Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
कितना शानदार लोकतंत्र है हमारा। पाँच दिन से पूरा देश तमाशबीन बनकर जनमत के मखौल का खेल देख रहा है। कांग्रेस जानती है कि पैसे फेंके जाएंगे तो उसके विधायक बिक जाएंगे, इसलिए उसने जनता के जीते हुए प्रतिनिधियों को बाक़ायदा नज़रबंद कर लिया है। भारतीय जनता पार्टी जानती है कि बहुमत साबित करने के लिए विधायक तोड़ने होंगे। वह यह भी जानती है कि बहुमत साबित हुआ, तो उसकी धूर्तता सबके सम्मुख स्पष्ट हो जाएगी। राज्यपाल जानते हैं कि सरकार बनाने के लिए हर हद्द तक का भ्रष्टाचार होगा। उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश जानते हैं कि कांग्रेस, भाजपा और जेडीएस में से कोई भी लोकतंत्र की रक्षा के लिए नहीं, बल्कि अपनी सरकार बनाने के लिए तमाम हथकंडे अपना रहे हैं।
कार्यपालिका जानती है कि निजी हितों के लिए अनधिकृत रूप से पैसे का नक़द लेन-देन अपराध है। कार्यपालिका यह भी जानती है कि नोटबन्दी के बाद से इतनी बड़ी नक़दी अपने पास रखना अपराध है। मीडिया जानती है कि शतरंज की बिसात पर पैसे फेंककर काले घोड़ों को सफेद करने की जुगत चल रही है। सोशल मीडिया धड़ल्ले से इस ख़रीद-फ़रोख़्त पर चुटीले, तीखे, कड़वे और चटखारे भरे संदेश वायरल कर रहा है।
भाजपा के प्रवक्ता से पूछो कि यह क्या हो रहा है तो वह चुपके से अपनी पार्टी के इस अपराध में लिप्त होने की बात स्वीकार करते हुए दलील देते हैं कि हरियाणा में इंदिरा गांधी ने अपना मुख्यमंत्री बनाने के लिए यही किया था, तब हम इसे अपराध मानते थे लेकिन अब हमारी बज्जी है, इसलिए अब हम इसे अपराध नहीं मानते।
कांग्रेस के प्रवक्ता से पूछो कि गोवा में आप सबसे बड़ी पार्टी की दुहाई देकर सरकार बनाने का दावा कर रहे थे तो फिर अब आप आधी रात को सुप्रीम कोर्ट क्यों चले गए। कांग्रेसी प्रवक्ता इस प्रश्न के उत्तर में स्पष्ट कहता है कि गोवा में हमने वह बात कही, जिससे हमें लाभ हो रहा था और कर्नाटक में भी हम वही बात कह रहे हैं जिससे हमें लाभ मिले अब ये दोनों बातें परस्पर विरोधी हों तो इसमें हमारी क्या ग़लती है?
सोशल मीडिया पर जो कांग्रेस को आइना दिखाए उसे ‘अंधभक्त’ कहकर ज़लील किया जाएगा। जो भाजपा का सच बोलने की कोशिश करे उसे ‘राष्ट्रद्रोही’ कहकर अपमानित किया जाएगा।
जनता पूछती है कि सबसे ज़्यादा वोट कांग्रेस को पड़े तो सबसे ज़्यादा सीटें भाजपा की कैसे आ गईं। उत्तर मिलता है कि सीटों का बँटवारा इस तरह से किया गया है कि चाहे एक वोट का अंतर हो, लेकिन सीट जीतने का जुगाड़ हो जाएगा।
जनता पुनः पूछती है कि फिर सबसे ज़्यादा सीट वाली पार्टी के सामने कम सीटों वाले दो मिलकर कैसे सरकार बना सकते हैं। उत्तर मिलता है कि दोनों पार्टियों ने तय कर लिया है कि मिल-बाँटकर मलाई खा ली जाएगी इसलिए रैलियों की गाली-गलौज को भूलकर गले लग जाओ।
जनता पुनः पूछती है कि हमने तो रैलियों की बातें सुनकर ही आपको वोट दिया था। उत्तर मिलता है कि हमने भी वोट लेने के लिए ही रैलियाँ की थीं। हमारा उद्देश्य जनकल्याण नहीं था, चुनाव जीतना था। पानी की तरह पैसा बहाना पड़ता है साहब। रात-दिन एक करने पड़ते हैं। इलेक्शन मैनेजमेंट कोई हँसी-खेल नहीं है। इतनी मेहनत से मिले वोटों को विपक्ष में बैठकर बर्बाद तो नहीं कर सकते ना। जहाँ इतना पैसा लगा, वहाँ थोड़ा और सही। एक बार कुर्सी मिल गई तो छह महीने में सारा ख़र्चा निकल आएगा।
