेहतर कर लें
या तो मन से जी लेने दे
या फिर मन से मर लेने दे
जो होगा देखा जाएगा
हमको मन की कर लेने दे
सुख-दुख जो भी हो, वो होगा खुद हासिल करने का वर दे
कर पाए तो इतना कर दे!
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का आम चुनाव सामने है। यह संभवतः पहला ऐसा आम चुनाव है जिसमें मीडिया से अधिक प्रभाव सोशल मीडिया का है। अब से पहले राजनीति में एक जुमला चलता था कि जनता की याद्दाश्त बहुत कमज़ोर है। लेकिन अब राजनीति यह समझ गई है कि मोबाइल की याद्दाश्त कमज़ोर नहीं होती। इसी कारण राजनीति ने न केवल ढिठाई की कोटिंग मज़बूत करवा ली है, बल्कि भाषा का स्तर भी इतना गिरा लिया है कि जनता उनकी बातों के तथ्यों तक पहुंचने की बजाय, बातों के तरीकों में उलझ कर रह जाए। हमें फ़ख़्र है कि हमें जिन लोगों को क़ानून बनाने के लिए नियुक्त करने जा रहे हैं वे आधिकारिक बैठक में जूते से अपने सहकर्मी की पिटाई करते हैं। हमें गुमान है कि जिन लोगों के हाथ में सभ्यता की बागडोर थमानी है वे सार्वजनिक रूप से माँ-बहन की गाली बकते देखे जाते हैं। हम जिनसे देश को समृद्ध बनाने की उम्मीद कर रहे हैं वे अपने कुर्ते की जेब फाड़ कर जनता के सम्मुख वोट की भीख मांगते देखे गए हैं। ज़िनको वचन निभाने की मिसाल क़ायम करनी थी, वे ओछे स्वार्थों के लिए बेशर्मी से दल बदलते फिर रहे हैं। राष्ट्रसेवा की आड़ में राजनीति का धंधा करने वाले सियारों का असली रंग तब सामने आता है जब उन्हें उनकी पार्टी चुनाव लड़ने के लिए टिकट नहीं देती। जनता के सम्मुख चुनावी रैलियों में प्रतिद्वंदियों की चरित्र हत्या की जाती है और फिर सरकार बनाने के जोड़-तोड़ में उन्हीं चरित्रहीन लोगों से गलबहियां डाली जाती हैं। बेशर्मी के साथ चुने हुए प्रतिनिधि ख़रीदे जाते हैं और हम लोकतंत्र की अरथी पर सजी हुई मूल्यों की लाशों को सरकार मानने लगते हैं। हमारी जनता पन्द्रह लाख, बहत्तर हज़ार और मुफ्त राशन की मरीचिका में अपना वोट वायदों के रेगिस्तान में फेंक आती है और राजनीति के गिद्ध वोटों के चीथड़ों को नोच नोच कर अपना पेट भरते रहते हैं। हमारे चुनावों में या तो अंतरिक्ष की उपलब्धियां गिनाई जाती हैं या फिर हवाई जुमले उछाले जाते हैं। यह हमारे नेताओं की ईमानदारी है कि चुनाव ख़त्म होते ही वे जनता को बता देते हैं कि उनके सारे वायदे केवल चुनावी जुमले थे। इस बार भी यही जुमले उछलेंगे और हम टेलिविज़न की बहस देखकर अपने राहुल या अपने मोदी के दांव देखकर ख़ुश होते रहेंगे। हम मोदी, राहुल, माया, अखिलेश, ममता, ओवैसी, उद्धव, नीतीश, शिवपाल, पासवान, अब्दुल्ला, महबूबा, नायडू, केजरीवाल या चौटाला की अंधभक्ति में देशभक्ति बिसरा चुके हैं। हमें किसी अभिनेता या अभिनेत्री की शक्ल दिखाकर प्रभावित किया जाएगा और हम हो जाएंगे। एक पार्टी दिल्ली के पुरबियों को साधने के लिए भोजपुरी के एक गायक को प्रदेश अध्यक्ष बनाती है और पुरबियों की वोट साध लेती है। दूसरी पार्टी पंजाबी वोटर को ख़ुश करने के लिए गणित भिड़ाती है और पंजाबी वोट