Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
आज एक टीवी चैनल पर समाचार प्रस्तोता टाइम पास करने के लिए बोल रहा था कि ये दुर्भाग्य की बात है कि हम लोग साल में कुछ ही दिन देशभक्ति के गीत गाते हैं। हम साल में एक ही दिन शहीदों को याद करते हैं। मुझे उसकी बात सुनकर लगा कि सचमुच करते तो हम ग़लत ही हैं। यह परंपरा बंद होनी चाहिए।
मैं प्रधानमंत्री जी को एक पत्र लिखकर अनुरोध करूँगा कि वे अपनी दिनचर्या बदलें। उन्हें चाहिए कि वे रोज़ सुबह उठकर सबसे पहले अमर जवान ज्योति, राजघाट, विजयघाट, शक्तिस्थल और शांतिवन पर पुष्प चढ़ाते हुए लालकिले जाएं। वहाँ झंडारोहण करके राष्ट्र को संबोधित करें। उसके बाद सीधे विजय चौक पहुँचकर गणतंत्र परेड में सम्मिलित हों। उसके बाद देश को ईद-उल-फ़ित्र, ईद-उल-जुहा, ईद-ए-मिलाद, मिलाद-उल-नबी, शब्-ए-बारात, मुहर्रम, होली, दीवाली, बिहू, ओणम, पोंगल, रक्षाबंधन, हरियाली तीज, मकर संक्रांति, लोहड़ी, महावीर जयंती, रामनवमी, गुरुपर्व, बुद्ध पूर्णिमा, वसंत पंचमी, वाल्मीकि जयंती, जन्माष्टमी, दुर्गापूजा, गणेश चतुर्थी, पर्यूषण, विश्वकर्मा जयंती, ईस्टर, गुड फ्राइडे, रविदास जयंती, बैसाखी, अहोई अष्टमी, सकट चौथ जैसे सभी पर्वों की शुभकामनाएं दें। इसके बाद दोपहर का भोजन करें और फिर विवेकानंद, भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, चंद्रशेखर आज़ाद, सुभाष, तिलक, अशफ़ाक़ुल्लाह खान, रामप्रसाद बिस्मिल, बिनोवा भावे, विपिनचंद्र पाल, लाला लाजपत राय, महाराणा प्रताप, वीर सावरकर, राजाराममोहन राय, पन्ना धाय, सम्राट अशोक, रणजीत सिंह, बिरसा मुंडा, कुँवर सिंह, खुदीराम बोस, स्वामी श्रद्धानंद, छत्रपति शिवाजी, और जो जो भी महान हैं उन सबके बलिदानों को याद कर गमगीन होकर बैठे रहें। वहां से निवृत्त होकर रामलीला मैदान पहुंचें और हवा में तीर छोड़कर बुराई पर अच्छाई की विजय के पर्व को याद करें। वहां से जामा मस्जिद पहुँच कर दावत-इ-इफ़्तार में शामिल हों। और उसके बाद किसी गिरिजा में जाकर जीसस को जन्मदिन की बधाई देते हुए संता के कपड़े पहन कर बच्चों को उपहार बाँटने निकल पड़ें। रात भर उपहार बांटने के बाद सुबह फिर से फूल लेकर राजघाट की ओर निकल लें।
यदि हमारे प्रधानमंत्री जी रोज़ इस दिनचर्या का पालन करें तो कोई आहत होकर यह न कह पाएगा कि हम साल भर में सिर्फ़ एक दिन शहीदों को याद करते हैं, या हमें बुद्ध, महावीर, देश या समाज की याद साल में एकाध दिन ही आती है। और ऐसा करते हुए इस बात की बिल्कुल फ़िक्र न करें कि लोग रोज़ मेरी एक जैसी दिनचर्या देख कर बोर हो जाएंगे, क्योकि एक महीने बाद कोई दूसरा प्रधानमंत्री इस दिनचर्या को करता दिखेगा। उसके एक महीने बाद कोई और… और फिर कोई और और इन सब प्रधानमंत्रियों का योगदान भी रोज़ याद किया जाएगा।
