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ठगों का बाज़ार

भारत में सरकारें जनकल्याणकारी नीतियों पर काम करती है। माननीय न्यायालय जनता के प्रति न्याय हेतु उत्तरदायी है। कार्यपालिका जनता की रक्षा हेतु चौबीस घंटे तैनात रहती है। …ये सब बातें जब सामाजिक विज्ञान की पाठ्य पुस्तिका में पढ़ते थे तब इस देश को लेकर जैसी छवि बनती थी वह किसी गोलोकधाम से कम नहीं थी। किन्तु जैसे ही हमने अख़बार पढ़ना सीखा तब ज्ञात हुआ कि पाठ्य पुस्तिका की इबारतें असल ज़िंदगी में झूठ साबित होती हैं।
लोकतंत्र के जिन स्तम्भों के प्रति श्रद्धा और आदर उमड़ा था, बाहर आकर देखा तो वे एक-दूसरे के साथ घटिया हरक़तें करते नज़र आए। पाठशाला के स्वप्न से बाहर निकले तो महसूस हुआ कि जनकल्याण एक कवच का नाम है जिसके पीछे खड़े होकर जनता पर क्रूर वार किए जाते हैं। सरकार नीतियाँ बनाते समय सिर्फ इतना ध्यान रखती है कि उसकी सत्ता को बचाने के लिए किस-किस ‘जन’ की ज़रूरत पड़ सकती है। और उसका कितना कल्याण करने से अपनी कमीशनिंग ठीक-ठाक चलती रह सकती है।
जब दिल्ली के बिल्डर करोल बाग़, पहाडग़ंज की आवासीय संपत्तियों को फ्रीहोल्ड करा के उन पर कमर्शियल काम्प्लेक्स बना रहे थे, तब उस क्षेत्र का थाना शायद तीर्थाटन पर गया था। उस क्षेत्र के नगर निगम अधिकारी भी देश सेवा में व्यस्त थे। जब उन कॉम्प्लेक्सों की बिक्री हुई तब रजिस्ट्रार का पूरा कार्यालय भी देश निर्माण में तल्लीन था। जब उस इकाई पर बिजली-पानी के वाणिज्यिक कनेक्शन लगाए गए, तब इन दोनों विभागों को भी ध्यान नहीं आया कि यह आवासीय परिसर है। कई दशकों से सरकार इन व्यापारियों से कमर्शियल टैक्स लेती रही।
बिजली विभाग, जल विभाग, नगर निगम सब व्यावसायिक पैसा वसूलते रहे। अब अचानक माननीय न्यायालय को ज्ञात हुआ कि यह तो आवासीय परिसर है। टैक्स चूसनेवाले विभाग सारा ठीकरा व्यापारी के सिर पर फोड़कर ईमानदारी और सिस्टम की ढाल के पीछे छुप गए। नगर निगम और पुलिस विभाग, माननीय न्यायालय के आदेश का पालन करते हुए सीलिंग करने पहुँच गए। व्यापारी ठगा-ठगा सा खड़ा रह गया। दिल्ली सरकार ने कहा कि सीलिंग केंद्र सरकार करवा रही है। केंद्र सरकार ने कहा कि यह न्यायालय का आदेश है और न्यायालय के आदेश को हम कैसे टाल सकते हैं।
माननीय उच्चतम न्यायालय ने एससी/एसटी कानूनों के दुरुपयोग को रोकने के लिए फैसला दिया कि इनमें कुछ नरमी बरती जाए। फैसला सुनते ही केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट के खि़लाफ़ खड़ी हो गई। जनकल्याण के कवच में घुसकर केंद्र सरकार ने जो बयान दिए, उनका वास्तविक भावार्थ ये है- ‘तुम्हारा दिमाग़ ख़राब हो गया है क्या? इलेक्शन सिर पर खड़ा है। राजस्थान की मीणा कम्युनिटी, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की ट्राइब्स… सबकी वोट कट जाएगी। सरकार औंधे मुँह गिर जाएगी। उधर पासवान जान खा लेगा। मायावती पहले ही भाजपा के लिए आफत है उसे सीधा लाभ मिलेगा। कोर्ट में बैठकर कुछ भी फैसला देने से पहले वोटिंग के गणित क्यों भूल जाते हो। व्यापारियों को वोट डालने की आदत नहीं है उन्हें नोच लो, हम कुछ नहीं कहेंगे लेकिन झुग्गी-झोंपड़ी, एससी-एसटी तो हमारे वोटिंग के गढ़ हैं भाई, यहाँ हाथ डालने से पहले सौ बार सोचा करो। समझे! अब हम रिव्यू पिटीशन ला रहे हैं, चुपचाप इस फैसले को वापस लेकर पुनर्विचार के अंधे कुएं में फेंक देना।’
…कई बार ऐसा महसूस होता है कि हम ठगों के बाज़ार से गुज़र रहे हैं। जो कम ठगा गया वो ख़ुश होता है। जो ज़्यादा ठगा गया वो अराजक होता है। जिसके कपड़े उतार लिए गए वो आत्मघातक होता है। और जो ठगता है वो गाता फिरता है- ‘सारे जहाँ से अच्छा…..!’

