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हाल-ए-हक़ीक़त

गुलों को ख़्वाब चमन के दिखा के छोड़ दिया
सवेरे हाल-ए-हक़ीक़त बता के छोड़ दिया

शिकस्त मुझसे बढ़ा देती दुश्मनी उसकी
उसे शिकस्त के नज़दीक ला के छोड़ दिया

अब अपने सच की गवाही कहाँ-कहाँ दूँ मैं
बस उनके झूठ से पर्दा हटा के छोड़ दिया

ज़माना उसके तरन्नुम में क़ैद है अब तक
जो गीत मैंने कभी गुनगुना के छोड़ दिया

मुझे नसीब भला आज़मा के क्या देखे
उसे ही मैंने अभी आज़मा के छोड़ दिया

वो सुर्ख़ हो गयी मेरी ज़रा-सी ज़ुर्रत से
फिर उसने हाथ मेरा मुस्कुरा के छोड़ दिया

✍️ चिराग़ जैन

पीड़ा का अनुमान

जिस बिरवे की हर कोंपल को अपने हाथों से दुलराया
उस बिरवे के मुरझाने पर माली पर क्या बीती होगी
चहक भरी जिसने जीवन में, तिनका-तिनका नीड़ बनाकर
उस चिड़िया के उड़ जाने पर, डाली पर क्या बीती होगी

कतरा-कतरा जोड़ा हिम ने, तब नदिया का रूप बना था
धरती का सीना छलनी कर इक मीठा जलकूप बना था
जिन हाथों में होंठों तक भी जाने का दम शेष नहीं था
उन हाथों से गिर जाने पर, प्याली पर क्या बीती होगी

दिन भर खून-पसीना देकर, जिस सूरज के प्राण बचाए
प्राची कितना सिसकी होगी, जब वो पश्चिम के मन भाए
जिसका तेज दमकता चेहरा सारी दुनिया में रौशन था
उस सूरज के ढल जाने पर, लाली पर क्या बीती होगी

जिसके नखरे पूरे करके रीझा करती रोज़ रसोई
ताती रोटी, नर्म पराँठे, चार परत आटे की लोई
जो रोटी पोए जाने तक खाली बासन खनकाता था
उस बेटे के मर जाने पर, थाली पर क्या बीती होगी

✍️ चिराग़ जैन

प्यार को चंद मजबूरियाँ खा गईं

स्वप्न तो खो गए बुद्धि के द्वार पर
प्यार को चंद मजबूरियाँ खा गईं
बच गई साथ की झुंझलाहट जहाँ
उस जगह प्रीत को दूरियाँ खा गईं

पारलौकिक सुखों की बड़ी प्यास को
कंदरा का महानंद जकड़े रहा
सुन सको तो सुनो काव्य एकांत का
बस जिसे मौन का छंद पकड़े रहा
ज़िन्दगी की समूची हिरन चैकड़ी
प्राण में व्याप्त कस्तूरियाँ खा गईं

प्रीत का रंग वैधव्य ने धो दिया
अनकही पीर अभ्यर्थना हो गई
आँसुओं पर लगी चैकसी आंख की
चाहतें सत्य को ओढ़ कर सो गई
धीर जितना बंधा था उसे एकदम
रेहड़ियों पर टंगी चूड़ियां खा गईं

भूख का इक ठहाका चुभा देर तक
जब कभी भी सड़क पर बसौड़ा पुजा
रीतियाँ ढोंग की ओट में नग्न थीं
पेट आँतों के पीछे दुबककर तुजा
अन्न के मूल्य की हर प्रबल सूक्ति को.
चौंक पर सड़ रही पूरियाँ खा गईं
✍️ चिराग़ जैन

विध्वंस के बाद

पेड़ की डालियो! नवसृजन में जुटो
पत्तियों को मिला टूटने का हुनर
रात भर मत बिलखियो री सूरजमुखी
सूर्य को भा गया रूठने का हुनर

जो गुंथे एक ही तार में वो सुमन
एक दिन सूखकर तो बिखर ही गए
किन्तु जब तक जिए, तब तलक़ यूं जिए
उत्सवों के सुअवसर संवर ही गए
तुम किसी फूल से सीख लेना प्रिये
मुस्कुराते हुए छूटने के हुनर

चाक ने ही अगर संतुलन खो दिया
प्यास का हर समाधान खो जाएगा
हर कलश, हर सुराही तड़क जाएगी
तृप्ति का साज-सामान खो जाएगा
व्यर्थ अवशेष चुभ जाएंगे याद में
पात्र सीखे न गर फूटने का हुनर

भाग्य की कुछ लकीरों के अवरोह पर
चाह की श्वास हर पल सिसकती रही
सत्य कटुता का बाना पहनता रहा
प्राण की डोर गर्दन जकड़ती रही
नियति की डुगडुगी पर दिखाता रहा
इक जमूरा खुशी लूटने का हुनर

✍️ चिराग़ जैन

इस राह चलकर देखते हैं

चलो, इस राह चलकर देखते हैं
कहाँ बदले मुकद्दर, देखते हैं

कहीं मुस्कान तो लब पर नहीं है
मेरे आँसू छलककर देखते हैं

हमें तो दिख रहा है कंठ नीला
यहाँ सब सिर्फ शंकर देखते हैं

हमारे हौसलों की थाह मत लो
कहाँ तक है समंदर, देखते हैं

अगर हँसता हुआ मिल जाऊँ उनको
तो जिगरी यार जलकर देखते हैं

अगर मुस्कान से परहेज रखूँ
तो फिर बच्चे सहम कर देखते हैं

अभी मजबूरियों की चल रही है
इरादे आह भरकर देखते हैं

यही एहसास दिल को खुश रखे है
वो हमको छुप-छुपाकर देखते हैं

✍️ चिराग़ जैन

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