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पाठ्य पुस्तक से मुठभेड़

दिल्ली विश्वविद्यालय में नये पाठ्यक्रम लागू हो गये हैं। चार साल वाला। कल स्नातक स्तर की हिंदी की पाठ्य पुस्तक से मुठभेड़ हो गयी। कहने लगी मैं साहित्य की पुस्तक हूँ। सुनकर मेरे भीतर के साहित्यिक ने कनखियों से एकाध पृष्ठ उघाड़ दिये। ये इत्तेफ़ाक़ ही था कि जो पृष्ठ खुला उस पर शाहरुख़ ख़ान का चित्र था, रा-वन वाला। मेरे साहित्यकार को कुछ शंका सी हुई। अगला पृष्ठ खोला, तो वो बोला- बलम पिचकारी जो तूने मुझे मारी तो सीधी-सादी लड़की शराबी हो गयी। …मैंने चारों तरफ़ नज़र घुमाई, शायद कहीं तारांकित लिखा हो- ‘शराब पीना सेहत के लिये हानिकारक है, इस पुस्तक में सम्मिलित कोई भी कवि शराब का सेवन या उसका प्रचार नहीं करता।’ …लेकिन अफ़सोस ऐसा कुछ नहीं दिखा। मेरा साहित्यकार आगे बढ़ा -‘जींस पहन के जो मैंने मारे ठुमके, तो लट्टू पड़ोसन की भाभी हो गयी। साहित्यकार कल्पना के कक्ष में खो गया। एक प्रोफ़ेसर काले गॉगल्स लगाये, मिनि स्कर्ट और शॉर्ट टॉप पहनकर ईअरफोन कान में लगाये विवेकानंद स्टेच्यू के आगे से गुज़रते हुए हिंदी विभाग में प्रवेश करती है।
40 लड़कों की कक्षा में प्रवेश करते ही हर विद्यार्थी से कड़ाई से पूछती है, आप में से जिसके पड़ोस में कोई पड़ोसन न हो बाहर हो जाओ। 10 लड़के बाहर चले जाते हैं। फिर पूछती है जिसकी पड़ोसन की भाभी न हो वो बाहर चला जाये। 20 विद्यार्थी फिर बाहर चले गये। 10 शेष बचे। अध्यापिका ने प्रत्येक छात्र से पड़ोसन के अंगोपांग की जानकारियां जुटानी शुरू ही की थी कि टोकने की आदत से मजबूर एक विद्यार्थी ने प्रश्न किया- मैडम ये बलम पिचकारी क्या होती है। मैडम ने साहित्य के सम्मान के लिये तुरंत बलम और पिचकारी के मध्य अल्पविराम लगाया। घर जाकर अध्यापिका अल्पविराम को राखी बांधेगी। यदि अल्पविराम समय पर न आता तो वह छात्र समास रूपी दुश्शासन का प्रयोग कर अध्यापिका का चीर, कोष्ठक में मिनी स्कर्ट, हरण कर लेता।
अभी एक संकट टला ही था कि दूसरा प्रश्न आ गया, मैडम प्रस्तुत पाठ में पड़ोसन की भाभी ही लट्टू क्यों हो रही है, पड़ोसन क्यों नहीं। क्या कवि अपनी प्रेयसी की भाभी पर फ्लैट है? क्या कवि शादीशुदा महिलाओं पर अधिक रीझता है।
अध्यापिका प्रश्न का उत्तर तलाशती इससे पूर्व ही एक और प्रश्न उछला- मैडम, यदि यह कविता किसी कवयित्री द्वारा रचित है तो इसमें लट्टू होने का कर्म पड़ोसन के भैया को करना चाहिये, भाभी को नहीं। और अगर ये कविता कोई कवि लिख रहा है तो बलम की पिचकारी से आहत होकर वह उन्मादी क्यों हुआ जाता है। क्या यह कविता समलैंगिकता का समर्थन करती है?
कक्षा के प्रश्नों से घबराकर अध्यापिका कक्षा से और साहित्यकार कल्पना से बाहर आ गये। पलटते-पलटते एक पृष्ठ पर तुलसी, कबीर दिखाई दिये। आरक्षित से। उपेक्षित से। साहित्यकार ने क्षोभ में भरकर कहा- ये पुस्तक साहित्य की नहीं है। पुस्तक ने इतराते हुए प्रेमचंद का निबंध दिखाया… चुप रहो। इसमें प्रेमचंद हैं, जो प्रेमचंद के साथ छप गया, वो सब साहित्य है।
जाओ अपना रास्ता नापो। मत मानो मुझे साहित्य। छात्र तो मानेंगे ही, 75 में से 55 नम्बर मास्टर की दया पर मिलेंगे। नहीं मानेंगे तो फैल करवा दूंगी चारों सालों कू!

