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उदित राज को समर्पित

जब तक टिकट नहीं कट जाती
तब तक सब कुछ चलता है
सब कुछ है चलता है
टिकट का कटना खलता है

जिस पुलवामा की घटना को साज़िश आप बताए
उस घटना के घटने पर क्यों दल को छोड़ न पाए
जिसकी खाट खड़ी हो जाए
वो ही आँखें मलता है
आंखें मलता है, टिकट का कटना खलता है

राष्ट्रपति को गूंगा-बहरा कहते नहीं हिचकते
बीजेपी में रहकर क्यों ये बात नहीं रख सकते
जबसे पार्टी बदली कर ली
तबसे जियरा जलता है
जियरा जलता है
टिकट का कटना खलता है
✍️ चिराग़ जैन

बात-बात पर बदलें मापदण्ड

हैदराबाद में पुलिस ने बलात्कार के आरोपियों का एनकाउंटर किया। इस घटना पर एक तबक़ा पुलिस को साधुवाद देते हुए यह तर्क दे रहा था कि न्याय व्यवस्था की विफलता के कारण पुलिस का यह क़दम तर्कसंगत है। यह शाबासी इस बात की भी गवाही दे रही थी कि यह एनकाउंटर एक वेल प्लैन्ड इंसिडेंट था।
विकास दुबे एनकाउंटर केस में भी लगभग यही तर्क दिये गये और उन बधाई संदेशों में उत्तर प्रदेश सरकार की भूरि-भूरि प्रशंसा से यह प्रतिध्वित हो रहा था कि पुलिस सरकार के निर्देश पर काम कर रही थी और सरकार में शेरदिल व्यक्ति बैठा है इसलिये अपराधी को ऑन द स्पॉट निपटाया जा सका।
किन्तु हाथरस काण्ड में पुलिस द्वारा किये गये अर्द्धरात्रि शवदाह में पुलिस की ग़लती बताकर सरकार ने कुछ पुलिसवालों को सस्पेंड कर दिया। सरकार ने उस परिवार को मुआवज़ा और सरकारी नौकरी दी जिसने कथित रूप से अपनी ही बेटी की हत्या करके उसका आरोप कुछ ‘बेचारे’ बेगुनाहों पर मढ़ दिया।
सलमान ख़ान को निचली अदालत ने सज़ा सुनाई और चंद घण्टों की भागदौड़ में ही उस ऊँची अदालत ने उसको बरी कर दिया, जिसमें अपील दर्ज कराने में महीनों गुज़र जाते हैं। उस समय यह तर्क दिया गया कि समाजोपयोगी व्यक्ति होने के नाते सलमान ख़ान की रिहाई तर्कसंगत है।
सुशांत सिंह राजपूत की मृत्यु के मामले में उसी समाजोपयोगी व्यक्ति सलमान ख़ान के चरित्र को फ़िल्म जगत् का सबसे बड़ा माफिया, नेपोटिज़्म का पोषक और न जाने किन-किन अलंकारों से सुसज्जित किया गया।
कंगना राणावत के दफ़्तर पर बुलडोजर चला, तब बताया गया कि राज्य सरकार सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग करके निजी द्वेष निकाल रही है। अर्णब गोस्वामी को जेल हुई तो बताया गया कि राज्य सरकार ने पुलिस के कंधे पर रखकर बंदूक चलाई है। निचली अदालत ने अर्णब गोस्वामी की जमानत रद्द की तो पता चला कि न्यायपालिका राज्य सरकार के इशारे पर काम कर रही है। फिर अदालती कार्रवाई की धीमी गति के नियम को तोड़कर कछुआ, खरगोश की तरह दौड़ा और ताबड़तोड़ अर्णब भैया की जमानत ऊँची अदालत से मंज़ूर हो गयी। हम सुप्रीम कोर्ट के प्रति कृतज्ञता से भर गये। हमने न्याय व्यवस्था की तारीफ़ों के पुल बांध दिये।

काफ़ी कन्फ्यूज़न क्रिएट हो गया है। समझ नहीं आ रहा कि-
1) वास्तव में हमारी न्याय व्यवस्था नपुंसक है या महान है?
2) यदि न्यायालय समाजोपयोगी व्यक्ति की पहचान करने में सक्षम है तो फिर न्याय की मूर्ति की आँखों पर पट्टी बांधने के पीछे क्या उद्देश्य है?
3) विकास दुबे के एनकाउंटर पर प्रदेश के मुख्यमंत्री को बधाइयाँ क्यों मिलती हैं? फिर हाथरस में पुलिसवाले क्यों सस्पेंड होते हैं?
4) पुलिस द्वारा क़ानून की धज्जियाँ उड़ाकर एनकाउंटर करना कैसे उचित है?
5) यदि निचली अदालत राज्य सरकार के इशारे पर चल सकती है तो ऊँची अदालतें केंद्र सरकार के इशारे पर क्यों नहीं चल सकतीं?
6) हैदराबाद, कानपुर और हाथरस में पुलिस की मनमानी जस्टिफाइड है, तो मुम्बई में पुलिस की मनमानी अन्याय कैसे है?
7) यदि महाराष्ट्र की राज्य सरकार सरकारी विभागों और संवैधानिक संस्थाओं का प्रयोग अपने हित में कर सकती है तो अन्य प्रदेशों की सरकारें और केंद्र में बैठी सरकारें ऐसा क्यों नहीं कर सकती?
और सबसे महत्वपूर्ण जिज्ञासा- यदि हर बार, हर घटना पर मापदंड बदल जाने हैं तो हमारे देश में लिखित संविधान की व्यवस्था क्यों है?

