Chirag Jain Writings, Geet, Lapete Mein Netaji, Poetry
जब तक टिकट नहीं कट जाती
तब तक सब कुछ चलता है
सब कुछ है चलता है
टिकट का कटना खलता है
जिस पुलवामा की घटना को साज़िश आप बताए
उस घटना के घटने पर क्यों दल को छोड़ न पाए
जिसकी खाट खड़ी हो जाए
वो ही आँखें मलता है
आंखें मलता है, टिकट का कटना खलता है
राष्ट्रपति को गूंगा-बहरा कहते नहीं हिचकते
बीजेपी में रहकर क्यों ये बात नहीं रख सकते
जबसे पार्टी बदली कर ली
तबसे जियरा जलता है
जियरा जलता है
टिकट का कटना खलता है
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
हम घटना और व्यक्ति में अन्तर करना क्यों नहीं सीख पाते। हमारी मान्यता ऐसी क्यों है कि जिसकी एक ग़लती सिद्ध हो गयी है, वह अन्य सब जगह भी ग़लत ही होगा। एक ही व्यक्ति एक जगह सही और दूसरी जगह ग़लत क्यों नहीं हो सकता।
हमारा समाज लम्बे समय से इस रोग से ग्रस्त है कि जिसे हमने नायक मान लिया उसके प्रत्येक कार्य को सही मान बैठे और जिसका एक कृत्य ग़लत हुआ उसके व्यक्तित्व से घृणा कर बैठे।
इसी प्रवृत्ति का दुष्परिणाम है कि जब कोई किसी राजनैतिक निर्णय का विरोध करता है तो बाक़ी सब लोग यह कहने लगते हैं कि कल तक तो तुम अमुक का समर्थन करते थे, आज विरोध कर रहे हो। यही कारण है कि किसी घटना अथवा निर्णय का विरोध या समर्थन करनेवाले को किसी व्यक्ति का विरोधी या समर्थक घोषित कर दिया जाता है।
हाल ही में हुई अर्नब गोस्वामी की गिरफ़्तारी के संदर्भ में उठने वाली आवाज़ से अर्नब, शिवसेना, भाजपा, कांग्रेस, राष्ट्रवाद, वामपंथ या अन्य किसी संज्ञा के पक्ष-विपक्ष की प्रतिध्वनि सुनने के प्रयास में हम भारतीय लोकतंत्र की उस बीमारी को अनदेखा कर रहे हैं जो बड़ी तेज़ी से उभरकर पटल पर आना चाह रही है।
अर्नब गोस्वामी की गिरफ़्तारी इस बात का प्रमाण है कि राजनीति अपने विरोधियों को दबाने के लिए कार्यपालिका का प्रयोग करती है। वहीं सुसाइड नोट में नामज़द होने के बावजूद तीन आरोपियों पर कोई कार्रवाई न होना भी इस बात का प्रमाण है कि रसूखदार लोग राजनैतिक प्रभाव से न्याय की मशीनरी से खिलवाड़ कर सकते हैं।
इस घटना से यह एक बार फिर सिद्ध हुआ है कि पुलिस जाँच में जो अपराधी सिद्ध हुआ है, वह निर्दाेष भी हो सकता है और पुलिस जिसे निर्दाेष क़रार देती है वह अपराधी भी हो सकता है। इस घटना से न तो केवल पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर प्रश्नचिह्न लगा है, न ही केवल राजनीति की कार्यशैली का पर्दाफ़ाश हुआ है। इस घटना से उस कार्यपालिका की ईमानदारी तथा निष्ठा कठघरे में आ खड़ी हुई है, जिसके हाथों में इस लोकतंत्र ने आंतरिक सुरक्षा का दायित्व सौंपा हुआ है।
प्रश्न न तो किसी उद्धव ठाकरे का है न ही किसी संजय राउत का; मुद्दा न किसी अर्नब का है न ही किसी रिया या कंगना का। प्रश्न यह है कि इस देश में सत्ता पर क़ाबिज़ मस्तिष्कों के हाथ में कठपुतली की तरह नाचता तंत्र इस देश के लोक का कितना और कैसा कल्याण कर सकता है? प्रश्न यह है कि इस देश का कोई भी नागरिक किसी राजनैतिक गलियारे की नज़रों में खटकते ही एक पूरी क़ौम का दुश्मन कैसे बना दिया जाता है। प्रश्न यह है कि जब कोई व्यक्ति समस्त राजनैतिक दलों की समान स्वार्थवादी सोच पर सवाल उठाने की कोशिश करता है तब अचानक उसके चरित्र, उसकी राष्ट्रभक्ति, उसका व्यक्तिगत जीवन और उसकी ईमानदारी के विवाद का शोर क्यों मचने लगता है?