✍️ चिराग़ जैन

सरकारी स्कूलों के बच्चों में संस्कार

श्री श्री रविशंकर ने बयान दिया है कि ”सरकारी स्कूलों के बच्चों में संस्कार नहीं होते।“ सुनकर लगा कि श्री श्री को अपनी खी-खी करवाने का चाव चढ़ा है। उनको कोई समझाये कि सरकारी स्कूलों में तो बच्चे ही नहीं होते। उन टीन वाले कमरों में ‘बाप’ पढ़ते हैं।
अमीरी की चम्मच मुँह में दबाए जन्मने वाले लाटसाहबों को अगर चार दिन इन सीलन भरे कमरों में बैठना पड़ जाये तो वे बिना किसी बाबा की सहायता के ‘सुदर्शन क्रिया’ करने लगेंगे। इसका प्रयोग करने के लिये बाबा स्वयं इन विद्यालयों का दौरा करें, वहाँ पहुँचते ही ‘कोऽहम्- कोऽहम्’ का मंत्र न बोलने लगें तो कहना।
ज़िम्मेदार लोगों को इस प्रकार की ग़ैर-ज़िम्मेदार बातें नहीं कहनी चाहियें। बाकी रही संस्कार की बात तो बाबा किसी दिन छुट्टी के समय कॉन्वेंट स्कूलों के बाहर जाकर देख लेना, संस्कृति और संस्कार किस प्रकार बसों के पीछे खड़े प्रेम और सद्भावना का प्रसार करते हैं, देख कर आपकी देह के विविध प्रदेशों के रोम राष्ट्रगान की मुद्रा में आ जाएंगे।
सरकारी स्कूलों की चुनौतियाँ बेशक़ टॉपर्स की फेहरिस्त तैयार न करने देती हों, लेकिन जीवन जीने का सही ज्ञान इन स्कूलों में आज भी बच्चे टाट्पट्टी पर बैठ कर ग्रहण कर लेते हैं।

