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राम मंदिर का मुहूर्त

रामजी ने जिस मुहूर्त में कोई शुभकार्य किया, ग्रहों के उसी संयोग को हम शुभ मुहूर्त मानते थे। आज राजनीति ने हमें इस कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है कि रामजी के मंदिर के लिए शुभ मुहूर्त का टंटा पड़ रहा है।
अरे, उनका नाम लेकर तो जिस मुहूर्त में ईंट रख दो, वही शुभ है मूढ़ो! भूल गए क्या, उनके नाम से तो पत्थर तिर गए थे! पर उस समय राम जी के सब कारज इसलिए सिद्ध हो जाते थे, क्योंकि तब नल-नील की पूरी ऊर्जा पुल बनाने में केंद्रित थी, यदि वे भी राजनीति कर रहे होते तो चार सीटें फालतू मिलने पर रावण के हाथों बिक जाते और राम जी के आगे नाटक करते रहते कि ‘पुल वहीं बनाएंगे’!

✍️ चिराग़ जैन

मन की सुनने से बचो

हमारे यहाँ युगों-युगों से सब कहते रहे हैं कि अपने मन की सुनो। यह वाक्य इतनी बार कहा गया है कि इसमें प्राण ही न रहे। यह वाक्य नीरस हो गया, निष्प्रभावी हो गया। शब्द-शब्द पड़े रह गए और अर्थ के प्राण पखेरू उड़ गए।
यह सामान्य बात है। यह अक्सर होता है। किसी बात को बार-बार बोलो तो वह निष्प्राण हो जाती है। हमने सुना है कि बार-बार बोलने से मंत्र सिद्ध हो जाते हैं… होते होंगे। मैं मंत्र के विषय में नहीं जानता। मैं तो शब्दों को जानता हूँ, मैं तो वाक्यों को पहचानता हूँ। क्योंकि उन्हीं से मेरा काम पड़ता है।
जिससे हमारा काम न पड़े, उसे पहचानने से क्या लाभ! उसे हम पहचान ही न पाएंगे। किसी को पहचानने के लिए उसको प्रयोग करना आवश्यक होता है। व्यक्ति से लेकर शब्द तक यह बात अक्षरशः सत्य है। जिस शक्ल को आप अपनी स्मृति में किसी अच्छी या बुरी याद के साथ प्रयोग न कर सको, उसे याद रखना बहुत कठिन काम है। बाज़ार में हज़ारों शक्लें हमारे सामने से निकलती हैं, लेकिन वे हमें याद नहीं रहतीं। लेकिन उनमें से कोई हमें गाली बक दे तो उसे हम भूल न पाएंगे। कोई थप्पड़ मार दे, तो उसे मरते दम तक याद रखेंगे। और कोई प्रपोज़ कर दे, फिर तो नींद को भूल जाएंगे, पर उसे न भुला सकेंगे।
सो, मैं शब्दों को जानता हूँ। शब्द मुझे हर समय घेरे रहते हैं। और मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि जिन बातों को बार-बार बोला जाए, वे निष्प्राण हो जाती हैं। आप इसका प्रयोग करके देख लीजिए। आप किसी से मिलकर उसका हालचाल पूछ लें- ‘और सुनाओ, कैसे हो?’ यह वाक्य इतनी बार बोला जा चुका है कि चुक गया है। हमने हाल ही में घर बदला। जहाँ घर लिया है वह स्थान हवाई अड्डे के पास है। हर दो मिनिट बाद एक जहाज गुज़रता है। पहले कुछ दिन तो बड़ा संकट हो गया। नींद ही न आए। लेकिन धीरे-धीरे वह शोर निष्प्राण हो गया। उसने प्रभावित करना बंद कर दिया। अब जैगुआर भी उड़ता है तो हमें संज्ञान ही नहीं होता। ठीक इसी प्रकार, ‘और सुनाओ, कैसे हो’ भी बोला जाता है… सामने वाला भी यंत्र की तरह ‘बढ़िया हूँ’ बोल देता है। लेकिन इन दोनों ही बातों का कोई प्रभाव नहीं होता।
हम ऐसा अपराध अनेक ज़रूरी वाक्यों के साथ कर चुके हैं। ‘आई लव यू’; ‘आई एम सॉरी’ और ‘हैलो’ से लेकर गालियों तक यही दुर्घटना घटी है। मनुष्य जाति का इतिहास गालियों के इतिहास के बराबर का ही होगा। कभी-कभी तो लगता है कि गालियाँ, मानव जाति से नौ-दस महीने बड़ी ही होंगी। शायद गालियों के अतिरिक्त किसी अन्य तत्व को मनुष्य ने अपने साथ इतनी लंबी यात्रा करने ही न दी होगी। गालियाँ सम्भवतः प्रारम्भ में ही बहुतायत प्रयोग से निष्प्राण हो गई हों। सो, उनको साथ रखने में हमें कोई आपत्ति न हुई। जिसका प्रभाव नहीं, उससे आपत्ति कैसी? आपत्तिजनक होने के लिए प्रभावशाली होना पहली शर्त है।