एक अभिनेता के रूप में शत्रुघ्न सिन्हा मेरी पसंद या नापसंद हो सकते हैं, किंतु इस आकलन से मेरी उनके राजनैतिक जीवन के प्रति राय का अनुमान क्यों किया जाता है? एक प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी के किसी निर्णय से मैं सहमत या विमत हो सकता हूँ किन्तु इससे उनके व्यक्तित्व के विषय में मेरी राय का आकलन क्यों किया जाता है? मैंने कभी मुनव्वर राणा की शायरी का अनुमोदन किया हो तो इसका यह अर्थ कैसे हो गया कि मुझे उनके विवादित बयानों से भी उतनी ही मुहब्बत होगी?
पुलिस की कार्यशैली से मैं असंतुष्ट हूँ तो इसका यह तात्पर्य कैसे हो गया कि मैं पुलिस रहित समाज का पक्षधर हूँ? न्याय व्यवस्था की धीमी गति और पेचीदा औपचारिकताओं के विरोध में कुछ कहने का यह अर्थ कैसे हो गया कि मुझे न्यायपालिका से रहित अराजक लोकतंत्र चाहिये?
अगर मैं अमुक से नफ़रत नहीं करता हूँ तो इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि मैं उससे प्यार करता हूँ। ‘हाँ’ का अभाव ‘न’ नहीं है। जीत न पाने का अर्थ हार जाना नहीं है। जीवित न होने का अर्थ मर जाना नहीं है।
हम अपने पूर्वग्रहों के कारण जजमेंटल होने के आदी हो गये हैं। समाज की इसी जल्दबाज़ी का लाभ उठाकर राजनैतिक स्वार्थ साधे जा रहे हैं। आपकी एक उक्ति को संदर्भ बनाकर आपके पूरे जीवन और चरित्र का चित्र प्रस्तुत किया जाता है। और मज़े की बात यह है कि वह उक्ति भी राजनीति के तत्कालीन स्वार्थों के अनुरूप बदलती रहती है।
जब वसुंधरा राजे मैदान में होंगी तो कांग्रेसी कार्यकर्त्ता रानी लक्ष्मीबाई की मदद न करने के ग्वालियर घराने के अपराध गिनाएंगे। जब ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ेंगे तो भाजपाई उनके खानदान को जी भर-भर कोसेंगे और राष्ट्रद्रोही सिद्ध करेंगे। फिर जब ज्योतिरादित्य भाजपा में आ जाएंगे तो भाजपावालों से सिंधिया खानदान के लिए निर्मित सभी अपशब्द कांग्रेस वाले ख़रीद लेंगे।
नीतीश कुमार, मोदी जी को कम्यूनल कहकर इस हद तक घृणा प्रदर्शित करते हैं कि उनके माध्यम से सहायतार्थ मिलने वाला चंदा भी उनको स्वीकार नहीं होता। बाद में राजनैतिक समीकरण देखते हुए वे ही नीतीश कुमार उन्हीं मोदी जी का फोटो दिखाकर वोट मांगने लगते हैं। सारी ज़िन्दगी कांग्रेस की यशोगाथा गानेवाले सचिन पायलट, अशोक गहलोत के विरुद्ध गाली-गलौज करते हैं और फिर सब रास्ते बन्द होते देख उन्हीं अशोक गहलोत को बुज़ुर्ग बताकर उनकी शरण स्वीकार कर लेते हैं।
स्वार्थों के इस घिनौने खेल में समाज, धर्म, कार्यपालिका, पत्रकारिता और यहाँ तक कि मनुष्यता की भी बोली लगायी जा रही है। भारतीय समाज के हितैषी वे लोग नहीं हैं जो किसी के चाबी भरते ही खिलौने की तरह कलाबाज़ी खाने लगते हैं, बल्कि भारत का भविष्य उन लोगों की ओर निहार रहा है जो नकारखाने में तूती की आवाज़ को भी सुनने की क्षमता रखते हैं।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