✍️ चिराग़ जैन

ट्यूशन का पौराणिक महत्व

ट्यूशन हमारी सांस्कृतिक तथा पौराणिक परम्पराओं का महत्वपूर्ण अंग है। यदि कुछ क्षण के लिए अपना दृष्टिकोण व्यापक करने के लिए पाश्चात्य विद्वानों की तरह सोचा जाए (क्योंकि हमारे यहां वेद-पुराणों की बातें तब तक समझ नहीं आतीं जब तक पश्चिम उसकी व्याख्या न करे) तो हम देखेंगे कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के युग से ही यह महान परम्परा हमारे समाज का अभिन्न अंग रही है।
संत कवि तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में इस परम धर्म की उतनी ही ‘कड़ी अनुमोदना’ की है जितनी कि आज के तथाकथित विद्वान इसकी आलोचना कर रहे हैं। ये और बात है कि अपने पूर्वजों को सम्मान देने के लिए ये आधुनिक विद्वान अपने घरों में इस परम्परा को बन्द करने के लिए कोई विशेष प्रयास नहीं कर पा रहे हैं। ख़ैर छोड़िये इनके घरों को; हम चर्चा कर रहे थे संतकवि तुलसीदास जी की। वे इस महान कर्म से इस हद तक प्रभावित थे, कि इसकी अनुमोदना करते समय वे चैपाई पूरी होने का भी सब्र न रख सके और एक अद्र्धाली मात्र में इस विचार को इन शब्दों में प्रतिपादित कर दिया- ‘गुरु गृह गए पढ़न रघुराई, अल्पकाल विद्या सब आई।’
महाकवि ने यह स्पष्ट किया है कि गुरु के घर जाने से रघुराई जी ने अल्पकाल में ही सारी शिक्षा प्राप्त कर ली थी। अब जब रामायण की बात चली है तो महाभारत का ज़िक्र न करने से बात अधूरी ही रह जाएगी। हालांकि इस देश में बहुत सी बातें महाभारत के ज़िक्र के बावजूद अधूरी ही पड़ी हैं। लेकिन फिर भी, इस सत्य को दरकिनार कर, लेखन की परम्पराओं का निर्वाह करते हुए मैं रामायण के पश्चात महाभारत का ज़िक्र अवश्य करूंगा।
महाभारत में केवल अर्जुन ही एकमात्र ऐसे होनहार विद्यार्थी थे, जो अपने होनहार गुरु से ‘अल्पकाल में शिक्षा पाने के लिए’ नाइट ट्यूशन का सहारा लेते थे। इसी कारण केवल वही ऐसे शिष्य रहे जिन्हें चक्रव्यूह भेदना आता था। यूं सीखा तो एकलव्य ने भी था, लेकिन उसने छिपकर सीखा था, और गुरु द्रोण कोई टटपूंजिये तो थे नहीं जो मुफ़्त शिक्षा दे देते। न ही उन्हें सरकार अनुसूचित जनजातियों के लिए कोई अनुदान दे रही थी, जो वे अपने आश्रम में पिछड़े वर्गोंं के लिए कुछ सीट्स रिज़र्व करते। एकलव्य ने उन्हें धोखा दिया था इसलिए उन्होंने एकलव्य के माध्यम से अपने शिष्यों को ‘जैसे को तैसा’ की अंतिम शिक्षा दे डाली।
गुरुद्रोण के इस ‘अंगूठा काटन कार्यक्रम’ को हम आज भी पूरे ज़ोर-शोर से चला रहे हैं। कुछ इंस्टिट्यूट्स ने तो इस परंपरा का बाक़ायदा विकास भी किया है। ये विकासवादी परंपरा के समर्थक इंस्टिट्यूट्स, शिष्यों का अंगूठा काटने की घटना के बाद हुई गुरु द्रोण की आलोचनाआंे से सबक लेते हुए, इस निश्चय पर पहुंचे हैं कि शिष्यों को सही-सलामत रहने दिया जाए और परम्परा के निर्वाह हेतु उनके अभिभावकों के हाथ-पैर कटवा लिए जाएं। इससे सामाजिक आलोचना भी नहीं होगी और परंपराओं की रक्षा भी हो सकेगी।
हाथ-पैर कटवा चुकने के बाद जब अभिभावकगण अपनी संतानों के शैक्षणिक विकास की भ्रामक आस लिए ट्यूशन वाली या वाले के पास पहुंचते हैं तो ये ट्यूशनधर्मी गुरुजी पहले तो पौराणिक परंपराओं का सम्मान करते हुए शिष्य से उसकी जाति पूछते हैं, फिर बातों-बातों में यह पता लगाते हैं कि इस राधेय/एकलव्य/अर्जुन/दुर्योधन/अश्वत्थामा या कृष्ण के पिता का व्यवसाय तथा सामाजिक कद कैसा है।
यदि शिष्य दुर्योधन, अर्जुन या युधिष्ठिर की तरह राजपरिवार से संबंध रखता हो तो पूरे आश्रम की नीतियां शिष्य की रुचियोें के अनुसार परिवर्तित करना गुरुजी के लिए सहज हो जाता है। आवश्यकता पड़ने पर विदुर या पितामह के हाथों में ही यह निर्णय सौंपा जा सकता है कि आश्रम की आचार-संहिता में क्या-क्या परिवर्तन करने होंगे। हां, ऐसे शिष्यों के प्रवेश के समय गुरुजी इस बात का विशेष ध्यान रखते हंै, कि फीस की चर्चा नहीं करनी। इससे इम्प्रेशन खराब होने का ख़तरा रहता है।
कृष्ण और राम जैसे शिष्य यदि राजपरिवार से संबंध न भी रखते हों तो भी गुरुजी की यह परम इच्छा रहती है कि समाज के ये अनमोल रत्न उन्हीं के इंस्टिट्यूट में अध्ययन करें। इस श्रेणी के शिष्यों की लोकप्रियता गुरुदेव को इस हद तक प्रभावित करती है कि कुछ गुरुश्रेष्ठ तो इनको लेने इनके घर तक जा पहुंचते हैं। इनको पढ़ाने से एक तो गुरुदेव को साख का लाभ मिलता है साथ ही अपना बड़प्पन झाड़ने का सौभाग्य भी प्राप्त होता है। इसलिए पब्लिक पर्सनेलिटी के प्रति गुरुजी का विशेष स्नेह देखने को मिलता है।
अश्वत्थामा श्रेणी के शिष्यों के लिए आश्रम में स्टाॅफ कोटे की सीटें हमेशा रिजर्व होती हैं। इन शिष्यों से गुरुजी और आश्रम दोनों को ही कोई प्रत्यक्ष या परोक्ष लाभ नहीं होता, लेकिन इन्हें पढ़ाना गुरुजी के लिए सामाजिक मर्यादा का प्रश्न होता है।
यदि शिष्य राधेय श्रेणी से संबद्ध हो तो गुरुदेव समझ जाते हैं कि इससे उन्हें कोई ख़ास लाभ होने वाला नहीं है। यदि इससे फीस ली जाती है तो निर्धन से धन लेने के आरोप में गुरुजी की बदनामी होगी; और फ्री में विद्यादान दिया गया तो अपनी दृष्टि में ही गुरुजी को मूर्ख बनना पड़ेगा। इसलिए गुरुजी ऐसी स्थिति में अपने आश्रम की आचार संहिता में तुरन्त परिवर्तन कर डालते हैं। इस परिवर्तन के वक़्त केवल इतना ध्यान रखा जाता है कि आश्रम में प्रवेश लेने के इच्छुक विद्यार्थियों की न्यूनतम योग्यता में कोई ऐसी मांग जोड़ दी जाए जिसे पूरा करना राधेय के लिए मुमकिन न हो। यही कारण है कि प्रवेश के नियम स्पष्ट करने से पूर्व प्रवेशार्थी का आर्थिक, बौद्धिक, सामाजिक तथा मानसिक स्तर अच्छी तरह देख लिया जाता है।
ऐसे शिष्यों को अपने आश्रम से रिक्त लौटा देना गुरुजी की सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए घातक हो सकता है, इसलिए चलते समय गुरुजी इन शिष्यों के एकाध गुणों की तारीफ़ करते हुए उसका नाम परिवर्तन अवश्य कर देते हैं। इससे एक तो गुरुदेव समाज की दृष्टि में महान बनते हैं साथ ही यह ख़तरा भी ख़त्म हो जाता है कि राधेय या इसका बाप बाहर जाकर आश्रम की बदनामी करे।
अंत में नम्बर आता है एकलव्य श्रेणी के शिष्यों का। इन शिष्यों के बाप से गुरुजी खाल या गर्दन उतरवाकर रख लेते हैं। यूं वे हाथ, पैर या अंगूठा आदि भी कटवा सकते थे लेकिन यह सब कुछ तो पहले ही इंस्टिट्यूट वाले कटवा लेते हैं इसलिए सत्यवादी हरिश्चंद्र के देश में पैदा होने के कारण मजबूरी में ट्यूशन वाले गुरुजी को अपना कर्तव्य पालन करते हुए ऐसा घिनौना कार्य करना पड़ता है।