इसीलिए भीड़ से कभी किसी को कोई आपत्ति न हुई। नेतृत्व ज़रूर आपत्ति को जन्म दे सकता है। यदि आपसे किसी को कोई आपत्ति न हो, तो यह कोई प्रसन्नता का विषय नहीं है। यह ख़तरनाक़ बात है। यह जड़ता का सूचक है। यदि किसी को आपसे कष्ट है, किसी को आपसे ईर्ष्या है, किसी को आपसे आपत्ति है तो उसके प्रति धन्यवाद ज्ञापित करना। वह अवश्य आपसे प्रभावित हुआ है। उसने आपके जीवन को अर्थ प्रदान किये हैं। अन्यथा आपका जीवन किसी गाली से अधिक अस्तित्व न रख पाता।
आपने लोगों के घर पर पुरखों की तस्वीरें देखी होंगीं। आपको आश्चर्य होगा, जब तक वे सब पुरखे जीते थे, तब तक जी का जंजाल बने हुए थे। उनके कारण पूरे घर का जीना हराम था। इसलिए उन्हें अपने घर में रखने को कोई भाई तैयार न हुआ होगा। लेकिन मरने के बाद उनसे कोई कष्ट नहीं हो सकता। अब वे कोई प्रभाव नहीं डाल सकते। इसलिए हर भाई ने अपने घर में उनकी तस्वीरें जड़वा ली हैं। तस्वीरों से किसी को कोई आपत्ति हो ही कैसे सकती है?
हमने निष्प्रभावी वस्तुओं को, निष्प्रभावी वाक्यों को ढोने में दक्षता प्राप्त की है। क्योंकि उनसे हमें कोई फर्क नहीं पड़ता। ऐसा ही एक वाक्य है ‘अपने मन की सुनो।’ इस वाक्य में भी प्राण नहीं हैं। इसलिए कोई मन की नहीं सुनता।
और यह बहुत अच्छी बात है कि कोई मन की नहीं सुनता। यदि ग़लती से किसी दिन आपने अपने मन की सुन ली, तो बड़ी गड़बड़ हो जाएगी। फिर हर किसी को देखकर मुस्कुराना सम्भव न होगा। मन बोलने लगा तो आपका सामाजिक जीवन नरक हो जाएगा। फिर आप सभ्य न रह सकेंगे। मन का कैनवास तो बहुत वैविध्यपूर्ण है। एक क्षण में, आपको किसी पर प्रेम आने लगेगा। और प्रेम भी ऐसा-वैसा नहीं। पूरा प्रेम। ऐसा कि सोचकर स्वयं आपका ही चेहरा लाल हो जाएगा। और अगले ही क्षण आप उसे पीटने लगोगे। आपने स्वयं न सुनी हों, ऐसी ऐसी गालियाँ बकने लगोगे। इसलिए मन की सुनने में बड़े संकट हैं। मन कभी भी पिटवा सकता है। मन का विधान, किसी भी युग के संविधान को सूट नहीं कर सकता।
इसीलिए जिसने यह भूल कर दी, जिसने अपने मन की सुन ली उसे हमने असभ्य मान लिया, उसे हमने असामाजिक घोषित कर दिया। पापी, अभद्र, चरित्रहीन, उच्छृंखल, अनैतिक, दुराचारी जैसे शब्द मन की सुनने वालों के ही अलंकार रहे हैं। मीरा ने मन की सुनी, उसे ज़हर दे दिया। सुकरात ने मन की सुनी, उसे भी ज़हर दे दिया। हीर-रांझा, सोहनी-मिर्ज़ा, लैला-मजनू ये सब मन की सुननेवाले लोग रहे। हमने इनके साथ क्या किया!
मन की सुनना ख़तरे से ख़ाली नहीं। यदि मन खोलकर रखना हो तो तैयार रहना, कि इसके बाद तत्कालीन नियम तुम्हारे दुश्मन हो जाएंगे। धर्म, समाज, नीति, विधान सब हाथ धोकर पीछे पड़ जाएंगे। फिर बाद में सबको क़िस्से सुनाए जाएंगे।
ये लैला-मजनू के क़िस्से प्यार के क़िस्से नहीं हैं। ये तो दहशत की कहानियाँ हैं; कि देखो, वो आए थे मन की सुनने, हमने उनका कैसा सत्यानाश किया है। पीढ़ियों को ये कहानियाँ इसलिए सुनाई जाती हैं, ताकि वे इन कहानियों से यह शिक्षा ले सकें कि कोई कितनी ही बार कहे, पर भूलकर भी मन की मत सुन लेना।

