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तमाशबीनों का लोकतंत्र

कितना शानदार लोकतंत्र है हमारा। पाँच दिन से पूरा देश तमाशबीन बनकर जनमत के मखौल का खेल देख रहा है। कांग्रेस जानती है कि पैसे फेंके जाएंगे तो उसके विधायक बिक जाएंगे, इसलिए उसने जनता के जीते हुए प्रतिनिधियों को बाक़ायदा नज़रबंद कर लिया है। भारतीय जनता पार्टी जानती है कि बहुमत साबित करने के लिए विधायक तोड़ने होंगे। वह यह भी जानती है कि बहुमत साबित हुआ, तो उसकी धूर्तता सबके सम्मुख स्पष्ट हो जाएगी। राज्यपाल जानते हैं कि सरकार बनाने के लिए हर हद्द तक का भ्रष्टाचार होगा। उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश जानते हैं कि कांग्रेस, भाजपा और जेडीएस में से कोई भी लोकतंत्र की रक्षा के लिए नहीं, बल्कि अपनी सरकार बनाने के लिए तमाम हथकंडे अपना रहे हैं।
कार्यपालिका जानती है कि निजी हितों के लिए अनधिकृत रूप से पैसे का नक़द लेन-देन अपराध है। कार्यपालिका यह भी जानती है कि नोटबन्दी के बाद से इतनी बड़ी नक़दी अपने पास रखना अपराध है। मीडिया जानती है कि शतरंज की बिसात पर पैसे फेंककर काले घोड़ों को सफेद करने की जुगत चल रही है। सोशल मीडिया धड़ल्ले से इस ख़रीद-फ़रोख़्त पर चुटीले, तीखे, कड़वे और चटखारे भरे संदेश वायरल कर रहा है।
भाजपा के प्रवक्ता से पूछो कि यह क्या हो रहा है तो वह चुपके से अपनी पार्टी के इस अपराध में लिप्त होने की बात स्वीकार करते हुए दलील देते हैं कि हरियाणा में इंदिरा गांधी ने अपना मुख्यमंत्री बनाने के लिए यही किया था, तब हम इसे अपराध मानते थे लेकिन अब हमारी बज्जी है, इसलिए अब हम इसे अपराध नहीं मानते।
कांग्रेस के प्रवक्ता से पूछो कि गोवा में आप सबसे बड़ी पार्टी की दुहाई देकर सरकार बनाने का दावा कर रहे थे तो फिर अब आप आधी रात को सुप्रीम कोर्ट क्यों चले गए। कांग्रेसी प्रवक्ता इस प्रश्न के उत्तर में स्पष्ट कहता है कि गोवा में हमने वह बात कही, जिससे हमें लाभ हो रहा था और कर्नाटक में भी हम वही बात कह रहे हैं जिससे हमें लाभ मिले अब ये दोनों बातें परस्पर विरोधी हों तो इसमें हमारी क्या ग़लती है?
सोशल मीडिया पर जो कांग्रेस को आइना दिखाए उसे ‘अंधभक्त’ कहकर ज़लील किया जाएगा। जो भाजपा का सच बोलने की कोशिश करे उसे ‘राष्ट्रद्रोही’ कहकर अपमानित किया जाएगा।
जनता पूछती है कि सबसे ज़्यादा वोट कांग्रेस को पड़े तो सबसे ज़्यादा सीटें भाजपा की कैसे आ गईं। उत्तर मिलता है कि सीटों का बँटवारा इस तरह से किया गया है कि चाहे एक वोट का अंतर हो, लेकिन सीट जीतने का जुगाड़ हो जाएगा।
