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अपशब्दों का सत्र

तुमने कड़वे शब्द कहे हैं, कैसे इस सच को झुठलाऊँ
समझ नहीं आता इस पर आश्चर्य करूँ या शोक मनाऊँ

वाणी कड़वी, मन खट्टा है और कसैला रूप-लवण है
किस आसन पर रख पाओगी, प्यार भरा जो मीठा क्षण है
कण-कण में विष व्याप्त हुआ है, किस कण पर अमृत टपकाऊँ
समझ नहीं आता इस पर आश्चर्य करूँ या शोक मनाऊँ

आँखों में अब तक ताज़ा है, प्रेम सुसज्जित पत्र तुम्हारा
पर कानों में गूँज रहा है, अपशब्दों का सत्र तुम्हारा
पाती पढ़-पढ़ मुस्काता हूँ, वाणी सुन-सुन बुझता जाऊँ
समझ नहीं आता इस इस पर आश्चर्य करूँ या शोक मनाऊँ

गहरी खाई में ला पटका, तुमने मेरे मन-पर्वत को
सारी रात पढ़ा है मैंने, प्रेम सुधा में भीगे ख़त को
अपने हाथों से उस ख़त का कोई कोना फाड़ न पाऊँ
समझ नहीं आता इस पर आश्चर्य करूँ या शोक मनाऊँ

तुमको पीड़ा पहुँचाने का, मैं भी अगर इरादा रखता
तो भी वाणी पर संयम की, थोड़ी तो मर्यादा रखता
अंतर्मन पर घाव हुए हैं, कैसे इनकी टीस भुलाऊँ
समझ नहीं आता इस पर आश्चर्य करूँ या शोक मनाऊँ

कष्ट हुआ हो तो तुम मुझसे झगड़ा कर के रो सकती हो
मैं ये सोच नहीं सकता तुम तुम इतनी कड़वी हो सकती हो
अब मैं ख़ुद भी चाहूँगा तो, तुम तक शायद लौट न पाऊँ
समझ नहीं आता इस पर आश्चर्य करूँ या शोक मनाऊँ

✍️ चिराग़ जैन

एकाकी

सिर्फ दिखावे भर के सारे उत्सव मेले हैं
सब अपने-अपने जीवन में निपट अकेले हैं

अपनेपन का नाम सुना है, शक्ल नहीं देखी
रिश्तों पर मिटने वालों की नस्ल नहीं देखी
बाहर से ख़ुश हैं पर भीतर बहुत झमेले हैं

वैभवशाली दिखने की इक होड़ लगी है रे
जर्जरता भी बाहर से बेजोड़ लगी है रे
हीरे बनकर घूम रहे मिट्टी के ढेले हैं

बेमतलब की प्रीत, ठिठोली पीछे छूट गई
मन से मन तक जाने वाली डोरी टूट गई
कौन बताए किसको किसने क्या दुःख झेले हैं

जिनसे अपनापन चाहा उनसे सम्मान मिला
संबंधों की नब्ज़ छुई तो मन बेजान मिला
वाणी पर है शहद दिलों में सिर्फ करेले हैं

क्या संबंधों वाले सारे किस्से झूठे थे
या सचमुच पिछली पीढ़ी के लोग अनूठे थे
क्या अब भी दुनिया में वैसे कुछ अलबेले हैं

✍️ चिराग़ जैन

निभा ले मुझको

मौत ने ज़िन्दगी का मोल लगा रखा है
अपने इक़रार की क़ीमत दे, बचा ले मुझको

मेरे किरदार का हर रंग तो चुभता भी नहीं
एक मौसम ही समझ के तू निभा ले मुझको

✍️ चिराग़ जैन

बाजीराव मस्तानी

बाजीराव मस्तानी देखी। लोग इसे प्रेमकथा समझें लेकिन ये संबंधों के उस दर्शन की कथा है जिसको सहज अनुभूत करना भी मुश्किल है। ये इस बात का प्रमाण है कि हम अक्सर ऐसी स्थिति में जी रहे होते हैं, जहाँ कोई भी शख़्स ग़लत नहीं होता, लेकिन हम अक्सर ये भी मान रहे होते हैं कि सब ग़लत हैं।
फ़िल्म का सबसे बारीक़ और मार्मिक सन्देश ये था कि सारी दुनिया के शत्रुओं के वार झेलना संभव है, शत्रुदल के सम्मुख अकेले उपस्थित होना और उसे जीतना भी संभव है, उफनती नदी में मृत्यु से लोहा लेना भी सरल है लेकिन ‘अपनों’ के व्यवहार में पल भर का परायापन ऐसा अजेय शत्रु है जिसे परास्त कर सकना सर्वथा असंभव है।
कि भयानक शत्रुओं से लगातार चालीस लड़ाईया जीतने वाले योद्धा को भी अपनों की चार दिन की बेरुख़ी धराशायी कर देती है।

✍️ चिराग़ जैन

नया पड़ोसी

पिछले महीने
नया पड़ोसी आया है।
दुश्मन लगता है
पिछले जन्म का।
कमबख्त
पुराने गानों का शौक़ीन है।
रोज़ रात
दुनिया भर के सोने के बाद
युद्ध शुरू करता है।
कभी रफ़ी, कभी हेमंत, कभी लता।
ख़ुद तो सो जाता है
आध-पौन घंटे में
लेकिन उसे क्या पता
क्या क्या गँवा बैठता हूँ मैं
रोज़ रात।

बदला भी लूँ तो कैसे
उसके लिए तो ये सब
सिर्फ़ लोरी के काम आता है
उसे क्या पता
क्या होता है
जब रेकॉर्ड पर बजता है-
“मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है”

✍️ चिराग़ जैन

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