✍️ चिराग़ जैन

चर्चालुओं से श्रद्धालुओं तक

नुक्कड़ का पनवाड़ी, चाय की मढ़ैया, बीड़ी-सिगरेट का खोखा, सिटी बस, लोकल ट्रेन और सार्वजनिक शौचालय की लाइन -ये सब चर्चाओं के स्वर्ग हैं। जैसे संसद में पक्ष और विपक्ष होते हैं, ऐसे ही इन चर्चाओं में भी पक्ष और विपक्ष होते हैं। विपक्ष के बिना चर्चा हो ही नहीं सकती। विपक्ष के अभाव में तो केवल गुणगान किया जा सकता है।
कुछ साल पहले तक, ‘केवल चर्चा को जारी रखने के लिए’ हर नुक्कड़ के पान की दुकान पर कुछ लोग ख़ुद को भाजपाई समझ लेते थे, और कुछ ख़ुद को कांग्रेसी। कभी पनवाड़ी फोन पर बतियाने लगता था तो भीड़ बढ़ने पर एकाध सपाई और बसपाई भी मिल जाता था। अगर पनवाड़ी का फोन कॉल लंबा चल जाए तो मनसे, झामुमो, जद, बीजद वगैरा की भी हाज़िरी लग जाती थी। फोन कॉल समाप्त होते ही पनवाड़ी तेज़ी से काम करके सब क्षत्रपों को निबटा देता था और राष्ट्रीय दलों के प्रतिनिधि चर्चा करते रहते थे। जो चर्चा से ऊब जाता था, वो अपने काम पर चला जाता; और जो काम से ऊब जाता था, वो चर्चा करने चला आता था। इन चर्चाओं में पनवाड़ी स्पीकर की भूमिका निभाता था और चर्चा को जीवित रखते हुए दोनों पक्षों को उकसाता रहता था। इस तरह वह चर्चा और पान पर एक साथ चूना लगाता रहता था।
चूँकि इन चर्चाओं से देश की राजनीति पर कोई असर नहीं पड़ता था इसलिए दोनों ही पक्ष चर्चा करते हुए उतने ही गंभीर होते थे, जितने तत्कालीन नेतागण देश को लेकर होते होंगे। इसका यह लाभ था कि चर्चा और संबंध दोनों सुरक्षित रहते थे।
इन चर्चाओं में से अधिकतम का कोई निष्कर्ष नहीं निकलता था और हर चर्चालु स्वयं ही अपने आप को विजेता समझकर मन लगाकर काम करने लग जाता था।
पिछले कुछ वर्षों से इस संस्कृति को लकवा मार गया। चर्चालुओं का स्थान श्रद्धालुओं ने ले लिया। ये श्रद्धालु चर्चा को लेकर इतने गंभीर होते हैं कि चर्चास्थल से काम पर जाने की बजाय युद्धक्षेत्र की ओर उन्मुख हो जाते हैं। चर्चास्थल से कूच करते समय दोनों ही पक्ष के श्रद्धालु सामनेवाले को शिशुपाल और स्वयं को कृष्ण समझते हुए ‘नितीश भारद्वाज’ मार्का मुस्कान लिए मन ही मन गांधारी की तरह समूल नाश का शाप दे रहे होते हैं।
