Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
सारांश : शिक्षकों की ट्यूशन-लोलुपता ने भारतीय शिक्षा-व्यवस्था को नई ऊँचाइयाँ प्रदान की हैं। युग-युग से योग्य शिष्य ढूंढ़ने में रत शिक्षकों ने अब ग्राहक ढूंढ़कर आत्मकल्याण की राह पकड़ ली है। शिष्य-शिक्षक परम्परा के इस महती परिवर्तन की मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया की सूक्ष्म कथा है यह लेख :
स्वाधीन भारत में शिक्षकों का काफी विकास हुआ है। आज़ादी से पहले हमारे देश में शिक्षकों का इतना विकास नहीं हो सका था। इसका प्रमुख कारण यह था, कि आज़ादी से पहले हम ग़ुलाम थे, अतएव शिक्षकों को अपनी बहुआयामी प्रतिभा दिखाने का अवसर नहीं मिल पाता था। शिक्षक जानते थे कि जो विद्यार्थी स्वयं तैरकर नदी पार कर रहा हो, वह गुरुजी की नैया को कैसे पार लगा पाएगा? जब तक पाठशाला पहुँचने वाले छात्रों के कपड़ों में नदी का जल विद्यमान रहा तब तक शिक्षकों की आँखों में भी जल पाया जाता था अतः वे अपने निजी स्वार्थों को विस्मृत करके, विद्यार्थियों को योग्य मनुष्य बनाने में संलग्न रहते थे। किन्तु अब शिक्षक जान गए हैं कि एक टुच्ची-सी तनख़्वाह के लालच में बेचारे विद्यार्थियों को कूट-पीटकर संस्कारवान मनुष्य बनाने का यत्न कोरा अत्याचार है। पहाड़ों और वर्णमाला जैसी जटिलताओं से हँसता-खेलता बचपन मर जाता है। किताबों के बोझ तले उनकी शरारतें दब जाती हैं। इसलिए आज़ादी के बाद शिक्षकों ने विद्यार्थियों को पढ़ाना बंद कर दिया।
धीरे-धीरे विद्यालयों में एक ऐसा सौहार्दपूर्ण वातावरण विकसित हो गया कि विद्यालय जाने के नाम पर कतराने वाले विद्यार्थी अब बड़े चाव से विद्यालय जाने लगे हैं। शिक्षकों और शिक्षार्थियों के मध्य एक ऐसा अनकहा समझौता हो गया है कि शिक्षकों ने विद्यार्थियों से सम्मान की उम्मीद समाप्त कर दी और विद्यार्थियों ने शिक्षकों से ज्ञान की।
शिक्षक अब जान गए हैं कि मनुष्य के सर्वांगीण विकास के ताले खोलने के लिए कुंजी की आवश्यकता पड़ती है। इसलिए वे विद्यार्थियों को बताते हैं कि नन्दलाल दयाराम की कुंजी में ही सफलता के सूत्र ‘छपे’ हुए हैं। तुम इन कुंजियों से पढ़कर अवश्य उत्तीर्ण हो जाओगे, क्योंकि हम इन्हीं कुंजियों के मुताबिक़ सफलता की राह पर परीक्षा-पत्र के ताले जड़ेंगे।
शिक्षक जान गए हैं कि विद्यालय के शोरगुल में अध्ययन संभव नहीं है। इसलिए वे छात्रों को शांत स्थान पर शिक्षा अध्ययन हेतु प्रेरित करते हैं। शांत स्थान अर्थात् मास्टर जी का घर। छात्र अपने अभिभावकों से गुरु-दक्षिणा की रक़म लेकर मास्टर जी के चरणों में अर्पित कर देते हैं। इस नवधा भक्ति से मास्टर जी के भीतर का दिव्य पुरुष प्रसन्न हो जाता है। वह छात्रों को बिना कुछ किए परीक्षा उत्तीर्ण करने का आशीर्वाद देते हैं। और इसके तुरंत बाद छात्र अन्तर्धान हो जाते हैं। शिक्षक जानते हैं कि छात्र घर से एकांत अध्ययन हेतु निकला है किन्तु वह पथभ्रष्ट होकर सिनेमा की ओर जा रहा है। यह सब जानते हुए भी शिक्षक मौन रहता है क्योंकि वह यह भी जानता है कि उसके घर के रसोईघर में नमक का डिब्बा उसी छात्र के द्वारा प्रदत्त गुरु-दक्षिणा की कृपा से भरा हुआ है। नमक के प्रति कृतज्ञता के भाव से भरा हुआ शिक्षक जानता है कि अपने भरतार के कृत्यों की आलोचना महापाप है।