बलात्कारी कहीं आसमान से नहीं आते। हम जैसे ही सामान्य दिखनेवाले लोग होते हैं, ये वीभत्स अपराधी। स्त्री सुरक्षा को लेकर जो कुछ बातें बनाई जाती हैं, उनकी निस्सारता हर बार उघड़कर सामने आती है। हमारे यहाँ रात-बेरात लड़कियों को अकेली जाने पर मनाही थी। लेकिन निर्भया काण्ड से पता चला कि किसी का साथ होना भी काम नहीं आता। बुलन्दशहर कांड में तो पिता के सामने माँ-बेटी को एक साथ रौंदा गया।
अब रात और दिन का भी कोई अर्थ नहीं रहा। हवस ने अब घड़ी देखना बन्द कर दिया है। बलात्कारी भी शेष समाज की तरह अमीर-ग़रीब, शिक्षित-अशिक्षित, अगड़े-पिछड़े, हिन्दू-मुस्लिम कई प्रकार के होते हैं। अमीर बलात्कारी यकायक किसी को खेत में जाकर दबोचने से परहेज करता है। वह बाक़ायदा आर्थिक, सामाजिक अथवा अन्य किसी प्रकार का दबाव बनाकर लड़की के साथ इत्मीनान से सालों तक बलात्कार कर सकता है। जबकि ग़रीब बलात्कारी के पास न तो ऐसा कोई लोभ होता है, न धैर्य। इसलिए वह मौक़ा देखते ही वीभत्स होने में यक़ीन करता है।
कुछ विशेष किस्म के बलात्कारी घर से यह सोचकर नहीं निकलते कि उन्हें बलात्कार करना है। वे तो बस हाथ आये अवसर का लाभ उठाते हुए कभी लड़की की छातियाँ मसलते दिखते हैं तो कभी दंगों या बलवों का लाभ उठाकर लूटपाट के साथ बलात्कार भी कर देते हैं। यह सब इतना अचानक घटित होता है कि न तो बलात्कारी को पुलिस की वर्दी बदलने का वक़्त मिलता है, न ही किसी धर्म विशेष का पटका गले में से उतारने की सुधि रहती है। शायद बलवों में विरोधी धर्म की बहन-बेटियों की आबरू लूटना वीरता माना जाता हो। अन्यथा किसी धर्म की रक्षार्थ निकले जत्थों में एक न एक व्यक्ति तो इस कर्म का विरोध करने के लिए आगे ज़रूर आता।
हर दुर्दांत कांड के बाद हम सरकार से कड़े कानूनों की मांग कर बैठते हैं। सरकारें भी अपनी राजनीति बचाने के लिए क़ानून बना देती हैं, लेकिन जब भी कोई लड़की अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए अथवा किसी से अन्य बदला लेने के लिए इन कानूनों का दुरुपयोग कर रही होती है, तब वह किसी नए बलात्कार की नींव रख रही होती है। जब-जब इन कानूनों का दुरुपयोग होता है तब-तब समाज ऐसी घटनाओं के प्रति संवेदनहीन होता जाता है।
हैदराबाद, बुलंदशहर, कानपुर, हाथरस, अलवर, दिल्ली, गुवाहाटी… ये सब शहर ऐसी घटनाओं पर शर्मिंदा होकर अपनी बेटियों के आगे लज्जित हो चुके हैं। कॉलेज परिसर से लेकर खेत-खलिहानों तक और न्याय के मंदिर से लेकर धर्म के मंदिरों तक इस अपराध ने पैर पसारे हैं। यौन-कुंठित नपुंसकता जब पौरुष का भरम पाल लेती है, तब बलात्कार होता है। अत्याधुनिक बनने की होड़ जब ‘ओपन माइंडेड कल्चर’ की आड़ में असभ्य शब्दावली को सामान्य मानने लगती है, तब बलात्कार होता है।
स्कूल से निकलती बच्चियों से लेकर कचरा बीनती अधेड़ तक; तीन महीने नई नवजात से लेकर 80 वर्ष की वृद्धा तक, असुरक्षा के इस अभिशाप को झेलती हैं। मतलब साफ़ है, बलात्कार किसी शारीरिक सुख की प्राप्ति का ज़रिया नहीं, बल्कि पाशविक प्रवृत्ति के मुखर हो जाने का परिणाम है। और इस प्रवृत्ति को खाद-पानी देने में समाज का प्रत्येक वर्ग समान अपराधी है।
