Chirag Jain Writings, Naavik ke teer, Prose, Quotation
आज जोधपुर कोर्ट ने दो दो मुजरिम एक साथ बरी किये। पहला, जनाब सलमान खान साहब, जिन्होंने दो चिंकारा मार दिए थे। दूसरा इंसाफ़, जो दशकों से अदालतों की चौखट पर उम्मीद का दीया जलाए बैठा था।
सलमान की रिहाई से यह सबक मिलता है कि क़ानून की आँखों पर बंधी काली पट्टी एक्चुअली काले धन की कोटिंग है।
कुछ भी हो, लेकिन हमारे न्यायलय ने ‘समानता के अधिकार’ का सम्मान करते हुए फुटपाथ पर मरने वालों और काले हिरणों को समान दृष्टिकोण से देखा है।
बड़ा उछल रहा था रजनीकांत कि उसकी फ़िल्म जब रिलीज़ होती है तो छुट्टी घोषित हो जाती है। ज़्यादा मत उछल बे, कहीं सलमान ने देख लिया तो काला हिरण समझ कर मार देगा।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
“कला का मुँह काला कर दिया जाए” -ये हुक्म अपने आप को दिया है कलयुग के कुकर्मियों ने। कोलाहल पर किलोल की विजय न हो जाए। अपनी महत्वाकांक्षाओं को मनोरंजन के सत्य भाषण से बचाने के लिए सियासत रोज़ नए पैंतरे खेल रही है। कोई मुज़फ्फरनगर के दंगों पर बोलने लगे तो उलेमाओं का फ़तवा उछाल दो, कोई पंजाब के सुट्टे पर बोले तो उसे सेंसर की देहरी पर रगड़ दो। कोई दिल्ली की समस्याओं पर कलम चलाए तो उसे मोदी का चापलूस कहकर अपमानित करो। कोई केंद्र सरकार की किसी नीति पर ऊँगली उठाए तो उसे “कांग्रेसी कुत्ता” कहो। कोई कांग्रेस की हरकतों पर लिखने की कोशिश करे तो उसे संघी कहकर प्रताड़ित करो। कोई फकीरों की मज़ार पर क़व्वाली गाने लगे तो उसे गोली मार दो।
ऑल इण्डिया बकचोद, बिग बॉस, ग्रैंड मस्ती और सनी लियोने जैसे प्रतिमानों की खिड़की से कला का आकलन करो ताकि कलाकार ख़ुद ब ख़ुद शर्मसार होकर ख़ुदकुशी कर ले। कला फिल्मों को आर्थिक विपन्नता से घोंट दो और फिर व्यावसायिक फिल्मों के उदाहरण प्रस्तुत कर फिल्मों की अनुपयोगिता का ढोल पीटो।
कोई हँसने-हँसाने की कोशिश में व्यंग्य के चौबारे में टहलने लगे तो उस पर मानहानि का मुक़द्दमा दर्ज कर दो। कोई न्यूज़ चैनलों से उत्तरदायित्वहीनता का कारण पूछ ले तो उसे चैनल पर दिखाना बंद कर दो। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का जुमला झूठे सर्वेक्षण और अश्लील विज्ञापनों के पक्ष में मुखर होना चाहिए। कला, कलाकार और सत्य… -इन सबको तो फांसी चढ़ा देना चाहिए।
✍️ चिराग़ जैन
Ref : Comedian got arrested for his sarcasm
Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
पहलाज निहलानी सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष हैं; इस हेतु उन्हें अपने दायित्व के निर्वाह हेतु सख्त होना पड़ेगा ही। भारत के दर्शकों को अश्लीलता से बचाना, अन्धविश्वास से बचाना उनका दायित्व है और भारत के लोगों अथवा समूहों की भावनाएं आहत न हों; यह देखना उनका काम है। किन्तु चूँकि मैं फिल्मों का आलोचक अथवा विद्वान न होकर एक सामान्य दर्शक हूँ इसलिए “उड़ता पंजाब” जैसे विवाद के बाद कुछ सामान्य प्रश्न करने की हिम्मत कर पा रहा हूँ। ये सब प्रश्न मैं इसलिए भी पूछ सकता हूँ कि इन्हें यह कहकर ख़ारिज भी नहीं किया जा सकेगा कि प्रश्नकर्ता अमुक पार्टी का सदस्य है।