जनता पुनः पूछती है कि फिर सबसे ज़्यादा सीट वाली पार्टी के सामने कम सीटों वाले दो मिलकर कैसे सरकार बना सकते हैं। उत्तर मिलता है कि दोनों पार्टियों ने तय कर लिया है कि मिल-बाँटकर मलाई खा ली जाएगी इसलिए रैलियों की गाली-गलौज को भूलकर गले लग जाओ।
जनता पुनः पूछती है कि हमने तो रैलियों की बातें सुनकर ही आपको वोट दिया था। उत्तर मिलता है कि हमने भी वोट लेने के लिए ही रैलियाँ की थीं। हमारा उद्देश्य जनकल्याण नहीं था, चुनाव जीतना था। पानी की तरह पैसा बहाना पड़ता है साहब। रात-दिन एक करने पड़ते हैं। इलेक्शन मैनेजमेंट कोई हँसी-खेल नहीं है। इतनी मेहनत से मिले वोटों को विपक्ष में बैठकर बर्बाद तो नहीं कर सकते ना। जहाँ इतना पैसा लगा, वहाँ थोड़ा और सही। एक बार कुर्सी मिल गई तो छह महीने में सारा ख़र्चा निकल आएगा।
जनता भौंचक्की होकर पूछती है कि चुनाव आयोग तो बताता है कि चुनाव लड़ने के लिए सीमित धन व्यय करना होता है। उत्तर मिलता है, छोड़ो यार, किस युग में जी रहे हो। उतने पैसे में कोई पार्षद का चुनाव भी न जीत पाएगा। ये सब औपचारिकता के लिए लिखा जाता है। सबको पता है कि इलेक्शन कितने करोड़ों का खेल है।
जनता की आँखे फट जाती हैं। वह प्रश्नवाचक दृष्टि से चुनाव आयोग की ओर देखती है। चुनाव आयोग जनता से मुँह फेरकर खड़ा हो जाता है। जनता आशा से भरकर कार्यपालिका की ओर देखती है तो पुलिसवाला उसे डाँटकर बोलता है- ‘अबे तैने वोट दे दिया ना, अब अपना हिल्ला कर, ये बड़े लोगों के काम हैं इन पचड़ों में क्यों पड़ता है?’ जनता हिम्मत करके न्यायपालिका की ओर देखती है तो न्यायपालिका अपने काले कोट में से पट्टी फाड़कर कस के अपनी आँखों पर बांध लेती है।
जनता हारकर मीडिया के पास पहुँची, तब तक ख़बर आ गई थी कि कांग्रेस के कुछ विधायक रिसोर्ट से ग़ायब हो गए। पूरे चैनल में अफरा-तफरी का माहौल बन गया। कोई कांग्रेस के प्रवक्ता को लाइन अप कर रहा है। कोई बीजेपी के प्रवक्ता का फोनो कर रहा है। कोई ग्राफिक बना रहा है। जनता ठिठककर धम्म से ज़मीन पर बैठ जाती है। स्टूडियो में आवाज़ गूंजती है – ‘कट, कट, कट, अरे यार ये फ्लोर पर कौन बैठा है इसे बाहर करो। …स्पॉट दादा देखो ज़रा!’
…बिजली की गति से दो स्पॉट बॉय आते हैं और जनता को उठाकर स्टूडियो से बाहर फेंक देते हैं।
जनता अपने हाथ में टिफिन पकड़े अपने दफ़्तर की ओर चल देती है। हाज़िरी रजिस्टर पर आधे दिन की तनख़्वाह कटवाती है और शाम को छुट्टी होने का इंतज़ार करने लगती है।

