Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose, Story
पत्रकारिता, सम्राट विक्रम की तरह राजनीति के बेताल को अपनी पीठ पर लादकर, जनमत की यज्ञशाला तक ले आने में समर्थ थी।
जब भी पत्रकारिता, राजनीति को वश में करके यज्ञशाला की ओर चलती, तो बेताल किसी अनावश्यक कहानी में उसे उलझा देता था। भ्रमित विक्रम, यज्ञशाला का लक्ष्य भूलकर कहानी के समाधान में भटक जाता। ज़रा-सी चूक होते ही बेताल हाथ से निकल जाता था और विक्रम देखता रह जाता था।
एक दिन विक्रम ने साधु के हाथ-पैर बांधकर उसे ही पीठ पर लाद लिया। थोड़ी दूर चलते ही बेताल ने दूर बैठकर एक कहानी शुरू की और फिर कहानी बीच में छोड़कर भाग गया।
विक्रम ने साधु को रास्ते में पटका और कहानी पूरी करने निकल गया। इससे पहले कि कहानी पूरी हो, बेताल फिर से कोई नई कहानी उसके हाथ में थमाकर भाग निकला।
अब, साधु बीच रास्ते में बंधा हुआ कराह रहा है। यज्ञशाला पर बेताल ने कब्ज़ा कर लिया है। और विक्रम बेचारा, रोज़ एक कहानी को अधूरा छोड़कर, नई कहानी को पूरा करने में व्यस्त है।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
महाभारत के महाविनाश की दोषी न तो दुर्योधन की हठधर्मिता है, और न ही धृतराष्ट्र की नेत्रहीन महत्वाकांक्षा! महाभारत के युद्ध में जो रक्तपात हुआ उसका गोमुख उस पट्टी से निसृत है जो सनेत्रा गांधारी ने अपने विवेक की आँखों पर बांध ली थी।
ठीक इसी तरह वर्तमान दुर्घटनाओं के लिए न कुम्भ दोषी है, न धर्म और न ही सरकार। इन सब हादसों की अपराधी है अपना विवेक गंवा चुकी जनता।
राजनीति तो हमेशा ही विवेक की आंखें फोड़कर सत्ता पर अधिकार करती रही है। राजनीति की तो यह प्रवृत्ति ही है। किन्तु राजनीति के गलियारों से चलनेवाली उन्माद की आँधी में अपनी व्यवस्था की धज्जियाँ देखकर ताली पीटना आश्चर्यजनक है।
महाभारत इसलिए वीभत्स नहीं था कि उसमें शव गिरे थे, महाभारत इसलिए भयानक था कि उस युद्ध में मृतक के संबंधी शोकाकुल कम और उन्मादी अधिक हो रहे थे।
उन्माद किसी का हित नहीं कर सकता। उन्माद किसी की रक्षा नहीं कर सकता। श्रद्धा की भी एक मर्यादा होती है। नदी में बहता नीर अमृत कहलाता है, किन्तु यही अमृत जब तटबंध तोड़कर जीवन को लीलने लगता है तो इसे माथे नहीं चढ़ाया जाता। मर्यादाहीन नदी भी निंद्य हो जाती है। ऐसे में मर्यादाहीन आस्था कैसे हितकर हो सकती है।
जो लोग परस्पर कुम्भस्नान की याद दिला रहे हैं, वे ही शासन को व्यवस्थित संसाधनों की याद दिलाते रहेंगे तो कुंभकर्ण की नींद सोने वाले जाग सकते हैं। नई दिल्ली स्टेशन पर मरनेवालों के मन में अंतिम समय कुम्भ के प्रति आस्था अधिक रही होगी या व्यवस्था के प्रति क्रोध अधिक रहा होगा या फिर असभ्य नागरिकता के प्रति निराशा… यह तो कोई नहीं जानता, लेकिन यह सत्य है कि धर्म की ओट में खड़ी नाकारा व्यवस्था ने जिस कपड़े में अपना मुँह चुराया है, उसका रेशा-रेशा जनता के अविवेक से बना है।
किसी का कद नहीं ऊँचा हुआ है
मेरी आवाज़ छोटी हो गई है
✍️ चिराग़ जैन