उड़ता पंजाब में कई दृश्य यह कहकर कटवाए जा रहे हैं कि उनमें द्विअर्थी संवाद हैं अथवा उनमें अभद्र भाषा का प्रयोग है। मैं इस तर्क का पक्षधर हूँ लेकिन इस आपत्ति पर यह समझ नहीं पा रहा हूँ कि क्या पहलाज जी उसी सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष हैं जिन्होंने निम्न फिल्मों को “ए” अथवा “यू/ए” प्रमाण पत्र के साथ पास किया था-
1) रागिनी एम एम एस (श्रृंखला)
2) मर्डर (श्रृंखला)
3) ग्रैंड मस्ती
4) रास्कल्स
5) द डर्टी पिक्चर
6) लेडीज़ वर्सिस रिकी बहल
7) विक्की डोनर
8) लाइफ की तो लग गई
9) गैंग्स ऑफ़ वासेपुर
10) जिस्म (श्रृंखला)
11) राज़
12) हीरोइन
13) अइया
14) फुकरे
15) लुटेरा
16) बी ए पास
17) बजाते रहो
18) नशा
19) शुद्ध देसी रोमांस
20) बूम
21) ऊप्स
22) गोलियों की रासलीला रामलीला
23) डेढ़ इश्किया
24) मस्तराम
25) हम्पटी शर्मा की दुल्हनिया
26) मर्दानी
27) नो वन किल्ड जेसिका
28) सुलेमानी कीड़ा
29) गुड्डू रंगीला
30) प्यार का पंचनामा
इसके अतिरिक्त भी एक लंबी श्रृंखला है जिसमें द्विअर्थी संवादों औरअश्लीलता के शानदार उदाहरण देखने लो मिलते हैं। “लग गई”; “ले ली”; “फट जाएगी” और “दे रही है” जैसे संवादों को सामान्य मानने वाला बोर्ड किन संवादों को द्विअर्थी कह रहा है यह समझ से परे है। “तेरी कह के लूंगा” जैसे वाक्यांश फ़िल्मी पोस्टर की टैगलाइन हो सकती है तो बाकी सब में क्या समस्या है।
अभी टीवी पर ‘डॉलर’ का एक विज्ञापन आता है जिसमें अक्षय कुमार एकलकड़ी के फट्टे से खलनायक पर वार करते हैं। फट्टा खलनायक के गुप्तांग परलगता है और फिर घायल खलनायक अपने गुप्तांग पर हाथ रखकर संवाद बोलता है – “मेरे अखरोट भिंच गए”।
इन संवादों को द्विअर्थी माना जाए या नहीं।द्विअर्थी तो छोड़ो, अब तो ऐसे ऐसे संवाद आम हो चले हैं जिनमें दूसरा अर्थ खोजा ही नहीं जा सकता।
नो वन किल्ड जेसिका के प्रारंभ में ही रानी मुखर्जी ने दो बार स्पष्ट रूप से संवाद बोला है – “*** फट जाती है।”
सुलेमनी कीड़ा में काव्य पाठ के दौरान नायक कविता पढता है जिसका शीर्षक है – “मेरी *** में कीड़ा है।”
डेढ़ इश्किया में अरशद वारसी और नसीरुद्दीन शाह में “चूतियापा” शब्द को बारबार प्रयोग किया है। इसी फ़िल्म में अरशद का संवाद है – “समझ नहीं पा रिया हूँ कि लेकर आ रिया हूँ कि देकर आ रिया हूँ।”
फ़िल्म “फुकरे” में एक पात्र का नाम ही “चूचा” है। जिसके एकमात्र अर्थ को फ़िल्म में बार बार स्पष्ट किया गया है।
अरशद ही गुड्डू रंगीला फ़िल्म में नायिका से पूछते पाए गए हैं- “लेगी?” बाद में इसी संवाद को वे बदल कर बोलते हैं- “देगी?”
