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रक्षाबंधन

‘बंधन भी सुख का कारण हो सकता है’ – इस अद्भुत सत्य का अनोखा उदाहरण है रक्षाबंधन! यद्यपि मैं जानता हूँ कि ईश्वर ने सृष्टि के प्रत्येक प्राणी को आत्मरक्षा हेतु आत्मनिर्भर बनाया है तथापि मुझे इस बात का एहसास है कि नाड़ी पर एक धागा बांधकर मन में अपनत्व की जिस अपेक्षा को गतिमान किया जाता है; वह संवेदना के स्नायु तंत्र को आनन्दित कर देती है।
कोई हम पर इतना अधिकार रखे कि हमें अपनी रक्षा का दायित्व सौंप दे… अहा! इस अनुभूति से मन कितना बलिष्ठ हो उठता है।
सम्भवतः हम इस त्यौहार की इस अलौकिक ख़ुशी को सही से समझ ही नहीं सके हैं। इसीलिए हमने इसको किन्हीं अर्थों में परिहास बना डाला है। यदि किसी लड़की को अहसास हो जाए कि अमुक परिचित लड़का उसके प्रति प्रेम का भाव रखता है, अथवा उसे प्रपोज़ करनेवाला है तो वह लड़की उसको राखी बांधने निकल पड़ती है! उधर लड़के को अनुमान हो जाए कि जिससे वह प्रेम करता है, वह उसे राखी बांधने की जुगत में है तो लड़का राखी से बचने का उपाय खोजने लगता है!
इस परिस्थिति के दोनों ही पात्र बचकानी हरकतें कर रहे हैं। जिसकी नीयत में तुम्हें खोट दिखाई दे रहा है, उसको राखी जैसे सम्मान से सम्मानित कैसे किया जा सकता है? और जिसकी तुम राखी से भयभीत हो, उससे तुम कम से कम प्रेम तो कभी नहीं कर सकते!
राखी एक पदक है। राखी एक सम्मान है। यदि कोई स्त्री किसी पुरुष को इस सम्मान के योग्य समझती है तो यह उस पुरुष के लिए गौरव का विषय है। सोशल मीडिया और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के इस युग में जब स्त्री-पुरुष सम्बन्धों को भौंडा करके परोसने के सभी द्वार खुले हैं ऐसे में राखी का एक धागा संवेदनाशून्य होते सम्बन्धों पर संवेदना के काँचुकीय की भूमिका निर्वाह करता है।
✍️ चिराग़ जैन

होली

बेतरतीबी से लगाया जाये
तो गुलाबी रंग से भी आदमी पागल हो जाता है
और सलीके से लगाया जाये
तो काला रंग भी काजल हो जाता है।

✍️ चिराग़ जैन

वसीयत

वो दौर गये जब लोग वसीयतों में ज़मीन-जायदाद छोड़कर जाते थे, आजकल तो चार सोशल मीडिया अकाउंट्स, कुछ हज़ार फॉलोवर्स और दस-पाँच ब्लॉक्ड प्रोफाइल्स से ज़्यादा किसी के पास कुछ नहीं है छोड़ने को…

सफेद बाल और अरथी देखकर वैराग्य घटित होनेवाली कहानियां सुनकर बड़े हुए थे, पर अब पता चला कि व्हाट्सएप-इंस्टाग्राम थोड़ी देर को बन्द हो जाए तो जीवन निरर्थक लगने लगता है।

✍️ चिराग़ जैन

पायल की रुनझुन

हर एक मुहूरत का जग में सत्कार मुझी से सम्भव है
बाक़ी सब कुछ सम्भव है पर परिवार मुझी से सम्भव है

बर्तन की खनखन चौके में
पायल की रुनझुन आंगन में
मेरे होंठो पर सजती है
गीतों की गुनगुन सावन में
जीवन के सोलह सपनों का सिंगार मुझी से सम्भव है
बाक़ी सब कुछ सम्भव है पर परिवार मुझी से सम्भव है

हर रोज़ सुबह की रंगोली
होली, दीवाली मुझसे है
रिश्तों की शोभा मुझसे है
घर की ख़ुशहाली मुझसे है
जीवन की पहली कोशिश का सत्कार मुझी से सम्भव है
बाक़ी सब कुछ सम्भव है पर परिवार मुझी से सम्भव है

बचपन में माँ का नाम हूँ मैं
यौवन की मीठी शाम हूँ मैं
अस्वस्थ बुढापे की ख़ातिर
हर इक पीड़ा पर बाम हूँ मैं
जीवन की हर इक दुविधा का उपचार मुझी से सम्भव है
बाक़ी सब कुछ सम्भव है पर परिवार मुझी से सम्भव है

✍️ चिराग़ जैन

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