✍️ चिराग़ जैन
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सुर-असुर; शैव-वैष्णव; कौरव-पाण्डव; आर्य-द्रविड़, बौद्ध-वैष्णव, जैन-बौद्ध, हिन्दू-मुस्लिम, भारतीय-अंग्रेज, ऊँच-नीच और अमीर-ग़रीब का परस्पर संघर्ष तो समझ लिया हमने! लेकिन रजवाड़े आपस में क्यों लड़े, मराठा-पेशवाओं में आपसी संघर्ष क्यों था, मुग़ल आपस में क्यों एक न हुए, मौर्यो में भितरघात कैसे हुआ, और तो और कांग्रेसी एक क्यों न रह सके, जनता दल क्यों विभक्त हुआ, तेलंगाना का संघर्ष क्यों हुआ, झारखण्ड मुक्ति मोर्चा क्यों बना, शिवसेना दुफाड़ क्यों हो गई, वरुण गांधी और राहुल गांधी में क्यों नहीं बनी, प्रमोद महाजन और प्रवीण महाजन का अंत कैसे हुआ, आडवाणी जी और मोदी जी में दूरी क्यों है, केजरीवाल और अन्ना और योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण और किरण बेदी अलग-अलग क्यों हो गए। -इन सब प्रश्नों का अलग अलग उत्तर तलाशने की आवश्यकता नहीं है। सीधा सा मतलब है बंधु। किसी भी वर्ग को इस देश की समस्याओं का दोषी ठहराना बंद होना चाहिए। यदि सारे हिंदुओं को देश से बाहर निकाल दिया जाएगा तो मुसलमान शीया-सुन्नी होकर लड़ेंगे। सारे मुसलमानों को बाहर निकाल दिया गया तो हिन्दू ब्राह्मण-बनिए-क्षत्रिय-शूद्र होकर सिर फोड़ेंगे। सबसे अहिंसक जैनियों को अकेला छोड़ दो तो वे श्वेताम्बर-दिगंबर-तेरापंथी-बीसपंथी-मूर्तिपूजक और न जाने क्या क्या होकर लड़ने लगेंगे। और शांति के प्रतिमान समझे जाने वाले बौद्धों को अकेला छोड़ दो तो उनके पास भी ढेर संभावनाएँ शेष हैं। गोत्र, वंश, कुल, भाषा, शिक्षा, पंथ किसी भी भेद पर लड़ना जब तय ही है तो किसी भी वर्ग को बाहर निकाल कर लड़ाई की संभावनाएं कम न करो। ऐसा करोगे तो लड़ाई हो जाएगी।
✍️ चिराग़ जैन
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भैये यो दलित दलित का होत है।
कछु नाय होत भाई। ई सब नेता-ऊता पहिले चुनाब-चुनाब की कुश्ती खेलत हैं, फिर हिन्दू-मुसलमान की कबड्डी। अऊर जब सबन से उकता जइहैं तब दलित-उलित का सलीमा लगा लई हैं।
✍️ चिराग़ जैन