इन चर्चाओं कुछ बातें ‘मान ली जाती हैं’, जैसे –
1) जो भी व्यक्ति सवाल पूछ रहा है, वह मोदी जी से ही सवाल पूछ रहा है।
2) जो भी व्यक्ति सिस्टम के किसी अंग से ख़फ़ा है, वह इनडायरेक्टली मोदी जी का विरोध कर रहा है।
3) जो मोदी जी का समर्थक नहीं है, वह राहुल गांधी का समर्थक है, इसलिए इसे समझाना बेकार है।
4) जो मोदी जी का समर्थक है, वह समर्थक नहीं, भक्त है। इसलिए इसे समझाना भी बेकार है।
5) जो मोदी जी का समर्थक नहीं है वह चोर है।
6) जो मोदी जी का विरोधी नहीं है, वह मूर्ख है।
7) जो एनडीटीवी नहीं देखता, वह ज़ीन्यूज़ देखता है।
8) जो ज़ीन्यूज़ देखता है, उसे कुछ ग़लत नहीं दिखता।
9) जो मेरे व्हाट्सएप पर आया है, वह किसी और के व्हाट्सएप पर नहीं आया, इसलिये हर अज्ञानी तक ज्ञान की रौशनी पहुँचाना मेरा कर्त्तव्य है।
10) सामनेवाले चर्चालु की आँखों पर एक चश्मा चढ़ा हुआ है, जिसे उतरवाए बिना मेरा मनुष्य जन्म सफल न हो सकेगा।

इन दस बिंदुओं को सामने रखकर चर्चा की गंगा बह निकलती है, और इन्हीं दस बिंदुओं पर हल्की-फुल्की बून्दा-बांदी, मूसलाधार बन जाती है। हर श्रद्धालु सामनेवाले श्रद्धालु को क्रमशः मूर्ख, भ्रष्ट, चोर, ग़द्दार, राष्ट्रद्रोही और पापी समझते हुए, ‘इसे तो वक़्त ही समझाएगा’ का कुंठित शाप देने लगते हैं।
जो श्रद्धालु अपने पंथ के मंदिर के जिस देवता को पूजता है, उसी के अनुरूप चर्चाभक्ति में उसकी भाषा का स्तर गिरता है। हर श्रद्धालु के पास चर्चायज्ञ में बोलने को कुछ रटे-रटाए मंत्र हैं, जिन्हें वह कठोर परिश्रम करके व्हाट्सएप फ़ॉरवर्ड पद्धति से प्राप्त करता है। चर्चा का विषय कुछ भी हो, श्रद्धालु अपने-अपने मंत्र पढ़ते रहते हैं।
चूँकि दोनों ही पक्ष एक-दूसरे के इन रटे-रटाए जुमलों से परिचित होते हैं इसलिए धार्मिक प्रार्थनाओं की तरह ये चर्चाएँ शोर पूरा करती हैं और असर शून्य।
भाजपा-कांग्रेस; राहुल-मोदी और भक्त-चमचा के आधार पर बँट रही जनता में फैलते विद्वेष को देखकर राजनीति अपने पूर्ववर्ती नेताओं का धन्यवाद ज्ञापन करती है कि जिस जनता को उन्होंने प्रजा बनकर रहना सिखाया था, वह अब श्रद्धालु बनकर एक-दूसरे से घृणा करके कितनी ख़ुश है!