जनता भौंचक्की होकर पूछती है कि चुनाव आयोग तो बताता है कि चुनाव लड़ने के लिए सीमित धन व्यय करना होता है। उत्तर मिलता है, छोड़ो यार, किस युग में जी रहे हो। उतने पैसे में कोई पार्षद का चुनाव भी न जीत पाएगा। ये सब औपचारिकता के लिए लिखा जाता है। सबको पता है कि इलेक्शन कितने करोड़ों का खेल है।
जनता की आँखे फट जाती हैं। वह प्रश्नवाचक दृष्टि से चुनाव आयोग की ओर देखती है। चुनाव आयोग जनता से मुँह फेरकर खड़ा हो जाता है। जनता आशा से भरकर कार्यपालिका की ओर देखती है तो पुलिसवाला उसे डाँटकर बोलता है- ‘अबे तैने वोट दे दिया ना, अब अपना हिल्ला कर, ये बड़े लोगों के काम हैं इन पचड़ों में क्यों पड़ता है?’ जनता हिम्मत करके न्यायपालिका की ओर देखती है तो न्यायपालिका अपने काले कोट में से पट्टी फाड़कर कस के अपनी आँखों पर बांध लेती है।
जनता हारकर मीडिया के पास पहुँची, तब तक ख़बर आ गई थी कि कांग्रेस के कुछ विधायक रिसोर्ट से ग़ायब हो गए। पूरे चैनल में अफरा-तफरी का माहौल बन गया। कोई कांग्रेस के प्रवक्ता को लाइन अप कर रहा है। कोई बीजेपी के प्रवक्ता का फोनो कर रहा है। कोई ग्राफिक बना रहा है। जनता ठिठककर धम्म से ज़मीन पर बैठ जाती है। स्टूडियो में आवाज़ गूंजती है – ‘कट, कट, कट, अरे यार ये फ्लोर पर कौन बैठा है इसे बाहर करो। …स्पॉट दादा देखो ज़रा!’
…बिजली की गति से दो स्पॉट बॉय आते हैं और जनता को उठाकर स्टूडियो से बाहर फेंक देते हैं।
जनता अपने हाथ में टिफिन पकड़े अपने दफ़्तर की ओर चल देती है। हाज़िरी रजिस्टर पर आधे दिन की तनख़्वाह कटवाती है और शाम को छुट्टी होने का इंतज़ार करने लगती है।
✍️ चिराग़ जैन
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सावधान रहकर रेंगा जा सकता है, चला जा सकता है किन्तु दौड़ा नहीं जा सकता। दौड़ने के लिए विश्वास की आवश्यकता होती है। जिस राह पर दौड़ रहे हो, उस पर विश्वास; जिन पैरों से दौड़ रहे हो, उन पर विश्वास; जिन राहगीरों के साथ दौड़ रहे हो, उन पर विश्वास। जिस वृक्ष के नीचे से गुज़रोगे, उस पर विश्वास करना होगा कि वह आपके ऊपर गिर नहीं पड़ेगा। आसमान पर विश्वास करना पड़ेगा कि वह टूट नहीं जाएगा। दाहिने पैर को विश्वास करना होगा कि जब तक वह हवा में रहेगा, तब तक बाँया पाँव उसके हिस्से का भी संतुलन बनाए रखेगा। बाँए पैर को आश्वस्त होना होगा कि जब वह अपने हिस्से की दौड़ लगाएगा तो दाहिना पैर देह के बोझ को ज़िम्मेदारी से संभाले रखेगा। इनमें से किसी भी विश्वास का स्थान संदेह ने ले लिया तो वह संदेह आपके पैरों को जकड़ लेगा।
जड़ के विश्वास पर ही देवदार के तना भौतिकी के समस्त नियमों के विपरीत, सैंकड़ों फीट तक उठता चला जाता है। यदि उस तने को जड़ पर विश्वास न हो और वह बार-बार मुड़कर जड़ की मजबूती जाँचने लगे तो वह अष्टवक्र सरीखा झाड़ बनकर रह जाएगा।