शिक्षक बच्चों को प्रताड़ित करने में नष्ट होने वाले समय को अब स्टाफ रूम में बैठकर देश और समाज की समस्याओं पर चिंतन करने में उपयोग करने लगे हैं। सरकार द्वारा मिलने वाला बोनस कितना बनेगा; इसकी पाई-पाई कैलकुलेशन गणित के अध्यापक कर देते हैं। सभी शिक्षक काग़ज़ पर गणित के अध्यापक द्वारा लिखी गई आंकड़ों की इबारत पढ़कर धन्य हो जाते हैं। अर्थशास्त्र के अध्यापक बता देते हैं कि बाज़ार में कौन से शेयर का भाव बढ़ने वाला है। इस ज्ञान को प्राप्त करते ही सभी शिक्षकों के अंतर्मन से साधु-साधु की दिव्य ध्वनि निकलने लगती है।
सामान्य ज्ञान के अध्यापक बताते हैं कि अमुक कक्षा में अमुक बिल्डर का बेटा शिक्षाध्ययन कर रहा है। उसे प्रसन्न रखने से टू बीएचके फ़्लैट कम मूल्य पर प्राप्त किया जा सकता है। सभी शिक्षकों के हृदय में उस छात्र के प्रति प्रेम और आदर घुमड़ने लगता है। यकायक उमड़े इस स्नेह को देखकर छात्र डर जाता है। वह अपने बिल्डर पिता से शिक्षकों के इस विचित्र रवैये की शिक़ायत करता है। चिंतित पिता अपने मित्र अर्थात् विद्यालय के सामान्य ज्ञान के अध्यापक को फोन मिलाते हैं। मित्र समस्या को गंभीरतापूर्वक सुनता है और चिंतित स्वर में बिल्डर को मास्टरों की मंशा बता देता है। बिल्डर, मित्र की सहायता से बेटे का दाख़िला किसी अन्य विद्यालय में करवा देता है और मित्र की सहृदयता से प्रसन्न होकर उसे एक थ्री बीएचके फ़्लैट का उपहार दे देता है। सभी शिक्षकों का हृदय अचानक सामान्य ज्ञान के अध्यापक के प्रति घृणा से भर उठता है।
विद्यार्थी, जी तोड़कर परिश्रम करते हैं। शिक्षक भी जी तोड़कर मेहनत करते हैं। किन्तु किसी एक वर्ग का परिश्रम किसी भी स्थिति में दूसरे वर्ग के परिश्रम का मार्ग अवरुद्ध नहीं करता। शिक्षक महोदय परिश्रम करते-करते एक दिन विद्यालय छोड़ देते हैं। छात्रों का परिश्रम एक दिन उनसे विद्यालय छुड़वा देता है। दोनों अचानक एक दिन सब्ज़ी मंडी में लौकी के ठेले पर मिलते हैं। छात्र अभिभूत होकर मास्टर साहब के पैर छू लेता है। मास्टर जी गुरुभक्ति से प्रसन्न होकर लौकी छाँटने में छात्र की सहायता करते हैं। छात्र गुरुकृपा से अनुग्रहीत होकर दाम चुकाने में मास्टर साहब की सहायता करता है।
फिर दोनों अपना-अपना झोला लटकाए जूतियां चटखाते हुए अपनी-अपनी राह पर चल देते हैं। दोनों की आँखें नम हो जाती हैं। दोनों के हृदय में एक जुमला गूंजने लगता है, ‘अहो! शिक्षक-शिष्य सम्बन्ध।’
✍️ चिराग़ जैन
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बचपन में हमें सुनाई गई दादी-नानी की कहानियों में दोस्ती को कभी अच्छी नज़र से देखने की परम्परा नहीं रही। यदि कभी किसी कहानी ने बन्दर और मगरमच्छ में दोस्ती करवाई भी तो उसके सद्भाव को अंततः मगरमच्छ की धूर्तता के हलक़ में उतर जाना पड़ा। एकाध बार शेर और चूहे की असंभव दोस्ती की कहानियाँ सुनाई गईं तो उसको भी स्वार्थ के जाल में बांधकर भौंथरा कर दिया गया। सारस और लोमड़ी की दोस्ती हुई तो सारस की बुद्धिमत्ता का ढोल पीटने के लिए दोस्ती की खीर में नींबू निचुड़वा दिया। हंस और केकड़े की दोस्ती केकड़े की प्रवृत्तियों की भेंट चढ़ गई। कुल मिलाकर बचपन से ही हमारे अवचेतन में ‘दोस्ती-वोस्ती कुछ नहीं होती’ जैसे वाक्य रोंप दिए जाते हैं।
