Chirag Jain Writings, Diary, Kohra Ghanaa Hai, Prose
भाषा किसी भी व्यक्तित्व का प्रथम विज्ञापन है। आप अपनी बात कहने के लिए जिस शब्दावली का प्रयोग करते हैं, वह आपकी मूल प्रवृत्ति की द्योतक है।
राजनैतिक भाषणों की गाली-गलौज, अराजकता, अभद्रता तथा अशिष्टता के सैंकड़ों उदाहरणों से यूट्यूब पटा हुआ है। निरर्थक वक्तव्य, कुतर्क, अश्लीलता और मूर्खतापूर्ण वक्तव्यों को रेखांकित करके मीडिया नकारात्मकता को हतोत्साहित करता है। यह अच्छी बात है। ट्रोलिंग कि माध्यम से भी ऐसी पोस्ट्स ख़ूब वायरल हो जाती हैं। लेकिन मुझे एक भी पोस्ट आज तक ऐसी नहीं मिली जो भाषा का स्तर पर सभ्य तथा शिष्ट लोगों की प्रशंसा में लिखी गयी हो। नकारात्मकता को हतोत्साहित करने में जितनी ऊर्जा व्यय होती है उसकी आधी ऊर्जा भी यदि सकारात्मकता के प्रोत्साहन में निवेश की जाए तो पूरा परिदृश्य बदल जाएगा।
जैसे प्रत्येक दल में बड़बोले, अशिष्ट और गालीबाज़ों की उपस्थिति है वैसे ही प्रत्येक दल में शिष्ट, विनम्र, शालीन तथा सभ्य नेताओं की भी उपस्थिति है। यह हमारा दुर्भाग्य है कि हम इन नेताओं के सद्गुणों पर चर्चा करते ही नहीं हैं।
बात ये सभी लोग अपनी-अपनी पार्टी के एजेंडे के अनुरूप ही कहते हैं, लेकिन बात कहने का इनका सलीक़ा उल्लेखनीय है।
दो दशक के सामाजिक जीवन, कवि-सम्मेलनीय यात्राओं और लपेटे में नेताजी के सैंकड़ों एपिसोड करने के कारण अनेकानेक राजनैतिक व्यक्तित्वों से भेंट हुई है। इनमें से कुछ लोगों की वक्तृत्व कला तथा भाषा शैली मन मोह लेती है।
मैं पुनः स्पष्ट कर दूँ कि इनमें से किसी भी नेता के राजनैतिक विचार पर चर्चा न करके मैं केवल इनके भाषा संस्कार की बात कर रहा हूँ।
इस क्रम में पहला नाम है श्री सुधांशु त्रिवेदी का। रामचरितमानस की चौपाइयों से लेकर हिंदी की सैकड़ों कविताएं, उर्दू के हज़ारों अशआर तथा संस्कृत के अनेक श्लोक इन्हें कंठस्थ हैं। किसी भी विषय पर अपनी बात रखते समय ये इन काव्यांशों से अपनी बात को पुष्ट करते हैं। भाषा का संस्कार ऐसा है कि शब्द सधे हुए तथा प्रभावी वाक्य विन्यास के साथ उपस्थित होते हैं।
ठीक इसी तरह श्रीमती रागिनी नायक को भी न जाने कितनी ही नज़्में, ग़ज़लियात, कविताएं, चौपाइयां और श्लोक रटे हुए हैं। और साहित्यिक समझ इतनी परिपक्व है कि संदर्भ उपस्थित होते ही बिल्कुल परफेक्ट पंक्तियाँ उद्धृत करने में ये दक्ष हैं। स्वर को कब कितना ऊँचा करना है और कब खिलखिलाकर चर्चा के तनाव को ग़ायब कर देना है -इसकी समझ रागिनी जी को भरपूर है।
एक वक्ता के रूप में सुधांशु जी और रागिनी जी; दोनों ही की एक ख़ासियत मुझे बहुत प्रभावित करती है और वह यह कि ये दोनों ही लोग सामनेवाले के अखाड़े में उसके स्तर पर उतरकर दाँव लगाना जानते हैं लेकिन जिस भी अखाड़े में उतरते हैं उसे बहुत जल्दी अपने स्तर तक ले आते हैं।