मैं इस देश के लोकतंत्र से इतनी सी अपेक्षा करता हूँ कि हमारे लिखित संविधान से ऊपर कोई भी न हो। यदि समाज में कोई विकृति व्याप्त हो तो हमारे चुने हुए प्रतिनिधि देश की सबसे बड़ी पंचायत में बैठकर उस विकृति के समाधान हेतु लिखित संविधान में आवश्यक परिवर्तन करें और न्यायपालिका से लेकर कार्यपालिका तक का तमाम तंत्र उसी लिखित संविधान के अनुरूप आचरण करके लोकतंत्र की आत्मा को जीवित रखें। इसके इतर व्यवस्था को जिस भी तरीके से चलाया जायेगा उसका प्रत्यक्ष शिकार भले ही अर्णब हो, कंगना हो या रिया हो… लेकिन परोक्ष रूप से उसका हर वार लोकतंत्र की आत्मा पर ही होगा।

✍️ चिराग़ जैन

नाय पलटी सरकार

पायलट ऐसी-तैसी कर गौ, उलटो पर गयो वार
पूरा जोर लगाया फिर भी नाय पलटी सरकार

होटल-होटल नेता दौड़े, दिल्ली दौड़ी आस
सेंटर दौड़ा, जयपुर दौड़ा, सबकी फूली साँस
गुरुग्राम में लोकतंत्र का हो न सका उपचार
पूरा जोर लगाया फिर भी नाय पलटी सरकार

कांग्रेस में गाली गूंजी, बीजेपी में दाम
कैसे अपने लोकतंत्र की भली करेंगे राम
नए नोट हैं सूटकेस में, सत्ता है व्यापार
पूरा जोर लगाया फिर भी नाय पलटी सरकार