सृष्टि विश्वास पर टिकी हुई है। सूर्य पर हमें विश्वास है कि वह शाम को ढल जाएगा। चन्द्रमा पर हमें विश्वास है कि वह नियत क्रम में घटता-बढ़ता रहेगा। यहाँ तक कि मृत्यु पर भी हमें विश्वास है कि वह एक न एक दिन अवश्य आएगी। बस, हम नहीं करते तो सिर्फ़ इस जीवन पर विश्वास नहीं करते। जिस जीवन का प्रारंभ प्रसव जैसी अद्वितीय पीड़ा से होता है उसकी शक्ति पर हमें भरोसा नहीं हो पाता। जिस मस्तिष्क ने बिना किसी प्रशिक्षण के देह के रोम-रोम पर नियंत्रण कर रखा है उसकी क्षमता पर हम संदेह करने लगते हैं।
जिन संबंधों की ऊर्जा शक्ति एक पूरी सृष्टि से लोहा लेने को तैयार रहती है, उन संबंधों पर हमें विश्वास नहीं है। जिस प्रेम के बूते सृष्टि की हज़ार बार सृजित की जा सकती है, उस प्रेम पर हम भरोसा नहीं कर पाते और घृणा को पोसने लगते हैं। लहलहाते हुए खेत का स्वप्न देखनेवाले लोग, बीज की क्षमताओं पर संदेह नहीं करते। जितनी ऊर्जा हम बीज पर संदेह करने में खपाते हैं, उतनी ही ऊर्जा अपने श्रम, अपनी इच्छाशक्ति और भूमि की उर्वरता को पोसने में खपाएँ तो खेत में फसल ज़रूर लहलहाएगी।
जीवन जीने के लिए विश्वास, श्वास से भी अधिक आवश्यक है। विश्वास के अभाव में कोई भी सफ़र गति नहीं पकड़ सकता; न क़ामयाबी का, न भक्ति का, न प्रेम का और न ही रिश्तों का! जो मन में संदेह रखकर इनमें से किसी राह पर चलता है, वह दरअस्ल अपने-आप को छल रहा होता है।
✍️ चिराग़ जैन
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ट्रेन में चलनेवाले मुसाफिरों से पैसे वसूलते पुलिसवालों का वीडियो देखा। मन क्षोभ और घृणा से भर गया। खाकी वर्दी की धौंस और सरकारी तंत्र के निकम्मेपन पर थूक रहा था पूरा वीडियो। सत्तर साल हो गए इस देश को आज़ाद हुए। सवा सौ करोड़ भारतीयों को मूलभूत सुविधाएँ देने में पूरी तरह नाकाम यह सिस्टम शर्म आ जाने की सीमा से कहीं आगे बढ़ चुका है।
पुलिस विभाग की अभद्रता, ढिठाई और निष्ठुरता ने जनहित के ढोंग की हर लम्हा खिल्ली उड़ाई है। अपराध और शोषण से त्रस्त नागरिक भी इन थानों में घुसने से कतराता क्यों है -इस प्रश्न का उत्तर न तो सरकार के पास है, न ही पुलिस की छवि सुधारने के लिए किए जा रहे आयोजनों के आयोजकों के पास।
भारत के विकास कार्यों हेतु रात-दिन मेहनत करके टैक्स चुकानेवाला नागरिक भी यदि किसी स्थिति में पुलिस की सहायता लेना चाहे तो उसे दुर्व्यवहार झेलने के लिए तैयार रहना पड़ता है। थाने में सहायता मिले या न मिले, एकाध गाली हर किसी को मिल ही जाती है। जनता के टैक्स के पैसों पर पलनेवाला ये विभाग, जनता की जेब से रिश्वत लूटनेवाला ये विभाग, जब किसी सभ्य नागरिक को गरियाता है, तब ऐसा लगता है जैसे कोई खाना खाने के बाद पत्तल में छेद कर रहा हो।
रिश्वत लेकर कार्रवाई करना और गाली-गलौज करना इस विभाग के कुछ नुमाइंदों को इतना भा गया है कि जो कुछ लोग ईमानदार होकर किसी पीड़ित की वास्तविक मदद करना भी चाहते हैं, उन्हें या तो निष्क्रिय हो जाना पड़ता है या फिर इनके रंग में रंग जाना पड़ता है। शहरों की पढ़ी-लिखी जनता भी इस महकमे की कारगुज़ारियों से बच नहीं पाती, फिर गाँव-कस्बों के सीधे-सादे लोगों का तो कहना ही क्या!