श्री शत्रुघ्न सिन्हा भी हर बात का उत्तर किसी काव्योक्ति से देकर लाजवाब कर देते हैं। उनका अध्ययन कोष बहुत समृद्ध है। और सबसे बड़ी बात यह कि वे अशआर को अशआर की ही तरह पढ़ना जानते हैं।
ऐसे ही एक वक्ता है श्री राकेश सिन्हा। कड़वे सवालों का उत्तर देते समय भी उनकी मिठास कभी ग़ायब नहीं होती। श्री सुधांशु मित्तल भी बड़े धैर्य के साथ विरोधी की बात सुनते हैं फिर मुस्कुराते हुए अपने राजनैतिक अनुभव के पिटारे से कोई संदर्भ तलाशकर धीमी आवाज़ में पुख्ता बात कहते हैं। श्री मनीष सिसोदिया भी असभ्यता के दायरे से दूर रहकर अपनी बात रखने में परिपक्व हैं।
तर्क की कसौटी पर श्री गौरव वल्लभ, श्री कन्हैया कुमार, श्री आलोक शर्मा, श्री कपिल सिब्बल, श्री श्रीकांत शर्मा, श्री शाहनवाज़ हुसैन, श्री अससुद्दीन ओवैसी भी विषय को भटकाने की बजाय टू द प्वाइंट उत्तर देते हैं, किन्तु इन सबको कई जगह धीरज खोते देखा जा चुका है। असभ्य न भी हों तो इनकी आवाज़ से इनके अनियंत्रण को भाँप लिया जाता है।
भारतीय राजनीति ने पंडित अटल बिहारी वाजपेयी और सुषमा स्वराज सरीखे वक्ताओं के उदाहरण प्रस्तुत किये हैं। लालू प्रसाद यादव जैसा हास्यबोध; आनन्द शर्मा जैसी समझ; शशि थरूर जैसी व्याख्या; के एक गोविंदाचार्य जैसी विद्वत्ता; राजनाथ सिंह जैसा ठहराव और मीरा कुमार जैसी मृदुता भारतीय राजनीति की पहचान रही है।
यदि हमने अच्छे लोगों की चर्चा करना शुरू कर दिया तो भारतीय राजनीति का वह दौर फिर लौट सकेगा।
✍️ चिराग़ जैन
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एक एंकर स्टूडियो में नशा करके ख़बर पढ़ रहा था तो पूरे देश ने उसका मज़ाक़ बनाकर रख दिया। यह सरासर बदतमीज़ी है। ऐसे किसी का मज़ाक़ बनानेवाले समझ लें कि मज़ाक़ बनाने का अधिकार केवल मीडिया के पास है। वह लोकतंत्र, न्यायपालिका, जनभावना, चुनाव प्रक्रिया, राजनीति और यहाँ तक कि किसी की मुर्दनी तक का मज़ाक़ बनाने के लिए स्वतंत्र है।
रिया चक्रवर्ती की निजता, सुशांत राजपूत की आत्महत्या, आर्यन खान की गिरफ्तारी, शशि थरूर की निजी ज़िन्दगी, अभिषेक बच्चन की शादी, सुनील दत्त की शवयात्रा… सबको बेचकर खाने का अधिकार है मीडिया के पास।
कोसी नदी में कब बाढ़ आएगी और क्या तबाही मचाएगी इसको लेकर तीन-चार दिन तक शोर मचता है और फिर अगली ख़बर चलते ही कोसी का गला सूख जाता है। अब टकराएगा तूफान, ऐसे आएगा तूफान, यमुना की बाढ़ में डूब रही है दिल्ली, देश में केवल दो दिन का कोयला बचा है शेष, इतने बजे टकराएगा धूमकेतु, इस तारीख़ को तबाह हो जाएगी धरती… यह सब मज़ाक़ देश के मनोरंजन के लिए थोड़े ही किये जाते हैं। ये तो कवरिंग फायर की तरह चलने वाली ख़बरें हैं जिनकी आड़ में ‘जाने क्या क्या’ जनता की आँख में धूल झोंककर पार कर दिया जाता है।
यह मज़ाक़ देशहित में किया जाता है ताकि देश अनावश्यक तनाव से बचा रहे। इतने राष्ट्रभक्त पत्रकारों का मज़ाक़ उड़ाने का अधिकार किसी को नहीं दिया जा सकता।
