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सामाजिक जीवन के लोग

सामान्य जीवन के सुगम रास्ते को छोड़कर कुछ अलग करने का पागलपन मनुष्य को विशेष बनाता है, लेकिन इस विशेष जीवन का चुनाव करने वाले लोग (चाहे जिस भी क्षेत्र में हों) जो क़ीमत चुकाते हैं, उस पर कभी किसी का ध्यान नहीं जाता। बनी-बनाई राह छोड़कर अपनी पगडण्डी स्वयं बनानेवाले ये दीवाने अगर विफल हो जाएँ तो समाज इन्हें मूर्ख कहकर छोड़ देता है। लेकिन यदि ये लोग सफल हो जाएँ तो वही समाज इनकी बनाई पगडण्डी पर चलने लगता है।
जोखि़म उठाने की हिम्मत और पगडण्डी बनाने के लिए झाड़-झंखाड़ से जूझने का जज़्बा विफल होनेवाले में भी उतना ही होता है, जितना सफल होनेवाले में होता है। राजनीति, अध्यात्म, साहित्य, कला, उद्योग, खेल और ऐसे प्रत्येक असामान्य क्षेत्र में काम करनेवाले हर व्यक्ति के भीतर एक ‘मनुष्य’ ज़रूर होता है, जो समाज की साधारण आँखों को कभी दिखाई नहीं देता।
✍️ चिराग़ जैन

कुण्ठित के नाम पाती

हे कुण्ठेश!
जिसकी कविता में कमी न निकाल सको, उसकी प्रस्तुति पर प्रश्न खड़े कर दो। जिसकी प्रस्तुति भी परफेक्ट हो, उसकी कविता की विषयवस्तु को कठघरे में घसीट लो। जो इस मोर्चे पर भी अंटे में न आए, उसके चरित्र पर कीचड़ उछाल दो। जिसका चरित्र भी कीचड़ से बच जाए, उसके निजी जीवन की समस्याओं को मिर्च-मसाला लगाकर सार्वजनिक कर दो। जहाँ यह वार भी बेकार जाए, उसकी ड्रेसिंग सेंस और रंग-रूप का मखौल बना लो… कुल मिलाकर हर सफल रचनाकार के लिए कोई न कोई ऐसा तीर ढूंढ ही लाओगे कि उसकी एकाग्रता भंग कर सको। और जिस पर सारे वार बेकार हो जाएँ, उसकी रचनाओं की मात्राएँ गिनने बैठ जाओ।
कितने ठाली हो बे! जो सरल भाषा में कविता सुनाए, उसे सतही कहते हो, और जिसकी भाषा परिष्कृत हो उसे क्लिष्ट कहते हो। किसी मानसिक चिकित्सक को क्यों नहीं दिखा लेते हो यार? इतनी बड़ी परंपरा में कोई एक तो ऐसा होगा, जो सही भी हो और सफल भी हो। कभी फूटे मुँह से उस एक की ही प्रशंसा की होती।
महाभारत में इतने सारे पात्र हैं। एक शिशुपाल से ही इतने प्रभावित क्यों हो गये हो? और भी कुछ नहीं तो शकुनि ही बनकर देख लो। कम से कम उसकी कुण्ठा के मूल में कोई कारण तो था। कर्ण ही बन जाओ, अर्जुन से स्पर्धा करने के लिये अर्जुन को गाली देने की बजाय उसके समकक्ष प्रतिभा जुटाकर उससे सामना होने की प्रतीक्षा तो कर के देखो।
जितना श्रम गाली देने में झोंक कर शिशुपाल बने फिरते हो, उसका दसवां हिस्सा भी गीत लिखने में लगाया होता तो सूरदास बनकर कृष्ण के नाम से मशहूर हो गए होते।
ऋषियों को तंग करनेवाले बाली को ऋष्यमूक पर्वत से तड़ीपार होकर जीवन बिताना पड़ता है। नल-नील ही बन गए होते कि ऋषि के शाप को भी सेतुनिर्माण में वरदान की तरह प्रयोग करना सीखते। लेकिन तुमने तो शपथ उठा रखी है हिरण्यकश्यप बनने की। वरदान की देहरी पर से भी अभिशाप ही उठाने की भीष्म प्रतिज्ञा किये बैठे हो।
याद करो बे! कथाओं ने हमेशा सीता के साथ वनवास स्वीकारा है, कोई भी कथा कभी धोबी के पीछे-पीछे उसके आंगन तक नहीं आयी।
बहुत सुंदर है रे ये बगिया। इसकी क्यारियों में फूल बनकर खिलने का शऊर नहीं सीख सको तो इसके खिले हुए फूलों को टिड्डीदल की तरह नष्ट न करो। क्योंकि जब भी टिड्डियों ने बगीचे पर धावा बोला है तो अंततः टिड्डियों का ही अस्तित्व नष्ट हुआ है। बगीचे का क्या है, वह तो अगले मौसम में फिर खिल उठेगा।

✍️ चिराग़ जैन

काश हम समझ सकें!