✍️ चिराग़ जैन

लोक और तंत्र की रस्साकशी

भारतीय लोकतंत्र के चार स्तम्भ हैं – विधायिका, न्यायपालिका, कार्यपालिका, पत्रकारिता।
विधायिका ने संसद में नोट लहराने से लेकर सांसदों की ख़रीद-फ़रोख़्त तक के गरिमामयी मंज़र देखे हैं। गाली-गलौज, स्याही, पत्थर, जूते और थप्पड़ जैसे अलंकरणों से इस स्तम्भ की आभा कीचड़ को अंगूठा दिखा रही है। घोटालों और दलाली तक के नवरत्नों ने प्रधानमंत्री पद से वार्ड सदस्य तक की कांति दूनी कर रखी है। स्थितियाँ इतनी सुखद हैं कि पूरे विश्व में भारतीय राजनीति के भ्रष्टाचार की मिसालें दी जाती हैं। किसी भी फ़िल्म में इस स्तम्भ के भीतर की गंदगी दिखाने में कोई राष्ट्रद्रोह नहीं महसूस किया जाता।
न्यायपालिका की कुत्ता-फ़जीहत पिछले दिनों सुखिऱ्यों में प्रकाशित हुई। कभी कोई जज अपने दुर्व्यवहार के लिए सड़क पर जनता के कोप का भाजन बनता है तो कभी सरेआम रिश्वत लेते हुए बरामद होकर न्याय की आँखों पर बंधी काली पट्टी पर धूल झोंकता दिखाई देता है। फैसलों की ख़रीद-फरोख़्त बोलने की हिम्मत इसलिए नहीं की जा सकती क्योंकि इसमें न्यायालय को बेइज़्ज़ती महसूस होती है। फिल्मों में न्याय प्रक्रिया की जितनी चाहे धज्जियाँ उड़ा लो, कभी कोई अवमानना का नोटिस जारी नहीं होता क्योंकि आँखों पर पट्टी बांधे बैठी न्याय की मूर्ति टीवी नहीं देखती। शिवसैनिक, बजरंग दल, आशाराम के भक्त, राम रहीम के भक्त, विश्व हिंदू परिषद, करणी सेना और अन्य संगठन, न्यायालय के आदेश के साथ बलात्कार करते रहते हैं और सभी महकमे चुपचाप बैठे तमाशा देखते रहते हैं।
कार्यपालिका ने अपनी एक साख बनाई है। जनता को विश्वास है कि जब कहीं से भी कोई सहायता नहीं मिलेगी तो पुलिस ले-दे के काम करवा देगी। थाना एकमात्र ऐसा जगह है जहाँ आम आदमी बाली की तरह जाने से डरता है। पुलिसवालों से बात करने में लोगों की रूह काँपती है। फिल्में पुलिसवालों को दिन रात गालियाँ देती हैं लेकिन पुलिसवाले ऊपर की कमाई में इतने व्यस्त हैं कि उन्हें फ़िल्म देखने की फुरसत ही नहीं है।
पत्रकारिता लोकतंत्र की आवाज़ है। सरकारी माध्यमों को सरकार का भौंपू कहने की परंपरा इंदिरा जी के ज़माने में ही डाल दी गई थी। अब विज्ञापनदाता की अभिरुचियों, सरकारी स्वार्थों की साधना और टीआरपी की अंधी होड़ में ‘कुछ भी’ दिखानेवाला मीडिया जनता से ‘बिकाऊ’ जैसा अलंकरण प्राप्त कर चुका है। मुद्दे, किरदार, खबर और यहाँ तक कि मौत को भी मंडी में बेचकर पैसा कमानेवाला मीडिया भारतीय लोकतंत्र की बर्बादी के गीत का आधार तत्व है।
इन चारों स्तंभों पर खड़ा लोकतंत्र निस्पृह भाव से लोक और तंत्र के मध्य की अनवरत रस्साकशी को तब-तक देखता रहेगा, जब तक हमारा तंत्र, लोक का आख़िरी कश नहीं मार लेगा।