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आज मेरा बटुआ खो गया। बटुआ खोने के बाद मुझे पता चला कि इस देश में जितने भी लोग हैं वे सब जीवन में कभी न कभी बटुआ गँवा चुके हैं और उस अनुभव की कहानी सुनाने के लिए अवसर की तलाश में जीवन जी रहे हैं। कुछ दरिद्र लोग जिनके पास निजी अनुभव का अभाव है वे समय पड़ने पर अपने दोस्त, चाचा, ताऊ, मौसा या पड़ोसी के अनुभवों से काम चलाते हैं।
बटुआ खोने के बाद मुझे इस बात का भी एहसास हुआ कि मनुष्य नामक सामाजिक प्राणी जानता है कि उम्मीद पर दुनिया कायम है इसलिए उस पत्थर के नीचे से भी बटुए की तलाश करते हैं जिसे युगों पूर्व भगवान् राम ने भी छूकर अहिल्या नहीं बनाया था।
बटुआ खोने के बाद ही मुझे यह भी पता चला कि देश के लोग वाक्य के शुरू में “काश” और वाक्य के अंत में “ता” लगा कर घटी हुई घटना को भी घटने से रोकने की सम्भावना बनाए रखने में दक्ष हैं।
जो भी व्यक्ति घटनास्थल की लोकप्रियता से आकृष्ट होकर मुझ तक पहुँचता वो आते समय मुख पर कौतूहल, सुनते समय माथे में त्यौरियां और कथा समाप्ति के समय नीचे वाले होंठ को ठुड्डी तक ले जाने का असफल प्रयास करके गर्दन हिलाता हुआ भीड़ का हिस्सा बन जाता था। कहानी चूंकि मैं खुद “आह से उपजे गान” की तरह सुना रहा था इसलिए वह कुछ ही मिनिटों के “करत करत अभ्यास” से इतनी प्रभावी हो चली थी कि सुनने वाला लौटते हुए गर्दन झुकाकर यह सोच कर शर्मिंदा दिखाई देता था कि यदि वह मौक़ा ए वारदात पर मौजूद रहा होता तो बटुए के गिरते ही उसे दबोच लेता और मुझे देकर मेरा सारा कष्ट हर लेता।
बटुआ खोने के बाद मुझे यह भी अच्छी तरह पता चल गया कि बटुए जैसी कीमती चीज़ संभाल के रखनी चाहिए। एक सज्जन ने यह भी जानकारी दी कि बटुए के खोने से बहुत परेशानी हो जाती है।
कुछ लोगों ने मुझसे यह भी पूछा कि बटुए में पैसे थे क्या। मैंने उनको बताया कि नहीं पैसे तो मेरी कार के फ्यूल टैंक में थे, बटुए में तो मैंने पेट्रोल भरवा रखा था।
ये सुनकर उन्होंने अपने स्वेटर के गले में हाथ घुसाकर कमीज की जेब में से एक सौ बीस रूपये निकाले और बताया कि वे भी पैसे कभी बटुए में नहीं रखते, बटुआ हमेशा खाली रहता है ताकि कभी गुम हो तो पैसों का नुकसान न हो। ऐसा कहते हुए उन्होंने एक सौ बीस रूपये से अपनी कमीज की खाली जेब पुनः भर ली।
बटुआ खो जाने के बाद मुझे यह भी पता चल गया कि अगले चार-पाँच दिन मुझे इस उम्मीद में जीना चाहिए कि कोई भला आदमी मुझे फोन करके बताएगा कि आपका बटुआ हमें कहीं पड़ा मिला है, इसे हमसे वापस ले जाओ।
✍️ चिराग़ जैन
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प्यारे देशवासियो!