साध लिया जाता है। जिस देश में जातीय आधार पर राजनैतिक दल बनाना अपराध है, उस देश में टीवी चैनल सरेआम जातीय गणित और चुनाव के जातीय समीकरणों पर घंटों चर्चा करते हैं और हमारे न्यायालय आँख पर पट्टी बांधे बैठे रहते हैं। हमारे लोकतंत्र में सबके गिरेबान चाक हैं। जनता को अपने टुच्चे लालच की साध में राजनेताओं के शिकंजे में स्वयं फंसने में कोई आपत्ति नहीं है तो राजनीति के इस नंगे नाच पर आक्षेप करना जनता को भी कतई शोभा नहीं देता।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Muktak, Poetry, Unpublished
आशंका से जीत गई आशा की रेखा
धीरज ने बदला अपनी क़िस्मत का लेखा
दहशत के अंधियारे ने दम तोड़ दिया है
दुनिया ने पश्चिम से सूरज उगता देखा
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished
पुष्प के मकरंद से महकी हवा तो
बन्द कलियों की विकलता बढ़ गई है
अधखुली-सी इक कली धीरज गँवाकर
पुष्प से प्रतियोगिता पर अड़ गई है
पंखुरी दर पंखुरी खिलना उचित है
डाल ने दिन-रात समझाया कली को
गंध निश्चित ही बिखरनी है हवा में
कौन-सी जल्दी पड़ी है बावली को
होड़ तज कर गंध को सींचो हृदय में
जो बसी भीतर, वही बाहर गई है
पुष्प के मकरंद से महकी हवा तो
बन्द कलियों की विकलता बढ़ गई है
जब तलक संघर्ष है, जीवन तभी तक
राह की कठिनाइयों का मान करना
घुल गया मकरंद जिसका भी हवा में
उस कुसुम के धैर्य का सम्मान करना
साधना पथ पर नहीं विचलित हुआ जो
ख्याति उस इंसान की घर-घर गई है
पुष्प के मकरंद से महकी हवा तो
बन्द कलियों की विकलता बढ़ गई है
मंद बहकर ही नदी सरगम बनेगी
वेग तो तटबंध को ही तोड़ देगा
रूह को महकाएँगी मंथर हवाएँ
और अंधड़ देह को झकझोर देगा
जो नियति की चाल से आगे बढ़ी है
वह कली अल्पायु में ही झर गई है
पुष्प के मकरंद से महकी हवा तो
बन्द कलियों की विकलता बढ़ गई है
ताप सहकर ही बनेगी वज्र, माटी
फिर भला दहती लपट से रूठना क्या
कर्म का अधिकार ही हमको मिला है
स्वप्न की फिर सर्जना क्या, टूटना क्या
हठ पकड़ बैठा कोई जब भी नियति से
भाग्य की त्यौरी उसी क्षण चढ़ गई है
पुष्प के मकरंद से महकी हवा तो
बन्द कलियों की विकलता बढ़ गई है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished
प्रेम चलकर आएगा जब तक प्रतीक्षा की गली में
तब तलक संसार भर में प्रीति जीवित रह सकेगी
है समर्पण जब तलक तैयार सब कुछ हारने को
उस घड़ी तक भावना की जीत जीवित रह सकेगी
जब तलक बदली स्वयं बेचैन होकर झर न जाए
तब तलक चातक उसे तकता रहेगा प्यास लेकर
बदलियों की शुष्क लापरवाहियों को क्या पता है
कण्ठ में अटके हुए हैं प्राण इक विश्वास लेकर
मृत्यु से पहले बरस जाओ, पिघल जाओ अगर तुम
तो प्रणयगत साधना की रीति जीवित रह सकेगी
उम्र काटी है शिला ने भी यही विश्वास रखकर
एक दिन मझमें विधाता प्राण भर देंगे परस कर
बेर चख-चख कर कोई शबरी प्रतीक्षारत रही है
इस अभागे प्रेम को स्वीकार लेंगे राम हँसकर
चेतना में प्रीत के अमरत्व का उल्लास भर दो
देह भी हर नियति के विपरीत जीवित रह सकेगी
✍️ चिराग़ जैन