नशा किया तो क्या अपराध हो गया। पहली बात तो यह कि अगले ने दिल्ली या यूपी में शराब पी थी। अगर बिहार या गुजरात में पी होती तब बोलते। तब कह सकते थे कि अपराध हुआ है। आपको भाई का डेडिकेशन ही समझ नहीं आता। इत्ती शराब पीने के बाद भी देश की ऐसी-तैसी करने के इस मौक़े पर भाई लड़खड़ाता हुआ स्टूडियो पहुँचा होगा। फिर सारे स्टाफ के सामने न्यूज़रूम में अपनी छाती ठोककर चिल्लाया होगा- ‘आज बुलेटिन तेरा भाई पढ़ेगा!’
ये होती है अपने काम के प्रति निष्ठा। सारे कांग्रेसी चमचे बेचारे राष्ट्रवादी पत्रकार के पीछे पड़ गए हैं। आर्यन की तरह ड्रग्स तो नहीं ली ना दीपक जी ने। आपने यह तो देख लिया कि वे लड़खड़ाती हुई ज़ुबान से विपिन रावत और वीके सिंह में अंतर नहीं कर पाए… अरे यही तो है सच्चा राष्ट्रवाद। देश का सैनिक हो, केंद्रीय मंत्री हो या फिर सीडीएस ही क्यों न हो… माननीय दीपक जी सबको एक नज़र से देखते हैं। और जो उनके माथा पकड़ने का झूठा प्रचार किया जा रहा है वह दरअस्ल सिर झुकाकर शहीदों को नमन किया जा रहा था। आप कांग्रेसी क्या समझेंगे इस भावना को कि सेल्यूट मारने के लिए दीपक जी ने एक नहीं दोनों हाथ अपने माथे तक उठा लिए और इस प्रक्रिया में उन्हें जैसे ही संस्कृति की याद आई उन्होंने दोनों हाथों से सेल्यूट मारते हुए सिर नीचे झुका लिया था। इसे कहते हैं सैनिकों का सम्मान। तुम क्या जानो इस भावना को।
तुम क्या चाहते हो कि इनकी जगह राहुल गांधी से न्यूज़ पढ़वाई जाए। उसे एक वाक्य तो ठीक से बोलना नहीं आता। उसको न्यूज़ स्टूडियो में बैठा दिया तो वो वहाँ भी कुर्ते की जेब फाड़ लेगा। अरे एहसान फरामोशों। अब से पहले ‘ड्रंक न्यूज़ एंकर’ सर्च करने पर गूगल में एक भी भारतीय चेहरा नहीं दिखता था, अब टॉप पर गूगल सर्च में दीपक जी छाए हुए हैं। राष्ट्र का नाम कितना ऊँचा हुआ है। पता-वता कुछ है नहीं; …चले आए हैं माननीय दीपक जी का मज़ाक़ बनानेवाले।
✍️ चिराग़ जैन
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‘आज तक में पेश हैं अभी तक की ख़बरें’ से शुरू हुआ ‘न्यूज़ एंकरिंग’ का सफ़र लड़खड़ाती हुई ज़ुबान में माथा पकड़कर ख़बर पढ़ते न्यूज़ एंकर तक पहुँच गया है।
टीवी पर समाचार पढ़नेवाले समाचार वाचक जब भावना शून्य चेहरे, सपाट स्वर, क्लीन्ड शेव, टाई, कोट जैसे सुनिश्चित गेट-अप में समाचार पढ़ते थे, तब दाढ़ी बढ़ाकर, ख़बर की संवेदना के साथ बदलती भाव भंगिमा और स्वर के उतार-चढ़ाव का कौशल प्रयोग करके सुरेन्द्र प्रताप सिंह ने पत्रकारिता में एक नयी विधा जोड़ दी थी। वे ख़बर को इतनी शिद्दत से महसूस करके पढ़ते थे कि उपहार सिनेमा के अग्निकांड की ख़बर पढ़ते हुए उन्हें हृदयाघात हो गया था। उस रात पत्रकारिता ने संवेदना से हाथ मिलाया था। ये थी ख़बरें आज तक, इंतज़ार कीजिये कल तक…!