आपको यह सूचित करते हुए ख़ुशी हो रही है कि हम पंजाबी, हम सिंधी, हम ये, हम वो सब कुछ हैं लेकिन सुरक्षा कारणों से हम हिंदी नहीं हो पा रहे हैं। यह बताते हुए मैं फूला नहीं समा रहा हूँ कि हिंदी कवि-सम्मेलन जगत् का शीर्ष कहा जाने वाला लालकिला कवि-सम्मेलन इस बार सुरक्षा कारणों से “स्थगित” कर दिया गया है। उल्लेखनीय है कि गणतंत्र दिवस के अवसर पर दिल्ली सरकार केअधीनस्थ सभी भाषा अकादमियां कवि-सम्मेलन का आयोजन करती हैं। इस श्रृंखला में हिंदी, उर्दू, पंजाबी, सिंधी और संस्कृत भाषा के कवि-सम्मेलन होते रहे हैं। इनमें सर्वाधिक लोकप्रिय कवि-सम्मेलन था “हिंदी भाषा” का गणतंत्र दिवस कवि-सम्मेलन।
उक्त कार्यक्रम हर साल लालकिले के भीतर फुटबॉल मैदान में होता था। बीच में कुछ वर्ष यह आयोजन सुरक्षा कारणों से तालकटोरा स्टेडियम में भी हुआ। लेकिन इसके रद्द अथवा स्थगित होने की कोई घटना याद नहीं आती।
वैसे इस कार्यक्रम का रद्द होना देशहित में ही है। इसकी लोकप्रियता और गरिमा को देखते हुए जवाहरलाल नेहरू से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक अनेक प्रधानमंत्रियों ने इसमें उपस्थित रहकर अपना समय नष्ट किया है। दिल्ली के मुख्यमंत्री और राज्यपालों को तो इसका आकर्षण कभी छोड़ ही न सका। ऐसे में इसके न होने से कितने सारे महत्वपूर्ण लोगों का कितना सारा कीमती समय बचा; यह गणतंत्र के लिए शुभ है।
अकादमी की ओर से आधिकारिक सूचना यह है कि स्थान उपलब्ध न होने के कारण कवि-सम्मेलन स्थगित किया जा रहा है। यह अच्छी बात है। गणतंत्र के अवसर पर लालकिले को सुरक्षा एजेंसियों ने किसी गुप्त स्थान पर छुपा दिया है ताकि आतंक की काली नज़र लालकिले की आभा को धूमिल न करदे। यदि लालकिले को कुछ हो जाता तो गणतंत्र परेड की झाँकियाँ कहाँ जाकर अपने पैर दबवातीं।
मेरे एक मित्र हैं जिनको अब मैं शत्रु मानने लगा हूँ। उन्होंने मुझसे इतना घटिया सवाल पूछा कि जब स्थान बदल कर बाकी भाषाओं का कवि-सम्मेलन हो सकता है तो हिंदी का क्यों नहीं। अब बोलो, कौन समझाए इनको! अरे यार, हिंदी की सुरक्षा ज़्यादा ज़रूरी है। हिंदी घुट-घुट कर मर जाए, तो हम स्वीकार कर सकते हैं लेकिन हिंदी आतंकियों की गोली से मरे इसे हमारी सरकार किसी सूरत बर्दाश्त नहीं कर सकती। वैसे भी, जिस प्रकार अन्य खेलों के उत्थान के लिए क्रिकेट पर प्रतिबन्ध लगाना आवश्यक है; जिस प्रकार पिछड़ों के विकास के लिए अगड़ों का शोषण ज़रूरी है उसी प्रकार अन्य भाषाओं के कवि-सम्मेलन की सफलता के लिए हिंदी के कवि-सम्मेलन को ठण्डे बस्ते में डालना अनिवार्य है।
अब ये मत पूछना कि विश्व पुस्तक मेला हज़ारों कीअव्यवस्थित भीड़ के साथ प्रगति मैदान में सुरक्षित रह सकता है तो कवि-सम्मेलन एक व्यवस्थित श्रोता समूह के साथ बंद इमारत में असुरक्षित क्यों है? ये भी मत पूछना कि छत्रसाल स्टेडियम में ऑड-इवन की क़ामयाबी का जश्न मनाने के लिए स्थान उपलब्ध हो सकता है तो कवि-सम्मेलन के लिए इतने बड़े शहर में स्थान का अभाव क्यों है?
इस प्रकार के प्रश्न बेमानी हैं। सरकार ने जनता की सुरक्षा के लिए ख़ुद को संकट में डाला। छत्रसाल स्टेडियम में मुख्यमंत्री जी ने सारे संकटों के सम्मुख अपनी छाती अड़ा दी और जनता के मुँह को काला होने से बचा लिया। इसको कहते हैं नेतृत्व। ऐसे लोगों की भावनाओं पर प्रश्न उठाना आपकी राष्ट्रभक्ति को संदेह के घेरे में खड़ा कर देगा।
इसलिये एक टुच्चे से कवि-सम्मेलन के न होने का शोक न मनाओ रे बंधु बल्कि अपने भाग्य को सराहो कि हमारा देश किन महान विभूतियों के हाथ में है।
और हाँ
वो एन्ड में क्या बोलते हैं
जय हिन्द!