इसके बावजूद हमने ‘कोई जब राह न पाए, तो हरदम साथ निभाए, तेरी दोस्ती तेरा प्यार’ जैसे फ़िल्मी झाँसों में फँसकर कुछ दोस्त बना लिए और उनके साथ धरम-वीर जैसा रिश्ता भी क़ायम कर लिया। लेकिन अवचेतन में पड़े बचपन के बीजों ने जय-बीरू की दोस्ती को राजेश्वर और वीरसिंह की दुश्मनी में तब्दील करके एक-दूसरे की जान का सौदागर बना डाला।
किस्से-कहानियों और फिल्मों से विरक्त होकर धर्मग्रन्थ उठाए तो पता चला कि मनसुखा और कृष्ण जैसे निश्छल सम्बन्ध बचपन में बन जाते हैं जो ‘भाई नी है’ जैसे अजेय मन्त्रों के सहारे निस्पृहता का यज्ञ संपन्न कर लेते हैं। लेकिन किशोरावस्था आते-आते व्यक्तिगत हित इतनी वरीयता तो पा ही लेते हैं कि दाँत किटकिटाने का बहाना बनाकर दोस्त के हिस्से के चने खा जाने में लज्जा आनी बंद हो जाती है। बचपन की इन्हीं ग़लतियों के परिणामस्वरूप गृहस्थी की विपन्नता के बावजूद संपन्न मित्र से सहायता मांगने में संकोच उत्पन्न होने लगता है।
कर्ण और दुर्याेधन की दोस्ती में कुछ गहराई दिखी तो उनका रिश्ता समर्पण की इस सीमा तक चला गया कि एक-दूसरे को सत्पथ पर लाने की बजाय एक-दूसरे के निर्णय का सम्मान करते हुए विनाश के चौबारे तक चले आए। अश्वत्थामा ने अपने प्रतिशोध को दुर्याेधन की मित्रता के रथ पर चढ़ाकर शिशुघात तक का महापाप कर डाला।
मानस् के महानायक ने निषादराज, सुग्रीव, विभीषण जैसे अनेक मित्र बनाए; लेकिन कूटनीति के झरोखे से झाँकने पर ज्ञात होता है कि ये सभी मित्र बनाए हुए मित्र थे, बने हुए नहीं। यह सोद्देश्य मित्रता थी, निस्पृहता का भाव यहाँ आया भी, तो सशंक।
कुल मिलाकर, दोस्ती के नाम पर हमें जो भी रिश्ते मिलते हैं, उन सबके आधार को हमारे अवचेतन में पड़ी कहानियों, पौराणिक सन्दर्भों और सिनेमा की प्रतिच्छाया ने जर्जर किया हुआ है।
✍️ चिराग़ जैन
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देश में डिग्रियों का बोलबाला है। कोई प्रधानमंत्री से डिग्री मांग रहा है तो कोई डिग्री से प्रधानमंत्री। ऐसे में मैं स्पष्ट कर दूँ कि डिग्री देखने की ललक छोड़ कर काम की क्षमता पर ध्यान दो।
प्रोडक्टिविटी और केपेसिटी हो तो डॉक्टरेट की डिग्रियाँ पांचवी फेल डिग्रीलेस को सलाम बजाती हैं। अंगूठा छाप मिनिस्टर हो गए और प्रशासनिक सेवा परीक्षा का अव्वल छात्र उनका सचिव। सर्वाधिक पढ़े लिखे प्रधानमंत्री का अध्यादेश एक मंदबुद्धि बालक फाड़ देता है और कोई कुछ नहीं कर पाता।
दंतकथाओं पर विश्वास करें तो कालिदास से अधिक विद्वान् ‘विलोम’ भाग्यहीन रह गया और विद्योत्तमा का मूढ़ पति युग का महाकवि हो गया। राजनीति में कुछ ऐसे भी हैं जो अपनी असली डिग्री दिखा दें तो विश्वविद्यालय और शिक्षानीति दोनों की क्षमताएँ कठघरे में आ जाएंगी।