…इंतज़ार का वो कल फिर कभी नहीं आया। सुरेन्द्र प्रताप सिंह का यह सूर्यास्त न्यूज़ एंकरिंग की पूरी दुनिया को अंधकार में खड़ा छोड़ गया।
यहाँ से शुरू हुआ वह दौर, जिसने आज न्यूज़ एंकर्स को वीभत्स, अश्लील, असभ्य तथा अमर्यादित बनाकर छोड़ दिया है।
एस पी सिंह की आवाज़ ख़ामोश हुई तो उनके जैसी दाढ़ी बढ़ाकर उन जैसा दिखने का प्रयास करनेवालों ने उनकी तरह बोलने का अभिनय शुरू किया लेकिन मूल संवेदना के अभाव में यह अभिनय बहुत जल्दी ही भौंडा और उबाऊ लगने लगा।
स्वर का जो उतार-चढ़ाव एस पी सिंह के पास था, वह ख़बर की आत्मा से प्राप्त संवेदना से स्वतः उभरता था। लेकिन अंधेरे में खड़े दाढ़ीवान पत्रकारों ने इसे चीख-चिल्लाहट में बदल डाला।
बुलेटिन ‘एक्शन फिल्म’ की तरह रोमांचक बनते गए। टीवी डिबेट में ‘विषय’ के अतिरिक्त सब कुछ दिखने लगा। राजनैतिक दलों ने इन अंधेरे के वासियों को अपनी उंगली थमाई तो ये बेचारे उस उंगली पर झूल गए। अब ये अपने-अपने भाग्य में आई उंगली पर झूलते हुए ख़बर पढ़ने लगे। इस अवस्था में जब ये दल के पक्ष में पींग लेते हैं तो बेहद लिजलिजे दिखने लगते हैं, और जब झूला इनके राजनैतिक आका के विपक्ष में जाता है तो ये असभ्य हो जाते हैं।
पिछले दिनों हमने एक ऐसा भी पत्रकार देखा जिसे उसके राजनैतिक आका ने अपने पक्ष में झूले समेत ज़मीन से आठ-दस फीट ऊपर हवा में टाँक दिया था। और वह वहीं से स्वामिभक्ति का प्रदर्शन करता हुआ दो-ढाई फीट और उछलता हुआ ख़बरें पढ़ता रहा।
हमने ऐसी भी एंकर्स देखी हैं जो तीन सौ ग्राम लिपिस्टिक और एक धड़ी मेकअप पोतकर अपनी आयु से लगभग दोगुनी आयु के राजनेताओं से पूछती हैं कि ‘तुम होते कौन हो इस देश की राजनीति पर बात करनेवाले?’
