Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
आपाधापी की राहों पर सुस्ताने का मन होता है
चलते-चलते ऊब गया हूँ, रुक जाने का मन होता है
शिक़वे और शिक़ायत कर ली
हिम्मत और हिमाक़त कर ली
यश-अपयश का दौर हुआ है
ज़हर सरीखा कौर हुआ है
नफ़रत का हर पाठ पढ़ा है
बदले का हर ज्वार चढ़ा है
मस्तक पर अवसाद रखा है
अपशब्दों का स्वाद चखा है
छल-बल की हर रीत दिखी है
देहरी चढ़ती जीत दिखी है
अब दुश्मन के आगे जाकर, झुक जाने का मन होता है
चलते-चलते ऊब गया हूँ, रुक जाने का मन होता है
उत्सव देखे, वैभव देखा
यौवन देखा, शैशव देखा
जयकारों का रोर सुना है
तारीफ़ों का शोर सुना है
स्वागत देखे, वंदन देखे
कितने ही अभिनन्दन देखे
फूलों संवरीं राहें देखीं
स्वागत करतीं बांहें देखीं
यश की हर इक सहेली देखी
पसरी रिक्त हथेली देखीं
हर आपाधापी को तजकर, चुक जाने का मन होता है
चलते-चलते ऊब गया हूँ, रुक जाने का मन होता है
इच्छाओं को शिष्ट कर लिया
पूरा जीवन क्लिष्ट कर लिया
तन जागा तो स्वप्न नरारद
हल निकले तो प्रश्न नदारद
झुकना चाहा अहम अड़ गए
रुकना चाहा क़दम बढ़ गए
ढेरों नियम, अगिन सीमाएँ
खंडहर थोथी परिभाषाएँ
कारण मिला अधर फैलाये
कारण मिला नयन भर आए
कभी-कभी बिन कारण भी तो मुस्काने का मन होता है
चलते-चलते ऊब गया हूँ, रुक जाने का मन होता है
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
एक तरफ़ अभिनन्दन जग का
एक तरफ़ घर की चिन्ताएँ
सरगम गाने वाली वीणा
किसको अपनी पीर सुनाएँ
ऊपर अनगिन फूल खिले हैं
जिनकी देह सुगंध बिखेरे
भीतर जड़ में गंधियाते हैं
पत्तों की लाशों के डेरे
जितनी बढ़ती उमस जड़ों की
उतने फूल महकते जाएँ
एक तरफ़ अभिनन्दन जग का
एक तरफ़ घर की चिन्ताएँ
कलकल करती जिस धारा की
घाटों पर पूजा होती है
वो निश्छल नदिया बेचारी
उद्गम पर रिस-रिस रोती है
अंत, गरजता खारापन है
आदि, गलन से ग्रसित शिलाएँ
एक तरफ़ अभिनन्दन जग का
एक तरफ़ घर की चिन्ताएँ
असुरों के संहारक राजा
कोपभवन से हार गए हैं
दुनिया का मन जीत लिया पर
अंतर्मन से हार गए हैं
घर की चैखट पर टूटी हैं
कितनी अपराजेय ध्वजाएँ
एक तरफ़ अभिनन्दन जग का
एक तरफ़ घर की चिन्ताएँ
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
अकेला छोड़ दे जब ये मुकद्दर, कौन आता है
किसी के आँसुओं से आँख भरकर कौन आता है
अंधेरा खुद पिघलकर आ गया रौशन चिरागों में
हमारी बाँह में वरना सिमटकर कौन आता है
हमें तो उम्र भर बस तीरगी से जंग लड़नी है
चिरागों की खबर लेने पलटकर कौन आता है
कमसकम झूठ तो हरगिज नहीं किस्से फरिश्तों के
मुसीबत में हवा का रुख बदलकर कौन आता है
हम अपना दर्द लेकर राह पर नजरें बिछाए हैं
जरा देखें फरिश्ता या सितमगर, कौन आता है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
आपस का ये झगड़ा कुछ तो उसको भी खलता होगा
बस मैं ही तन्हा थोड़ी हूँ, वो भी तो तन्हा होगा
मैं तो हर मिलने वाले से मिलने से कतराता हूँ
वो भी सबसे मन की बातें करने से बचता होगा
शाम ढले मजबूरी में मैं बेमन से घर जाता हूँ
क्या वो भी घर के रस्ते पर रुक-रुक कर चलता होगा
अपने गम में रो लेने की फुरसत किस कमबख्त को है
मैं यूँ रोता हूँ वो मेरी यादों में रोता होगा
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
सभ्यताओं के क्षरण में
क्षोभ के वातावरण में
वेदना के मूल्य का अनुमान कमतर ही रहेगा
व्यस्तताओं को हृदय का भान कमतर ही रहेगा
मुद्रिका में प्रेम का क्षण तो सहेजा जाएगा पर
भूल जाएगा मिलन के सौख्य को दुष्यंत इक दिन
प्रीति की उजड़ी हुई क्यारी पुनः पुष्पित न होगी
हर कथा है नियत इक छोर पर तो अंत इक दिन
विष पिलाया जाएगा भी
गीत गाया जाएगा भी
बावरी की प्रीति से विज्ञान कमतर ही रहेगा
वेदना के मूल्य का अनुमान कमतर ही रहेगा
जीतकर लंका अवध को लौट आए राम लेकिन
जानकी के त्याग की लौ से हृदय जलता रहेगा
न्याय की वेदी जिसे अपनत्व कहकर ठग चुकी है
वो अहम संबंध मन की टीस बन गलता रहेगा
याद हर बाकी रहेगी
रात एकाकी रहेगी
इस पराभव का जगत् को ज्ञान कमतर ही रहेगा
वेदना के मूल्य का अनुमान कमतर ही रहेगा
जो नहीं सीखा अभी संवेदना से पार पाना
अपशकुन है उस धनंजय का महारण में उतरना
हाथ में गाण्डीव लेकर भी नयन जो नम करेगा
है नियत उसका निज अन्तर आत्मा के हाथ मरना
शस्त्र सब तूणीर में हो
और अंतस पीर में हो
तो शरों का लक्ष्य हित संधान कमतर ही रहेगा
वेदना के मूल्य का अनुमान कमतर ही रहेगा
साधना को भंग करने मेनकाएँ आएंगी ही
इंद्र लेंगे सत्यवादी की बहुत दुष्कर परीक्षा
हर सृजन की राह में शीशा बिछाया जाएगा फिर
युग करेगा सत्व की उपलब्धियों की भी समीक्षा
कष्ट के बादल फटेंगे
राह में पर्वत डटेंगे
आत्मबल के शौर्य से व्यवधान कमतर ही रहेगा
वेदना के मूल्य का अनुमान कमतर ही रहेगा
✍️ चिराग़ जैन
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