हर इक मर्यादा के उस पार न हो जाएँ
इक रोज़ कहीं हम सब, बीमार न हो जाएँ

लाइक्स और कमेंट्स बटोरने की ललक सोशल मीडिया यूज़र्स से जो न करवा दे, वही कम है। इस होड़ में किसी की चरित्र हत्या होती हो, तो होती रहे; किसी की जीवन भर की साधना पर कालिख़ पुतती हो तो पुत जाये; किसी का जीवन बर्बाद होता हो तो हो जाये; किसी का परिवार नष्ट होता हो तो हो जाये; हमें तो बस इससे मतलब है कि हमारी पोस्ट की रीच कितनी हुई!
और पढ़नेवाले भी इतनी जल्दबाज़ी में रहते हैं कि लिखनेवाले की बात का पूर्णार्थ और भावार्थ ग्रहण किये बिना ही लाइक ठोककर आगे बढ़ जाते हैं। कुछ लोग तो पढ़ने की जेहमत भी नहीं उठाते और हर पोस्ट को लाइक करते हुए अभियान की तरह फेसबुक का दौरा करते हैं। इस प्रवृत्ति के कारण सोशल मीडिया की विश्वसनीयता और नैतिकता लगभग ध्वंस हो चली है।
इण्डियन आइडियल नामक एक रिएलिटी शो में श्री संतोष आनन्द जी को अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया तो संतोष जी के अनुभव तथा जीवन यात्रा को सुनकर लोगों की आँखें भर आईं। इस भावुकता में नेहा कक्कड़ ने संतोष जी को पाँच लाख रुपये की राशि ‘भेंट’ करने की पेशकश की तो संतोष जी ने यह कहकर अस्वीकार कर दिया कि ‘मैं बहुत स्वाभिमानी व्यक्ति हूँ इसलिए यह राशि स्वीकार नहीं कर सकता।’ इस पर नेहा ने रुंधे हुए गले से कहा कि मैं आपकी पोती हूँ और आप मेरी ख़ुशी के लिए यह राशि स्वीकार करें।
इस घटना को कुछ लाइक-लोलुपों ने यह कहकर फेसबुक पर पोस्ट किया कि ‘इतना मशहूर गीतकार भीख मांगकर गुज़ारा कर रहा है।’
उफ़, इस एक शब्द ने नेहा कक्कड़ के वात्सल्य और संतोष आनंद जी के स्वाभिमान; दोनों को गाली दी। हमें याद है जब संतोष जी के परिवार पर सबसे बड़ा दुःख टूटा था तब भी हमने संतोष जी को टूटते हुए नहीं देखा। अपने जवान बेटे की श्रद्धांजलि सभा में जब संतोष जी ने माइक थामा तो उनके बूढ़े जिस्म के सम्मुख उनका आत्मविश्वास तथा उनका जीवट सूर्य की तरह दमक रहा था। जिन संतोष आनंद का जीवन हिम्मत और स्वाभिमान के लिए अलंकृत होना चाहिए उनके जीवन को दया की कहानी बनाने का कुप्रयास किसी पाप से कम नहीं है।
कलाकार समाज की धरोहर भी होता है और उत्तरदायित्व भी। कलाकार समाज के एकाकी क्षणों का सम्बल होता है। कलाकार किसी व्यक्ति के भीतर चल रहे घमासान में उसके आत्मबल की ढाल होता है। न जाने कब, कौन-सी कविता, किसी मनुष्य को आत्मघात से बचा लाती है। न जाने कब कौन-सी पंक्ति किसी मनुष्य को अपराधी होने से रोक लेती है। न जाने कब कौन-सा संगीत भीतर ही भीतर घुट रहे मनुष्य को अभिव्यक्त होने में सहायता कर देता है।
कला की यह सामाजिक उपयोगिता समझनेवाले लोग कलाकारों का सम्मान करते हैं। इन अनुभवों से गुज़रे हुए लोग जब अपने प्रिय कलाकार को कोई राशि अर्पित करते हैं तो वह ‘भीख’ नहीं, ‘भेंट’ कहलाती है। सड़क किनारे ठण्ड में ठिठुर रहे किसी निर्धन के प्रति करुणा से भरकर उसे चादर या कम्बल ओढ़ाने में और अपने पिता को दुःशाला ओढ़ाने में जो अन्तर है; वही अन्तर ‘भीख’ और ‘भेंट’ में है।
सोशल मीडिया की जल्दबाज़ प्रवृत्ति से किसी के स्वाभिमान पर कैसा वज्रपात होता है; काश यह बात लोग समझ सकें।
किसी की निजता को बदनाम करके अपने पेज की रीच बढ़ाना कितना घातक चलन है; काश यह बात लोग समझ सकें।
काश यह बात लोग समझ सकें कि शब्दों के घाव कभी नहीं भरते। काश, कुछ भी लिख देने से पहले यह बात लोग समझ सकें कि संन्यास लेकर भी सम्राट अशोक अपने हाथों मारे गये लोगों को जीवित नहीं कर सके थे।