अपने बुलेटिन को नम्बर वन बनाने की जुगत में किसी की चरित्र हत्या, किसी के सामाजिक अपमान में इन अंधकार-उलूकों को कोई हिचक नहीं होती। अफ़वाह को ‘ख़बर’ कहकर परोसने में इन्हें कोई संकोच नहीं होता। साम्प्रदायिक विद्वेष को हवा देना इनके बाएँ हाथ का खेल है। किसी की निजता में प्रवेश करने में इन्हें लज्जा नहीं आती। और अब तो देश के सर्वाेच्च सैनिक की श्रद्धांजलि की ख़बर पढ़ने की ललक में मद्यपान कर के स्टूडियो पहुँचने के कीर्तिमान भी स्थापित हो गये हैं। टीआरपी का घपला करते हुए ये पहले ही पकड़े जा चुके हैं। कार्यस्थल पर यौन-आचरण के इनके चैट और वीडियो वायरल होते ही रहते हैं। महानायक के घर के निजी उत्सव की कवरेज के समय इन्हें ‘बाक़ायदा’ वाचडॉग से डॉगवाच होते देखा जा चुका है। न जाने किसके इशारे पर ये पूरी प्रजाति एक साथ किसी ख़बर को टिपर से ही ग़ायब करने को तैयार हो जाती है। स्वार्थ और अवसरवाद की सीमा यहाँ तक है कि इनके साथ के ही किसी पत्रकार के साथ अन्याय हो तो भी ये चुपचाप अपने स्वामी की ओर मुँह उठाए पुंछ-ध्वज फहराते रहते हैं।
पत्रकारिता को पत्रकारिता बनाए रखने का दायित्व केवल पत्रकारों के कंधों पर नहीं है, बल्कि जिन दर्शकों की कृपा से इन भौंडे न्यूज़ बुलेटिन्स को नम्बर वन का खि़ताब मिल जाता है, वे भी इस अपराध में बराबर के भागीदार हैं। लेकिन फिर भी यह प्रश्न तो उठता ही है कि जनता की अभिरुचियों के अनुसार बुलेटिन ‘डिज़ाइन’ करते समय क्या कभी पत्रकारिता की आत्मा नहीं जागती।
…तो साहब, यह प्रश्न बेमआनी है। क्योंकि अगर पत्रकारिता के पास आत्मा होती तो राजनैतिक बेताल, विक्रम के सिर पर चढ़कर कहानी न सुना रहे होते।
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हैदराबाद में पुलिस ने बलात्कार के आरोपियों का एनकाउंटर किया। इस घटना पर एक तबक़ा पुलिस को साधुवाद देते हुए यह तर्क दे रहा था कि न्याय व्यवस्था की विफलता के कारण पुलिस का यह क़दम तर्कसंगत है। यह शाबासी इस बात की भी गवाही दे रही थी कि यह एनकाउंटर एक वेल प्लैन्ड इंसिडेंट था।
विकास दुबे एनकाउंटर केस में भी लगभग यही तर्क दिये गये और उन बधाई संदेशों में उत्तर प्रदेश सरकार की भूरि-भूरि प्रशंसा से यह प्रतिध्वित हो रहा था कि पुलिस सरकार के निर्देश पर काम कर रही थी और सरकार में शेरदिल व्यक्ति बैठा है इसलिये अपराधी को ऑन द स्पॉट निपटाया जा सका।
किन्तु हाथरस काण्ड में पुलिस द्वारा किये गये अर्द्धरात्रि शवदाह में पुलिस की ग़लती बताकर सरकार ने कुछ पुलिसवालों को सस्पेंड कर दिया। सरकार ने उस परिवार को मुआवज़ा और सरकारी नौकरी दी जिसने कथित रूप से अपनी ही बेटी की हत्या करके उसका आरोप कुछ ‘बेचारे’ बेगुनाहों पर मढ़ दिया।
