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भारत में समाज सुधारकों की भरमार रही है लेकिन समाज सुधर न सका। इसका यह अर्थ नहीं है कि समाज सुधारकों के मन में कोई बेईमानी थी। इसका कारण यह है कि हमारी ग्राह्यता और उनकी सम्प्रेषणीयता में तारतम्य नहीं था। यदि ऐसा न होता तो एक नानक ही पर्याप्त थे समूची मानवता के लिए। एक महावीर ही बहुत थे प्राणिमात्र के चित्त में अहिंसा की प्रतिष्ठापना के लिए। एक तथागत के बाद अन्य किसी की आवश्यकता ही न होती। ये सब निष्ठा और ऊर्जा के चरम पर पहुँचे हुए लोग थे।
किन्तु हमारी ग्राह्यता इतनी क्षमतावान न हो सकी। हम समझने में चूक कर गए। हम वह सुन ही न सके जो इन सुधारकों ने कहा। हम उनके तत्पर्यों से दाएँ-बाएँ होते रहे। हमने अपने-अपने अर्थ गढ़ लिए।
उन्होंने कहा- ‘कन्या भ्रूण हत्या न करो’। हमने सुना- ‘कन्या के अतिरिक्त सबकी भ्रूण हत्या कर दो।’ उन्होंने कहा- ‘स्त्री को कमज़ोर मत समझो।’ हमने सुना- ‘कमज़ोर तो पुरुष है, उसे कुचल दो।’ उन्होंने कहा- ‘मज़हब के नाम पर मत लड़ो।’ हमने सुना- ‘अन्य किसी भी कारण से लड़ते रहो।’ उन्होंने कहा- ‘दहेज के लिए वधू को मत मारो।’ हमने सुना- ‘दहेज के ऐसे क़ानून बना दो कि वर को मारा जा सके।’
हमने वो सुना ही नहीं, जो वे कहना चाहते थे। उन्होंने सती प्रथा की कुरीति का विरोध किया। किसी जीते जागते प्राणी को चिता में झोंक देने की परंपरा का विरोध किया। उन्होंने विधवा स्त्रियों पर किये जाने वाले अत्याचारों के विरोध किया। लेकिन उन्होंने ऐसा कदापि नहीं कहा कि किसी विधवा स्त्री को उच्छृंखल होने दिया जाय। उन्होंने यह कतई नहीं कहा कि वैधव्य सहानुभूति अर्जित करने का ज़रिया बना दिया जाय।
उन्होंने जाति प्रथा का विरोध किया। मनुष्य को मनुष्य समझने की वक़ालत की। किन्तु हमने उनके इस प्रयास को पलट दिया। हमने पूर्व में शोषित होते रहे मनुष्यों के वंशजों को पूर्व के सवर्ण समुदाय की संतानों से बदला लेने के मार्ग खोल दिये। जिन्हें संभ्रांत बनाना था, उन्हें अराजक बनाने पर तुल गए हम।
नारियों को क़ानून के तराजू पर समानांतर रखने को कहा गया तो हमने क़ानून का तराजू ही झुका दिया। हमने नारी को इतनी हिम्मत न दी कि वह उचककर न्याय तंत्र को छू सके बल्कि हमने न्याय का संतुलित वृक्ष ही नारी के क़दमों में झुका डाला। अब अन्याय उलट गया। एक ही ओर झुकी-झुकी न्याय प्रक्रिया कुबड़ी हो गई है। हम समस्याओं का समाधान ढूंढते-ढूंढते समाधान को समस्या बना बैठे।