✍️ चिराग़ जैन

शिक़ायत करना मना है

दशकों तक परिश्रम करके तंत्र ने जनता को इतना सहनशील बनाया है कि लाख परेशानियाँ सहकर भी जनता शिक़ायत करने से परहेज करे। हम गाहे-बगाहे सत्ता और राजनीति को कोसते हैं। टेलिविज़न के सामने बैठकर राजनेताओं को भ्रष्ट कह लेते हैं; लेकिन हमारे सामने कुर्सी पर बैठा क्लर्क सामने खड़ी जनता को इंतज़ार करने के लिये छोड़कर फोन पर इश्क़ फरमा रहा होता है और हम उसे टोकने की जेहमत नहीं उठाते। खिड़की के उस पार बैठी महिला बराबरवाली महिला से कुरकुरी भिंडी की रेसिपी समझ रही होती है और हम खिड़की के इस पार खड़े भिंडी पक जाने की प्रतीक्षा करते रहते हैं।
अब तो हमारी सहनशीलता का इतना विकास हो चुका है कि निजी सेवाक्षेत्र, जो ‘क्लाइन्ट सेटिस्फेक्शन फर्स्ट’ जैसे सिद्धांतों के साथ काम करता था, वह भी अब हमें क्लाइंट नहीं, जनता समझने लगा है। वे भी जान गये हैं कि इन्हें परेशान करके कभी कोई नुक़सान नहीं होगा; क्योंकि जब कोई ख़ुद को क्लाइंट समझकर हमसे हमारी ख़राब सर्विस की शिकायत करेगा तब उसके पीछे हमारी उसी ख़ामी को झेल रहे सैंकडों लोग जनता की तरह मौन खड़े रहेंगे। उस समय बर्दाश्त करनेवालों के अनुपात में प्रतिक्रिया करनेवाला वह बेचारा अल्पमत में होने के कारण तर्कों के साथ हार जायेगा और ख़ामोश खड़े रहकर तमाशा देखनेवाले बहुमत के साथ जीत जायेंगे। इन जीते हुए लोगों में से अनेक मन ही मन उस प्रतिक्रियावादी का सम्मान करेंगे, कुछ उसे झगड़ालू और कलेशी कहेंगे, कुछ उस पर हँसेंगे और वह एक अकेला भी धीरे-धीरे सहनशील जनता की भीड़ में शामिल हो जायेगा।
पिछले दिनों एक निजी एयरलाइंस में क्रू के किसी दुर्व्यवहार का विरोध करने पर एक प्रतिक्रियावादी को पूरे क्रू ने जहाज से उतरते ही ज़मीन पर गिरा-गिराकर पीटा, पर शेष जनता चुपचाप देखती रही। निजी कंपनियाँ ‘कंपनी पॉलिसी’ के नाम पर आपकी किसी भी समस्या का समाधान करने से पल्ला झाड़ लेती हैं और आप उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाते क्योंकि उनकी शिक़ायत लेकर आप जहाँ जाएंगे, उन थानों और न्यायालयों में आप पहले ही ‘जनता’ सिद्ध हो चुके हैं। वहाँ आपको दुर्व्यवहार और प्रतीक्षा करवाने में तंत्र को कोई आपत्ति नहीं होती, क्योंकि जब इन संस्थाओं में ऐसा चलन शुरू हुआ होगा तब भी मौन रहनेवाले ऐसे ही प्रतिक्रिया करनेवालों पर हँसे होंगे।
‘कौन पचड़े में पड़े’; ‘अपना काम बनता…’ और ‘हमें क्या लेना-देना’ जैसे जुमले बोलनेवाले लोग जब सिस्टम की ख़ामियों का रोना रोते हैं तब ऐसा लगता है जैसे कोई बलात्कारी भेड़िया, स्त्रियों की सुरक्षा का भाषण दे रहा हो। सरकारी नीतियों में सुधार के सपने देखनेवालों को यह समझना होगा कि अच्छी या बुरी, जो भी वर्तमान नीतियाँ हैं, उनके क्रियान्वयन का ज़िम्मा उसी व्यक्ति का है, जो टेबल के उस तरफ़ बैठा फोन पर चौपाल जमा रहा है। यदि उसके इस आचरण पर उसे टोका न गया तो उसकी ख़ामी सरकार को कभी नहीं दिखाई देगी, क्योंकि सरकार के सामने वह कभी लापरवाही नहीं करता।
इस देश में रोज़ लाखों लोग सिस्टम के सामने लाचार खड़े रहते हैं और करोड़ों लोग राजनीति को कोसने में व्यस्त रहते हैं। इस देश में भारत के लोककल्याणकारी राज्य होने का संविधानी दावा रोज़ सैंकड़ों मौत मरता है लेकिन हम मान बैठे हैं कि केवल राजनीति को गाली देकर ही अपने साथ हुए अन्याय की भड़ास निकालना उचित है, क्योंकि अन्याय करनेवाले को डायरेक्ट कुछ कहा तो वह हमारे काम को और मुश्किल कर देगा।