संवादों की अश्लीलता के नाम पर अगर सेंसर बोर्ड “बुरा न सुनो” का सिद्धांतपालन करने वाला बन्दर बन जाए तो इससे आगे बढ़कर हम उन फिल्मों पर आते हैंजिनके पोस्टर से क्लाइमेक्स तक सिवाय अश्लीलता कुछ ढूंढे नहीं मिलता।
यदि याददाश्त पर सरकारी बेरियर न लगा हो तो उस पोस्टर का संज्ञान ले लें जिसके पोस्टर पर भीगे बदन की नायिका नग्न केवल एक झीनी चद्दर ओढ़कर लेती हुईथी। उसके स्तनों का स्पष्ट प्रदर्शन फ़िल्म की सफलता की सीढ़ी बन गई थी।पीके में सिर्फ रेडियो की आड़ में छुपे आमिर खान पोस्टर पर आए तो वह बॉलीवुडकी विकसगाथा का अध्याय समझा गया।
बीए पास में शिल्पा शुक्ला और अन्यअभिनेत्रियों के साथ पूरे सम्भोग दृश्य अगर अश्लील नहीं थे तो फिर नैतिकताके शास्त्रों पर गुमराह करने का मुक़द्दमा चलाया जाना चाहिए। सनी लियोने, विद्या बालन, राखी सावंत, मल्लिका शेरावत जैसी अभिनेत्रियों के अभिनय ने जबअश्लीलता और अभद्रता की परिभाषाएँ बदलीं तब सेंसर बोर्ड की आँखें कौन सेसपने देखने में व्यस्त थीं। द डर्टी पिक्चर, बूम, ग्रैंड मस्ती, मर्डर, जिस्म, राज, रागिनी एम् एम् एस, शुद्ध देसी रोमांस और मस्तराम बनाने के बादजब हमारे सामने अश्लीलता के प्रश्न उठते हैं तो ऐसा लगता है कि विजयमाल्या लालकिले से राष्ट्र को ईमानदारी और संस्कारों का उपदेश दे रहे हों।
किस सीन पर प्रश्न उठाने वाले बोर्ड को आँखों की पट्टी हटाकर राजाहिंदुस्तानी, मुहब्बतें, कील दिल, 2 स्टेट्स, हंसी तो फँसी, हीरोपंती, पुरानी जीन्स, रिवॉल्वर रानी, बैंग बैंग, यारियां, फाइंडिंग फैनी, हेटस्टोरी 2, बेवकूफियां, धूम 3, हम्पटी शर्मा की दुल्हनिया, रागिनी एम एम एस, एक विलेन, क्वीन, राजा नटवरलाल, ढिशक्याउँ, तेज़ाब, मानसून वेडिंग, ज़िद, दट्रेन, रास्कल्स और राज़ जैसी फ़िल्में दोबारा देखनी चाहियें।
उड़ता पंजाब पर दर्ज आपत्तियों में एक आपत्ति यह भी थी कि फ़िल्म के शीर्षक में “पंजाब”का नाम आने से पंजाब के लोगों की भावनाएं आहत होंगी। श्रीमान कृपया निम्न सूची पर भी नज़र डाल लें-
1) ज़िला ग़ाज़ियाबाद
2) मुम्बई मस्त कलंदर
3) पटियाला हाउस
4) चलो दिल्ली
5) दिल्ली बैली
6) मम्मी पंजाबी
7) गैंग्स ऑफ़ वासेपुर
8) दिल्ली सफारी
9) देहरादून डायरी
10) मुम्बई मिरर
11) बोम्बे टॉकीज़
12) गो गोआ गोन
13) बोम्बे टू गोआ
14) लव इन बोम्बे
15) चेन्नई एक्सप्रेस
16) वन्स अपॉन अ टाइम इन मुम्बई
17) वन्स अपॉन अ टाइम इन बिहार
18) चांदनी चौंक टू चाइना
19) मद्रास कैफे
20) वेक अप इण्डिया
21) चक डे इण्डिया
22) अहमदाबाद जंक्शन
23) परांठे वाली गली
24) मिड समर मिड नाईट मुम्बई
25) मुम्बई कनेक्शन
26) मुम्बई 125 केएम
27) पीपली लाइव
28) मुम्बई कैन डांस साला
29) मुम्बई दिल्ली मुम्बई
30) एनएच 10
31) एनएच 8 (रोड टू निधिवन)
32) बोम्बे वेलवेट
33) एंग्री इंडियन गॉडेस
34) लखनवी इश्क़
इस सूची को और भी लम्बा किया जा सकता है। “ज़रा हट के, ज़रा बच के ये है मुम्बई मेरी जान” जैसे गीतों ने किसी की भावनाएं आहत नहीं की।
इन सब सन्दर्भों के परिप्रेक्ष्य में मेरा प्रश्न केवल यह है कि किसी भीव्यक्ति अथवा विचारधारा अथवा दल अथवा संस्थान के चश्मे लगाकर बैठे लोग क्यावास्तव में किसी का हित कर सकते हैं।
निहलानी जी एक बार इस एहसास कोजी लें कि फ़िल्म उद्योग को निरंकुश होने से रोकने के लिए जब सेंसर बोर्ड कागठन किया गया था तब इस बोर्ड के प्रतिष्ठापकों की आँखों में सपना रहा होगाकि यह संस्था निष्पक्ष रहकर कार्य करेगी।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