हम सबको अपने समाज में पनप रही इस पशुता को अपने-अपने स्तर पर नष्ट करना होगा, क्योंकि तंत्र से अपेक्षा रखकर हम अब तक कई बेटियों की ज़िंदगी बर्बाद कर चुके हैं।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
जिस समस्या का कोई समाधान न हो उस समस्या को ही समाधान मान लेना चाहिए। इस महान विचार से प्रेरित होकर हम समाधान को समस्या बना देने में निष्णात हो गए।
देश को स्वतंत्रता मिली तो राजभाषा का प्रश्न उठा। प्रश्न उठते ही हमने वही किया जो हम करते आए हैं। हमने धड़ल्ले से राजभाषा के विभाग खोल दिये। थोक के भाव निदेशालय और संस्थान बनाकर हिंदी को सरकारी तंत्र में ऐसा उलझाया कि प्रश्न उठानेवालों की बोलती बंद हो गई। स्वयं हिंदी को निरीक्षणों और तिमाही रपट के ऐसे थर्ड डिग्री टॉर्चर मिलने लगे कि हिंदी आज तक उस आदमी को कोस रही है जिसने उसके उत्थान का प्रश्न उठाया था।
क्या ज़रूरत थी यह सब करने की। अच्छी-भली लोगों के मुँह पर चढ़ी थी। उसे उठाकर सरकारी दफ़्तरों में ला पटका। जब कभी हिंदी दिवस आता है या राजभाषा समिति का निरीक्षण आता है तब इसे नहला-धुलाकर पेश कर दिया जाता है और निरीक्षण सम्पन्न होते ही पुनः दफ्तर के सबसे बदबूदार कोने में पटक दिया जाता है।
यह निरीक्षण भी क़माल होता है। देश की सबसे बड़ी पंचायत से कुछ पंच दफ़्तरों का निरीक्षण करने निकलते हैं। निरीक्षण की न्यूनतम शर्त यह है कि दफ़्तर किसी रमणीक स्थल पर बना हो। क्योंकि वे जानते हैं कि जब हिंदी की फाइलों में कुछ नहीं मिलेगा तब निहारने को प्राकृतिक सौंदर्य की आवश्यकता पड़ेगी। वैसे भी जो माँ प्रकृति से दूर हो वह माँ हिंदी के क़रीब कैसे हो सकता है।
बहरहाल, निरीक्षण की सूचना मिलते ही दफ़्तर के अधिकारियों से लेकर कर्मचारी तक काम पर लग जाते हैं। मुख्यालय में नियुक्त राजभाषा अधिकारी तुरंत निरीक्षण के निशाने पर आए दफ़्तर में प्रकट हो जाते हैं। रात-दिन जागकर निरीक्षकों के लिए श्रेष्ठतम प्रवास की व्यवस्था की जाती है। मुख्यालय इस पुनीत कार्य हेतु अलग से बजट की व्यवस्था करता है। प्रत्येक निरीक्षक के लिए अलग से गाड़ी तैनात होती है। उनके पर्यटन की योजना बनाई जाती है। उनके भोजन के मेन्यू सेट किये जाते हैं। उन्हें प्रकारांतर से उपहार देने की प्लानिंग होती है। ये सब महत्वपूर्ण कार्य सम्पन्न होने के बाद दफ़्तर की सभी नाम-पट्टिकाएँ गर्म-गर्म देवनागरी में पकाकर परोसने की तैयारी होती है। और निरीक्षण से ठीक पहले कार्यालय में हिंदी के कामकाज की फाइलें चकाचक कर दी जाती हैं।
यद्यपि मंत्रालय के पत्र में यह स्पष्ट लिखा जाता है कि उपरोक्त व्यवस्था सम्बन्धी व्यय नहीं करना है। तथापि राजभाषा के अनुभवी अधिकारी जानते हैं कि निर्देश में लिखा गया ‘नहीं’ पढ़ने के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए।