हम समझ ही न सके कि धरती पर न होने का अर्थ आकाश में होना नहीं है। लेकिन हम युगों-युगों से धरती से अनुपस्थित लोगों को तारों में ढूंढने की प्रक्रिया में व्यस्त हैं। हम मान बैठे हैं कि यदि कोई आस्तिक नहीं है तो वह नास्तिक ही होगा। हमने धारणा बना ली है कि जो इस्लाम को नहीं मानता वह क़ाफ़िर ही होगा। हम आश्वस्त हो गए हैं कि जो सत्य नहीं बोलता वह असत्य अवश्य बोलेगा।
कैसी मूर्खतापूर्ण मान्यता है। किसी ने कहा कि फलां धर्म का सम्मान करो, और हमने सुना कि बाकी सब धर्मों का अपमान करो। किसी ने कहा कि फलां धर्मग्रंथ में सब सच लिखा है और हम मान बैठे कि बाकी सब ग्रंथ झूठे हैं।
चूक सुधारकों से भी हुई है। उन्होंने प्रापक के स्तर को समझे बिना, उसकी समझ की फ्रीक्वेंसी को मापे बिना ही संदेश भेज दिया। यह समझा ही नहीं कि हवाई जहाज से जाने वाली डाक उस स्थान पर नहीं भेजनी चाहिए जहाँ हवाई अड्डा ही न बना है। संदेश का माध्यम क्या है यह कतई महत्वपूर्ण नहीं होना चाहिए, बल्कि संदेश का प्रभाव कितना है इसको मापदंड बनाना चाहिए।
विशेषणों ने बड़े विचारों की हत्या कर दी। सीधे कहना चाहिए था कि भ्रूण हत्या न करो। बस, बात यहीं सम्पन्न हो जाती। इसमें कन्या या कुमार का प्रश्न ही नहीं उठना चाहिए था। आपको स्पष्ट बोलना था कि न्याय निष्पक्ष होना चाहिए। इसमें स्त्री, पुरुष, दलित, सवर्ण, गोरा, काला जैसे शब्द जोड़ने की आवश्यकता ही नहीं थी। साफ-साफ कह देते कि मांसाहार न करो। इसमें गाय, सूअर, बकरा, कुत्ता न जोड़ते तो संदेश समाधान बन जाता।
ज्ञान की सजावट के चक्कर में आपने समाधान को समस्या बना दिया। आज तक हमने इस ढर्रे को बदला नहीं है। हम अभी तक विशेषणों की लुटिया में समाधान का सागर भरने की होड़ कर रहे हैं और यही कारण है कि हर सामाजिक आंदोलन की लुटिया डूबती जा रही है।
✍️ चिराग़ जैन
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दिल्ली और मुम्बई जैसे शहरों को पूरे देश का सेम्पल मानने की चूक सही नीतियों के निर्माण में सबसे बड़ी बाधा है। जेएनयू, जामिया और डीयू में किसी लड़की को राह चलते परेशान करना या छेड़ना किसी मनचले के लिए महंगा पड़ सकता है लेकिन कानपुर, इलाहाबाद, पटना, बनारस, लखनऊ जैसे शहरों में स्थिति ऐसी नहीं है। इन विश्वविद्यालयों में प्रवेश लेने वाली लड़कियाँ छोटे शहरों, कस्बों और गाँव से आती हैं जहाँ ‘आज भी’ जागरूकता का आलम यह है कि छेड़छाड़ के किसी मुआमले की नुक्कड़-सभाओं में लड़कियों को ही दोषी माना जाता है। यदि कहीं कानूनी प्रक्रिया लड़की का पक्ष ले भी ले तो बाद में सामाजिक कानाफूसी से उपजा जनविरोध लड़कियों के लिए किसी प्रताड़ना से कम नहीं होता। यही वह स्थिति है कि कई शताब्दियों तक ‘बदनामी’ से बचने के लिए लड़कियाँ ‘बलात्कार’ के बाद भी थाने जाने से कतराती रहीं।