✍️ चिराग़ जैन

इतनी तो मर्यादा रखो

सामाजिक जीवन जीनेवाले लोग भी अंततः मनुष्य होते हैं। राजनीति, फ़िल्म जगत्, क्रिकेट, साहित्य, अध्यात्म या अन्य किसी भी क्षेत्र में सक्रिय व्यक्ति के दो पक्ष होते हैं, एक उसका निजी जीवन, दूसरा उसका सामाजिक जीवन।
हममें इतनी नैतिकता अवश्य होनी चाहिए कि उसके निजी जीवन को उसके सामाजिक जीवन से गड्ड-मड्ड न करें। ऐसा करके हम न केवल उस व्यक्ति को आहत करते हैं, अपितु अपनी सोच का टुच्चापन भी सार्वजनिक कर देते हैं।
राजनीति में यह सर्वाधिक होता है। फलाने जी के फलानी जी के साथ सम्बन्ध हैं, यह कहना सबसे आसान है। किसी की चरित्र हत्या करने से ज़्यादा आसान कुछ नहीं है। मुझे आज तक समझ नहीं आया कि राजनेताओं से तुम्हें देश चलवाना है, या बेटी ब्याहनी है? हाँ, यदि किसी का निजी जीवन उसके सामाजिक आचरण को प्रभावित करने लगे तब शालीनता से इस विषय पर टोकना अवश्य चाहिए।
अमिताभ बच्चन के कोरोना संक्रमित होने की ख़बर पर रेखा जी के साथ उनका नाम जोड़कर जिस तरह सोशल मीडिया पर बातें बनाना, घृणास्पद हैं। विश्वास कीजिये, सामाजिक जीवन जीनेवाला हर व्यक्ति, अपनी निजी जिंदगी में आपसे ज़्यादा समस्याएँ और चुनौतियाँ झेलता है। लेकिन वह इन समस्याओं पर न तो कभी आपसे सहयोग मांगने आता है, न ही उनका असर अपने कार्यक्षेत्र में दिखने देता है। लेकिन वह यह भी अपेक्षा रखता है कि उसकी निजी संवेदनाओं को सार्वजनिक उपहास का विषय न बनाया जाए।
आप मज़ाक़ कीजिये ना, राजनेताओं के राजनैतिक जीवन पर मज़ाक़ कीजिये। आध्यात्मिक लोगों के प्रवचनों और तहरीरों में हुई चूक पर परिहास कीजिये; क्रिकेटर्स के खेल पर सवाल उठाइये, पिच पर उसके व्यवहार का मज़ा लीजिए, साहित्यकारों के लेखन, भाषण और भाषा की ख़ूब खिंचाई कीजिये, फिल्मी सितारों की भूमिकाओं, संवादों, अभिनय आदि पर जितना चाहे लिखिए लेकिन उनकी निजता में प्रवेश करते समय इतना सतर्क अवश्य रहें कि आपके नेतृत्व, आपके मनोरंजन, आपके आधात्मिक विकास और आपके बौद्धिक विकास के लिए ये लोग अपनी निजी ज़िन्दगी को अनदेखा कर देते हैं।
मैं हास्य का पक्षधर हूँ किन्तु किसी का दिल दुखाकर हँसते हुए ओंठ एक संवेदनहीन हृदय का प्रमाण होते हैं।