इस देश की पुलिस को रामायण के बाली की तरह यह वरदान प्राप्त है कि जो भी नागरिक बिना किसी एप्रोच के किसी पुलिसवाले के सामने खड़ा हो जाएगा, उसका इज़्ज़तदार होने का भरम समाप्त हो जाएगा और चंद मिनिटों में वह स्वयं को अपराधी मानने लगेगा।
देश के हुक्मरानो! खरबों रुपये के घोटाले आपको मुबारक़, देश की अंतरराष्ट्रीय छवि भी आपको मुबारक़, देश के चुनावों की राजनीति भी आपको मुबारक़, राहुल-मोदी की महाभारत भी आप जानो; इस देश के आम नागरिक को अपनी समस्या बताकर बिना प्रताड़ित हुए थाने से घर लौट सकने की स्थितियाँ इस देश को सौंप दीजिये ताकि आप जब देश की अंतरराष्ट्रीय छवि सुधरने का ढोल पीटें तो कोई वायरल वीडियो आपके रंग में भंग न डाल सके।
✍️ चिराग़ जैन
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भारत में सरकारें जनकल्याणकारी नीतियों पर काम करती है। माननीय न्यायालय जनता के प्रति न्याय हेतु उत्तरदायी है। कार्यपालिका जनता की रक्षा हेतु चौबीस घंटे तैनात रहती है। …ये सब बातें जब सामाजिक विज्ञान की पाठ्य पुस्तिका में पढ़ते थे तब इस देश को लेकर जैसी छवि बनती थी वह किसी गोलोकधाम से कम नहीं थी। किन्तु जैसे ही हमने अख़बार पढ़ना सीखा तब ज्ञात हुआ कि पाठ्य पुस्तिका की इबारतें असल ज़िंदगी में झूठ साबित होती हैं।
लोकतंत्र के जिन स्तम्भों के प्रति श्रद्धा और आदर उमड़ा था, बाहर आकर देखा तो वे एक-दूसरे के साथ घटिया हरक़तें करते नज़र आए। पाठशाला के स्वप्न से बाहर निकले तो महसूस हुआ कि जनकल्याण एक कवच का नाम है जिसके पीछे खड़े होकर जनता पर क्रूर वार किए जाते हैं। सरकार नीतियाँ बनाते समय सिर्फ इतना ध्यान रखती है कि उसकी सत्ता को बचाने के लिए किस-किस ‘जन’ की ज़रूरत पड़ सकती है। और उसका कितना कल्याण करने से अपनी कमीशनिंग ठीक-ठाक चलती रह सकती है।
जब दिल्ली के बिल्डर करोल बाग़, पहाडग़ंज की आवासीय संपत्तियों को फ्रीहोल्ड करा के उन पर कमर्शियल काम्प्लेक्स बना रहे थे, तब उस क्षेत्र का थाना शायद तीर्थाटन पर गया था। उस क्षेत्र के नगर निगम अधिकारी भी देश सेवा में व्यस्त थे। जब उन कॉम्प्लेक्सों की बिक्री हुई तब रजिस्ट्रार का पूरा कार्यालय भी देश निर्माण में तल्लीन था। जब उस इकाई पर बिजली-पानी के वाणिज्यिक कनेक्शन लगाए गए, तब इन दोनों विभागों को भी ध्यान नहीं आया कि यह आवासीय परिसर है। कई दशकों से सरकार इन व्यापारियों से कमर्शियल टैक्स लेती रही।
बिजली विभाग, जल विभाग, नगर निगम सब व्यावसायिक पैसा वसूलते रहे। अब अचानक माननीय न्यायालय को ज्ञात हुआ कि यह तो आवासीय परिसर है। टैक्स चूसनेवाले विभाग सारा ठीकरा व्यापारी के सिर पर फोड़कर ईमानदारी और सिस्टम की ढाल के पीछे छुप गए। नगर निगम और पुलिस विभाग, माननीय न्यायालय के आदेश का पालन करते हुए सीलिंग करने पहुँच गए। व्यापारी ठगा-ठगा सा खड़ा रह गया। दिल्ली सरकार ने कहा कि सीलिंग केंद्र सरकार करवा रही है। केंद्र सरकार ने कहा कि यह न्यायालय का आदेश है और न्यायालय के आदेश को हम कैसे टाल सकते हैं।