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एक समय वह था, जब भारतीय राजनीति, ट्रेन की जनरल बोगी को कैटल क्लास कहती थी। राजनीति के इस स्टेटमेंट से हम आम भारतीयों को बहुत दुःख हुआ। हमने राजनीति को भरपूर गालियाँ दीं। हमने उन गंदे ट्रेन कोच को और सड़ांध मारते सिस्टम को सुधारने की जगह, उनमें यात्रा करनेवालों को बताया कि देखो तुम्हें मवेशी समझा जा रहा है।
यह जानकर तथाकथित मवेशी बहुत क्रुद्ध हुए। उन्होंने सींग मार-मारकर राजनीति का सिंहासन तोड़ दिया। सत्ता बदल गई। अब आरक्षित बोगी तक ‘ठुँसने’ की सुविधा मिल गई। नई राजनीति ने मवेशियों का धन्यवाद करते हुए उन्हें थ्री टियर एसी तक घुसने की सुविधा दे दी। आरक्षण करवानेवालों के अत्याचारों का बदला लेने के लिए आरक्षण करवाने पर तरह-तरह के कर लगा दिए गए। आरक्षित वरिष्ठ नागरिकों के लिए दी जानेवाली छूट समाप्त कर दी। वेटिंग की टिकट रद्द करवाने पर भी जुर्माना लगा दिया।
आरक्षण करवानेवालों से बदला लेने के लिए उनकी बोगी में नियुक्त अटेंडेंट की भर्ती को निजी कंपनियों को सौंप दिया। अब ये आरक्षित लोग फर्स्ट एसी में सारी रात अलार्म बजाये जाते हैं और ‘नौकरी जाने के भय से मुक्त’ अटेंडेंट कोच की कूलिंग बढ़ाकर सोता रहता है।
अब धीरे-धीरे स्थिति सुधर रही है। अमीर-ग़रीब के बीच की खाई पटने लगी है। व्यवस्था जानती है कि स्लीपर क्लास के शौचालयों को वातानुकूलित जैसा नहीं रखा जा सकता, इसलिए उन्होंने वातानुकूलित कम्पार्टमेंट के शौचालयों को जनरल क्लास जैसा रखना शुरू कर दिया। इसे कहते हैं, ‘समानता का अधिकार’।
निजी ट्रैवल पोर्टल पर रेल की टिकट कन्फर्म न होने पर दोगुने पैसे देने का दावा किया जा रहा है। मैंने एक सरकारी अधिकारी से पूछा, रेल्वे में सेटिंग किए बिना ऐसा दावा कैसे किया जा सकता है। अधिकारी बोले, ‘ऊपरवाला जाने’!
मैं ठहरा मूढ़बुद्धि, ईश्वर को ही ऊपरवाला समझता था, इसलिए सोचा कि उस कोर्पाेरेट कम्पनी के अधिकारी वेटिंग की टिकट को सामने रखकर ईश्वर से प्रार्थना करते होंगे, पाँच वक़्त दुआ मांगते होंगे, मोमबत्ती वगैरा जलाकर प्रेयर करते होंगे और टिकट कन्फर्म हो जाती होगी।
लोग हर समस्या को लेकर सरकार के पास पहुँच जाते हैं। अरे भई, सरकार देश चलाएगी या रेल की टिकटें बेचेगी? सरकार का काम व्यापार करना नहीं है। सरकार तो झंडी दिखाकर ट्रेनें चलाती है, व्यापार तो यार लोग करते हैं। सरकार जिन्हें स्टेशन बेचती है, वे भी कृतघ्न नहीं हैं। वे सरकार से ख़रीदे हुए प्लेटफॉर्म पर विज्ञापन, उद्घोषणा और अन्य तमाम माध्यमों से सत्ताधारी पार्टी के प्रचार करती है। प्लेटफ़ॉर्म पर वेटिंग रूम बंद होने लगे हैं। लेकिन इसमें सरकार क्या करे, सरकार व्यापार नहीं करती, सरकार तो प्रचार करती है। शिकायतों का पूरा तंत्र है, जिसमें शिकायतकर्ता बुरी तरह उलझकर अपना माथा पीटता है, लेकिन सरकार क्या करे, सरकार चुनाव लड़ेगी या गंदे बेडरोल्स और ख़राब खाने की शिकायतें सुनते रहेगी।
कुछ तो शर्म करो, जो अच्छा हुआ है वो नहीं दिखता। रेल्वे स्टेशनों के नाम बदल दिए गए हैं। इसकी तारीफ़ नहीं होती तुमसे! एक आदमी क्या-क्या करे।
जब देखो सरकार पर कीचड़ उछालते रहते हो, जानवर कहीं के! साइड हटो, सरकार को नहाने जाना है!