निरीक्षकों का कर्मठ दल हवाई अड्डे से ही निरीक्षण प्रारम्भ कर देता है। उनके स्वागत में खड़े कर्मचारी से लेकर गाड़ी पर चिपके स्टीकरों तक हिंदी की उपस्थिति जाँची जाती है। चूँकि सब कुछ पहले से ही तय होता है अतएव कहीं कोई चूक नहीं होती। यह देखकर पहले से ही तय कार्यक्रम के अनुरूप आधे निरीक्षक प्रसन्नता प्रदर्शित करते हैं और बाक़ी के आधे थोड़े उखड़े-उखड़े बने रहते हैं। ऐसा करने से निरीक्षण का डेकोरम बना रहता है।
कार्यालय में प्रवेश करते हुए स्वागत की वेला में पूरा कार्यालय हिन्दीमय हो जाता है। सब हिंदी बोल रहे होते हैं। जहाँ न बोलना हो वहाँ भी सभी हिंदी बोल रहे होते हैं। फिनांस के नाम से बदनाम कमरा अचानक वित्त विभाग हो उठता है। परफोर्मा यकायक प्रपत्र बन जाता है। अटेंडेंस रजिस्टर पर नया आवरण चढ़ाकर उसे उपस्थिति पत्रिका बना दिया जाता है।
निरीक्षण दल जानता है कि यह कायाकल्प उनके आगमन से एकाध दिन पूर्व ही हुआ है तथापि वे कार्यालय में हिंदी की स्थिति देखकर संतुष्ट होने की भंगिमा बना लेते हैं। हिन्दीमय वातावरण में चायपान करते समय उन्हें उनके प्रवास, भोजन तथा पर्यटन के कार्यक्रमों से अवगत करा दिया जाता है। इस सूचना के प्रेषित होते ही कार्यालय की कुछ फाइलों का पूर्वनिर्धारित औचक निरीक्षण सम्पन्न कर लिया जाता है। अगली सुबह निरीक्षण की समस्त कार्यवाही समाप्त होने के बाद निरीक्षण दल प्रकृति के वैभव का निरीक्षण करने लगता है और कार्यालय अपनी स्थायी वेशभूषा में लौट आता है। हिंदी बेचारी आचरण से निकलकर पुनः फाइलों के आवरण में सिमट जाती है।
न्यायपालिका से लेकर कार्यपालिका और विधायिका तक हिंदी के लिए प्रवेश निषेध की तख़्ती हर वर्ष और पुख़्ता होती जा रही है। व्यापार में हिंदी को स्थापित करने के लिए नियुक्त लोग हिंदी का व्यापार करने में संलग्न हैं। हिंदी पखवाड़े के दौरान कार्यालय के बाहर नीले रंग का सरकारी बैनर लटक जाता है। उसके बाद पूरे वर्ष हिंदी का चेहरा उस बैनर की तरह लटका रहता है।
राजभाषा विभागों का बजट पूरे कार्यालय के बजट का सबसे तुच्छ भाग होता है। और वह भी सत्र समाप्ति के समय जबरन व्यय किया जाता है। हिंदी को राजभाषा बनाने का यह ढोंग क क्षेत्र से ग क्षेत्र तक समान रूप से चल रहा है। कार्यालयी हिंदी इतनी क्लिष्ट और अव्यवहारिक बना दी गई है कि जब कभी किसी राजभाषा अधिकारी की अंतरात्मा जागती है तो वह स्वयं हिंदी की कृत्रिम सूरत को देखकर अपनी अंतरात्मा को हिंदी की एक लोरी गाकर सुला देता है।
✍️ चिराग़ जैन
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सोशल मीडिया पर एक पार्टी विशेष के नेताजी पर कोई टिप्पणी की जाए अथवा कोई प्रश्न पूछा जाए तो यकायक कमेंट बॉक्स गालियों से भरने लगता है। इन गालीबाज़ों की प्रोफाइल देखें तो अधिकतर ने अपनी प्रोफाइल पर किसी धर्मविशेष अथवा दलविशेष के समर्थन की घोषणा कर रखी होती है।