✍️ चिराग़ जैन

चुनाव तंत्र

एक दल बोलता है हमको थमा दो देश
हम लोकतंत्र की ज़मीन बेच देते हैं
एक दल बोलता है हमको थमा दो देश
जनता का धर्म और दीन बेच देते हैं
एक नेता बोला हम बन के मुंगेरी लाल
जनता को सपने हसीन बेच देते हैं
जनता ने कहा हम वायदों की बीन पर
काले कोबरा को आस्तीन बेच देते हैं

✍️ चिराग़ जैन

मनोरंजक चुनावी रैलियाँ

सरकार चाहती है कि दिल्ली की जनता सड़क पर पार्किंग न करे। जनता भी चाहती है कि उसे अपनी गाड़ी अनाधिकृत स्थान पर खड़ी न करनी पड़े। लेकिन सरकार गाड़ी के लिए पार्किंग का स्थान मुहैया नहीं करवा पाती। वह जनता से कहती है कि अपने घर के भीतर गाड़ी खड़ी करो। जनता हाथ जोड़ कर कहती है कि छोटे-छोटे फ्लैट्स और बिल्डर फ्लोर्स में रहनेवाला शख़्स गाड़ी घर में कैसे खड़ी करे।
उत्तर सुनते ही सरकार तुरंत नहले पे दहला मारते हुए कहती है- ‘इत्ते छोटे घर में रहनेवाला आदमी गाड़ी ख़रीदता ही क्यों है?’
जनता रुआंसी होकर कहती है- ‘माई बाप! हम डीटीसी की बस में दफ्तर जाना चाहते हैं लेकिन बस में पैर रखना तो दूर, लटकने की भी जगह नहीं होती। ऊपर से सरकारी चेतावनी और लिखी होती है कि पायदान पर यात्रा न करें। …पायदान पर कर नहीं सकते, भीतर जगह नहीं है और लटकने का सामर्थ्य नहीं है। ऑटो-टैक्सीवाले खाल उतार लेते हैं। उनकी शिकायत करो तो पुलिसवाला ऑटोवाले के प्रति नमकहलाल बनकर तब तक नहीं पहुँचता, जब तक ऑटोवाला हमें मारपीट के फरार न हो जाए। ओला-ऊबर में इतना सरचार्ज लगता है कि तीन कर्मचारियों की तनख़्वाह मिला ली जाए तो भी एक कर्मचारी दफ्तर नहीं पहुँच सकता। मेट्रो में ऑफिस टाइम पर इतनी भीड़ होती है कि जब तक मेट्रो में घुस पाते हैं तब तक बायोमेट्रिक की मशीन हमें लेटलतीफ घोषित करके हमारी आधी दिहाड़ी चट कर जाती है। गाड़ी पूल करने की सोचें, तो उसके लिए गाड़ी होना ज़रूरी है और चार दिन में एक दिन नम्बर आवे तो बाकी तीन दिन गाड़ी खड़ी करने के लिए पार्किंग की जगह चाहिए।’
इतनी सारी कहानी सुनकर सरकार थोड़ी देर मौन रहती है। अचानक उसे ध्यान आता है कि दो महीने बाद राजस्थान में चुनाव है। सरकार मन ही मन स्वयं को कोसती है- ‘मूढ़मति, दिल्ली के लोगों की समस्याएँ कभी ख़त्म नहीं होंगी। ये थैंकलैस लोग एक नम्बर के आलसी हैं। इनके चक्कर में पड़ोगे तो राजस्थान हाथ से निकल जाएगा।’
सोच-विचार करके, सरकार जनता को आश्वासन देती है कि हमने एनसीआर कमेटी को बोलकर दिल्ली का विस्तार शामली तक करवा दिया है। लगभग सौ किलोमीटर दायर बढ़ जाएगा तो पार्किंग की समस्या हल हो जाएगी। फिर आप आराम से अपनी गाड़ी पार्क करना।
इससे पहले कि जनता इस आश्वासन को सुनकर सम्भल पाए, सरकार राजस्थान के दौरे पर निकल लेती है। जनता अपने घर पहुँचकर घर के बाहर गाड़ी पार्क करती है और टीवी पर सरकार की चुनावी रैली देखने लगती है। रैली के आश्वासनों को सुनकर जनता ठहाका मारती है और न्यूज़ चैनल का मनोरंजन त्याग कर पोगो चौनल के समाचार लगा लेती है।
✍️ चिराग़ जैन

भारत-पाकिस्तान संबंध

मोदी जी – “नवाज़ साहब, आप ये बार बार सीमा की शांति क्यों भंग करते हो?”
नवाज़ – “अरे मोदी जी, हमारे यहाँ 8 राज्य हैं, उनमें चुनाव होते हैं तो जनता का समर्थन जुटाने के लिए हमें भारत से छेड़ छाड़ करनी पड़ती है।”
मोदी जी – “ऐसा करके क्या सचमुच चुनाव जीता जा सकता है?”
नवाज़ – “100℅”
मोदी जी – “तो बेट्टा, अब तू देख। हमारे यहां 29 तो राज्य हैं, फिर 7 केंद्र शासित प्रदेश, फिर राज्यसभा के चुनाव, फिर नगर निगम …और हम तो यूनिवर्सिटी इलेक्शन तक को सीरियसली लेते हैं। तुम छेड़छाड़ की बात कर रहे हो हम तो छू छू कर ही मार डालेंगे।”