✍️ चिराग़ जैन
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आज एक साहित्यिक कार्यक्रम में अनेक वक्ताओं को सुनने का अवसर मिला तो पता चला कि आजकल मार्केट में अनेक प्रकार के वक्ता चल रहे हैं। कुछ परंपरागत वक्ता जो पुराने ढर्रे पर विषय का बाक़ायदा अध्ययन करके मंच पर आते हैं, वे आजकल मंच पर आ नहीं पाते हैं। इसके विपरीत वे लोग मंच की अट्टालिकाओं पर सुशोभित हो जाते हैं जो अध्ययन में व्यर्थ होने वाला अमूल्य समय मंच जुटाने में लगाते हैं। ये लोग जानते हैं कि एक बार मंच मिल जाए तो कुछ भी बोल देंगे, श्रोताओं को सुनना पड़ेगा। क्योंकि साहित्यिक गोष्ठियों का श्रोता वह विवश जीव है जो दरी पर बैठी अनपढ़ महिलाओं की तरह इस भंगिमा से मंच को निहार रहा होता है कि पूज्य बाबाजी जो कह रहे हैं वह ठीक ही होगा।
कुछ वक्ता प्रोफ़ेशनल वक्ता होते हैं। ये स्वागत-वुआगत हो जाने के उपरांत बराबर वाले की ओर झुकते हैं और घबराहट प्रदर्शित करने का अभिनय करते हुए प्रश्न करते हैं कि आज क्या बोलूंगा। उनका प्रश्न सुनकर बराबर वाला अतिरिक्त शिष्टाचार प्रदर्शित करते हुए रिरियाता हुआ कहता है, अरे साहब, आप तो कुछ भी बोल दीजिये। इसके बाद दोनों हें हें हें की ध्वनियाँ निकालते हुए सीधे हो जाते हैं। इस प्रक्रिया के दौरान कुछ अनुभवी लोग पेट के भीतर हो रही गुड़गुड़ाहट को ठोस से गैस में परिवर्तित कर देने का रासायनिक उपक्रम भी पूर्ण कर लेते हैं।
फिर संचालक एक-एक वक्ता को जिन शब्दों में आमंत्रित करता है उनसे स्पष्ट होता है कि अमुक की उत्पत्ति न हुई होती तो इस धरा को स्वयं पर इतराने का अवसर न मिला होता।
एक ख़ास प्रकार के वक्ता अपने रटे-रटाए वक्तव्य को प्रस्तुत विषय से जोड़ने के लिये एकाध मिनिट की त्वरित भूमिका बनाते हैं और जैसे ही उनके तैयार भाषण का शीर्षक उनके आशुभाषण में घुसड़ जाता है, वे तुरंत धाराप्रवाह अपना भाषण पेल कर मुस्कुराते हुए बैठ जाते हैं।
इसके बाद क्रम शुरू होता है उन वक्ताओं का जो किसी भी विषय पर केवल यह बताते पाए जाते हैं कि उनका कई बड़े-बड़े लोगों से बेहद निकट का संबंध रहा है। ऐसे लोगों की सूची सामान्यतया उन लोगों तक सीमित रहती है जो कदाचित् इनसे निकटता के सदमे से दुखी होकर दुनिया छोड़ चुके हैं। इनको सुनकर पता चलता है कि कई भूतपूर्व प्रधानमंत्रियों और राज्यपालों ने तो इनकी सलाह सुनने के लिये ही पदग्रहण किया होता है। ऐसों का वक्तव्य सुनकर मेरा मन एक ठंडी आह भरते हुए कहता है कि अच्छा ही है अमुक जी दुनिया से चले गए वरना ऐसी बेसिर-पैर की बातें सुनने में समय नष्ट करने के अपराध में भारतीय दण्ड संहिता की सभी धाराएँ एक साथ उन पर लग जातीं।