✍️ चिराग़ जैन

अनपढ़ माँ

चूल्हे-चौके में व्यस्त
और पाठशाला से
दूर रही माँ
नहीं बता सकती
कि ”नौ-बाई-चार” की
कितनी ईंटें लगेंगी
दस फीट ऊँची दीवार में
…लेकिन अच्छी तरह जानती है
कि कब, कितना प्यार ज़रूरी है
एक हँसते-खेलते परिवार में।

त्रिभुज का क्षेत्रफल
और घन का घनत्व निकालना
उसके शब्दों में ‘स्यापा’ है
…क्योंकि उसने मेरी छाती को
ऊनी धागे के फन्दों
और सिलाइयों की
मोटाई से नापा है

वह नहीं समझ सकती
कि ‘ए’ को
‘सी’ बनाने के लिए
क्या जोड़ना
या घटाना होता है
…लेकिन
अच्छी तरह समझती है
कि भाजी वाले से
आलू के दाम
कम करवाने के लिए
कौन सा फॉर्मूला
अपनाना होता है।

मुद्दतों से
खाना बनाती आई माँ ने
कभी पदार्थों का तापमान नहीं मापा
तरकारी के लिए
सब्ज़ियाँ नहीं तौलीं
और नाप-तौल कर
ईंधन नहीं झोंका
चूल्हे या सिगड़ी में
…उसने तो
केवल ख़ुश्बू सूंघकर बता दिया है
कि कितनी क़सर बाकी है
बाजरे की खिचड़ी में।