✍️ चिराग़ जैन

बलात्कार

फिर से एक प्रश्न पर
अटक गये हैं मिस्टर यक्ष;
कि सामान्यतया
बलात्कार के होते हैं दो पक्ष।

एक बलात्कारी,
जो बलात्कार करता है,
और एक बलात्कृता
जिसका बलात्कार होता है।

पहला पक्ष
यानि बलात्कारी
एक से लेकर
दस-बीस तक हो सकते हैं
अपनी संख्या
और बलात्कृता की लाचारी के अनुपात में
ये लोग
बलात्कार की सिचुएशन को
कुछ मिनिटों,
कुछ घंटों,
कुछ दिनों
और कुछ वर्षों तक
ढो सकते हैं।

यहाँ तक तो बात है बिल्कुल साफ़
लेकिन प्रश्न ये है
कि बलात्कार की सिचुएशन में
किसको कहा जाता है इंसाफ़!

जिसका हुआ है बलात्कार
उसका न कोई मुक़द्दमा
न कोई एफ़ आई आर
न कोई तारीख़
न कोई सुनवाई
…सीधी फ़ाइनल कार्रवाई

टिमटिमाते हुए बुझ जाती है
जीवन की ज्योत
उसके हिस्से आती है सज़ा-ए-मौत।

और जिसने किया है ये दुराचार
उसको
पहले तो पुलिस प्रोटेक्शन देती है सरकार
फिर पुलिस के सामने
सेलिब्रिटी की मुद्रा में बैठता है वो ढीठ
और उससे पूछ-पूछ कर पुलिस बनाती है चार्जशीट।

फिर अदालत, तारीख़ और जाँच
तब तक ठंडी हो चुकी होती है
पीड़ित लड़की की चिता की आँच।

फिर सही और ग़लत की खेंचम-खेंच
फिर क़ानून की ऊँची अदालतों के पेंच
जैसे-तैसे फाँसी तक पहुँचती है सरकार
तब तक सामने आ जाते हैं
दोषियों के मानवाधिकार।

कुल मिलाकर कैंसिल हो जाता है फाँसी का प्लान
कोई नहीं लेता फ़ैसले का संज्ञान
बार बार दोहराया जाता है यही स्टाइल
हर बार इसी तरह बंद हो जाती है
बलात्कार की फ़ाइल।

इस यक्ष प्रश्न पर सारा समाज मौन है
यक्ष समझ नहीं पा रहा है
कि सभ्य क़ानून की निगाह में
बलात्कार का असली दोषी कौन है।