दिल्ली जैसे जागरूक शहर में भी आज तक ऐसे मुआमलात खूब होते हैं कि छेड़छाड़ का विरोध करने से पहले लड़की हिचकिचाती है कि लोग उसके बारे में बातें बनानी शुरू न कर दें।
छोटे शहरों की लड़कियों के मस्तिष्क में उनके माहौल ने यह धारणा बना दी होती है कि वे बड़े शहर की लड़कियों जितनी आधुनिक नहीं हैं इसलिए न तो उनमें लड़कों से बात करने का आत्मविश्वास होता है न ही उनकी बदतमीजी का विरोध करने का। उत्तर प्रदेश के अनेक विश्वविद्यालयों में पढ़ रही लड़कियों की स्थिति इतनी दयनीय है कि उन्हें अपने हॉस्टल से मेस तक जाने के लिए भी किसी साथिन की जरूरत होती है। बेंच पर दो-चार लड़के बैठे हों और लड़कियाँ वहाँ से गुजरें तो यह मुमकिन नहीं कि उन पर फब्ती न कसी जाए। यदि किसी लड़की का दुपट्टा पेड़ की झाड़ी में अटक जाए तो वह वहां रुक कर उसे निकालने में समय लगाते हुए अश्लील डायलॉग सुनने की अपेक्षा उसे त्याग कर आगे बढ़ जाना उचित समझती है। शाम के बाद तो सड़क पर किसी भी अकेली लड़की का रास्ता रोकने, हाथ पकड़ने, छातियाँ मसलने और किसी भी हद तक बढ़ जाने का अधिकार लड़कों को मिल जाता है।
इन परिस्थितियों में पढ़ना-लिखना तो दूर, साँस लेना तक कितना दूभर होता होगा इसकी कल्पना करने के लिए कुछ क्षण स्वयं को वहाँ खड़ा करना आवश्यक है। एक लड़का किसी लड़की को दबोच कर चूम ले और फिर रोज शाम अपने दोस्तों के साथ उसकी खामोश लाचारी का जुलूस निकालकर उस पर हँसता हुआ निकले तो कैसा लगता होगा इसका अनुमान लगाना जरूरी है। हॉस्टल के बाथरूम में नहाते हुए किसी लड़की की निगाह ऊपर के झरोखे से टकराए और वहाँ दो आँखें उसे बेशर्मी से टंगी हुई दिखाई दें तो कैसा एहसास होता होगा।
शिक्षाध्य्यन के समय इन संस्थानों की लड़कियों को यह पहेली भी बूझनी होती है कि इनके सामने से गुजरते हुए बेचारे लड़कों को अपने गुप्तांग खुजाने का नियम क्यों निभाना पड़ता है?
मैं हमेशा आश्चर्य करता था कि इस दमघोंटू माहौल में रहकर पढ़ना और फिर अपनी काबिलियत सिद्ध करके उन्नति करना कितना मुश्किल होता होगा। इन छोटे शहरों की लड़कियों का चेहरा अपने ध्यान में लाकर एक बार हम सबको यह प्रश्न स्वयं से करना चाहिए कि इन मासूम परियों को हमने कितनी मुसीबत में डाल दिया है? हमें सोचना चाहिए कि इतनी सारी जिल्लत सहकर भी मौन रहने की इनकी विवशता हमारी कौन सी परंपराओं और संस्कारों के सम्मिलन से जन्मी है?