✍️ चिराग़ जैन

प्रेम : पावनता का द्वार

एक पहर ठहरी सखी, कान्हा जी के ठौर।
पहुँची कोई और थी, लौटी कोई और।।
योगेश छिब्बर जी का यह दोहा भारत में प्रेम के उत्कर्ष को समझने के लिये पर्याप्त हैं। भारत में प्रेम का चरम यह है कि मीरा ने जो प्रेमगीत रचे, वे भक्ति की मानक कविताएँ बनकर जग में प्रसिद्ध हुए। यह भारतीय संस्कृति ही है कि यहाँ प्रेम और भक्ति के बीच की योजक रेखा पर सर्वश्रेष्ठ साहित्य रचा जाता है।
यहाँ साकार और निराकार के भेद को समझने के लिये अकेले राधा का प्रेम समझना पर्याप्त हो सकता है। यहाँ सुभद्रा और अर्जुन के प्रेम का सम्मान करने के लिये स्वयं कृष्ण अपने वंश की परंपरा को तोड़ने का बीड़ा उठाते हैं। यहाँ शबरी का प्रेम, प्रतीक्षा की गहरी नदी में खड़े-खड़े इतना निश्छल हो जाता है कि स्वयं श्रीराम उसके कौतूहल का सम्मान करते हुए अतिथि सत्कार की टूटती हुई परंपरा को अनदेखा कर देते हैं।
यहाँ भक्ति कब प्रेम बन जाए और प्रेम कब भक्ति बन जाए, इसका अनुमान लगाना कठिन है।
हमारे यहाँ वसन्त का मौसम प्रेम का मौसम माना गया है, साथ ही वसन्त पंचमी का दिन ज्ञान की देवी सरस्वती को भी समर्पित है। मदनोत्सव के साथ सरस्वती के पूजन का यह संयोग भारतीय संस्कृति के संतुलन प्रमुख होने का सबसे बड़ा प्रमाण है।
प्रेम, मनुष्य होने की पहली अर्हता है, अतएव प्रेम के अभाव में मनुष्यता की कल्पना भी नहीं की जा सकती। प्रेम और पवित्रता का अनुप्रास हमारे देश की अधिकतम प्रेम कथाओं में सहज ही घटित हो जाता है।
राधा और कृष्ण को प्रतीक मानकर रचा गया श्रृंगार हमारे प्रेम को सगुण और निर्गुण के मध्य ऐसे नखत की तरह जड़ देता है कि एक भी पंक्ति अपनी मर्यादा की धुरि से रंचमात्र भी इधर-उधर नहीं हो पाती।
प्रेम से आपूरित हृदय स्वयं तो सुन्दर होता ही है, साथ ही वह अपने आसपास के वातावरण को भी सुन्दर बनाता चलता है। वह पारिजात के उस वृक्ष के समान होता है जो अंधियारी रात जैसे जीवन में भी इस विश्वास के साथ भरपूर खिलता है कि यदि अंधियारे के कारण उसके सौंदर्य को कोई न भी भोग सका, तो भी उसकी सुवास से कुछ पहर तो रात का वीराना सँवर ही जाएगा। यही निस्पृहता हमारे प्रेम को विशेष बना देती है।
एक बात और, प्रेम कभी घटता-बढ़ता नहीं है। वह तो जब अपने पूरे सौष्ठव के साथ किसी सम्बन्ध में रम जाता है तो फिर धरती में गड़े किसी बीज के समान उस पर अपनत्व, अधिकार, विश्वास और दायित्व-बोध के फूल खिलते हैं। यह लौकिक प्रेम की सहज नियति है। जो लोग इस नियति को स्वीकार न करके इन फूलों को अनदेखा करके, उसी बीज की तलाश में सम्बन्ध की जड़ खोदने लगते हैं, वे सब कुछ खो बैठते हैं।
प्रेम, जीवन में घटित होनेवाली सबसे स्वाभाविक, सहज और सुन्दर घटना है। इसकी शाखाओं का विस्तार इसके बीज के अस्तित्व का साक्षी है, इसका पल्लवन इसके बीज के समर्पण का गवाक्ष है। इसे केवल समय और स्थान की आवश्यकता होती है, अपने हिस्से का धूप-पानी यह प्रकृति से स्वतः जुटा लेता है।
देह से विदेह तक विस्तृत प्रेम को अभिव्यक्त करता एक कबीराना दोहा और उद्धरित करना चाहूंगा-
जब मैं था, तब हरि नहीं, अब हरि हैं, मैं नाय।
प्रेम गली अति साँकरी, जा में दो न समाय।।