माननीय उच्चतम न्यायालय ने एससी/एसटी कानूनों के दुरुपयोग को रोकने के लिए फैसला दिया कि इनमें कुछ नरमी बरती जाए। फैसला सुनते ही केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट के खि़लाफ़ खड़ी हो गई। जनकल्याण के कवच में घुसकर केंद्र सरकार ने जो बयान दिए, उनका वास्तविक भावार्थ ये है- ‘तुम्हारा दिमाग़ ख़राब हो गया है क्या? इलेक्शन सिर पर खड़ा है। राजस्थान की मीणा कम्युनिटी, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की ट्राइब्स… सबकी वोट कट जाएगी। सरकार औंधे मुँह गिर जाएगी। उधर पासवान जान खा लेगा। मायावती पहले ही भाजपा के लिए आफत है उसे सीधा लाभ मिलेगा। कोर्ट में बैठकर कुछ भी फैसला देने से पहले वोटिंग के गणित क्यों भूल जाते हो। व्यापारियों को वोट डालने की आदत नहीं है उन्हें नोच लो, हम कुछ नहीं कहेंगे लेकिन झुग्गी-झोंपड़ी, एससी-एसटी तो हमारे वोटिंग के गढ़ हैं भाई, यहाँ हाथ डालने से पहले सौ बार सोचा करो। समझे! अब हम रिव्यू पिटीशन ला रहे हैं, चुपचाप इस फैसले को वापस लेकर पुनर्विचार के अंधे कुएं में फेंक देना।’
…कई बार ऐसा महसूस होता है कि हम ठगों के बाज़ार से गुज़र रहे हैं। जो कम ठगा गया वो ख़ुश होता है। जो ज़्यादा ठगा गया वो अराजक होता है। जिसके कपड़े उतार लिए गए वो आत्मघातक होता है। और जो ठगता है वो गाता फिरता है- ‘सारे जहाँ से अच्छा…..!’
✍️ चिराग़ जैन
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कवि सम्मेलन के सफर में फिर से दो साथी ज़ंजीर खींच कर बीच में ही उतर गए। रायबरेली से कानपुर लौटते हुए एक बार फिर रात के तीसरे पहर का अंधेरा हमसे हमारे दो कवियों को छीन ले गया। यादों के चुलबुले गीतकार श्री प्रमोद तिवारी एक ही झटके में हमारा साथ छोड़ गए। उनके साथ श्री के डी शर्मा हाहाकारी भी इसी दुर्घटना में विदा हो गए। लखनऊ हाइवे पर गीत और हास्य लहूलुहान हो गया। सुनते हैं रात को रायबरेली में गुड्डे-गुड़ियों वाले दिनों की याद दिलाकर लौट रहे थे और फिर यादों के अंधे खोह में विलीन हो गए। सफ़र में अनवरत जीवंत रहने वाले प्रमोद तिवारी चले गए। सद्भाव का संदेश देने वाले प्रमोद जी चले गए। गीत को उत्सव की तरह प्रस्तुत करने वाले प्रमोद जी चले गए। मन खिन्न भी है और विधिना के प्रति आक्रोशित भी। कवि सम्मेलन में हर रात उत्सव जीने वालों के जीवन का ऐसा दुर्दांत समापन। तालियों की गड़गड़ाहट के अंत में इतना भयावह चीत्कार। क्षणभंगुरता का इतना भयानक उदाहरण। बस करो मेरे विधाता! इस वर्ष का उदय अश्रुओं से हुआ है। सब लोग जा रहे हैं कपड़े बदल बदल के। जीवन पर मृत्यु का यह ग्रहण क्रम समाप्त कर दो प्रभु। बहुत प्यारे साथी गए हैं हमारे बीच से। कई रातों के उनींदे होंगे। सफर की थकन अभी उनकी पोरों में भरी होगी। उन्हें अपने नेह से दुलारना प्रभु!