सलमान ख़ान को निचली अदालत ने सज़ा सुनाई और चंद घण्टों की भागदौड़ में ही उस ऊँची अदालत ने उसको बरी कर दिया, जिसमें अपील दर्ज कराने में महीनों गुज़र जाते हैं। उस समय यह तर्क दिया गया कि समाजोपयोगी व्यक्ति होने के नाते सलमान ख़ान की रिहाई तर्कसंगत है।
सुशांत सिंह राजपूत की मृत्यु के मामले में उसी समाजोपयोगी व्यक्ति सलमान ख़ान के चरित्र को फ़िल्म जगत् का सबसे बड़ा माफिया, नेपोटिज़्म का पोषक और न जाने किन-किन अलंकारों से सुसज्जित किया गया।
कंगना राणावत के दफ़्तर पर बुलडोजर चला, तब बताया गया कि राज्य सरकार सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग करके निजी द्वेष निकाल रही है। अर्णब गोस्वामी को जेल हुई तो बताया गया कि राज्य सरकार ने पुलिस के कंधे पर रखकर बंदूक चलाई है। निचली अदालत ने अर्णब गोस्वामी की जमानत रद्द की तो पता चला कि न्यायपालिका राज्य सरकार के इशारे पर काम कर रही है। फिर अदालती कार्रवाई की धीमी गति के नियम को तोड़कर कछुआ, खरगोश की तरह दौड़ा और ताबड़तोड़ अर्णब भैया की जमानत ऊँची अदालत से मंज़ूर हो गयी। हम सुप्रीम कोर्ट के प्रति कृतज्ञता से भर गये। हमने न्याय व्यवस्था की तारीफ़ों के पुल बांध दिये।
काफ़ी कन्फ्यूज़न क्रिएट हो गया है। समझ नहीं आ रहा कि-
1) वास्तव में हमारी न्याय व्यवस्था नपुंसक है या महान है?
2) यदि न्यायालय समाजोपयोगी व्यक्ति की पहचान करने में सक्षम है तो फिर न्याय की मूर्ति की आँखों पर पट्टी बांधने के पीछे क्या उद्देश्य है?
3) विकास दुबे के एनकाउंटर पर प्रदेश के मुख्यमंत्री को बधाइयाँ क्यों मिलती हैं? फिर हाथरस में पुलिसवाले क्यों सस्पेंड होते हैं?
4) पुलिस द्वारा क़ानून की धज्जियाँ उड़ाकर एनकाउंटर करना कैसे उचित है?
5) यदि निचली अदालत राज्य सरकार के इशारे पर चल सकती है तो ऊँची अदालतें केंद्र सरकार के इशारे पर क्यों नहीं चल सकतीं?
6) हैदराबाद, कानपुर और हाथरस में पुलिस की मनमानी जस्टिफाइड है, तो मुम्बई में पुलिस की मनमानी अन्याय कैसे है?
7) यदि महाराष्ट्र की राज्य सरकार सरकारी विभागों और संवैधानिक संस्थाओं का प्रयोग अपने हित में कर सकती है तो अन्य प्रदेशों की सरकारें और केंद्र में बैठी सरकारें ऐसा क्यों नहीं कर सकती?
और सबसे महत्वपूर्ण जिज्ञासा- यदि हर बार, हर घटना पर मापदंड बदल जाने हैं तो हमारे देश में लिखित संविधान की व्यवस्था क्यों है?