✍️ चिराग़ जैन

कार्यपालिका बनाम न्यायपालिका

सोशल मीडिया पर पुलिस को मिल रही बधाइयों को देखकर लगता है कि कार्यपालिका ने न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण किया है। अगर न्यायपालिका की आँखों में थोड़ा भी पानी होगा तो लोकतंत्र में शून्य होते अपने अस्तित्व को बचाने के लिए स्वतः संज्ञान लेगी, अन्यथा देश का लोकतंत्र पुलिसिया राज की भयावहता की ओर बढ़ने के लिए तैयार है।

✍️ चिराग़ जैन

फिल्मों से झाँकता लोकतंत्र

हिंदी फिल्मों में भारतीय समाज की पूरी तस्वीर साफ़ दिखाई देती है। एक प्रभावी संचार माध्यम होने के नाते फिल्मों ने जनमत का ही नहीं ‘जन-प्रवृत्ति’ का भी निर्माण किया।
हर फिल्म में एक नायक होता है। यह नायक जो भी करे, उसे सही मानना जनता का धर्म है। इस धर्म के निर्वाह में क़ानून की धज्जियाँ उड़ती हैं तो उड़ जाएँ। इस धर्म के निर्वाह में अदालत का अपमान होता हो, तो हो जाए। इस धर्म के निर्वाह में अराजकता पुष्ट होती हो, तो हो जाए।
जिस फ़िल्म में नायक गैंगस्टर, डॉन या स्मगलर हो, उसमें वह पुलिस को चकमा दे तो हॉल में तालियाँ बजने लगती हैं। वह पुलिस पर गोलियाँ चलाकर फरार हो जाए, तो हॉल में तालियाँ बजती हैं। वह कॉलेज में लड़की छेड़े तो तालियाँ बजती हैं। वह बैंक लूटने की फुलप्रूफ प्लानिंग करे तो तालियाँ बजती हैं। वह गाली दे तो भी तालियाँ बजती हैं। कुल मिलाकर हमें यह समझा दिया गया कि नायक जो भी करे वह प्रशंसनीय है। और हम यह समझ भी गए।
जिस फ़िल्म में नायक पुलिसवाला हो, वहाँ गुंडों की कुटाई पर, राजनेताओं की ठुकाई पर, नियम-क़ानून को ताक पर रखकर अपराधी को सबक़ सिखाने पर हम तालियाँ पीटते रहते हैं। इन फिल्मों में साफ़ दिखाया जाता है कि क़ानून का पालन करके क़ानून का पालन नहीं करवाया जा सकता।
जिन फिल्मों में नायक वक़ील हो, उसमें न्यायालय की अवमानना, पुलिस की मिलीभगत, अदालत के बाहर होने वाले प्रपंच और क़ानून की लाचारी साफ़-साफ़ दिखाई जाती है। हम अदालत में ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाते एक्शन हीरो, और जज के सामने धमकी देते वकीलों को देखकर ताली बजाते हैं।
फिल्मों ने हमें यह भी बताया कि हर नायक के कुछ सहयोगी होते हैं। जिस फ़िल्म का नायक गैंगस्टर हो, उसके सहयोगी छोटे-मोटे गुंडे होते हैं। ये सहयोगी अपने नायक की दादागिरी जमाने के लिए ‘जुगाड़’ करते रहते हैं। भाई को कोई दिक्कत न हो इसके लिए पुलिस से सेटिंग और जनता को साधने के लिए ‘कभी गर्म, कभी नर्म’ की नीति, प्रतिद्वंद्वी गैंग से होने वाले पंगों का निपटारा वगैरा सब इनका काम होता है। पुलिस के आला अधिकारियों और ऊँचे-ऊँचे पॉलिटिशियन्स के साथ नायक का उठना-बैठना होता है, और छोटे-मोटे इंस्पेक्टर वगैरा को सहयोगी सम्भाल लेते हैं।
जिन फिल्मों में नायक पुलिसवाला हो, उनमें ये सहयोगी या तो जूनियर पुलिस अफसर होते हैं या फिर भूतपूर्व गुंडे। इनको साथ लेकर नायक सड़े हुए सिस्टम में पल रहे अपराध के कीड़ों को साफ़ करता है।
इन फिल्मों में भीड़ के शॉट्स भी दिखाए जाते हैं, लेकिन इन शॉट्स की तीन ही सिचुएशन्स होती हैं। या तो यह भीड़, खलनायक और उसके गुर्गों के शोषण से पीड़ित होकर रोती-पीटती दिखाई देती है, या फिर इस भीड़ को खलनायक की दहशत से घरों में दुबकते दिखाया जाता है, या फिर कभी-कभी फ़िल्म के अंत में अधमरे खलनायक को ‘मॉब लिंचिंग’ से मारकर नायक को कोर्ट-कचहरी से बचाने के लिए इस भीड़ का सीन लिखा जाता है। शेष फिल्मों में अगर भीड़ है तो तालियाँ बजाने के लिए या जयकारे लगाने के लिए।
फिल्मों ने हमें बताया कि राजनेता हमेशा भ्रष्टाचारी ही होते हैं। हम भी राजनीति के दाँव-पेंच पर्दे पर देखते रहे और मान बैठे कि राजनीति की कीचड़ में कोई बेदाग़ हो ही नहीं सकता।
मीडिया इन फिल्मों में हमेशा सच को उजागर करता ही दिखाई दिया। इसलिए भ्रष्ट पुलिस, अपराधी और राजनीति को इन फिल्मों में हमेशा मीडिया से डरता हुआ ही दिखाया जाता है। ख़बरें बेचने, ख़बरें दबाने, ख़बरें बनाने और ख़बरें घुमानेवाले सीन कभी किसी स्क्रिप्ट में लिखे ही नहीं गए। अब से कुछ दशक पहले तक न्यायाधीशों के लिए संवाद लिखने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। उनकी सिचुएशन फिक्स थी। अदालती बहस के दौरान उन्हें केवल लकड़ी का हथौड़ा टेबल पर पीटते हुए ‘ऑर्डर… ऑर्डर…’ बोलना होता था।
इस पूरे तमाशे ने हमारे मस्तिष्क में कुछ बातें गहरे तक बैठा दीं।