✍️ चिराग़ जैन

संदर्भ: सचिन पायलट को मोहरा बनाकर राजस्थान में सरकार गिराने की कोशिश नाकाम

अवसरवादी देशभक्ति

राजधानी दिल्ली का एक क्षेत्र विशेष दंगों की चपेट में है और मीडिया ट्रम्प की यात्रा का इंच-इंच कवर कर रहा है। सरकार मेहमाननवाज़ी में व्यस्त है और घर में भाण्डे बज रहे हैं। सीएए का विरोध या समर्थन दो दिन बाद भी किया जा सकता है यार! हद्द हो गई। क्या हम इतने भी सभ्य नहीं रह गए हैं कि किसी मेहमान के सामने ‘झूठा ही सही’ लेकिन सद्भाव का परिचय दे सकें।
कभी-कभी आश्चर्य होता है। आखि़र किस समाज के लिए यह राजनेता अपना जीवन न्यौछावर करने पर अड़े हैं! हम सुरक्षा में लगे पुलिसवालों को गोली मारेंगे, फिर यह भी चाहेंगे कि कोई हमें नक्सली न कहे। हम धर्म की टोपी पहनकर पत्थरबाज़ी करेंगे और फिर यह चाहेंगे कि हमारे धर्म को आतंकवादी न कहा जाए। शर्म आनी चाहिए। जहालत की भी कोई सीमा होती है।
मोदी जी को यह चिंता है कि दिल्ली के स्कूलों की प्रदर्शनी हो तो दिल्ली के मुख्यमंत्री वहाँ न हों। दिल्ली के मुख्यमंत्री इस बात से ख़ुश हैं कि अमरीकी दूतावास ने यह घोषणा कर दी है कि मुख्यमंत्री की उपस्थिति पर अमरीकी प्रशासन को कोई आपत्ति नहीं थी, यह आपकी आंतरिक राजनीति के कारण हुआ है। क्या कर रहे हो भाई! हम हर पल गिरते जा रहे हैं। मोदी विरोधी इस बात पर चुटकुले बना रहे हैं कि हमारे प्रधानमंत्री के मुँह से डोनाल्ड की जगह ‘दोलाण्ड’ निकल गया। भाजपाई यह बता रहे हैं कि ट्रम्प भारत इसलिए आए हैं क्योंकि मोदी की तूती बोल रही है। कोई इस बात पर जुमलेबाज़ी कर रहा है कि ट्रम्प ने पाकिस्तान को दोस्त बताकर भारत की डिप्लोमेसी के मुँह पर तमाचा मार दिया। कोई यह सिद्ध करने पर उतारू है कि ट्रम्प ने आतंकवाद ख़त्म करने की बात करके पाकिस्तान की इज़्ज़त उतार दी। …क्या है यह सब।
भारतीय समाज भयंकर संकटों से जूझ रहा है। एक वर्ग विशेष सरकारी राजहठ से लोहा लिए बैठा है। राजा बालहठ को झुकाने पर अड़ा हुआ है। जनता में साम्प्रदायिक विद्वेष बढ़ता जा रहा है। राजनैतिक चर्चाएँ दुश्मनी का सबब बनती जा रही हैं।
समाज भक्तों और चमचों में बँटा जा रहा है। ‘भारत माता की जय’ का सर्वग्राह्य उद्घोष एक राजनैतिक दल की बपौती हो चला है। समाज का सौहार्द बिगाड़ने के लिए धर्म, सम्प्रदाय और जातियाँ पहले से ही विद्यमान थीं; अब पार्टी भी आग में घी का काम कर रही है। कांग्रेसी लोग, मोदी समर्थकों को मूढ़ मान चुके हैं और मोदी समर्थकों ने मोदी विरोधियों को ग़द्दार मान लिया है।
कोई शाहीन बाग़ जाकर ख़ुद को रामभक्त बताता है और बिना लाइसेंस की बंदूक से गोली दाग देता है। कोई महिला कॉलेज में घुसकर हस्तमैथुन करता मिलता है। कोई पत्थरबाज़ी के बीच पुलिस पर गोली चला देता है। आखि़र कर क्या रहे हैं हम? यह भयावह वर्तमान भविष्य के प्रति प्रश्नचिन्ह खड़े करने लगा है।
एक सरकार कार्यविहीन योजना में समय नष्ट करती रही, दूसरी सरकार योजनविहीन कार्यों में पूंजी लुटा रही है। मीडिया अमरीका के चिड़ियाघर में जन्मे भालू के बच्चे दिखाकर टीआरपी बटोर रहा है और न्यायपालिका तारीखें बढ़ाकर अपनी नौकरी बचाए रखने में दक्ष हो गई है। कार्यपालिका कभी पैसा खाने में व्यस्त है तो कभी गोली खाने को मजबूर।
समान नागरिक आचार संहिता की बात करो तो उनको आपत्ति है जो धर्म की आड़ में संविधान के नियमों का मज़ाक़ बनाए जा रहे हैं। समान नागरिक आचार संहिता की बात न करो तो वे बौखलाते हैं जो संविधान की आड़ में एक धर्म विशेष को अपना वोटर बनाए रखना चाहते हैं।
सरकार और तंत्र को गाली देनेवाले लोग ट्रैफिक नियमों को भी मानने को तैयार नहीं हैं। सब, ख़ुद को छोड़कर बाक़ी सबको अपराधी सिद्ध करने पर तुले हैं। हर दुर्भाग्यपूर्ण घटना में कवि अपने लिए तालियाँ बटोर रहा है, पत्रकार अपने लिए टीआरपी तलाश रहा है, राजनीति वोट तलाश रही है और कार्यपालिका अवसर!
कुछ लोग अराजकता के समर्थन में केवल इसलिए हैं क्योंकि वह अराजकता मोदी के खि़लाफ़ बढ़ रही है। कुछ लोग अराजकता के विरोध में केवल इसीलिए हैं कि इससे मोदी जी को चुनाव में फ़ायदा मिलेगा और हमें मोदीवादी होने का अवसर। संविधान, जनहित, नैतिकता, मनुष्यता और सभ्यता जैसे शब्द बेमआनी हो गए हैं और हम रवीश बनाम सुधीर चौधरी में बँटते-बँटते असभ्यता के शिखर की ओर अग्रसर हैं।

✍️ चिराग़ जैन

Ref : Donald Trump’s India visit and Delhi Riots

संघ की जासूसी

ये नीतीशवा करे है कानाफूसी
करावे जासूसी
मोदी जी इनका साथ छोड़ दो
इनके तेवर में भर दो ज़रा भूसी
कि छोड़ो कंजूसी
सत्ता की शह-मात छोड़ दो

आर एस एस पर और विहिप पर नज़रें इनकी पैनी हैं
हम हैं मौन तुम्हारी ख़ातिर उनके हाथों छैनी हैं
हमें बता दो आख़िर कब तक गुंडागर्दी सहनी है
संघ लुटा तो बीजेपी की लाज कहाँ फिर रहनी है
जहाँ होती हो रोज़ बेईमानी
क्या दोस्ती निभानी
मोदी जी ये बिसात छोड़ दो
ये नीतीशवा करे है कानाफूसी
करावे जासूसी
मोदी जी इनका साथ छोड़ दो
इनके तेवर में भर दो ज़रा भूसी
कि छोड़ो कंजूसी
सत्ता की शह-मात छोड़ दो

✍️ चिराग़ जैन

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