मैं इस देश के लोकतंत्र से इतनी सी अपेक्षा करता हूँ कि हमारे लिखित संविधान से ऊपर कोई भी न हो। यदि समाज में कोई विकृति व्याप्त हो तो हमारे चुने हुए प्रतिनिधि देश की सबसे बड़ी पंचायत में बैठकर उस विकृति के समाधान हेतु लिखित संविधान में आवश्यक परिवर्तन करें और न्यायपालिका से लेकर कार्यपालिका तक का तमाम तंत्र उसी लिखित संविधान के अनुरूप आचरण करके लोकतंत्र की आत्मा को जीवित रखें। इसके इतर व्यवस्था को जिस भी तरीके से चलाया जायेगा उसका प्रत्यक्ष शिकार भले ही अर्णब हो, कंगना हो या रिया हो… लेकिन परोक्ष रूप से उसका हर वार लोकतंत्र की आत्मा पर ही होगा।
✍️ चिराग़ जैन
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हम घटना और व्यक्ति में अन्तर करना क्यों नहीं सीख पाते। हमारी मान्यता ऐसी क्यों है कि जिसकी एक ग़लती सिद्ध हो गयी है, वह अन्य सब जगह भी ग़लत ही होगा। एक ही व्यक्ति एक जगह सही और दूसरी जगह ग़लत क्यों नहीं हो सकता।
हमारा समाज लम्बे समय से इस रोग से ग्रस्त है कि जिसे हमने नायक मान लिया उसके प्रत्येक कार्य को सही मान बैठे और जिसका एक कृत्य ग़लत हुआ उसके व्यक्तित्व से घृणा कर बैठे।
इसी प्रवृत्ति का दुष्परिणाम है कि जब कोई किसी राजनैतिक निर्णय का विरोध करता है तो बाक़ी सब लोग यह कहने लगते हैं कि कल तक तो तुम अमुक का समर्थन करते थे, आज विरोध कर रहे हो। यही कारण है कि किसी घटना अथवा निर्णय का विरोध या समर्थन करनेवाले को किसी व्यक्ति का विरोधी या समर्थक घोषित कर दिया जाता है।
हाल ही में हुई अर्नब गोस्वामी की गिरफ़्तारी के संदर्भ में उठने वाली आवाज़ से अर्नब, शिवसेना, भाजपा, कांग्रेस, राष्ट्रवाद, वामपंथ या अन्य किसी संज्ञा के पक्ष-विपक्ष की प्रतिध्वनि सुनने के प्रयास में हम भारतीय लोकतंत्र की उस बीमारी को अनदेखा कर रहे हैं जो बड़ी तेज़ी से उभरकर पटल पर आना चाह रही है।
अर्नब गोस्वामी की गिरफ़्तारी इस बात का प्रमाण है कि राजनीति अपने विरोधियों को दबाने के लिए कार्यपालिका का प्रयोग करती है। वहीं सुसाइड नोट में नामज़द होने के बावजूद तीन आरोपियों पर कोई कार्रवाई न होना भी इस बात का प्रमाण है कि रसूखदार लोग राजनैतिक प्रभाव से न्याय की मशीनरी से खिलवाड़ कर सकते हैं।
इस घटना से यह एक बार फिर सिद्ध हुआ है कि पुलिस जाँच में जो अपराधी सिद्ध हुआ है, वह निर्दाेष भी हो सकता है और पुलिस जिसे निर्दाेष क़रार देती है वह अपराधी भी हो सकता है। इस घटना से न तो केवल पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर प्रश्नचिह्न लगा है, न ही केवल राजनीति की कार्यशैली का पर्दाफ़ाश हुआ है। इस घटना से उस कार्यपालिका की ईमानदारी तथा निष्ठा कठघरे में आ खड़ी हुई है, जिसके हाथों में इस लोकतंत्र ने आंतरिक सुरक्षा का दायित्व सौंपा हुआ है।
प्रश्न न तो किसी उद्धव ठाकरे का है न ही किसी संजय राउत का; मुद्दा न किसी अर्नब का है न ही किसी रिया या कंगना का। प्रश्न यह है कि इस देश में सत्ता पर क़ाबिज़ मस्तिष्कों के हाथ में कठपुतली की तरह नाचता तंत्र इस देश के लोक का कितना और कैसा कल्याण कर सकता है? प्रश्न यह है कि इस देश का कोई भी नागरिक किसी राजनैतिक गलियारे की नज़रों में खटकते ही एक पूरी क़ौम का दुश्मन कैसे बना दिया जाता है। प्रश्न यह है कि जब कोई व्यक्ति समस्त राजनैतिक दलों की समान स्वार्थवादी सोच पर सवाल उठाने की कोशिश करता है तब अचानक उसके चरित्र, उसकी राष्ट्रभक्ति, उसका व्यक्तिगत जीवन और उसकी ईमानदारी के विवाद का शोर क्यों मचने लगता है?
