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चौरकर्म

फेसबुक के प्रयोक्ताओं को रोज़ कुछ अच्छा स्टेटस डालने का शौक तो चर्रा गया है, लेकिन इसके साथ अपनी सृजनात्मक क्षमता बढ़ाने की ललक नहीं जगी। ऐसे में दूसरों की प्रोफाइल से स्टेटस या स्टेटसांश कॉपी करके अपनी timeline पर पेस्ट करने की प्रवृत्ति बढ़ गयी है। इसमें कोई बुराई तो नहीं है, लेकिन कष्ट तब होता है जब उसके नीचे से मूल लेखक का नाम गायब कर दिया जाता है।
जिनके अपने बच्चे नहीं होते वो दूसरों के चुरा लें क्या। ज़्यादा शौक़ है तो बच्चा गोद ले लो। गोद लेने वाली स्त्री को चरित्रहीन तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन बच्चा चुरा लेने वाली स्त्री अपराधिन अवश्य कहलाती है।
किसी की बात पसंद आये तो उसको कॉपी-पेस्ट करने की बजाय शेयर करने में क्या दिक्कत है भाई। कॉपी-पेस्ट करने में लेखक का नाम न लिखो तो “अज्ञात” या “फ़ॉर्वर्डेड” ही लिख दो।
विचार या रचनाएँ चुरानेवाले लोग कभी दो कौड़ी के दो शब्द भी ख़ुद लिख कर देखें। उसके बाद शब्दकोष में भी उन शब्दों को उसी क्रम में देख कर दुःख न हो तो कहना। किसी की रचना चुराने वाले बुरे लोग हैं। ऐसे लोगों का बहिष्कार करें और इसको स्वच्छ भारत अभियान का ही एक हिस्सा समझें।
-चौरकर्म पीड़ित

✍️ चिराग़ जैन

पीड़ा जगनी थी

अन्तस् में पीड़ा जगनी थी, यह निर्धारित था
ठेस अपेक्षा से लगनी थी, यह निर्धारित था
रत्ना तो बस बानक भर थी, पूरे किस्से में
तुलसी को मानस् रचनी थी, यह निर्धारित था

✍️ चिराग़ जैन

बँटवारा

आदमी की तरह
जन्मते ही बँट जाते हैं
भाव भी
अलग-अलग जातियों में
अलग-अलग धर्मों में।

प्रसव की पीड़ा
भावों की दुनिया में भी
एक जैसी है।
और वहां भी
आ चुकी है
कवि का पेट चीरकर
सर्जिकल डिलीवरी की प्रक्रिया।
बढ़िया ही है
इस तकनीक में दर्द नहीं सहना पड़ता!

देवनागरी की देह में क़ैद भावों को
कई बार देखा है
फ़ारस और रोमन के डीएनए से मैच होते।
भावों में भी देखे गए हैं
अनैतिक सम्बन्ध
आदमी की तरह।
भाव भी मरते हैं
आदमी की तरह।

भावों ने बहुत कुछ सीखा है
आदमी से।
लेकिन आदमी
कभी नहीं सीख पाया
एक भाषा में रहते हुए
कई भाषाओं में
अनुवाद हो जाने की कला।

हम फैलाना चाहते हैं
बाइबल को
गीता को
कुरआन को
जातक को
आगम को।
लेकिन समेट लेना चाहते हैं
अपने ईसा
अपने कृष्ण
अपने पैगम्बर
अपने बुद्ध
अपने महावीर।

हमने शास्त्र बना दिया है
किताबों को
विस्तृत करके।
और इंसान बना दिया है
भगवान को
संकुचित कर के।

✍️ चिराग़ जैन

मन की कविता

कविता मेरे अस्तित्व का आधार है। यदि मुझसे मेरी कविताओं को श्रेणीबद्ध करने को कहा जाए तो मैं अपनी तमाम रचनाओं को दो वर्गों में रखूंगा- एक ‘मंच की कविता’ और दूसरी ‘मन की कविता’। ‘मंच की कविता’ रोज़ रात को कवि-सम्मेलनों में तालियाँ और वाह-वाही लूटती फिरती है। लेकिन ‘मन की कविता’ ऐसा नहीं कर पाती। वह किंचित संकोची है, मेरी तरह। वह मेरे नितान्त एकाकी क्षणों में मेरे चारों ओर लास्य करके संतोष प्राप्त कर लेती है।

यात्राओं से थका-हारा जब बिस्तरानुगामी होता हूँ तो हौले से आकर मेरे सिरहाने बैठ जाती है, कभी नयन कोर पर आ ठहरती है, तो कभी अधरों पर एक मुस्कान का चुंबन जड़ जाती है। इसे शोर-शराबा, हो-हल्ला और भीड़-भाड़ कतई पसंद नहीं। यह तो बेहद सरल शब्दों का चोगा पहने मुहल्ले की उस अनपढ़ गृहिणी सी मेरे साथ चलती है, जिसकी उपस्थिति को तो मैं अनदेखा कर सकता हूँ लेकिन उसकी अनुपस्थिति की ख़लिश को नहीं।

इन कविताओं ने कभी मुझसे झगड़ा नहीं किया, कभी रूठी भी नहीं। लेकिन पिछले कुछ दिनों से एक ख़्वाहिश करने लगी थीं। एक ज़िद्द सी कर रही थीं। मैं इस ज़िद्द से परेशान न हुआ। बल्कि मुझे ऐसा लगा जैसे कोई छोटी सी बच्ची मेरे वक़्त के बटुए में से चार-आठ आने की मांग कर रही हो। तेज़ भागती ज़िन्दगी के बीच भी मुझे यह मांग नाजायज़ न लगी।

बस, यकायक धारणा की कि नया संग्रह प्रकाशित होना है। बेतरतीब सफ़हों पर बिखरा ख़ज़ाना देखते ही देखते किताब की शक़्ल में ढल गया। पुस्तक प्रकाशन के निश्चय से अब तक की यात्रा स्वतः एक कविता में उतर आई है-

आजकल
अपनी ही लिखी हुई
कविताओं से बतियाता हूँ।
सहेजता हूँ उनको
एक-एक कर।

…कई दिन से ज़िद्द किये बैठी थीं
कहती थीं-
“हमें जिल्द में बांधों।”

आख़िर माननी ही पड़ी
उनकी बात।
अब इस पर झगड़ा है
कि पहले कौन?

लड़ाकी हो गई हैं
सारी की सारी।

सोने देती हैं
न बैठने।
…लगाए रखती हैं
हिल्ले से।

सचमुच!
बेटी ब्याहने जैसा काम है
किताब बनाना।

✍️ चिराग़ जैन

# “मन तो गोमुख है” संग्रह की भूमिका

ब्लॉगर होगा पहला कवि

युग बीत गये हैं अब
प्रकृति, बरखा
या दर्द
सहायक सामग्री
नहीं है अब
कविता के लिये!

…अब नहीं जन्मती कविता
वियोग या संयोग से!

आजकल
फ़ेसबुकिये हो गये हैं
वाल्मीकि और तुलसीदास!

“ब्लॉगर होगा पहला कवि
पोस्ट से उपजा होगा गान!”

✍️ चिराग़ जैन

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