✍️ चिराग़ जैन

रामरहीम की गिरफ्तारी

प्रश्न किसी फैसले में हुई पंद्रह साल की देरी का नहीं है। प्रश्न रामरहीम के समर्थकों की गुंडागर्दी का भी नहीं है। और प्रश्न किसी प्रदेश में जनता की संपत्ति को बर्बाद करने का भी नहीं है। इन सब प्रश्नों के तो हम आदी हो चुके हैं।
अब सवाल ये है कि जो लोग रामरहीम के समर्थन में इस देश को नेस्तोनाबूद करने का ऐलान कर रहे हैं क्या उन लोगों के कंधों पर हम विकसित भारत का स्वप्न देख सकते हैं। कितनी आश्चर्यजनक घटना है कि जिस लोकतंत्र में सात दशक की सरकारें सबको वोट डालने के लिए प्रेरित नहीं कर पाईं उसी देश में एक व्यक्ति कुल पंद्रह साल के कालखंड में लाखों लोगों को घर-परिवार छोड़ कर मरने-मारने के लिए प्रेरित देता है।
शर्म की नहीं बल्कि निराश हो जाने वाली बात ये है कि इस देश की न्यायपालिका को इसलिए कठघरे में खड़ा किया जा रहा है कि न्यायालय ने बाबा के लाखों समर्थकों की बात अनसुनी कर दी।
माननीय न्यायालय यदि देश की संपत्ति के नुकसान की भरपाई बाबा की संपत्ति से करवा सकता है तो जनता के कष्टों की भरपाई बाबा के कष्टों से क्यों नहीं कर सकता। क्यों न हो ऐसा की टीवी स्क्रीन को दो हिस्सों में स्प्लिट करके एक ओर उपद्रवियों की हरकतें और हर हरकत पर बाबा को इलेक्ट्रिक शॉक का दूसरा चित्र हो।
प्रश्न यह है कि न्यायालय और सीबीआई पर प्रत्यक्ष रूप से सरकार का पिट्ठू होने का आरोप लगता है और लोकतंत्र देखता रहता है।
प्रश्न यह है कि एहतियातन रास्ते रोके जाएं तो मीडिया इसे सरकार की नाकामी कहता है। रास्ते न रोके जाएँ तो इसे सरकार की लापरवाही कहा जाता है। रामरहीम को हेलीकॉप्टर से ले जाया गया तो इसे वीआईपी ट्रीटमेंट बताया जा रहा है। सड़क से ले जाते तो इसे रोड शो कह दिया जाता।
प्रश्न यह है कि मीडिया चैनल पर यदि किसी पार्टी का कोई प्रवक्ता किसी रिपोर्टिंग की किसी तथ्यात्मक चूक को सुधारने की सलाह देता है तो एंकर चीख चीख कर उसे जलील करने लगती है और फिर उसकी बात सुने बिना बुलेटिन समाप्त कर देती है। प्रश्न यह है कि जो मीडिया अपनी बुराई सुनने को तैयार नहीं है उसे सबको कठघरे में खड़ा करने का अधिकार कैसे दे दिया गया।
प्रश्न यह है हुजूर कि विज्ञापनों की कमाई से थालियाँ जुटाने वाले खबरिया चैनलों को इस देश की जनता की बौद्धिक खुराक और जनमत निर्माण का ठेका कैसे दिया जा सकता है?
और प्रश्न यह भी है साहिब कि जिस देश की जनता मूलभूत सामान्य ज्ञान और सिविक सेंस से भी वंचित है उस देश के विकास का भवन किन हवाई बुनियादों पर खड़ा किया जा सकेगा? प्रश्न यह है कि अच्छे इंजीनियर और अच्छे डॉक्टर बनाने वाले पाठ्यक्रमों में अच्छा नागरिक बनाने का अध्याय’ कब जुड़ेगा?

