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कवि सम्मेलन के सफर में फिर से दो साथी ज़ंजीर खींच कर बीच में ही उतर गए। रायबरेली से कानपुर लौटते हुए एक बार फिर रात के तीसरे पहर का अंधेरा हमसे हमारे दो कवियों को छीन ले गया। यादों के चुलबुले गीतकार श्री प्रमोद तिवारी एक ही झटके में हमारा साथ छोड़ गए। उनके साथ श्री के डी शर्मा हाहाकारी भी इसी दुर्घटना में विदा हो गए। लखनऊ हाइवे पर गीत और हास्य लहूलुहान हो गया। सुनते हैं रात को रायबरेली में गुड्डे-गुड़ियों वाले दिनों की याद दिलाकर लौट रहे थे और फिर यादों के अंधे खोह में विलीन हो गए। सफ़र में अनवरत जीवंत रहने वाले प्रमोद तिवारी चले गए। सद्भाव का संदेश देने वाले प्रमोद जी चले गए। गीत को उत्सव की तरह प्रस्तुत करने वाले प्रमोद जी चले गए। मन खिन्न भी है और विधिना के प्रति आक्रोशित भी। कवि सम्मेलन में हर रात उत्सव जीने वालों के जीवन का ऐसा दुर्दांत समापन। तालियों की गड़गड़ाहट के अंत में इतना भयावह चीत्कार। क्षणभंगुरता का इतना भयानक उदाहरण। बस करो मेरे विधाता! इस वर्ष का उदय अश्रुओं से हुआ है। सब लोग जा रहे हैं कपड़े बदल बदल के। जीवन पर मृत्यु का यह ग्रहण क्रम समाप्त कर दो प्रभु। बहुत प्यारे साथी गए हैं हमारे बीच से। कई रातों के उनींदे होंगे। सफर की थकन अभी उनकी पोरों में भरी होगी। उन्हें अपने नेह से दुलारना प्रभु!
✍️ चिराग़ जैन

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