जनता, भीड़ है। जो उसे हाँक ले जाए वही उसका नायक है। फिर वह चाहे पुलिस हो चाहे अपराधी।
सही वही है जो नायक करे और ग़लत वही है जो खलनायक करे।
सिस्टम को सुधारा नहीं जा सकता, उससे या तो खेला जा सकता है या फिर उसको यूज़ करके रॉबिन हुड का जीवन बिताया जा सकता है।
अराजक हो जाने में कोई बुराई नहीं है, बशर्ते अराजक होनेवाला नायक हो।
जनता का काम केवल ताली पीटना है। उसे अपने उत्थान के लिए स्वयं कुछ नहीं करना होता। उसे केवल एक नायक की प्रतीक्षा करनी होती है, जो पूरे सिस्टम से लड़कर जनता को ख़ुशी-ख़ुशी ताली बजाने का मौक़ा देगा।

इन सब धारणाओं को मस्तिष्क में बैठाए हमारी कई पीढ़ियाँ गुज़र गईं। नायकवाद की इस धारणा ने हमें ‘जनता’ से ‘प्रजा’ बना डाला। और इससे जो ख़ामोशी पसरी उसका लाभ उठाकर हमारे तंत्र ने लोकतंत्र का मखौल बनाकर रख दिया।

✍️ चिराग़ जैन

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