जिन गुणों से व्यक्ति महान बनता है उनकी शिक्षा डिग्रियों में नहीं लिखी होती। विजय जी माल्या को कला की कक्षा में नहीं पढ़ाया गया था कि कन्याओं के कितने कपडे उतरवाकर गले में हाथ डालोगे तो फोटो अच्छी आएगी। न ही उन्हें विज्ञान के अध्यापक ने बताया था कि बैंकों के पैसे में विटामिन होते हैं। और तो और फिज़िकल एजुकेशन में भी उन्हें यह पाठ नहीं पढ़ाया गया था कि संकट की स्थिति में किस देश की ओर दौड़ना उचित होगा। …फिर भी माल्या साहब महान बने कि नहीं।
श्री मान केजरीवाल जी से ही पूछ लेते हैं कि उन्होंने अन्ना जी को अधन्ना बनाकर खुद हज़ारी हो जाने का कौशल किस स्कूल में सीखा था? अपने गले में मफलर बाँध कर भाजपा और कांग्रेस का गला घोंटने का पाठ NCERT की किस पुस्तक में शामिल था। अपनी कमीज़ बाहर निकाल कर बाकियों को विधानसभा से बाहर निकालना किस अभ्यास पुस्तिका में लिखा था। फिर भी केजरीवाल जी महान बने कि नहीं।
मोदी जी की विश्वविद्यालय की डिग्री देख कर भी क्या कर लोगे। जो पढ़कर डिग्री हासिल की वो उन्होंने कभी किया ही नहीं। बचपन से पढ़ते आए थे कि बड़े-बुज़ुर्गों का सम्मान करो, उन्होंने किया क्या? बचपन से पढ़ते आए कि ‘अपना घर छोड़ कहीं और न जाया जाए’; वे माने क्या? बचपन से पढ़ते आए कि ‘तोल-मोल कर बोल’ …किस किस चीज़ की डिग्री देखोगे?
सन्नी द्योल ने दामिनी फ़िल्म में एक डायलॉग बोला था। उसी अंदाज़ में समझ लो – “सिसोदिया समझा इसे, काग़ज़ पर छपी हुई ये डिग्रियाँ जमुनापार में बहुत मिलती हैं, लेकिन इनसे कुर्सी पाने का जो मुक़द्दर है ना, वो दुनिया के किसी स्कूल में नहीं मिलता; नेहरू-गांधी खानदान उसे लेकर पैदा होता है। पुलिस की थर्ड डिग्री जब दिखती है ना, तो आदमी बोलता नाहीं …बोल जाता है।”
✍️ चिराग़ जैन
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अगर इस आग को बढ़ने से रोकना चाहे
तो अपने मुल्क़ को इस आग की ख़बर से बचा
मीडिया की ख़बरों की भूख किस हद तक इस देश की रीढ़ में दीमक की भूमिका अदा कर रही है; इसका अगला उदाहरण है कन्हैया कुमार। कोई भी शख़्स अराजकता के उदाहरण प्रस्तुत करके सुर्ख़ियाँ बटोरे, राष्ट्रीय अस्मिता की लाश पर पाँव रखकर लाइम लाइट में आए और मीडिया द्वारा बने जन समर्थन के आधार पर “बेचारा” अथवा “पीडित” बनकर जेल से बाहर आकर देशभक्ति की जुमलेबाज़ी करे और हीरो बन जाए। और सफ़र सिर्फ़ यहीं ख़त्म नहीं होगा। अचानक से मिली पब्लिसिटी से फूल कर जब यह सद्यजात देशभक्त मीडिया को गाली बके तो यही मीडिया पाला बदल कर उसके पीछे पड़ जाए।
ऐसा क्या हो गया इस देश में कि अख़बार के बैनर से लेकर प्राइम टाइम तक सिवाय कन्हैया कुमार कुछ बचा ही नहीं। और कन्हैया भी वो जो अपने भाषण के दौरान जब मीडिया का धन्यवाद ज्ञापन करता है तो उसमें प्राइमटाइम पर छा जाने की गर्वोक्ति व्यंग्य की शक्ल लेकर उभरती है, जिसे सुनकर वहाँ बैठे अन्य देशभक्त ठहाका लगाते हैं। पूरे देश की मीडिया एक विश्वविद्यालय के छात्रसंघ अध्यक्ष की पीसी कवर करने के लिये ओबी लेकर रिरियाने लगेगी तो कौन स्थितप्रज्ञ रह सकेगा।
“वो बहुत अच्छा बोलताहै”; “वो सबको धो देता है”; वो नया लीडर है” आदि आदि… इन जुमलों को वे समाचार प्रस्तोता और पत्रकार मंत्र की तरह जप रहे हैं, जिन्हें हमने इस देश में सूचनाएँ पहुँचाने का दायित्व सौंपा है।
