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होली

सबके जीवन में भरें पावनता के रंग
ऐसी रंगत लाए अब, होरी अपने संग

अब ऐसे मनने लगा, होली का त्यौहार
चेहरे स्याह-सफेद हैं, रंगे हुए अख़बार

भूले से भी मत करो, पॉवर का मिस-यूज़
भस्म हो गई होलिका, उड़ा पाप का फ्यूज़

✍️ चिराग़ जैन

मेहमानों का आना-जाना

वो, जिनके घर मेहमानों का आना-जाना होता है
उनको घर का हर कमरा, हर रोज़ सजाना होता है
जिस देहरी की किस्मत में स्वागत या वंदनवार न हो
उस चौखट के भीतर केवल इक तहख़ाना होता है

✍️ चिराग़ जैन

मूल से कटकर

एक दिन
पीपल के पत्तों को
हवा ने बरगलाया!
फिर शरारत से भरे लहजे में
उनका गात छूकर
कान में यूँ फुसफुसाया-

“तुमको अंदाज़ा नहीं
क्या रूप है तुमको मिला
इस नाकारा पेड़ की
शोभा के तुम आधार
तुम जो चाहो तो हवाएँ ले चलें तुमको
दूर परियों के सुनहरे देस
अम्बर पार!
ये ख़नकती देह धर कर भी
भला क्योंकर
ढो रहे हो बोझ तुम इस ठूठ का बेकार
वृक्ष की तो ज़िन्दगी है
जड़, अचल, लाचार
तुम भला क्यों झेलते हो
ये नियति की मार?

बादलों की पालकी पर बैठकर हम-तुम
छोर नापेंगे धरा के
और गगन के आज
मैं बहूंगी
हाथ मेरा थाम लेना तुम
फिर करेंगे हम जहाँ के हर चमन पर राज।”

कुछ ने सुनकर अनसुनी कर दी
हवा की बात
और कुछ कमज़र्फ़
बह निकले हवा के साथ।
पर बढ़े वे थामने को जब हवा का हाथ
सब हवाई बात निकली कुछ न आया हाथ।
छू तलक पाए नहीं पत्ते
हवा का छोर
और हवा हौले से बह निकली
गगन की ओर।

आ गिरे धरती पे
जो थे फुनगियों के ताज
सरगमों पर छा गई
इक कर्कशी आवाज़।
क्या इसी को बोलते हैं सब ‘समय का फेर’
जो ख़नकते थे, वो हैं अब एक सूखा ढेर
स्वप्न वो देखें गगन के और परिस्तां के
जो न हो पाए सगे अपने गुलिस्तां के
मूल से छूटें तो जीवन को तरसते हैं
और जुड़ कर पेड़ से पत्ते खनकते हैं

अब कोई झोंका हवा का
जब कभी भी छेड़ जाता है
तड़पते हैं सूखे पत्ते
और पीपल खिलखिलाता है।

✍️ चिराग़ जैन

अंधानुकरण

कजरी, गारी, फाग, जोगीरे भूल गए
बंसी, तबले, ढोल, मंझीरे भूल गए
इतनी तेज़ी से दुनिया की ओर बढ़े
अपने घर को धीरे-धीरे भूल गए

✍️ चिराग़ जैन

पनिहारी

पानी भरने को पनिहारी पनघट चली
मटकिया मटकती कटि में दबात है
गोरी के बदन की छुअन ऐसी मदभरी
मदहोश गगरिया झूम-झूम गात है
अंग-अंग में सुगन्ध ता पे मतवारी चाल
मोरनी भी नत है, हिरनिया भी मात है
चूम-चूम पतली कमरिया गुजरिया की
गगरिया गोरी संग ठुमका लगात है

क्वारी पनिहारी लिए झारि जो मटक चली
झारि वाला वारि झारि विच झूमने लगा
बूंद-बूंद टूट, कूद-कूदकर बारी-बारी
गोरी के ललाट को पकड़ घूमने लगा
क़िस्मत एक जलकण की थी उजियारी
भृकुटि से नासा पै लटक लूमने लगा
जरा-सा जतन कर होंठ की किनारी छुई
मीठे रस-भरे अधरों को चूमने लगा

मद-भरी बून्द नैक नीचे कू उतर आई
मतवारी चाल मदहोश-सी ढलक थी
होले-होले तन की सवारी पर चली; तब
नज़रों में तोष की कमाई की चमक थी
साँवरी की गर्दन पर डोल लहराई
चाल में षोडषी की कमर-सी लचक थी
गोरी के बदन में उतर जाऊँ भीतर लौ
ऑंख में सपन और श्वास में महक थी

इत बून्द बढ़ै उत चूनरी की ऑंख कढ़ै
गोरी को कलेजो घेर लयो पल भर में
उजरौ हिया तनि चुनरिया तैं ढँक गयो
पथ पै घनो अंधेर भयो पल भर में
चूनरी तैं अँखियाँ बचाय बढ़ चली बून्द
पर चूनरी ने हेर लयो पल भर में
तब बून्द हारी बकी गारी दारी चूनरी को
करनी पै पानी फेर दयो पल भर में

✍️ चिराग़ जैन

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