सड़क सौन्दर्य
देश की यातायात व्यवस्था देखकर मेरा मन श्रद्धा से भर जाता है। पूरी दुनिया सड़कों के रास्ते दफ्तर पहुँचती है और दफ्तर पहुँचकर चुनौतियों से जूझने लगती है। हम भारतीय चुनौतियों से जूझते हुए दफ्तर पहुँचते हैं और दफ्तर पहुँचकर चैन की साँस लेने लगते हैं।
अन्य देशों के लोग गाड़ी की पिछली सीट पर बैठकर अख़बार पढ़ते हैं, लेकिन हम सड़कों के अप्रतिम सौंदर्य के कारण गाड़ी में अख़बार नहीं पढ़ पाते, इसलिए दफ्तर पहुँचकर अख़बार पढ़ने लगते हैं।
चूँकि हम भारतीय बड़े दिलवाले लोग हैं इसलिए तीन लेन की सड़क पर पाँच लेन बनाने में कभी नहीं कतराते। सड़क पर बनी सफेद-पीली पट्टियां हमारी शक्ल देखती रह जाती हैं और हम उनके अरमानों को कुचलकर लहराते हुए निकल जाते हैं।
हम पश्चिम की तरह यू टर्न के लिए सड़क को चौड़ा नहीं करते, बल्कि उसके लिए मेन लेन को भी संकरा कर देते हैं। प्रेम गली अति सांकरी…!
होंगे वे और देश जहाँ पैदल चलने के लिए फुटपाथ बनाए जाते हैं। हम वसुधैवकुटुम्बकम वाले तो इन फुटपाथों पर सपरिवार निवास करते हैं। दुनिया बैडरूम में हाइवे का चित्र लगाती है, हम हाईवे पर ही बैडरूम बना लेते हैं। खुले आसमान के नीचे…!
चूँकि सड़कें राष्ट्र की धरोहर हैं, इसलिए इनकी सुरक्षा के लिए यातायात पुलिस की भी सुविधा है। ये कर्मठ सेवक सड़क पर कभी भी, कहीं भी बैरिकेड्स लगाकर चले जाते हैं। इनका विश्वास है कि बैरिकेड्स अपने आप गाड़ियों को नैतिकता की प्रेरणा देते रहेंगे।
बीच के डिवाइडर पर लगी रेलिंग कहीं भी अपनी महान सड़कों के चरण स्पर्श करने सड़क पर उतर आती है। रिपेयर करने के बाद बचे हुए पत्थर, बजरी आदि को वहीं सड़क पर छोड़ दिया जाता है ताकि जनता अपने नेताजी का एहसान याद रख पाए।
पेड़ की डालियाँ अगर झुककर ट्रैफिक सिग्नल का चेहरा छिपा दें तो हम अनुमान से चौराहा पार करते रहते हैं लेकिन डाली और सिग्नल के इस प्रणय में खलल नहीं पड़ने देते।
रेलिंग, बैरिकेड्स, पेड़ों की डालियों, भिखारियों, रेहड़ियों, गड्ढों और कचरे से जो जगह बच जाती है वहाँ मवेशी विचरण करते हैं। क्योंकि ‘सबै भूमि गोपाल की!’
दुनिया को होगा अपने राजमार्गों पर अभिमान। हमने तो ऊबड़-खाबड़ सड़कों के सम्मान में गीत लिखे हैं- ‘गड्डी जांदी है छलांगां मार दी।’
हम भारतीयों का कलाप्रेम देखना हो तो किसी ट्रक का सौंदर्य देख लो। नजरबट्टू से लेकर चुटीले तक सब कलात्मक। यहाँ तक कि हॉर्न में भी गाना भरवा रखा होता है। रात के अंधेरे में रेस-पैडल पर ईंट रखकर पालथी मारकर पैग लगाता ट्रक-ड्राइवर, जब अस्सी-नब्बे की स्पीड में ट्रक दौड़ाते हुए हॉर्न से मधुर संगीत बजाने लगता है तो ऐसा लगता है, मानो स्वर लहरियां बिखेरती हुई किसी गंधर्व की सवारी आ रही है।
मैंने अपने ड्राईवर से पूछा कि ख़तरा किसे कहते हैं तुम्हें पता है। उसने बाईं ओर स्टीयरिंग घुमाकर एक गाड़ी को ओवरटेक किया और बोला- “साहब, ख़तरा तो बाएं हाथ का खेल है।”
✍️ चिराग़ जैन

रुपया क्यों लुढ़कता है
जो लोग रुपये के गिरने के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं, उन्हें मैं साफ़-साफ़ बता देना चाहता हूँ कि रुपया सरकार के कारण नहीं, तुम्हारी फटी हुई जेब के कारण गिरता है।
यदि तुमने अपनी जेब सिल ली होती तो रुपया नहीं गिरता। सरकार उचित नीतियां बनाकर सारा रुपया अपने पास सुरक्षित करना चाहती है तो जनता शोर मचाने लगती है।
अब ले लो मज़े, और रखो अपने पास। अब गिर गया ना रुपया। अब पड़ गया चैन?