घर की
कुल आमदनी के हिसाब से
उसने हर महीने
राशन की लिस्ट बनाई है
ख़र्च और बचत के
अनुपात निकाले हैं
रसोईघर के डिब्बों
घर की आमदनी
और पन्सारी की
रेट-लिस्ट में
हमेशा सामन्जस्य बैठाया है
…लेकिन
अर्थशास्त्र का
एक भी सिद्धान्त
कभी उसकी समझ में
नहीं आया है।

वह नहीं जानती
सुर-ताल का संगम
कर्कश, मृदु और पंचम
सरगम के सात स्वर
स्थाई और अन्तरे का अन्तर
….स्वर साधना के लिए
वह संगीत का
कोई शास्त्री भी नहीं बुलाती थी
…लेकिन फिर भी मुझे
उसकी लल्ला-लल्ला लोरी सुनकर
बड़ी मीठी नींद आती थी।

नहीं मालूम उसे
कि भारत पर
कब, किसने आक्रमण किया
और कैसे ज़ुल्म ढाए थे
आर्य, मुग़ल और मंगोल कौन थे,
कहाँ से आए थे?
उसने नहीं जाना
कि कौन-सी जाति
भारत में
अपने साथ
क्या लाई थी
लेकिन
हमेशा याद रखती है
कि नागपुर वाली बुआ
हमारे यहाँ
कितना ख़र्चा करके आई थी।

वह कभी नहीं समझ पाई
कि चुनाव में
किस पार्टी के निशान पर
मुहर लगानी है
लेकिन इसका निर्णय
हमेशा वही करती है
कि जोधपुर वाली दीदी के यहाँ
दीपावली पर
कौन-सी साड़ी जानी है।

बेशक़ माँ को नहीं आता
सीधा स्वास्तिक बनाना
पर स्वास्तिक को ख़ूब आता है
माँ के हाथ से बनकर
शुभ हो जाना।

मेरी अनपढ़ माँ
वास्तव में अनपढ़ नहीं है
वह बातचीत के दौरान
पिताजी का
चेहरा पढ़ लेती है

काल-पात्र-स्थान के अनुरूप
बात की दिशा
मोड़ सकती है
झगड़े की सम्भावनाओं को
भाँप कर
कोई भी बात
ख़ूबसूरत मोड़ पर लाकर
छोड़ सकती है

दर्द होने पर
हल्दी के साथ दूध पिला
पूरे देह का पीड़ा को
मार देती है
और नज़र लगने पर
सरसों के तेल में
रूई की बाती भिगो
नज़र भी उतार देती है

अगरबत्ती की ख़ुश्बू से
सुबह-शाम
सारा घर महकाती है
बिना काम किए भी
परिवार तो रात को
थक कर सो जाता है
लेकिन वो
सारा दिन काम करके भी
परिवार की चिन्ता में
रात भर सो नहीं पाती है।

सच!
कोई भी माँ
अनपढ़ नहीं होती
सयानी होती है
क्योंकि
ढेर सारी डिग्रियाँ
बटोरने के बावजूद
बेटियों को
उसी से सीखना पड़ता है
कि गृहस्थी
कैसे चलानी होती है।

✍️ चिराग़ जैन

तुम महान हो

बीज ने वृक्ष से कहा-
“तुम महान हो”

वृक्ष ने उत्तर दिया-
“वृक्ष होने से पहले
मैं भी तुम जैसा ही था
जैसे तुम अब हो
मैं भी पहले ऐसा ही था”

…सुनकर
बीज धरती में गड़ गया
मिट्टी का एक आवरण उस पर चढ़ गया

फिर एक दिन
उसकी सीमाओं का खोल टूटा
उसमें से एक कोमल अंकुर फूटा
धूप-पानी पाकर
धीरे-धीरे वो अंकुर बड़ा हो गया
और एक दिन
मुस्कुराते हुए
वृक्ष के समकक्ष खड़ा हो गया

मनुष्य ने ईश्वर से कहा-
“तुम महान हो”
ईश्वर ने उत्तर दिया-
“ईश्वर होने से पहले
मैं भी तुम जैसा ही था
जैसे तुम अब हो
मैं भी पहले ऐसा ही था”

…सुनकर
मनुष्य इस सीधी-सादी बात के
गूढ़ अर्थ बूझने लगा
और जब कुछ नहीं सूझा
तो ईश्वर को पूजने लगा

✍️ चिराग़ जैन

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