✍️ चिराग़ जैन

व्यवस्थित अव्यवस्था

सिस्टम… यह एक ऐसा शब्द है, जो किसी भी भारतीय भाषा में अनूदित होकर प्रपंच बन जाता है। ईश्वर को जब सृष्टि का सर्वाधिक दीन प्राणी बनाना था, तो उसने भारतीय सिस्टम में फँसा मनुष्य बना डाला।
हमारा संविधान प्रत्येक नागरिक को ‘समानता का अधिकार’ देता है; इसलिए हमारा सिस्टम भी अपनी गिरफ़्त में आए सभी नागरिकों को समान रूप से प्रताड़ित करता है।
इस सिस्टम में सबसे ऊपर है, विधायिका। स्कूली किताबों ने विधायिका के विषय में यह अफ़वाह फैलाई है कि विधायिका क़ानून बनाती है। जैसे ही स्कूल की आदर्शवादी रामचरितमानस से निकलकर मनुष्य व्यवहारिकता की महाभारत बाँचता है तो उसे समझ आ जाता है कि विधायिका को सामान्य भाषा में राजनीति कहा जाता है और उसका केवल एक ही काम है- चुनाव जीतना। इस काम में राजनीति अपना जी, और नागरिकों की जान भी दाँव पर लगाने से नहीं चूकती।
संसद में क़ानून बनाने से लेकर सड़क पर भाषण देने तक और हँसने-रोने से लेकर उठने-बैठने और यहाँ तक कि जीने-मरने तक का एक ही लक्ष्य होता है, चुनाव जीतना। जिस कार्य से चुनाव जीता जा सके, उसे करने में राजनीति कभी पीछे नहीं रहती। फिर वह कार्य किसी को जीवन देने का हो या किसी का जीवन लेने का। राजनेता चुनाव जीतने के लिए ही दंगा शुरू करवाते हैं और फिर चुनाव जीतने के लिए ही दंगा बन्द भी करवाते हैं। टीवी डिबेट में गाली-गलौज से लेकर अपने-आप पर जूते-चप्पल फिंकवाने में भी इन्हें कोई परहेज नहीं होता। चुनाव जीतने के लिए ही बयान दिये जाते हैं और चुनाव जीतने के लिए ही उन बयानों से पलटा जाता है। नेता उपलब्ध है अर्थात् उसे वोट चाहिए और नेता व्यस्त है, अर्थात् उसे वोट मिल चुका है। चुनाव जीतने की इस मारामारी में जनता के दुःख-दर्द की सुधि लेने की फुर्सत किस कम्बख़्त के पास है?
अतएव, हे पार्थ! किताबों में लिखी लोकतंत्र की परिभाषाओं से भ्रमित न होओ। लोकतंत्र में तुम्हारी देह की स्थिति एक उंगली से अधिक नहीं है। यदि वोट देने के बाद उस उंगली का प्रयोग करने का विचार भी मन में आया तो यह व्यवस्था तुम्हारी शेष देह को जीते जी ही नारकीय कष्टों से अवगत करा देगी और फिर तुम युग की समाप्ति तक अपनी आत्मा पर अपनी देह का बोझ लादे हुए जीवित रहोगे। चूँकि सिस्टम की आत्मा होती ही नहीं है इसलिए उसकी आत्मा कभी मरती भी नहीं है। और जनता की आत्मा महाराज कुंभकर्ण के सिंहासन पर पैर पसारकर सोई हुई है।