✍️ चिराग़ जैन
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हिंदी कवि-सम्मेलन भारतीय समाज में एक परंपरागत संचार माध्यम के रूप में प्रतिष्ठापित है। आधुनिक और अत्याधुनिक माध्यमों के प्रचलन से पूर्व ही कवि-सम्मेलनों ने भारतीय जनमानस में गहरी पैंठ बना ली थी। समय के साथ काव्यमंचों पर रासानुपत में परिवर्तन अवश्य हुए किन्तु ये सब परिवर्तन कवि-सम्मेलन के मूल स्वरूप के इर्द-गिर्द ही बने रहे।
प्रारम्भ में साहित्य और पत्रकारिता के हस्ताक्षर अलग-अलग नहीं थे किंतु समय के साथ ये दोनों ही क्षेत्र अलग चिह्नित किये जाने लगे। हिंदी की पत्रकारिता का तो उद्भव ही साहित्य के साधकों ने किया। माखनलाल चतुर्वेदी, गणेशशंकर विद्यार्थी, भारतेंदु हरिश्चंद्र, धर्मवीर भारती और अन्य तमाम ऐसे साहित्यकार हुए जिन्होंने भारत में पत्रकारिता की आधारशिला रखी। यह वह समय था जब साहित्य और पत्रकारिता को अलग करना असंभव जान पड़ता था।
बाद में “साहित्यिक पत्रकारिता” पत्रकारिता के बड़े क्षितिज का छोटा-सा अंश बनकर रह गई। इस कालखंड में प्रतिष्ठित साहित्यकारों को समाचार-पत्र के संपादन-मंडल में इसलिए स्थान मिलता था क्योंकि पत्र में नियमित प्रकाशित होने वाली कहानियां, कविताएं, संपादकीय, व्यंग्य और भाषा का स्तर पत्र की गरिमा तय करता था। धीरे-धीरे समाचार-पत्रों में साहित्य एक कोना मात्र बनकर रह गया। अधिकतर समाचार-पत्रों में यदा-कदा कोई कविता छापकर साहित्य की हाज़िरी लगा दी जाती थी और कुछ समूहों ने तो यह हाज़िरी भी बंद कर दी।
इसके बाद एक दौर ऐसा भी आया जब साहित्य, कविता, कहानी, नाटक और उपन्यास की कड़ियाँ समाचार-पत्रों में बाक़ायदा “बैन” हो गईं। कुछ संपादकीय मंडलों ने तो साहित्यिक गोष्ठियों, कवि-सम्मेलनों आदि की ख़बर तक प्रकाशित करने से परहेज किया। अंततः इक्कीसवीं सदी के प्रथम दशक की शुरुआत होते-होते देश के प्रमुख हिंदी दैनिक पत्रों से साहित्य-बीट ही समाप्त हो गई।
मीडिया की अनदेखी के इस दौर में दूरदर्शन एकमात्र ऐसा माध्यम बचा था जिससे प्रसारित होनेवाली काव्य-गोष्ठियों में साहित्य जीवित था। नववर्ष की पूर्वसंध्या पर प्रसारित होनेवाले रंगारंग कार्यक्रमों में हुल्लड़ मुरादाबादी, सुरेन्द्र शर्मा और शैल चतुर्वेदी जैसे चेहरे अक्सर दिखाई देते थे। अशोक चक्रधर और गोविंद व्यास ने दूरदर्शन की इन काव्य-गोष्ठियों में विविध प्रयोग किये। हर दूसरे मंगलवार को प्रसारित होने वाले ‘कहकहे’ कार्यक्रम में अशोक चक्रधर, सुरेश नीरव और सरोजिनी प्रीतम ने हास्य-कविता का नया अध्याय प्रारम्भ किया। अनेक कवियों की वर्तमान लोकप्रियता की नाल दूरदर्शन की इन्हीं गोष्ठियों में गड़ी हुई है। युवा काव्य-गोष्ठी, फुलझड़ी एक्सप्रेस और अन्य काव्य आधारित कार्यक्रम टेलीविज़न पर कवियों की हाज़िरी लगवाते रहे। दृश्य-श्रव्य संचार माध्यम पर यह उपस्थिति साहित्यिक अनुष्ठानों के मनोबल की दृष्टि से “डूबते को तिनके का सहारा” सिद्ध हुई।