पहली बार इन डरी हुई बच्चियों ने इस देश के प्रशासन को अभिभावक समझ कर इन हरकतों की शिकायत की है। इन्हें फटकार लगाकर चुप रहने को न कहें। इनके साथ वह सुलूक न करें जो अब तक इनके माता-पिता करते आए हैं। इनके साथ मारपीट न करें हुजूर, सच मानिए, इन्हें किसी लड़के ने छेड़ा इसमें इनका कोई कुसूर नहीं है।
बेटियों को बचाने की जिम्मेदारी प्रशासन उठा ले तो बेटियों को पढ़ाने में किसी परिवार में हिचक न होगी। एक बात और, ये सब लड़कियाँ किसी और मुल्क से भागकर आईं शरणार्थी नहीं हैं, ये हमारे आंगन में गूंजी वही किलकारियां हैं जिनका आकर्षण हमें दफ्तर से घर लौटने के लिए बेताब कर देता है।
✍️ चिराग़ जैन
वाराणसी विश्वविद्यालय में लड़कियों की सुरक्षा की मांग के संदर्भ में।
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सारांश : शिक्षकों की ट्यूशन-लोलुपता ने भारतीय शिक्षा-व्यवस्था को नई ऊँचाइयाँ प्रदान की हैं। युग-युग से योग्य शिष्य ढूंढ़ने में रत शिक्षकों ने अब ग्राहक ढूंढ़कर आत्मकल्याण की राह पकड़ ली है। शिष्य-शिक्षक परम्परा के इस महती परिवर्तन की मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया की सूक्ष्म कथा है यह लेख :
स्वाधीन भारत में शिक्षकों का काफी विकास हुआ है। आज़ादी से पहले हमारे देश में शिक्षकों का इतना विकास नहीं हो सका था। इसका प्रमुख कारण यह था, कि आज़ादी से पहले हम ग़ुलाम थे, अतएव शिक्षकों को अपनी बहुआयामी प्रतिभा दिखाने का अवसर नहीं मिल पाता था। शिक्षक जानते थे कि जो विद्यार्थी स्वयं तैरकर नदी पार कर रहा हो, वह गुरुजी की नैया को कैसे पार लगा पाएगा? जब तक पाठशाला पहुँचने वाले छात्रों के कपड़ों में नदी का जल विद्यमान रहा तब तक शिक्षकों की आँखों में भी जल पाया जाता था अतः वे अपने निजी स्वार्थों को विस्मृत करके, विद्यार्थियों को योग्य मनुष्य बनाने में संलग्न रहते थे। किन्तु अब शिक्षक जान गए हैं कि एक टुच्ची-सी तनख़्वाह के लालच में बेचारे विद्यार्थियों को कूट-पीटकर संस्कारवान मनुष्य बनाने का यत्न कोरा अत्याचार है। पहाड़ों और वर्णमाला जैसी जटिलताओं से हँसता-खेलता बचपन मर जाता है। किताबों के बोझ तले उनकी शरारतें दब जाती हैं। इसलिए आज़ादी के बाद शिक्षकों ने विद्यार्थियों को पढ़ाना बंद कर दिया।
धीरे-धीरे विद्यालयों में एक ऐसा सौहार्दपूर्ण वातावरण विकसित हो गया कि विद्यालय जाने के नाम पर कतराने वाले विद्यार्थी अब बड़े चाव से विद्यालय जाने लगे हैं। शिक्षकों और शिक्षार्थियों के मध्य एक ऐसा अनकहा समझौता हो गया है कि शिक्षकों ने विद्यार्थियों से सम्मान की उम्मीद समाप्त कर दी और विद्यार्थियों ने शिक्षकों से ज्ञान की।
शिक्षक अब जान गए हैं कि मनुष्य के सर्वांगीण विकास के ताले खोलने के लिए कुंजी की आवश्यकता पड़ती है। इसलिए वे विद्यार्थियों को बताते हैं कि नन्दलाल दयाराम की कुंजी में ही सफलता के सूत्र ‘छपे’ हुए हैं। तुम इन कुंजियों से पढ़कर अवश्य उत्तीर्ण हो जाओगे, क्योंकि हम इन्हीं कुंजियों के मुताबिक़ सफलता की राह पर परीक्षा-पत्र के ताले जड़ेंगे।