सफलता के पथ पर एक प्रेत रहता है, जिसका नाम है अवसाद। इसकी पकड़ बहुत मज़बूत है। मुस्कुराहटों और खिलखिलाहटों की महफ़िल से छिटक कर अचानक एकाकी हो गए लोगों पर यह सामने से हमला करता है।
सफलता के पथ का पथिक जब व्यावसायिक सफलता और व्यक्तिगत चुनौतियों के बीच झूल रहा होता है तब न जाने किस बिंदु पर यह प्रेत उसे ऐसा अड़ंगा देता है कि यदि संभला न जाए तो प्राण संकट में पड़ जाएं। इसी बिंदु पर अक्सर मृत्यु के कष्ट, जीवन की चुनौती से सरल जान पड़ते होंगे। इसी आयाम पर मर जाना, जी लेने से सहज लगता होगा। यहीं आकर जिजीविषा के अस्त्र हताशा के पाश से परास्त हो जाते होंगे।
सृजन और कला से विभक्त होकर जब क्लेश और तनाव की अंधी खोह में गिरना पड़े तो चेतन मस्तिष्क शून्य हो जाता होगा। उस क्षण में दैहिक कष्ट की तुलना में मानसिक पीड़ा बड़ी हो जाती होगी।
प्रत्यूषा और ज़िया खान जैसी प्रतिभाएं ऐसे ही किसी क्षण पर अवसाद के प्रेत की शिकार हुई होंगी। उसकी सफलता और उसके भीतर के कलाकार के लिए क्लेश अथवा तनाव झेलना असंभव हो गया होगा। स्टूडियो की फोकस लाइट से निकल कर स्वयं के साथ अनावश्यक तनाव के गहन अँधेरे उसकी बर्दाश्त से बाहर हो गए होंगे।
कला और सृजन पारलौकिक विधाएँ हैं। इनसे जुड़े हर शख़्स में एक फ़क़ीर वास करता है। उस फकीर को दुनियादारी के अनावश्यक झगड़ों से दूर रखा जाना चाहिए। उसका समाज में रहने का तरीका अलग लेकिन उत्तरदायित्वपूर्ण होता है। उसे उसके तरीके से दुनिया को बेहतरी की ओर ले जाने दिया जाना चाहिए। उसे सृजन से पृथक करना उसकी राह में काँटे बोने जैसा है।
प्रत्यूषा ने सही किया या ग़लत ये मैं नहीं जानता लेकिन एक कलाकार होने के नाते इतना अवश्य जानता हूँ कि उसकी परिस्थितियां उसके साथ सही नहीं कर रही थीं, वरना इतनी खूबसूरत ज़िन्दगी का ऐसा दर्दनाक अंत कौन कोमलहृदयी कर सकेगा!
✍️ चिराग़ जैन
Ref : Suicide of Pratyusha Mukarji
Article, Chirag Jain Writings, Lapete Mein Netaji, Prose
“क्यों भैया, ये सरकार ने विजय माल्या को तभी क्यों नहीं पकड़ लिया जब वो भारत में था?”
डायलॉग- “हम तुम्हें पकड़ेंगे माल्या। लेकिन वो ज़मीन भी हमारी नहीं होगी, देश भी हमारा नहीं होगा और वक़्त भी हमारा नहीं होगा।”
“क्यों जी, ये बैंकों ने माल्या को इतना लोन कैसे दे दिया?”
डायलॉग- “कौन कम्बख़्त ज़माने के लिये बनाता है, हम तो बनाते हैं ताकि उसे पीकर बैंक वाले लोन का अमाउंट पढ़ न सकें।”
“ये श्री श्री रविशंकर पाँच करोड़ रुपये के लिये मुक़द्दमेबाज़ी करता अच्छा लगेगा?”
डायलॉग- “तारीख़ पे तारीख़, तारीख़ पे तारीख़, तारीख़ पे तारीख़ मिलती रहेगी, लेकिन इन्साफ़ नहीं मिलेगा। और जब तक इन्साफ़ मिलेगा तब तक हम जमुना के किनारे को साफ़ कर चुके होंगे मीलॉर्ड।”
“वर्ल्ड कल्चरल फ़ेस्टिवल में मोदी जी के लिये अलग मंच बनाने की क्या ज़रूरत?”
डायलॉग- “डाबर साहब, कुछ साल पहले हम लालकिले से भाषण देना चाहते थे, और हमने अपना मंच लालकिले जैसा बना लिया था। …मैं आज भी बने-बनाए मंच पर नहीं जाता।”
“केजरीवाल को कराची लिटरेचर फ़ेस्टिवल में जाने की इज़ाज़त मिलेगी या नहीं?”
डायलॉग- “एक काग़ज़ पर मुहर नहीं लगेगी तो का केजरी पाकिस्तान नहीं जाएगा? अरे चाहे सल्लू मियां की पद्दी पर लदकर जाना पड़े लेकिन उसे कराची जाकर अपना साहित्य प्रेम दिखाने से कोई सरहद, कोई ताक़त नहीं रोक सकती।”
“भैया पाकिस्तान की क्रिकेट टीम को सुरक्षा की लिखित गारंटी क्यों चाहिये?”
डायलॉग- “जिनके घर शीशे के होते हैं, वो दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं फेंका करते।”
✍️ चिराग़ जैन