✍️ चिराग़ जैन

हत्यारा तंत्र

गोरखपुर मुआमले जैसे महापाप के सूतक की ज़िम्मेदारी एक बार फिर सरकारी दफ्तरों की कार्यशैली ने ली है। पाकिस्तान में जब स्कूली बच्चों की लाशें बिछीं तो पूरे विश्व ने आतंकवाद से मिलकर लड़ने की शपथ उठाई थी। आज जब हमारे मुल्क में नन्हीं किलकारियों की प्राणवायु तक दफ्तरी छीन ले गए तो इस हिंसक व्यवस्था के साथ एकजुट होकर लड़ने के लिए हम क्यों शपथ नहीं ले सकते।
स्थितियां इतनी विकराल हैं कि “ईमानदारी” के साथ आप ड्राइविंग लाइसेंस तक नहीं बनवा सकते हैं और बेईमान होते ही आप कुछ भी कर सकते हैं। “चप्पल घिसना”; “एड़ियां रगड़ना”; “धक्के खाना”; अड़ंगा लगाना”; “पेंच फँसना”; “जुगाड़ भिड़ाना” और “ले-दे के करवाना” जैसे मुहावरों से सुसज्जित हमारे सरकारी कार्यालय स्वाधीनता दिवस के अवसर पर हर साल रौशनी में नहा जाते हैं लेकिन देश के भीतर का अंधेरा कम होने का नाम नहीं लेता। किसी दफ़्तर में आपका सामान्य-सा काम भी पड़ जाए तो इस हद तक हैरासमेंट होता है कि अराजक हो जाने का मन करने लगता है।
फॉर्म के एक कॉलम में चूक हो जाए तो खिड़की पर बैठा बाबू आपको इस तरह लताड़ता है जैसे किसी बलात्कारी को रंगे हाथ पकड़ लिया हो। किसी काग़ज़ की फोटोकॉपी करवानी पड़ जाए तो दफ्तरी आपको यह भी नहीं बताएगा कि फोटोकॉपी होगी कहाँ से। बाबू से कोई सवाल पूछ लो तो ऐसे हिक़ारत से देखा जाता है मानो उसकी जेब काट ली हो। चपरासी भी प्रतीक्षा करने वालों के साथ ऐसे बर्ताव करता हो जैसे किसी इकलखौन्डी बहू के घर उसकी ननद छह महीने से पड़ी हो।
दो और दो चार जैसे सामान्य सवाल को भी इतना जटिल बना दिया जाता है कि आदमी गिनती भूल जाए। सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर और नर्स तो हैं ही; सफाईकर्मी तक किसी भी मरीज़ या उसके परिजन को अकारण धकियाने और लताड़ने के लिए अधिकृत होते हैं। रेलवे में किसी की इतनी औक़ात नहीं है कि पूछताछ खिड़की के उस पार बैठे साहब से रेल के लेट होने का कारण पूछ सके। अदालतों में जज साहब ग़लत समय पर छींकने के जुर्म में भी किसी पर अवमानना का अभियोग चला सकते हैं। और थाने तो दैवीय प्रकोप के महाभवन हैं ही।
पुलिसवाले जनता के बीच जब गाना बजाते हैं “पुलिस- आपके लिए आपके साथ” तो ऐसा सुखद अनुभव होता है मानो फरिश्तों ने खाकी पहन कर क़ौम की खिदमत का बीड़ा उठाया हो। पुलिस के जनहित में जारी विज्ञापन देखो तो ऐसा महसूस होता है मानो पूरी पुलिसफोर्स आपके पैर पकड़ कर गिड़गिड़ा रही हो कि हे जनता जनार्दन! हमारा कर्तव्य है कि आपको कोई कष्ट न हो। हमें हमारा फ़र्ज़ अदा करने का मौका दो माई-बाप! ….लेकिन अगर किसी दिन आपको थाने के दर्शन करने पड़ जाएं तो ये सारे विज्ञापन आपके पीछे तालियाँ पीट-पीट कर नाचते हुए गाना गाने लगते हैं – “अप्रैल फूल मनाया, तो उनको गुस्सा आया…”।
व्यवस्था की यह घिनौनी तस्वीर न तो जनता से छिपी है न ही सरकार से। ऐसे में किसी भी नेता की या समाजसुधारक की इच्छा शक्ति संक्रमित पतीले में दूध की तरह व्यर्थ है। सरकार संसद में बैठ कर योजनाएं बनाती है और बाबू उस योजना का सागर मंथन करके उसमें से लक्ष्मी जी के अवतरण का उपाय खोज लेते हैं। रेड लाइट जम्पिंग रोकने के लिए चालान की राशि बढ़ाकर सौ से पांच सौ की जाती है तो रेडलाइट के पार पेड़ की ओट में अपराध करने का अवसर देने वाले सार्जेंट के ईमान की क़ीमत पचास रुपये से बढ़कर स्वतः ही दो सौ हो जाती है।
भारत में कई नेता ऐसे हुए हैं जो सचमुच इस देश को एक लोककल्याणकारी गणराज्य बनाने का स्वप्न देखते थे। लेकिन उन सब स्वप्नों की फाइलें टूथपिक से कान खुजाते किसी बाबू के बासी चाय के झूठे कप के नीचे दबी धूल खा रही हैं।

✍️ चिराग़ जैन

Ref : Gorakhpur Case, Children dead in hospital due to shortage of Oxygen.

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