कुछ वक्ता एकदम इन्स्टेंट वक्ता होते हैं। वे “हिंदी साहित्य में रामचन्द्र शुक्ल जी का योगदान” जैसे विषय पर भी बोलेंगे तो बात यहाँ से शुरू करेंगे-
“मेरे पास आयोजकों का फोन आया। मुझसे कहा डॉक्टर साहब आपको आचार्य शुक्ल के योगदान पर बोलना है। मैंने कहा अरे भई, कब बोलना है, कहाँ बोलना है, कुछ तो बताओ। तब आयोजक बोले अरे सर, सॉरी सॉरी मैं बताना भूल गया था, फ़लाँ तारीख़ को फ़लाँ जगह फ़लाँ अवसर पर आपको बोलना है। मैंने कहा ये हुई ना बात। अब बताइये आपको मेरा नम्बर कहाँ से मिला। तो उन्होंने बताया जी आपका नम्बर चुचुलूपुर वाले मिश्रा जी ने दिया है। मैंने कहा अरे राम रे, ये तो मुसीबत हो गई। चुचुलूपुर वाले मिश्रा जी की बात कैसे टाल सकता हूँ। उनसे इतना पुराना सम्बन्ध है कि क्या बताएँ। मुझे एक आवश्यक कार्य से लखनऊ जाना था लेकिन अब आपने ऐसे धर्म्संकट में डाल दिया है कि क्या कहें। चलिये… अब जो भी हो, आ जाएंगे। इसलिये मुझे आना पड़ा। बहुत बढ़िया कार्यक्रम है आपका। सभी बढ़िया लोग बुलाए हैं। साहित्यिक गोष्ठियों में आजकल इतने स्तरीय विद्वान कहाँ देखने को मिलते हैं। आज के अध्यक्ष जी को ही ले लीजिये। महोबा में ये और हम घंटों चाय की दुकान पर साहित्य चर्चा किया करते थे। अनेक बार इनके घर भी जाना हुआ है मेरा। और भाभीजी तो क्या शानदार भजिया बनाती हैं। और उसके साथ वो लहसुन की चटनी। आज तक स्वाद नहीं गया उसका। इतने विद्वान आदमी को अध्यक्ष बनाकर आपने साहित्य के प्रति अपने अनुराग और ईमानदारी का परिचय दिया है। समय की सीमाएँ हैं इसलिये अपनी बात को संक्षिप्त कर रहा हूँ, वरना जी तो करता है कि बोलता ही जाऊँ। आचार्य शुक्ल पर जितना कहा जाए उतना कम है। हिंदी साहित्य उनके योगदान के लिये हमेशा ॠणी रहेगा। आपने मुझ अकिंचन को इतने संभ्रांत लोगों के बीच बोलने का अवसर दिया, बहुत बहुत धन्यवाद।”
इस प्रकार के सात-आठ वक्तव्यों के बाद आयोजक सबका धन्यवाद ज्ञापन करता है। वक्ता सम्मान में मिले दुशालों को कंधों पर डाले, अपना अपना गुलदस्ता उठाकर इतराते हूए एक दूसरे की पीठ ठोंकते हैं। सबके मन में एक दूसरे के प्रति समान आदर भाव होता है कि आप भी उतने ही विद्वान हैं जितना मैं स्वयम को समझता था। श्रोता प्रवचन समाप्ति की घोषणा के साथ ही प्रसाद के लिये जलपान की लाइन में लग जाते हैं। और साहित्य मंच के पीछे टँगे बैनर के साथ ही अपने कर्णधारों की योग्यता देख कर ज़मीन पर आ गिरता है।
✍️ चिराग़ जैन