विधायिका के इस विराट स्वरूप को जानने के पश्चात भारतीय नागरिक के मन में न्यायपालिका के स्वरूप को जानने की जिज्ञासा उत्पन्न होती है। चूँकि न्यायपालिका किसी के साथ भेदभाव नहीं करती अतः अपने द्वार पर आनेवाले सभी मुक़द्दमों को समान रूप से लटकाती है। काग़ज़ और औपचारिकताओं के भीषण जंजाल में फँसे न्यायालय की लय विलंबित प्रवृत्ति की है। इसलिए न्यायालय में एक बार प्रवेश करते ही मनुष्य के जीवन में ठहराव-सा आ जाता है। छह महीने प्रतीक्षा करने के बाद एक तारीख़ आती है, उस तारीख़ पर कई घण्टे प्रतीक्षा करने के बाद प्रार्थी को अपने मामले का नाम सुनाई देता है। बंदा इस आवाज़ को सुनने की ठीक से ख़ुशी भी नहीं मना पाता, कि तब तक दूसरे मामले की आवाज़ लग जाती है। लटके हुए मुँह को लेकर प्रार्थी कोर्ट के बाहर आता है तो वक़ील अगली तारीख़ नोट करवाकर उससे अपने परिश्रम का मेहनताना वसूलने की भूमिका बनाने लगते हैं। घुटन भरे इन न्यायालयों के पास पीड़ित के लिए केवल टूटन है, जिसे बटोरने का लिए लोग अखण्ड ज्योत से भी अधिक निष्ठावान बनकर माननीय न्यायालय में हर तारीख़ पर उपस्थित रहने के लिए विवश हैं। स्वाधीनता के बाद से अब तक किसी न्यायाधीश ने ‘न्याय’ को समय पर उपस्थित होने के समन जारी किए होते तो कदाचित न्याय व्यवस्था की ओर उम्मीद से देखती करोड़ों आँखें पथरा न गई होतीं।
विधायिका से जर्जर हुई देह और न्याय की प्रतीक्षा में पथराई हुई आँखों के साथ भी यदि किसी नागरिक में साँस बच जाएँ, तो उसके लिए लोकतंत्र में कार्यपालिका की पर्याप्त व्यवस्था है। यह कार्यपालिका सुरसा माई के मुख की भाँति असीम है। वायुमण्डल में जहाँ-जहाँ तक वायु है वहाँ-वहाँ तक कार्यपालिका है। यह कार्यपालिका विधायिका द्वारा बनाए गए विधान के आधार पर नागरिकों से ‘प्रत्यक्ष कर’ वसूल करती है। अपराध रोकने में इसकी कोई रुचि नहीं है, अपितु इसका पूर्ण विश्वास है कि अपराध मनुष्य की स्वाभाविक वृत्ति का अंग है, इसलिए यह हर नागरिक को अपराधी मानते हुए उससे अभद्र तथा अपमानजनक व्यवहार करती है। क्लर्क से लेकर हवलदार तक और अधिकारी से लेकर चौकीदार तक; सब व्यवस्थित रूप से जनता को यह समझाते रहते हैं कि सिस्टम से उलझने की भूल मत कर बैठना… क्योंकि लोकतंत्र में तंत्र से अधिक महत्वपूर्ण तो लोक भी नहीं होता।
हमने अपने बुजुर्गों से शायद कभी नहीं पूछा, लेकिन अगर हमारी पीढ़ियों ने हमसे इस सिस्टम के इस हाल का कारण पूछ लिया, तो उस समय हमारी ख़ामोशी हमें ख़ुद को भीतर तक बेन्ध जाएगी।

✍️ चिराग़ जैन

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