शिक्षक जान गए हैं कि विद्यालय के शोरगुल में अध्ययन संभव नहीं है। इसलिए वे छात्रों को शांत स्थान पर शिक्षा अध्ययन हेतु प्रेरित करते हैं। शांत स्थान अर्थात् मास्टर जी का घर। छात्र अपने अभिभावकों से गुरु-दक्षिणा की रक़म लेकर मास्टर जी के चरणों में अर्पित कर देते हैं। इस नवधा भक्ति से मास्टर जी के भीतर का दिव्य पुरुष प्रसन्न हो जाता है। वह छात्रों को बिना कुछ किए परीक्षा उत्तीर्ण करने का आशीर्वाद देते हैं। और इसके तुरंत बाद छात्र अन्तर्धान हो जाते हैं। शिक्षक जानते हैं कि छात्र घर से एकांत अध्ययन हेतु निकला है किन्तु वह पथभ्रष्ट होकर सिनेमा की ओर जा रहा है। यह सब जानते हुए भी शिक्षक मौन रहता है क्योंकि वह यह भी जानता है कि उसके घर के रसोईघर में नमक का डिब्बा उसी छात्र के द्वारा प्रदत्त गुरु-दक्षिणा की कृपा से भरा हुआ है। नमक के प्रति कृतज्ञता के भाव से भरा हुआ शिक्षक जानता है कि अपने भरतार के कृत्यों की आलोचना महापाप है।
शिक्षक बच्चों को प्रताड़ित करने में नष्ट होने वाले समय को अब स्टाफ रूम में बैठकर देश और समाज की समस्याओं पर चिंतन करने में उपयोग करने लगे हैं। सरकार द्वारा मिलने वाला बोनस कितना बनेगा; इसकी पाई-पाई कैलकुलेशन गणित के अध्यापक कर देते हैं। सभी शिक्षक काग़ज़ पर गणित के अध्यापक द्वारा लिखी गई आंकड़ों की इबारत पढ़कर धन्य हो जाते हैं। अर्थशास्त्र के अध्यापक बता देते हैं कि बाज़ार में कौन से शेयर का भाव बढ़ने वाला है। इस ज्ञान को प्राप्त करते ही सभी शिक्षकों के अंतर्मन से साधु-साधु की दिव्य ध्वनि निकलने लगती है।
सामान्य ज्ञान के अध्यापक बताते हैं कि अमुक कक्षा में अमुक बिल्डर का बेटा शिक्षाध्ययन कर रहा है। उसे प्रसन्न रखने से टू बीएचके फ़्लैट कम मूल्य पर प्राप्त किया जा सकता है। सभी शिक्षकों के हृदय में उस छात्र के प्रति प्रेम और आदर घुमड़ने लगता है। यकायक उमड़े इस स्नेह को देखकर छात्र डर जाता है। वह अपने बिल्डर पिता से शिक्षकों के इस विचित्र रवैये की शिक़ायत करता है। चिंतित पिता अपने मित्र अर्थात् विद्यालय के सामान्य ज्ञान के अध्यापक को फोन मिलाते हैं। मित्र समस्या को गंभीरतापूर्वक सुनता है और चिंतित स्वर में बिल्डर को मास्टरों की मंशा बता देता है। बिल्डर, मित्र की सहायता से बेटे का दाख़िला किसी अन्य विद्यालय में करवा देता है और मित्र की सहृदयता से प्रसन्न होकर उसे एक थ्री बीएचके फ़्लैट का उपहार दे देता है। सभी शिक्षकों का हृदय अचानक सामान्य ज्ञान के अध्यापक के प्रति घृणा से भर उठता है।
