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गंगा और शव

कौन कहता है कि गंगा में लाशें बह रही हैं अब तो लाशों में गंगा बह रही है। कौन कहता है कि प्रशासन साम्प्रदायिक भेदभाव करता है प्रशासन तो सब लाशों से एक जैसा बर्ताव करता है। कौन कहता है नदी किनारे मानव सभ्यता पनपती है अब तो नदी तट पर मानवता की रूह दहलती है। साहेब! एक बात...

अकेला

हर दिन बढ़ता ही जाता है मेरे आंगन का वीराना और अकेला कर जाता है हर दिन कोई यार मुझे ✍️ चिराग़ जैन

मदद की होड़

रेगिस्तान की दोपहर में पानी को तरस रहा एक प्यासा तपती हुई रेत में पड़ा था; ऊपर से सूरज का भी रुख कड़ा था। उसको पानी देने के लिए केंद्र सरकार ने बिल पास किया; राज्य सरकार ने भी उसका स्वतः संज्ञान लिया। लेकिन ज्यों ही राज्य सरकार का कारिंदा मदद लेकर प्यासे की ओर बढ़ा, उसके...

श्मशानों में चहल-पहल है

सबके एकाकी मन में हैं जाने कितनी शोक सभाएँ पीपल के पेड़ों ने पूछा इतने घण्ट कहाँ लटकाएँ हर पल पर डर का कब्ज़ा है, हर क्षण पर दहशत के पहरे घाव दिलों पर इतने गहरे, हँसना भूल चुके हैं चेहरे आँखें रोकर पूछ रही हैं कितने आँसू और बहाएँ पीपल के पेड़ों ने पूछा इतने घण्ट कहाँ...

नया धर्म : सेंड टू ऑल

आज मुझे एहसास हुआ कि हमारे देश में कोई आम आदमी है ही नहीं। हर नागरिक के दुनिया के बड़े से बड़े आदमी से डायरेक्ट कॉन्टेक्ट हैं। और सबको ही कोई कल्पवृक्ष टाइप की सिद्धि प्राप्त है। यही कारण है कि जब उन्हें पैनडेमिक से संबंधित कोई पुख्ता जानकारी चाहिए होती है तो उनके...
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