Blank Verse, Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Poetry
बंद पलकों के तले
आँखों के निचले बिस्तरे पर
जब मेरी दो पुतलियाँ
आराम करती हैं।
तब लगाकर कामना के पंख
पहरों तक विचरता है मेरा मन
बस तुम्हारे गिर्द।
तुम्हें अपलक निरखता है
उसे तुम भी कभी नज़रें हटाने को नहीं कहतीं।
जब बढ़ाकर हाथ
छू लेती है तुमको कल्पना
तब चैंक कर
तुम कब झटकती हो उसे
उस पल
महज मुस्कान होती है तुम्हारे नूर में
वो भी
शरारत से भरी
और प्यार से लबरेज।
लो, तुम्हें खुलकर बताता हूँ
मुझे पलकों के बाहर
तुम कभी अच्छी नहीं लगती।
बेतहाशा बंधनों की वादियों में
कामनाओं की नदी अच्छी नहीं लगती।
नियम, सीमाएँ, मर्यादा
रिवाज़ो-रस्म
-इन सबसे परे
जब प्रेम की उन्मुक्त देहरी पर
छलकती है लहर
बेलौस चाहत की
(जहाँ तुम सिर्फ़ तुम होती हो
और मैं सिर्फ़ मैं)
उस ठौर पर
आकण्ठ तुमसे प्रेम में संलग्न होता हूँ
जहाँ तुम मुझमें होती हो
जहाँ मैं तुममें होता हूँ।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Doha, Poetry
देख-देख कर सोचता, चाँद धरा से दूर।
आज छतों पर आ गया, सारे जग का नूर।।
करवे से जब अर्घ्य का, निभने लगा रिवाज़।
चन्द्रलोक तक बज उठा, जलतरंग सा साज।।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
एक अजीब से रिश्ते में
उलाहना देते हुए कहा तुमने-
“आज बारिश हो रही है
मैं भीग रही हूँ बरसात में
तुम मत आना
तुम्हें तो
डर लगता है ना भीगने से।”
मैंने कहा-
“नहीं, भीगने से नहीं
भीगने के बाद सूखने से।”
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chirag Jain Writings, Mann To Gomukh Hai, Poetry
जाने ये कैसा बदरा है
बदरा के भीतर मदिरा है
जब छलकी तो सब झूम उठे
जैसे मृदंग से धूम उठे
पीपल ने छेड़ी तान अलग
बूंदों ने गाया गान अलग
पुरवा ने ऐसा रास रचा
बिजुरी ने जी भर नाच नचा
पंछी कलरव करते डोले
कच्चे स्वप्नों ने पर खोले
बचपन बौराया तब भू पर
हाथों से बूंदें छू-छू कर
ऐसा मेघों में रोर हुआ
इक उत्सव-सा हर ओर हुआ
धुल गई धरा, खुल गई पवन
पावन पावन है अंतर्मन
श्वासों में शीतलता आई
नयनों में चंचलता छाई
सब कष्ट ग्रीष्म के भूल गए
बागों में झूले झूल गए
जिस क्षण जल से संलिप्त हुई
वसुधा की तृष्णा तृप्त हुई
ऐसा मौसम का ज्वर आया
प्यासों में पानी भर आया
जाने ऐसा क्या कृत्य करा
सब कुछ लगता है हरा-हरा
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
सारा शहर
सज उठा है तुमसे
बरसात नहीं हुई
तो भी…
मायावी हो तुम बोगनवेलिया
कभी कतार बाँध कर खड़े हो जाते हो
तेज़ दौड़ती सड़क के दोनों ओर
कभी लिपट जाते हो किसी वृक्ष से
और कभी
ऐसे ही
बस उग आते हो
निरुद्देश्य
जहाँ-तहाँ
तुम ऊँच-नीच नहीं जानते
छोटा-बड़ा भी नहीं
भाषा-धर्म
समझते ही नहीं हो
सेक्यूलर कहीं के!
पसर जाते हो
कहीं भी
कैसे भी
कितने रँग भरे हैं तुममें
आदमी होते
तो रँगभेद के दंगे कराने के काम आते
बाग़ की दीवारों की बाड़ हो तुम
बिछे जाते हो मॉर्निंग वॉक वालों की
हाँफ़ती रफ़्तार के बीच
सूरज चिलचिलाता है
तुम्हारे रँगों के चटकने पर
तुम और गहरा उठते हो
और गहरा जाते हैं तुम्हारे रँग
और भारी हो जाते हैं तुम्हारे बूटे
बचपन में माँ ने बताया था-
“इन फूलों से काग़ज़ बनता है”
तब से लगातार देखता आया हुँ तुम्हें
काग़ज़ बनते
……सूखकर।
कोई नहीं आयेगा कभी
तुम्हारा शुक्रिया अदा करने
हम फ़ॉर ग्रांटेड लेते हैं उन्हें
जो जताना नहीं जानते।
शिक़ायत करो बोगनवेलिया
रूठना सीखो
मुस्कुराहटों के पीछे झाँकती उम्मीदें
हम अन्देखी कर देते हैं बोगनवेलिया
क्योंकि हम बोगनवेलिया नहीं हैं
हम तो इन्सान हैं
…वो भी शहरी!
✍️ चिराग़ जैन