विद्यार्थी, जी तोड़कर परिश्रम करते हैं। शिक्षक भी जी तोड़कर मेहनत करते हैं। किन्तु किसी एक वर्ग का परिश्रम किसी भी स्थिति में दूसरे वर्ग के परिश्रम का मार्ग अवरुद्ध नहीं करता। शिक्षक महोदय परिश्रम करते-करते एक दिन विद्यालय छोड़ देते हैं। छात्रों का परिश्रम एक दिन उनसे विद्यालय छुड़वा देता है। दोनों अचानक एक दिन सब्ज़ी मंडी में लौकी के ठेले पर मिलते हैं। छात्र अभिभूत होकर मास्टर साहब के पैर छू लेता है। मास्टर जी गुरुभक्ति से प्रसन्न होकर लौकी छाँटने में छात्र की सहायता करते हैं। छात्र गुरुकृपा से अनुग्रहीत होकर दाम चुकाने में मास्टर साहब की सहायता करता है।
फिर दोनों अपना-अपना झोला लटकाए जूतियां चटखाते हुए अपनी-अपनी राह पर चल देते हैं। दोनों की आँखें नम हो जाती हैं। दोनों के हृदय में एक जुमला गूंजने लगता है, ‘अहो! शिक्षक-शिष्य सम्बन्ध।’
✍️ चिराग़ जैन
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बचपन में हमें सुनाई गई दादी-नानी की कहानियों में दोस्ती को कभी अच्छी नज़र से देखने की परम्परा नहीं रही। यदि कभी किसी कहानी ने बन्दर और मगरमच्छ में दोस्ती करवाई भी तो उसके सद्भाव को अंततः मगरमच्छ की धूर्तता के हलक़ में उतर जाना पड़ा। एकाध बार शेर और चूहे की असंभव दोस्ती की कहानियाँ सुनाई गईं तो उसको भी स्वार्थ के जाल में बांधकर भौंथरा कर दिया गया। सारस और लोमड़ी की दोस्ती हुई तो सारस की बुद्धिमत्ता का ढोल पीटने के लिए दोस्ती की खीर में नींबू निचुड़वा दिया। हंस और केकड़े की दोस्ती केकड़े की प्रवृत्तियों की भेंट चढ़ गई। कुल मिलाकर बचपन से ही हमारे अवचेतन में ‘दोस्ती-वोस्ती कुछ नहीं होती’ जैसे वाक्य रोंप दिए जाते हैं।
इसके बावजूद हमने ‘कोई जब राह न पाए, तो हरदम साथ निभाए, तेरी दोस्ती तेरा प्यार’ जैसे फ़िल्मी झाँसों में फँसकर कुछ दोस्त बना लिए और उनके साथ धरम-वीर जैसा रिश्ता भी क़ायम कर लिया। लेकिन अवचेतन में पड़े बचपन के बीजों ने जय-बीरू की दोस्ती को राजेश्वर और वीरसिंह की दुश्मनी में तब्दील करके एक-दूसरे की जान का सौदागर बना डाला।
किस्से-कहानियों और फिल्मों से विरक्त होकर धर्मग्रन्थ उठाए तो पता चला कि मनसुखा और कृष्ण जैसे निश्छल सम्बन्ध बचपन में बन जाते हैं जो ‘भाई नी है’ जैसे अजेय मन्त्रों के सहारे निस्पृहता का यज्ञ संपन्न कर लेते हैं। लेकिन किशोरावस्था आते-आते व्यक्तिगत हित इतनी वरीयता तो पा ही लेते हैं कि दाँत किटकिटाने का बहाना बनाकर दोस्त के हिस्से के चने खा जाने में लज्जा आनी बंद हो जाती है। बचपन की इन्हीं ग़लतियों के परिणामस्वरूप गृहस्थी की विपन्नता के बावजूद संपन्न मित्र से सहायता मांगने में संकोच उत्पन्न होने लगता है।
कर्ण और दुर्याेधन की दोस्ती में कुछ गहराई दिखी तो उनका रिश्ता समर्पण की इस सीमा तक चला गया कि एक-दूसरे को सत्पथ पर लाने की बजाय एक-दूसरे के निर्णय का सम्मान करते हुए विनाश के चौबारे तक चले आए। अश्वत्थामा ने अपने प्रतिशोध को दुर्याेधन की मित्रता के रथ पर चढ़ाकर शिशुघात तक का महापाप कर डाला।
मानस् के महानायक ने निषादराज, सुग्रीव, विभीषण जैसे अनेक मित्र बनाए; लेकिन कूटनीति के झरोखे से झाँकने पर ज्ञात होता है कि ये सभी मित्र बनाए हुए मित्र थे, बने हुए नहीं। यह सोद्देश्य मित्रता थी, निस्पृहता का भाव यहाँ आया भी, तो सशंक।