जेब नहीं सिल पाए तो कम से कम जुबान ही सिल लो। देश की करंसी के विषय में ऐसी गिरी हुई बातें करनेवालों को राष्ट्रद्रोही करार देकर पाकिस्तान भेज देना चाहिए।
जिसे गिरना हो वो गिरेगा ही। शादियों में लोग आसमान की ओर रुपये उछालते हैं, लेकिन रुपया फिर ज़मीन पर आ गिरता है। अब जिसे गिरने की आदत पड़ गई हो, उसे कोई कहाँ तक उछाल सकेगा?
सोशल मीडिया पर रुपये की गिरावट को लेकर बड़ा मज़ाक बनाया जा रहा है। ये काफ़ी गिरी हुई हरकत है। गिरते को गरियानेवाला नजरों से गिर जाता है।
रुपया बेचारा कब से ललचायी नज़रों से नब्बे के अंक को देख रहा था। हमारी नीतियों ने अथक परिश्रम करके उसे नब्बे पार करवाया है। इस उपलब्धि पर सरकार की पीठ थपथपाई जानी चाहिए लेकिन जिन्हें केवल आलोचना करनी है उनका कोई इलाज नहीं है।
यह सरकार का बड़प्पन है कि दूसरों की गलतियों की सज़ा चुपचाप भुगत रही है। दरअस्ल रुपया नेहरू जी के कारण गिरता है क्योंकि नेहरू जी ने रुपया गोल बनाया। अब गोल है तो लुढ़केगा ही। यदि उन्होंने रुपया चौकोर बनाया होता तो रुपया कभी नहीं गिरता।
डॉलर ने रुपये को छेड़ते हुए कहा- “आज खुश तो बहुत होगे तुम। जो रुपया गिरे हुओं को भी चढ़ा देता था, आज वो ख़ुद गिरा पड़ा है।”
इस पर रुपये ने खनकता हुआ जवाब दिया- “गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में।”
डॉलर ने चिकोटी काटकर बात आगे बढ़ाई- “रुपये को उठाना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है।”
रुपये ने थोड़ा दार्शनिक होते हुए जवाब दिया- “कौन कमबख्त उठने के लिए गिरता है, हम तो गिरते हैं ताकि बाज़ार उठ सके।”
डॉलर फिर बोला- “बाप का, दादा का, भाई का, सबका बदला लेगा रे, तेरा डॉलर।”
रुपया गिरे हुए गुरूर से बोला- “मुझ पर एक एहसान करना, मुझ पर कोई एहसान मत करना।”
डॉलर ख़ुद पर इतराते हुए बोला- “हमारा डॉलर गिरा होता तो हमारी सरकार उसे उठाने के लिए जी-जान लगा देती।”
अब हमारे नेताजी बोले- “मैं आज भी गिरे हुए पैसे नहीं उठाता डॉलर सेठ!”