एक अभिनेता के रूप में शत्रुघ्न सिन्हा मेरी पसंद या नापसंद हो सकते हैं, किंतु इस आकलन से मेरी उनके राजनैतिक जीवन के प्रति राय का अनुमान क्यों किया जाता है? एक प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी के किसी निर्णय से मैं सहमत या विमत हो सकता हूँ किन्तु इससे उनके व्यक्तित्व के विषय में मेरी राय का आकलन क्यों किया जाता है? मैंने कभी मुनव्वर राणा की शायरी का अनुमोदन किया हो तो इसका यह अर्थ कैसे हो गया कि मुझे उनके विवादित बयानों से भी उतनी ही मुहब्बत होगी?
पुलिस की कार्यशैली से मैं असंतुष्ट हूँ तो इसका यह तात्पर्य कैसे हो गया कि मैं पुलिस रहित समाज का पक्षधर हूँ? न्याय व्यवस्था की धीमी गति और पेचीदा औपचारिकताओं के विरोध में कुछ कहने का यह अर्थ कैसे हो गया कि मुझे न्यायपालिका से रहित अराजक लोकतंत्र चाहिये?
अगर मैं अमुक से नफ़रत नहीं करता हूँ तो इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि मैं उससे प्यार करता हूँ। ‘हाँ’ का अभाव ‘न’ नहीं है। जीत न पाने का अर्थ हार जाना नहीं है। जीवित न होने का अर्थ मर जाना नहीं है।
हम अपने पूर्वग्रहों के कारण जजमेंटल होने के आदी हो गये हैं। समाज की इसी जल्दबाज़ी का लाभ उठाकर राजनैतिक स्वार्थ साधे जा रहे हैं। आपकी एक उक्ति को संदर्भ बनाकर आपके पूरे जीवन और चरित्र का चित्र प्रस्तुत किया जाता है। और मज़े की बात यह है कि वह उक्ति भी राजनीति के तत्कालीन स्वार्थों के अनुरूप बदलती रहती है।
जब वसुंधरा राजे मैदान में होंगी तो कांग्रेसी कार्यकर्त्ता रानी लक्ष्मीबाई की मदद न करने के ग्वालियर घराने के अपराध गिनाएंगे। जब ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ेंगे तो भाजपाई उनके खानदान को जी भर-भर कोसेंगे और राष्ट्रद्रोही सिद्ध करेंगे। फिर जब ज्योतिरादित्य भाजपा में आ जाएंगे तो भाजपावालों से सिंधिया खानदान के लिए निर्मित सभी अपशब्द कांग्रेस वाले ख़रीद लेंगे।
नीतीश कुमार, मोदी जी को कम्यूनल कहकर इस हद तक घृणा प्रदर्शित करते हैं कि उनके माध्यम से सहायतार्थ मिलने वाला चंदा भी उनको स्वीकार नहीं होता। बाद में राजनैतिक समीकरण देखते हुए वे ही नीतीश कुमार उन्हीं मोदी जी का फोटो दिखाकर वोट मांगने लगते हैं। सारी ज़िन्दगी कांग्रेस की यशोगाथा गानेवाले सचिन पायलट, अशोक गहलोत के विरुद्ध गाली-गलौज करते हैं और फिर सब रास्ते बन्द होते देख उन्हीं अशोक गहलोत को बुज़ुर्ग बताकर उनकी शरण स्वीकार कर लेते हैं।
स्वार्थों के इस घिनौने खेल में समाज, धर्म, कार्यपालिका, पत्रकारिता और यहाँ तक कि मनुष्यता की भी बोली लगायी जा रही है। भारतीय समाज के हितैषी वे लोग नहीं हैं जो किसी के चाबी भरते ही खिलौने की तरह कलाबाज़ी खाने लगते हैं, बल्कि भारत का भविष्य उन लोगों की ओर निहार रहा है जो नकारखाने में तूती की आवाज़ को भी सुनने की क्षमता रखते हैं।
✍️ चिराग़ जैन