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सिस्टम का सिस्टम

पड़ी कुँए में भांग है, भली करे करतार
होरी के घर लूट में, मुखिया हिस्सेदार
मुखिया हिस्सेदार, शिक़ायत किससे करता
आखिर थाने में जा पहुँचा डरता-डरता
लिखा रपट में गया, रुपैये गए जुए में
मिला उसे यह ज्ञान, भांग है पड़ी कुँए में

✍️ चिराग़ जैन

कार्यपालिका बनाम न्यायपालिका

सोशल मीडिया पर पुलिस को मिल रही बधाइयों को देखकर लगता है कि कार्यपालिका ने न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण किया है। अगर न्यायपालिका की आँखों में थोड़ा भी पानी होगा तो लोकतंत्र में शून्य होते अपने अस्तित्व को बचाने के लिए स्वतः संज्ञान लेगी, अन्यथा देश का लोकतंत्र पुलिसिया राज की भयावहता की ओर बढ़ने के लिए तैयार है।

✍️ चिराग़ जैन

एनकाउंटर

आठ दिन से देश एक ऐसी फिल्म देख रहा था, जिसका क्लाइमेक्स पहले से पता था। विकास दुबे जैसे घिनौने अपराधियों की मृत्यु होनी तय थी, किन्तु एक बार फिर कष्ट इस बात का है कि समस्या की जड़ को बचाने के लिए, एक शाखा काट कर संतोष कर लिया गया।
दो स्थितियाँ हो सकती हैं-
यदि यह एनकाउंटर सच है तो उत्तर प्रदेश सरकार और उत्तर प्रदेश पुलिस को इसका श्रेय और बधाई देनेवाले लोग पुलिस की कार्यशैली पर प्रश्नचिन्ह लगा रहे हैं। उनका हर ट्वीट यह घोषणा कर रहा है कि उत्तर प्रदेश पुलिस ने क़ानून की आँखों में धूल झोंकते हुए विकास दुबे को मौत के घाट उतार दिया। और अगर यह एनकाउंटर फर्जी है तो भी दो स्थितियाँ हो सकती हैं। पहली यह कि इस खेल के मास्टरमाइंड को बचाने के लिए पुलिस ने छोटे-मोटे गुर्गे निपटा दिए। अर्थात् पुलिस अभी भी किसी आपराधिक प्रवृत्ति के मस्तिष्क के इशारों पर नाच रही है।
दूसरी यह कि पुलिस को लगता है कि कानूनी दाँव-पेंचों का उपयोग करके कोई अपराधी छूट न निकले, इस कारण पुलिस ने ‘फैसला ऑन द स्पॉट’ करके न्याय किया है। अर्थात् स्वयं सिस्टम को ही सिस्टम पर भरोसा नहीं है।
दोनों ही सूरतों में इस देश की न्याय व्यवस्था और पुलिस महकमे की पुनर्समीक्षा अपरिहार्य हो जाती है।

✍️ चिराग़ जैन

अपराध का सिस्टम

विकास दुबे की गुंडागर्दी को खाद-पानी देनेवाले जो लोग थे, वे उसी महकमे में काम करते थे, जिसे इस तंत्र ने जनता की सुरक्षा हेतु तैनात किया है। ये महक़मा जनता के टैक्स के पैसों से चलता है और जनता को ही थाली में रखकर अपराधियों के आगे पेश कर देता है।
जिन लोगों के साथ विकास दुबे और उसके गैंग ने ज़्यादतियाँ की होंगी, वे बेचारे भी पुलिस को अपना दोस्त समझकर थाने गए होंगे…. उनके साथ थाने में क्या-क्या हुआ होगा यह कल्पनातीत है।
भारत की जनता भी क़माल है और तंत्र भी। अपराधी के लिए सिस्टम मददगार है और पीड़ित के लिए मकड़जाल। आम नागरिक थाने जाते हुए थर्राता है और अपराधी थाने में बैठकर चाय पीते हैं।
किसी निर्दाेष को सज़ा न हो जाए, इस वाक्य की ओट में पूरी न्याय व्यवस्था को ध्वंस कर चुका यह तंत्र उन लोगों के विषय में क्या जवाब देगा, जिन्हें पुलिस की मदद से पल रहे अपराधियों ने तबाह कर दिया।
एक बार अपने दिल पर हाथ रखकर सोचिए कि इस देश में किसी शरीफ़ आदमी के साथ कुछ ग़लत हो जाए तो ‘व्यवहारिक धरातल पर’ उसको कहाँ जाकर गुहार करनी चाहिए?

✍️ चिराग़ जैन

माई लाॅर्ड

महिला का एक बयान
आपको
जेल की सलाखों के पीछे पहुँचा सकता है;
इसलिए
शरीफ़ आदमी
महिला से पंगा लेने से डरता है।

…लेकिन अपराधी नहीं डरता
अपराधी तो
सबको एक नज़र से देखता है
आदमी-औरत, सवर्ण-दलित
ऊँच-नीच, छोटा-बड़ा;
इन सबसे अपराधी को क्या मतलब पड़ा?

अपराधी
लिंग और जाति देखे बिना
सीधा अपराध पर आता है;
इसलिए झट से अपराध कर जाता है।
लेकिन क़ानून झट से न्याय नहीं कर पाता है।
क़ानून को सब कुछ देखना पड़ता है;
इसलिए अपराधी ख़ुद को
निर्दोष साबित करने की बजाय
केवल कमज़ोर साबित करता है।
कमज़ोर साबित होते ही
न्याय उसके पक्ष में झुक जाता है
और निष्पक्षता की उम्मीद का पहिया
रुक जाता है।

इसीलिए
शरीफ़ आदमी कचहरियों से डरता है
और अपराध;
(चाहे दाएँ कठघरे में खड़ा हो या बाएँ में)
झुके हुए क़ानूनों के दम पर अकड़ता है।

शराफ़त का तो पता नहीं माई लॉर्ड!
पर बेईमानी को पहचानना
बेहद आसान है
जो अपनी कमज़ोरी का कार्ड दिखाकर
ख़ुद को ईमानदार साबित करे
वह सबसे बड़ा बेईमान है।

✍️ चिराग़ जैन

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