इस घोषणा के तमगे से सजी प्रोफ़ाइलधारी जब अश्लील, भद्दी और असंसदीय भाषा का प्रयोग करते हैं, तो उससे उस धर्म अथवा दल की छवि पर क्या प्रभाव पड़ेगा -इस विषय पर कोई इसलिए नहीं बोलना चाहता क्योंकि राजनीति को यह बात समझ आ गई है कि इस देश से लोकतंत्र का दौर समाप्त होने जा रहा है और ‘बाहुबल’ के आधार पर वह तानाशाही व्याप्त हो रही ह,ै जिसे सभ्य भाषा में गुंडागर्दी कहा जाता है। और गुंडागर्दी के लिए लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान करनेवाले सभ्य नागरिकों की नहीं, बल्कि अराजक, असभ्य और बर्बर मवालियों की आवश्यकता होती है।
मुम्बई में व्यंग्य-चित्र फॉरवर्ड करने पर एक दल विशेष के कार्यकर्ताओं द्वारा एक वरिष्ठ नागरिक की पिटाई की घटना उसी विषबेल का पहला फल है जो पूरे देश में एक राष्ट्रीय पार्टी ने अब तक बोई है। भीड़ की आड़ में निजी दुश्मनी निकालने की परंपरा, मॉब लिंचिंग की गलियों से गुज़रते हुए अब सरेआम गुंडागर्दी की शक्ल ले चुकी है।
कंगना रनौत के मुद्दे पर केंद्र सरकार और राज्य सरकार की राजनैतिक तनातनी का विकृततम रूप यह है कि एक राजनैतिक दल अपने मुखपत्र में साफ़-साफ़ लिखता है कि कंगना रनौत ने पानी में रहकर मगरमच्छ से वैर किया है।
उफ़्फ़! क्या यही लोकतंत्र की भाषा है। समाचार पत्र के माध्यम से सरेआम धमकी देने के लिए क्या कोई क़ानूनी कार्रवाई नहीं की जाएगी। हम रिया, कंगना, सुशांत के कंधे पर रखी राजनैतिक बंदूकों के डिजाइन पर मुग्ध होकर यह क्यों नहीं देख पा रहे हैं कि सिस्टम की विफलताओं का लाभ उठाकर इन राजनैतिक बंदूकों से लोकतंत्र की हत्या की जा रही है।
भाजपा, शिवसेना, कांग्रेस, टीएमसी, जद …ये सब वेदियाँ तभी तक पूज्य हैं जब तक लोकतंत्र का मंदिर सलामत रह सकेगा। हम किसी भी राजनैतिक विचारधारा से प्रभावित हों, लेकिन लोकतंत्र की जड़ों में मट्ठा डालनेवालों का विरोध करते समय उस विचारधारा के परिचय पत्र का बचाव नहीं करना चाहिए।
भारत की मूल प्रवृत्ति लोकतंत्रात्मक है। यदि लोकतंत्र ध्वस्त हुआ तो कुछ न बच सकेगा। सत्ता का विरोध करनेवालों पर अचानक भिन्न-भिन्न धाराएँ लगने लगती हैं। क्यों भई! इस देश के सिस्टम को शर्म से मर नहीं जाना चाहिए कि मुंबई जैसे शहर में कंगना रनौत जैसी प्रसिद्ध हस्ती ने ग़ैरकानूनी निर्माण कर रखा था और उस पर एक्शन तब हुआ जब उसने सत्ता का विरोध किया। क्या हमारी एजेंसियों को अपने नाकारापन पर शर्म नहीं आनी चाहिए कि मुंबई फ़िल्म उद्योग से जुड़े लोग ड्रग्स का सेवन करते हैं और उसकी खुशबू तक एजेंसियों को तब तक नहीं आती जब तक रिया चक्रवर्ती को गिरफ़्तार करने के बाकी सब रास्ते बंद नहीं हो गए।
शर्मनाक स्थिति तक आ चुका है हमारा सिस्टम और वधस्थल में लाकर बांध दिया गया है हमारा लोकतंत्र। अपनी-अपनी राजनैतिक निष्ठाएँ त्यागकर यदि लोकतंत्र के पक्ष में चेतना नहीं आई तो हमारे महान देश के भविष्य पर गहरा अंधकार पसर जाएगा।
✍️ चिराग़ जैन