कुल मिलाकर, दोस्ती के नाम पर हमें जो भी रिश्ते मिलते हैं, उन सबके आधार को हमारे अवचेतन में पड़ी कहानियों, पौराणिक सन्दर्भों और सिनेमा की प्रतिच्छाया ने जर्जर किया हुआ है।
✍️ चिराग़ जैन
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देश में डिग्रियों का बोलबाला है। कोई प्रधानमंत्री से डिग्री मांग रहा है तो कोई डिग्री से प्रधानमंत्री। ऐसे में मैं स्पष्ट कर दूँ कि डिग्री देखने की ललक छोड़ कर काम की क्षमता पर ध्यान दो।
प्रोडक्टिविटी और केपेसिटी हो तो डॉक्टरेट की डिग्रियाँ पांचवी फेल डिग्रीलेस को सलाम बजाती हैं। अंगूठा छाप मिनिस्टर हो गए और प्रशासनिक सेवा परीक्षा का अव्वल छात्र उनका सचिव। सर्वाधिक पढ़े लिखे प्रधानमंत्री का अध्यादेश एक मंदबुद्धि बालक फाड़ देता है और कोई कुछ नहीं कर पाता।
दंतकथाओं पर विश्वास करें तो कालिदास से अधिक विद्वान् ‘विलोम’ भाग्यहीन रह गया और विद्योत्तमा का मूढ़ पति युग का महाकवि हो गया। राजनीति में कुछ ऐसे भी हैं जो अपनी असली डिग्री दिखा दें तो विश्वविद्यालय और शिक्षानीति दोनों की क्षमताएँ कठघरे में आ जाएंगी।
जिन गुणों से व्यक्ति महान बनता है उनकी शिक्षा डिग्रियों में नहीं लिखी होती। विजय जी माल्या को कला की कक्षा में नहीं पढ़ाया गया था कि कन्याओं के कितने कपडे उतरवाकर गले में हाथ डालोगे तो फोटो अच्छी आएगी। न ही उन्हें विज्ञान के अध्यापक ने बताया था कि बैंकों के पैसे में विटामिन होते हैं। और तो और फिज़िकल एजुकेशन में भी उन्हें यह पाठ नहीं पढ़ाया गया था कि संकट की स्थिति में किस देश की ओर दौड़ना उचित होगा। …फिर भी माल्या साहब महान बने कि नहीं।
श्री मान केजरीवाल जी से ही पूछ लेते हैं कि उन्होंने अन्ना जी को अधन्ना बनाकर खुद हज़ारी हो जाने का कौशल किस स्कूल में सीखा था? अपने गले में मफलर बाँध कर भाजपा और कांग्रेस का गला घोंटने का पाठ NCERT की किस पुस्तक में शामिल था। अपनी कमीज़ बाहर निकाल कर बाकियों को विधानसभा से बाहर निकालना किस अभ्यास पुस्तिका में लिखा था। फिर भी केजरीवाल जी महान बने कि नहीं।
मोदी जी की विश्वविद्यालय की डिग्री देख कर भी क्या कर लोगे। जो पढ़कर डिग्री हासिल की वो उन्होंने कभी किया ही नहीं। बचपन से पढ़ते आए थे कि बड़े-बुज़ुर्गों का सम्मान करो, उन्होंने किया क्या? बचपन से पढ़ते आए कि ‘अपना घर छोड़ कहीं और न जाया जाए’; वे माने क्या? बचपन से पढ़ते आए कि ‘तोल-मोल कर बोल’ …किस किस चीज़ की डिग्री देखोगे?
सन्नी द्योल ने दामिनी फ़िल्म में एक डायलॉग बोला था। उसी अंदाज़ में समझ लो – “सिसोदिया समझा इसे, काग़ज़ पर छपी हुई ये डिग्रियाँ जमुनापार में बहुत मिलती हैं, लेकिन इनसे कुर्सी पाने का जो मुक़द्दर है ना, वो दुनिया के किसी स्कूल में नहीं मिलता; नेहरू-गांधी खानदान उसे लेकर पैदा होता है। पुलिस की थर्ड डिग्री जब दिखती है ना, तो आदमी बोलता नाहीं …बोल जाता है।”
✍️ चिराग़ जैन