बाद में सेटेलाइट टेलीविज़न की अतिवृष्टि में जैसे-जैसे दूरदर्शन के रंग फीके पड़े, वैसे-वैसे ही काव्य गोष्ठियों और अन्य साहित्यिक अनुष्ठानों के प्रचार-प्रसार का कारवां भी थम गया। शुद्ध व्यावसायिकता और ग्लैमर की तेज़ रौशनी में मसनद पर विराजित बिना संगीत-साज के कवि-सम्मेलन को मिसफिट करार दे दिया गया। देश भर में कवि-सम्मेलन होते रहे किन्तु मीडिया की फोकस लाईट का छोटा-सा घेरा कवि-सम्मेलन तक पहुँचने से कतराता रहा। NDTV ने कुमार संजोय सिंह के संचालन में “अर्ज़ किया है” शीर्षक से एक कवि-सम्मेलन की सर्जना की भी थी किन्तु इस प्रयास की यात्रा बहुत लम्बी न हो सकी। इसके तुरंत बाद डॉ अशोक चक्रधर ने SAB TV पर “वाह-वाह” प्रारम्भ किया। कवि सम्मेलन की परंपरागत छवि की तर्ज़ पर तैयार यह कवि-सम्मेलन एक नए भवन की नींव मजबूत कर गया।
इसी समय में STAR ONE पर द ग्रेट इंडियन लाफ्टर चैलेंज नामक एक कार्यक्रम प्रारम्भ हुआ जिसने TRP के सभी रेकॉर्ड तोड़ डाले। इस कार्यक्रम में लतीफों और भाव-भंगिमा से लोगों को हँसाने की एक अपेक्षाकृत नवीन विधा की प्रतियोगिता का संयोजन था। इस कार्यक्रम को जब मीडिया के पुराने लोगों ने देखा तो वह साथी याद आया जिसे वे मसनद पर बैठा छोड़ आए थे।
“आउट ऑफ साइट, आउट ऑफ माइंड” में यक़ीन करनेवाले मीडिया ने कवि-सम्मेलन को लुप्त मान लिया था। इसलिए जब पीछे जाकर उसने कवि-सम्मेलन के सिर पर लगी फोकस-लाइट का स्विच ऑन किया तो वहाँ सब कुछ बदल चुका था। मसनद के गोल तकियों ने सोफे का रूप ले लिया था। कवियों का कुर्ता-पायजामा सूट-बूट में तब्दील हो चुका था। टैंट हाउस के माइक सिस्टम अब ग्लैमरस माइक्रोफोन और लेपल के आकार में ढल गए थे, दरी पर बैठे श्रोताओं की दरियां] कुर्सियां बन चुकी थीं और लोकल टैंटहाउस की व्यवस्थाएं भव्य ऑडिटोरियम में सुव्यवस्थित हो चली थीं।
इस दौर तक SAB TV पर अशोक चक्रधर द्वारा संचालित “वाह-वाह” का दर्शक वर्ग TRP के आंकड़ों में अपनी सम्मानजनक पहचान बना चुका था। उधर “जनमत” टीवी के माध्यम से दीपक गुप्ता और नीरज पुरी; टीवी इंडिया और दबंग टीवी से शैलेश लोढ़ा; तथा अन्यान्य चैनल्स से अरुण जैमिनी भी सेतुनिर्माण में गिलहरी के योगदान की कथा लिख रहे थे। विवेक गौतम के संचालन में “जैन टीवी” पर चल रहा “इंडिया कॉलिंग” लम्बा चला किंतु अपनी पहचान क़ायम करने में विफल रहा। साधना टीवी पर प्रवीण आर्य के संयोजन में चल रहे “कवियों की चौपाल” कार्यक्रम का उपक्रम भी बहुत फलदायी सिद्ध न हो सका।
इसी उठापटक के बीच सब टीवी को सोनी एंटरटेनमेंट जैसे बड़े समूह ने ख़रीद लिया और अशोक चक्रधर का “वाह-वाह” सुभाष काबरा के हाथों से होता हुआ शैलेष लोढ़ा के हाथों में आ गया। अनेक प्रयोग करने के बाद शैलेष जी ने इसे “वाह-वाह क्या बात है” शीर्षक से बिल्कुल नए प्रारूप में प्रारम्भ किया। ठीक इसी कालखण्ड में लाफ्टर चैम्पियन की अचानक से उभरी मांग का जादू धीमा पड़ने लगा था। और इसी दौर में नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर अन्ना आंदोलन में डॉ कुमार विश्वास की अग्रणी भूमिका ने उन्हें लोकप्रियता के शीर्ष पर ला खड़ा किया था।
वाह-वाह क्या बात है ने TRP के मोर्चे पर कवि सम्मेलन की महती उपस्थिति दर्ज की और कुमार विश्वास ने कवि सम्मेलनों को उस तबके तक पहुंचा दिया जिसको कविता से कोई ख़ास लेना-देना नहीं था।” वाह-वाह क्या बात है” के संचालक शैलेश लोढ़ा भी लोकप्रिय धारावाहिक “तारक मेहता का उल्टा चश्मा” के मुख्य पात्र के रूप में लोकप्रियता के प्रतिमान स्थापित कर चुके थे।