✍️ चिराग़ जैन
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एक समय था
जब मीडिया वाले भी सच बोलते थे
सरकारी घोषणाओं की कलई खोलते थे
फिर हर तरफ बस एक ही तस्वीर छा गई
क्योंकि देश में भाजपा आ गई
विश्वास करो भाईसाहब
पैट्रोल पंप पर सिर्फ़ ईंधन का व्यापार होता था
फिर आ गई भाजपा
अब वहाँ भी साहिब का प्रचार होता था
ईडी और सीबीआई
लोकतंत्र के सिपाही थे
अपराध और भ्रष्टाचार के लिए तबाही थे
फिर आ गई भाजपा
अब इनके रिमोट ख़ुद जिल्ले-इलाही थे
जो हमसे पंगा ले
उसी को रगड़ दो
कैसे भी करके उस पर एक चार्जशीट जड़ दो
बाद में कोर्ट में डाँट पड़ती हो
तो पड़ने दो
विपक्ष को जेल में सड़ने दो
ख़ुद भाजपा के कार्यकर्ता
सारी ज़िन्दगी मेहनत करते थे
कि कभी तो उनके भी झंडे तनेंगे
आडवाणी जी को उम्मीद थी
कि एक दिन वो कुछ बनेंगे
फिर देश में भाजपा आ गई
सारी उम्मीदों पर पानी फिरा गई
पहले रेलमंत्री रेल का उद्घाटन करते थे
विदेश मंत्री विदेशों में विचरते थे
फिर हर मंत्रालय की योजनाओं पर
एक ही तस्वीर छप-छपा गई
क्योंकि देश में भाजपा आ गई
मंदिर, पद्मावत जैसे मुद्दे छाने लगे
महँगाई को विकास बताने लगे
रोज़गार, ग़रीबी जैसे मुद्दों को
गाय माता चबा गई
क्योंकि देश में भाजपा आ गई
पहले उद्योगपतियों के टैक्स के पैसे से
सरकार भरती थी घाटा
लेकिन फिर लोकहित को करके टाटा
सरकारी कंपनियाँ
उद्योगपतियों की जेब में समा गई
क्योंकि देश में भाजपा आ गई।
आते हुए जो सड़क बनी थी
वो जाने से पहले ही लड़खड़ा गई
क्योंकि देश में भाजपा आ गई
संसद लीक, पेपर लीक
एयरपोर्ट की छत धड़ाम
खिलाड़ी, डॉक्टर, किसान सड़क पर
अधबने मंदिर में श्रीराम
करोड़ों की मूर्ति ध्वस्त
साहिब फोटो खिंचवाने में मस्त
दो-दो इंजन के बाद भी
ट्रेन पटरी को ठेंगा दिखा गई
कमाल ही हो गया
इस देश में भाजपा आ गई
✍️ चिराग़ जैन
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सिस्टम की आपसे केवल इतनी अपेक्षा है कि आप सिस्टम से कोई अपेक्षा न करें। जब कोविड से जूझना हो तो डॉक्टर को सिस्टम का सहयोग करना चाहिए। उस समय, न उसे अपने ड्यूटी ऑवर्स की चिंता करनी चाहिए, न अपनी जान की! ऐसा करते हुए उनकी जान चली जाये तो उनका जीवन सार्थक होगा। सिस्टम की मदद करनेवालों पर फूल बरसाये जाएंगे। उनके लिए सब अपनी बालकनी में खड़े होकर ताली बजाते दिखेंगे! सभी के चेहरे पर डॉक्टर के लिए आदर का भाव उभर आएगा। लेकिन डॉक्टर को जब सिस्टम की सहायता चाहिए, तब सिस्टम अपनी शक्ल पर बड़ा-सा शून्य लटका लेगा। अपनी मांग लेकर डॉक्टर सड़कों पर उतरना चाहेंगे तो उन पर ड्यूटी से लापरवाही का आरोप लगेगा। उन्हें ग़ैर-ज़िम्मेदार बताया जाएगा। उनकी मांगों को अनसुना करते हुए उन्हें कर्त्तव्यों का पाठ पढ़ाया जाएगा। उन्होंने सत्ता के विरुद्ध कोई मोर्चा खोला तो उन्हें राष्ट्रद्रोही और ग़द्दार कहने में भी राजनीति नहीं हिचकिचाएगी।
किसी की जान जाती है तो जाए, पर सरकार की साख नहीं जानी चाहिए।
