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ग्लोबल वार्मिंग

मेघों का जल घट रहा, सूरज उगले आग
धरती धू-धू जल रही, मानव अब तो जाग

तप्त धरा, बादल विफल, गया संतुलन डोल
रे मानव अब तो संभल, अब तो ऑंखें खोल

मानव अब क्यों हो गया, आखिर बिल्कुल मौन
तूने ही छलनी करी, दिव्य परत ओज़ोन

तितली, धुरवा, बीजुरी, पाला, सावन, कूप
धीरे-धीरे धर रहे, इतिहासों का रूप

रिमझिम, झर-झर, झमाझम, बरसा था आकाश
इन बातों पर कल किसे, होएगा विश्वास

✍️ चिराग़ जैन

मीडिया : एक चेहरा ये भी

हमारे मुल्क़ की क़िस्मत में ये विस्फोट क्यूँकर था
शहर से गाँव तक माहौल कल दमघोट क्यूँकर था
पसीना चू रहा था सबकी पेशानी से पर फिर भी
ख़बर पढ़ते हुए उनके बदन पर कोट क्यूँकर था

✍️ चिराग़ जैन

मुल्क़ में दहशत

जो फैलाने चले हैं मुल्क़ में दहशत धमाकों से
वही छुपते फिरा करते हैं इक मुद्दत धमाकों से

न ख़बरों में उछाल आया, न बाज़ारों में सूनापन
न बिगड़ी मुल्क़ के माहौल की सेहत धमाकों से

वही हल्ला, वही चीखें, वही ग़ुस्सा, वही नफ़रत
हमें अब हो गई इस शोर की आदत, धमाकों से

ये दहशतग़र्द अब इस बात से आगाह हो जाएँ
कि अब आवाम की बढ़ने लगी हिम्मत धमाकों से

वज़ूद अपना जताने के लिए वहशी बने हैं जो
उन्हें हासिल नहीं होती कभी शोहरत धमाकों से

✍️ चिराग़ जैन

मर्यादा

न हों हदों में तो छाले रिसाव देते हैं
किनारे धार को बाढब बहाव देते हैं
हदों में हैं तो ख़ैर-ख्वाह हैं उंगलियों के
हदों को लांघ के नाखून घाव देते हैं

✍️ चिराग़ जैन

लोग आते-जाते हैं

दिल भी है इक ख़ूबसूरत से इदारे की तरह
लोग आते-जाते हैं, पानी के धारे की तरह

जब से ये संसार सारा हो गया है आसमां
तब से है इन्सानियत टूटे सितारे की तरह

चल सको तो तुम किसी के बन के उसके संग चलो
वरना इक दिन छूट जाओगे सहारे की तरह

दिल के रिश्तों को फ़रेबी उंगलियों से मत छुओ
जुड़ नहीं पाते, बिखर जाते हैं पारे की तरह

ज़िन्दगी तुम बिन भी यूँ तो ख़ूबसूरत झील थी
तुम मगर इस झील में उतरे शिकारे की तरह

आपका चेहरा भी मीठी ईद-सा ख़ुशरंग है
खिलखिलाहट चांद-तारे के नज़ारे की तरह

एक अरसा साथ रहकर भी पराए ही रहे
तुम समन्दर की तरह थे, हम किनारे की तरह

✍️ चिराग़ जैन

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