ऐसे संयोगों के बल पर SAB TV का “वाह-वाह क्या बात है” कवि सम्मेलनों के खोए हुए ग्लैमर का लॉन्चिंग पैड साबित हुआ। नए रूप-रंग और ग्लैमर के साथ प्रसारित होता परंपरागत कवि-सम्मेलन कॉर्पोरेट और मल्टी नेशनल्स को भी आकृष्ट करने लगा। उधर कुमार विश्वास की ख्याति भी कवि-सम्मेलनों की सिल्वर स्क्रीन प्रेजेंस के लिए प्रायोजक जुटाने में सहायक सिद्ध हुई।
इधर “वाह-वाह क्या बात है” के सौ से अधिक एपिसोड प्रसारित हो चुके थे, उधर धूमिल होते लाफ्टर शो के एक सादा से नुमाइंदे कपिल शर्मा ने एक कॉमेडी शो लांच करके भारतीय टेलीविज़न जगत के TRP अन्वेषकों को चौंका दिया। चूँकि कवि-सम्मेलन और लाफ्टर शो के स्वरूप में बहुत सी समानताएं हैं इसलिए इन दोनों प्रकार के कार्यक्रमों के श्रोतावर्ग का भी एक बड़ा हिस्सा समान ही है।
कपिल शर्मा के शो की टीआरपी के चलते कोई नया कार्यक्रम तो टेलीविज़न पर नहीं शुरू हुआ किन्तु कवि-सम्मेलन के प्रति उदासीन मीडिया का बर्ताव पूरी तरह बदल गया। टीवी न्यूज़-चैनल्स ने कवि-सम्मेलनों को अनियमित प्रसारण के लिए प्रयोग करना शुरू कर दिया। एकाध वर्ष में ही प्रत्येक न्यूज़ चैनल में होली के अवसर पर कवि-सम्मेलन अनिवार्य-सा हो गया। इसी बीच न्यूज़-नेशन ने “चुनावी-चकल्लस” शीर्षक से कवियों का एक ऐसा कार्यक्रम प्रारम्भ किया जिसमें राजनैतिक चुनावी घटनाक्रम पर कवियों की चुटकियां कार्यक्रम की सफलता का माध्यम बनी। 16वीं लोकसभा के चुनाव में यह कार्यक्रम ख़ासा लोकप्रिय हुआ। चुनाव सम्पन्न होने के बाद इसे “चकल्लस” शीर्षक से संजय झाला ने संचालित किया।
उधर कुमार विश्वास ने दो कदम और आगे बढ़कर “महाकवि” शीर्षक से दिवंगत कवियों के जीवनवृत्त की एक श्रृंखला ABP NEWS पर प्रारम्भ की। इस कार्यक्रम के प्रचार-प्रसार ने कवियों के ग्लैमर को और ऊपर उठाने में सहायता की।
कुछ समय बाद NEWS 18 INDIA ने “लपेटे में नेताजी” शीर्षक से एक ऐसा कार्यक्रम प्रारम्भ किया जिसमें राजनैतिक दलों के प्रतिनिधियों को स्टूडियो में कवियों के सामने बैठाया जाता था और कवि अपने चुटीले अंदाज़ में उनसे प्रश्न पूछते थे। इस कार्यक्रम में पहली बार कविता और राजनीति का ON AIR आमना सामना हुआ।
न्यूज़ मीडिया में कवि-सम्मेलन अब पूरी तरह चस्पा हो चुका है। किसी भी मुद्दे पर कवियों को बुलाकर एक एपिसोड शूट कर लेना प्रोग्रामिंग हेड के लिए आसान भी होता है और इस कार्यक्रम की सफलता की गारंटी भी पूरी होती है। कई लाख रुपये ख़र्च करके प्रोग्रामिंग कोटे का एक बुलेटिन तैयार करने की बजाय मौलिक कंटेंट, सरल समन्वय और अपेक्षाकृत कम व्यय में शानदार कवि-सम्मेलन शूट करने में प्रोडक्शन की अधिक रुचि दिखने लगी है। आज तक, एबीपी, न्यूज़ नेशन, ज़ीन्यूज़, ज़ी बिज़नेस, इंडिया न्यूज़, न्यूज़ 24 और अन्य सभी न्यूज़ चैनल्स पर समय-समय पर कवि-सम्मेलनों की उपस्थिति यह घोषणा करती है कि साहित्य और मीडिया का जो बिछोह प्रिंट मीडिया के मेले में प्रारम्भ हुआ था वह अब इलैक्ट्रोनिक मीडिया की गलियों में समाप्त हो गया है। मीडिया के पास नए कंटेंट का टोटा था और कवि-सम्मेलनों के पास उचित प्रचार तकनीकों का। दोनों ने आपस में हाथ मिलाकर एक नए युग की शुरुआत की है।
✍️ चिराग़ जैन