खिलाड़ी देश के लिए मैडल लायें, यह उनका कर्त्तव्य है। उन्हें अपने जीवन की तमाम सम्भावनाओं को ताक पर रखकर देश के लिए खेलना चाहिए। यही राष्ट्र के प्रति उनका कर्त्तव्य है। लेकिन वही खिलाड़ी अपने खानपान, अपनी न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए; अपने संस्थान में चल रहे किसी कदाचार के लिए या अपने साथ हुए किसी दुर्व्यवहार के लिए सिस्टम और सत्ता की ओर देखे तो सत्ता पहले उस व्यक्ति का भारोत्तोलन करती है, जिस पर आरोप लगाया गया है। यदि उस पर एक्शन लेने से सरकार को कोई फर्क़ नहीं पड़ता तो सरकार उस भ्रष्टाचारी को उठाकर सिस्टम से बाहर फेंक देती है; लेकिन उस पर कार्रवाई होने से सरकार की सेहत पर फर्क़ पड़ता हो तो सरकार खिलाड़ियों को उठाकर जंतर-मंतर से बाहर फेंक देती है।
किसान देश के लिए अधिक अन्न उपजाने में दिन-रात एक कर दे तो सरकार जगह-जगह ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा पुतवा देती है, लेकिन वही किसान, सरकार की किसी नीति का विरोध करना चाहे तो सरकार उसी किसान पर उन्हीं जवानों से लाठीचार्ज करवा देती है। जिन किसानों को अन्नदाता कहकर गीत गाए जाते थे, उन्हीं को ग़द्दार, खालिस्तानी और आतंकवादी कहा जाने लगता है। जिन किसानों के रास्ते में फूल बिछाये गए थे, उन्हीं के रास्ते में काँटे बिछा दिए जाते हैं।
सैनिक देश के लिए सीमा पर मरे तो उसे शहीद कहा जाता है। उसे तिरंगा ओढ़ाकर विदा किया जाता है। लेकिन वही सैनिक अपने को मिलनेवाले खाने की शिकायत कर दे तो उसे अनुशासन का पाठ पढ़ाया जाता है।
सरकार आपको एक नागरिक मानना ही नहीं चाहती। आप सरकार के काम आ रहे हैं तो आपको ‘महान’ माना जाएगा। आपको वॉरियर, देवदूत, भगवान, मनुष्यता का पर्याय और न जाने क्या-क्या कहा जाएगा।
अगर आप सरकार के विरुद्ध हुए तो आपको राष्ट्रद्रोही, ग़द्दार, आतंकवादी, संवेदनहीन, लालची, भ्रष्टाचारी, रैकेटियर जैसे तमगे मिलेंगे। और अगर आपका सरकार से कोई सरोकार नहीं है तब तो आप कीड़े-मकोड़े हैं ही।
यदि नागरिक मान लिया जाए तो न तो किसी को देवता सिद्ध करना पड़ेगा, न हो दानव।
डॉक्टर मरीज़ का इलाज कर रहा है, किसान फसल उगा रहा है, खिलाड़ी खेल का अभ्यास कर रहा है, लेखक लिख रहा है, लिपिक फाइल प्रबंधन कर रहा है -यह सब सामान्य है ना।
लेकिन सरकार तारीफ़ करके हमें हमारे रोज़मर्रा के काम के लिए महान सिद्ध करती है। हम प्रसन्न हो जाते हैं। सरकार हमें बताती है कि तुम विशेष हो। हम स्वयं को विशेष मानकर बाकी सबको समान्य मान लेते हैं। इसी समय बाकी सब भी हमें सामान्य मानते हुए ख़ुद को विशेष मान रहे होते हैं।
हम ख़ुद को विशेष समझकर सरकार की ओर अपेक्षा भरी नज़र उठाते हैं। सरकार अपेक्षा से चिढ़ती है। वह सिस्टम को इशारा करती है कि इस विशेष को इसकी हैसियत बताई जाए।
सिस्टम हमें हमारी औक़ात बताने लगता है। पत्थर हो चुके सत्ताधीशों की ओर अपेक्षा से देखते देखते हमारी आँखें पथरा जाती हैं। सिस्टम हमारी आँख में उंगली डालकर वह पत्थर की आँख निकालता है और हमारे सिर पर दे मारता है।
✍️ चिराग़ जैन