वो कैसा बोलता है, इससे ज़्यादा महत्वपूर्ण होना चाहिये कि वो क्या बोलता है। एक तरफ़ वह कहता है कि उसे असमानता से आज़ादी चाहिये। दूसरी तरफ़ वह कहता है कि उसे संघवाद से एलर्जी है। एक तरफ़ उसे बोलने की आज़ादी चाहिये दूसरी तरफ़ वह दक्षिणपंथियों को ख़ामोश कर देना चाहता है। एक तरफ़ वह जातिवाद और लिंगभेद से मुक्ति चाहता है, दूसरी तरफ़ वह जातीय आधार पर सुनिश्चित दलितों को प्राथमिकता देना चाहता है।
क्यों भई, समानता की कौन सी सार्वभौमिक परिभाषा में किसी को भी विशेष मानने की वक़ालत मिलती है। कहाँ लिखा है कि दक्षिणपंथी विचारधारा का कोई भी शख़्स किसी भी स्थिति में कोई सही बात बोल ही नहीं सकता।
एक तरफ़ तुम स्वयं को इस देश के हितों का वक़ील घोषित करते हो दूसरी तरफ़ आप आँखो पर पट्टी बांध कर कहते हो कि उमर और अनिर्वाण पर देश द्रोह का मुक़द्दमा इसलिये नहीं चलाया जाना चाहिये क्योंकि जेएनयू का कोई भी विद्यार्थी देशद्रोह होही नहीं सकता। एक तरफ़ आपको इस देश के क़ानून में विश्वास है, दूसरी तरफ़ आप न्यायालय को लगभग चेतावनी देते हुए कहते हैं कि देशद्रोह क़ानून का ग़लत इस्तेमाल नहीं होना चाहिये। अगर तुम्हें इस देश के क़ानून में विश्वास है तो गिरफ़्तारी के बाद तुम्हारी परछाई पकड़ कर लोकप्रियता का बैकुण्ठ तलाशते कुर्ताधारकों को सड़कों पर उतरने की क्या ज़रूरत थी।
तुम इस देश कीराजनीति से निराश नहीं हो कन्हैया। तुम भाजपा, संघ, एवीबीपी और पूरी दक्षिणपंथी विचारधारा के ख़िलाफ़ हो। तुम तथ्य उद्घटित करो, उसमें कोई किसी भी विचारधारा का व्यक्ति अपराधी सिद्ध होकर शीशे में उतरता हो तो स्वीकार है, लेकिन किसी को सिर्फ़ इसलिये अपराधी कहकर उसका मख़ौल नहीं उड़ाने दिया जा सकता कि वह राष्ट्रवादी है।
ये तुम्हारी सोच होगी मिस्टर कन्हैया कुमार, कि जेएनयू का कोई विद्यार्थी देशद्रोही हो ही नहीं सकता। हम इस देश की मूल आत्मा के पक्षधर हैं। हम उन उदाहरणों का अनुकरण करते हैं कि सगा भाई भी अपराधी हो तो उसका विरोध करना हमारा धर्म है।
तुम कहते हो कि स्मृति ईरानी जेएनयू को फ़ैलोशिप देती रहतीं तो उनके ख़िलाफ़ मुर्दाबाद के नारे नहीं लगते। इस बात को खुली धमकी न माना जाए तो और क्या कहा जाएगा। मतलब जो तुम्हें पैसे देगा, वो ज़िंदाबाद और जो नहीं देगा वो मुर्दाबाद। शर्म करो मिस्टर कन्हैया कुमार्। चंद पैसों के लिये किसी की ख़िलाफ़त करने वाले लोग इस मुल्क़ के ख़िलाफ़ कितनी आसानी से खड़े हो सकते हैं; इसकी पोल तुम ख़ुद खोल रहे हो। ख़ैरातों को अधिकार मानने की आदत डाल तो ली है तुमने, इस आदत से बच कर रहना। इन आदतों की नींव पर खड़े किलों की दीवारों का खोखलापन अक्सर ख़ुद ही चीख़-चीख़ कर बता देता है कि हमारे सहारे मत खड़े होना, हम बहुत जल्दी ढह जाएंगे।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Poetry, Unpublished
पहाड़ की
घुमावदार पगडंडी पर
स्कूल जा रही हैं लड़कियाँ।
…मतलब
बचपन में हमें ग़लत पढ़ाया गया था
कि रौशनी
सीधी रेखा में ‘ही’ यात्रा करती है।
✍️ चिराग़ जैन