✍️ चिराग़ जैन

स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर कृतज्ञ राष्ट्र का सन्देश

श्रद्धेय राजनीतिज्ञो!
स्वाधीनता के सात दशक बीत चले हैं। इतनी लंबी अवधि किसी भी समाज में विसंगतियों और विद्रूपताओं के प्रवाह हेतु पर्याप्त है। सामान्यतया स्वाधीन हो चुके समाजों में अचानक पनपे अधिकार भाव के कारण इस प्रकार की स्थितियां सहज पनप जाती हैं। किन्तु आप दूरदर्शी लोगों ने स्वाधीन हो जाने के बावजूद महान भारतवर्ष को ऐसे पुंछल्लों में उलझाए रखा कि किसी प्रकार के विकार को पनपाने योग्य समय ही उनके पास शेष नहीं रहा।
समाज विकास की अंधी होड़ में पाश्चात्यता का दास न बन जाए; इस हेतु आप उन्नीसवीं शताब्दी में मर चुकी जातिप्रथा की सड़ी हुई लाश को अपने कंधे पर ढो कर लाए और समाज के बीच उसे पटक दिया। आज़ादी की लड़ाई के उन्माद में जो समाज इसे भूल चुका था, वह पुनः इसके गले-सड़े अंगों से खेलने में मशगूल हो गया।
अंत्योदय और पंचशील जैसे ठाली बैठे के कामों में हमारा नौजवान फँस कर न रह जाए इस हेतु आपने बेरोज़गारी के पैरों पर अपनी पगड़ी रख दी कि वह इस मुल्क़ को छोड़ कर न जाए। आपकी इस अनुनय से पिघल कर महान बेरोज़गारी ने अपना बंधा हुआ बोरिया खोला और इस देश के हर मुहल्ले में अपनी पैंठ बनाई।
परदेसियों के अधीन रहे इस समाज में शासन को शत्रु समझने का भाव घर कर गया था, इस समस्या को ध्यान में रखते हुए आपने जनहित में एक ऐसा अलिखित संविधान तैयार कर डाला जिसमें सरकारी करों के भुगतान का मार्ग अवरुद्ध हो ही न सके। लिखित संविधान के अनुसार सरकार जनता से विविध कर वसूल कर अपने कोष में एकत्र करती है और फिर उस कोष से सड़क, बिजली, जल, शिक्षा, सुरक्षा, न्याय आदि की मूलभूत सुविधाएँ जनता के लिए मुहैया कराई जाती हैं। लेकिन आपका अलिखित संविधान कर प्राप्ति और जनहित के इस अनावश्यक रूप से लंबे तरीके पर विश्वास नहीं करता।उसके अनुसार FIR लिखने और झगड़ों का निपटारा करने के एवज में दरोगा जी; सड़क पर चलने वाले करदाता से ट्रैफिक सार्जेंट और इसी प्रकार एन्य जनसेवक अपने-अपने हिस्से का कर बिना किसी रसीद के सीधे वसूल लें। इस महान प्रणाली से रसीदों में नष्ट होने वाली लुगदी की ख़ासी बचत हुई है।
चुनाव के समय पूरा विश्व हमारे देश की ख़बरों पर निगाह गड़ाए रहता है। ऐसे में भुखमरी, ग़रीबी, बेरोज़गारी, अशिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं की विफलता, अस्वच्छता, गुंडागर्दी, पुलिसिया भ्रष्टाचार और सामाजिक न्याय जैसे टुच्चे और पुरापाषाणयुगीन मुद्दों पर चुनाव हों तो इससे वैश्विक समाज में हमारी छवि का ह्रास होगा।इस समस्या के समाधान हेतु आप लोगों ने सारी बुराई अपने कन्धों पर उठाते हुए गाली-गलौज, बेतुके बयान, सूट के रेट, घोड़े की टांग, बर्थडे केक के साइज़, गौरक्षा और राममंदिर जैसे मुद्दों को आपने न केवल पैदा किया अपितु अपनी-अपनी पार्टी के कोष की गाढ़ी कमाई व्यय करके इन्हें मीडिया और प्रोपगंडा के माध्यम से हवा भी दी। कई बार तो दंगों में हज़ारों देशभक्तोंकी आहुति देकर भी अपने मूलभूत मुद्दों को सिर उठाने से रोका है।
व्यवस्था को यद्यपि जनता के हित हेतु निर्मित किया जाता है किन्तु आपने ऐसा जादू घुमा रखा है कि आरामकुर्सी पर पसरी व्यवस्था और शासन सुख भोग रहे व्यवस्थापकों के सुख में खलल डालने के उद्देश्य से चलने वाला हर फरियादी दफ्तरों, थानों, अदालतों और खिड़कियों के चक्कर काट-काट कर चप्पलों के साथ-साथ ख़ुद भी घिस गया लेकिन किसी अफ़सर या कुर्सी के कान पर जूं तक न रेंगा सका।
गली के बच्चे-बच्चे को पता होता है कि फलां घर में सेक्स रेकेट चलता है। पच्चीस रुपल्ली ख़र्च करने की औक़ात रखने वाले हर शराबी को पता होता है कि नक़ली शराब कहाँ मिलती है। चरस, गांजा, अफ़ीम, सुल्फा और ड्रग्स का किस नुक्कड़ पर खोखा है। कौन अपने यहाँ जुआ खिलवाता है, कौन क्रिकेट पे सट्टा लगवाता है, किसके यहाँ आधी रात को भी शराब मिल जाएगी -ये बातें हर ऐरे-गैरे-नत्थूखैरे को पता होती है लेकिन आपने अपने कानून के लंबे हाथों को सिस्टम की आँखों के ऊपर से लपेटते हुए अपने कानों तक इस तरह से बाँध दिया है कि इन काली गलियों की अंधियारी से इस महान राष्ट्र की व्यवस्था काली न पड़ जाए।
इस देश को इस दशा तक लाने में आपने जैसा दिन-रात परिश्रम किया है वैसा तो कोई अपनों के लिए भी नहीं करता। आपकी इन सेवाओं के प्रतिफल में अब काश श्रीकृष्ण आपको इस संसार के कष्टों से मुक्त कर अपने जन्मस्थान पर विश्राम करने के लिए उचित व्यवस्था करें।

✍️ चिराग़ जैन

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