डॉलर अपना सा मुँह लेकर रह गया। हमारे नेताजी ने जेब से रुपया निकाला और ख़ुद की नजर उतारते हुए डायलॉग बोला- “बाबूमोशाय, बात ऊँची होनी चाहिए, सच्ची नहीं।”
✍️ चिराग़ जैन

मास्टर स्ट्रोक से सारे प्रदूषण पर लगाम
पुराने समय में किसी नगर में एक यशस्वी राजा राज्य करता था। एक बार सभी राजकीय कर्मचारियों ने राजा की महा आरती का आयोजन किया। राजकाज के सभी कर्मचारी अपने-अपने विभाग के बजट के अनुरूप दीप, धूप, लौबाण, गुग्गल और न जाने कितनी ही सामग्री बटोर लाए।
आयोजन बहुत भव्य था। धूप के धुएं ने आकाश तक जाकर राजा की लोकप्रियता के फरमान पर हस्ताक्षर किए। धीरे-धीरे यह धुआं राजा के विरोधियों की आँखों में चुभने लगा। विरोधियों की आँखें लाल हुई तो प्रजा की भी साँस घुटने लगी।
विरोधी, जनता की कराह को चीख बनाने पर तुल गये और मंत्रियों ने कराह की आवाज़ को आरती के मंजीरे की आवाज़ घोषित करके राजा की पूजा जारी रखी।
जब धुएं से ख़ुद राजा की ही साँस उखड़ने लगी तो राजा ने मंत्रियों से पूछा कि इस धुएं का क्या करें?
मंत्रियों ने राजा को सुझाव दिया कि और तो कुछ नहीं हो सकता लेकिन ये धुआं प्रजा की आँखों में झोंकने के काम आ सकता है।
समाधान सुनकर राजा की आँखें चमक उठीं। उसने अपने काबिल मंत्रियों की ओर प्रशंसा भरी नजरों से देखा।
एक मंत्री बोला, ‘हुज़ूर, हम इस धुएं को धोकर राजा की सौगात के रूप में जनता को बांट देंगे।’
‘लेकिन धुएं को धोया कैसे जाएगा?’ एक चिढ़ोकड़ा मंत्री बोला।
”पानी से धुलाई होगी जनाब, और कैसे धोयेंगे?’ पहला मंत्री गुफी पेंटल के अंदाज़ में खिसियानी हँसी हँसते हुए बोला।
राजा को सुझाव पसंद आया, पूरे राज्य में मुनादी हो गयी कि “सब अपने-अपने घर के ऊपर छाये धुएं को धो-पोंछकर साफ़ करेंगे। जिसके घर के ऊपर ज़हरीला धुआं मिला, उसको राजा के आदेश से देशनिकाला दे दिया जाएगा।”
मुनादी काम कर गई, देशनिकाले के डर से जनता ने अपने-अपने ऊपर के आसमान को साफ़-सुथरा कहना शुरू कर दिया। समाजसेवी संगठनों ने जगह-जगह कैंप लगाकर हवा में पानी उछाला और धुएं की धुलाई में उल्लेखनीय योगदान दिया। वैद्य-हकीमों ने धुएं में साँस लेने के चिकित्सीय लाभ बताकर प्रजा को जागरूक किया। हरकारों ने घर-घर संदेश पहुँचाया कि राजा की बेहतरीन शासकीय क्षमता से प्रजा की आँखों से ख़ुशी के जो आँसू बहे, उन्हीं आँसुओं से सारा धुआं धुल गया।
विरोधियों ने जिस आसमान को सिर पर उठा रखा था, उसी आसमान को शीशे की तरह साफ़ बताकर प्रजा ने विरोधियों के सिर पर दे मारा।
इसे कहते हैं मास्टर स्ट्रोक।राजा ने एक मुनादी से प्रदूषण की चौतरफा सफाई कर दी।
पानी बहा, इससे जल प्रदूषण समाप्त हो गया। धुआं धुल गया इससे वायु प्रदूषण ख़त्म हुआ। जिनकी आँखों में राजा की ख्याति खटक रही थी, उनकी आँखों का कचरा साफ़ हो गया।
और विरोधियों की बोलती बंद हुई इससे ध्वनि प्रदूषण पर भी लगाम लग गई।
डिस्क्लेमर: इस कहानी के सभी पात्र काल्पनिक हैं।यदि इसमें दिल्ली के प्रदूषण के दर्शन हों तो यह केवल एक इत्तफाक होगा।
✍️ चिराग़ जैन

क्रांति
उम्मीद से भरी आँखों में धूल झोंकी जाए तो उन आँखों से लावा फूटने लगता है। कराह को अनसुना किया जाए तो कराह चीख बन जाती है। और चीख बड़े-बड़े राजवंशों की चूल हिलाने का सामर्थ्य रखती है।
✍️ चिराग़ जैन